Monday, January 12, 2015

जो लड़का देखता था

वो दिसम्बर की एक सर्द सुबह थी. जिधर देखो घना कोहरा...लड़के ने खिड़की से बाहर झाँका और खुश हो गया. उसक पसन्दीदा वातावरण था. टी.वी की न्यूज़ एंकर लाख कहती रहे, घने कोहरे से जनजीवन अस्त-व्यस्त, लड़के की दिली तमन्ना थी कि आने वाले दो-तीन दिन यूँ ही रहें...घने कोहरे में डूबी सड़कें, पेड़-पौधे...और उनको चीरती दूर से आ रही किसी मोटर की मद्धिम सी हेडलाइट.

लड़के ने एक बार फिर घड़ी पर निगाह डाली. सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे. यानि लड़की से उसकी मुलाकात में मात्र 25 घण्टों का फ़ासला...और कुछ सौ किलोमीटर की दूरी... कल के बारे में सोच कर ही उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी. क्या करेगा वो कल, जब महीनों बाद उसकी ज़िन्दगी उसके सामने होगी...? वो तो जो करेगा, सो करेगा, पर लड़की कैसे और क्या करेगी, सोच के उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान खिल गई...पगली है वो तो...

हाँ सच में, पागल ही तो थी वो दुनिया की सबसे ज़्यादा भोली और मासूम लड़की...। दुनिया के लिए वह चाहे जो भी हो, उसके लिए हमेशा किसी बच्चे-सी मासूम ही रहेगी. उसकी हरकतें, ख़्वाहिशें, बातें, शिकायतें...उसकी उम्र की लड़कियों के मुकाबले वो कोरा पागलपन होगा, पर वो ऐसी ही थी...कम-से-कम उसके सामने वो अपने असली रूप में होती थी...हमेशा...

लड़की की नज़र से

जिस दिन से लड़के ने उसे बताया, मिलने को तैयार रहना, तुम्हारे शहर आ रहा हूँ...लड़की के मानो पंख लग गए थे. लड़के ने टिकट कन्फ़र्म होते ही सबसे पहले उसे ही सूचना दी थी. अपनी आदत के मुताबिक लड़की ने उसी समय उससे आने और जाने की दोनो ट्रेनों की पूरी डिटेल्स मँगवा ली थी. लड़के को कभी कभी हल्की कोफ़्त भी होती थी...वो कहीं भी जाए...मीलों दूर बैठी वो आखिर कर क्या लेगी...? क्या ड्राइवर के माथे पर दोनाली टिका कर बोलेगी, ट्रेन जल्दी-जल्दी...बिना रुके चलाने को...? या फ़िर बाकी की सब ट्रेनें रुकवा कर उसके लिए लाइन क्लीयर करवाएगी. पर उसकी बहुत सारी बचकानी ज़िदों की तरह वो हमेशा उसकी ये ज़िद भी मान जाता था...चुपचाप...

लड़की को भी वैसे तो कोहरा बहुत पसन्द था, पर जाने क्यों अबकी उसकी ख़्वाहिश थी कि जब लड़का उसके पास आए, आकाश में तेज़ धूप खिली रहे...पूरे दिन...

"मैं तुम्हारे साथ उस खिली धूप में छत पर बैठना चाहती हूँ..." लड़की ने जब कहा तो लड़का हल्का चौंक गया,'छत...? माने...? अबकी तुम बाहर नहीं मिलोगी क्या...?'

लड़की उसके सामने नहीं थी, पर वो जानता था, उसकी बात सुन कर उसने उसी यूनिक तरीके से मुँह बिचकाया होगा,‘आर यू आउट ऑफ़ योर माइंड ऑर वॉट, मिस्टर...? भूल गए, उस पूरे हफ़्ते घर में बस मैं और दी ही रहेंगे...पूरी फ़ैमिली निखिल भैय्या की शादी में शहर से बाहर रहेगी न...'

लड़के के दिल की धड़कन ये सोचने मात्र से बढ़ सी गई थी. सहसा लड़की भी खामोश हो गई थी... दोनो की चुप्पी भी मानो कितना कुछ कह रही थी. लड़की ने दिन गिने थे...मात्र पच्चीस दिन...और एक बार फ़िर कुछ लम्हें...कुछ घण्टे सिर्फ़ उन दोनो के...लड़की ने मन-ही-मन हिसाब लगाना शुरू कर दिया था....अब की मिलेगी तो क्या-क्या कहना है उसे लड़के से...सब कुछ उसने अपने मन की डायरी में नोट करना शुरू कर दिया था. लड़का तो अपने पास किसी भी रूप में ये सब बातें नोट कर भी लेता था, पर लड़की चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकती थी. घर पर किसी ने भी पढ़ लिया तो उसके बाद जो भयानक तूफ़ान आता, उसकी कल्पना मात्र से वह सिहर उठती थी. उसका जो भी हो, उसे परवाह नहीं थी, पर लड़के पर राई भर भी बात आए, ये उसे बिल्कुल गवारा नहीं था.

यूँ तो लड़का कभी उसकी किसी भी बात से इरीटेट नहीं होता था, या कम-से-कम उसे तो यही जताता था, पर जाने क्यों अब उससे ही जाने-अन्जाने ऐसी ग़लतियाँ होने लगी थी जिसे करने के साथ ही उसे अहसास हो जाता था कि उसकी वो ग़लती शायद माफ़ी के क़ाबिल नहीं... लड़के की जगह कोई और होता तो उसे कभी माफ़ न करता, पर वो तो बस वो ही था न...लड़की को दिल के किसी कोने में एक ढाँढस रहता था कि ज़िन्दगी में अगर कभी वह सच में ऐसा कुछ ग़लत कर बैठी, तो और कोई उसके साथ हो न हो, लड़का तब भी मजबूती से उसके साथ खड़ा नज़र आएगा. अबकी बार उसके पहले नम्बर पर उन सब गलतियों के लिए लड़के को एक्स्प्लनेशन देना था.

गिनते-गिनते आखिर वो दिन आ ही गया। रात में खुशी के मारे लड़की की नींद कई बार टूटी, पर सुबह वह हर दिन से ज़्यादा तरोताज़ा थी. भगवान भी जैसे उसके साथ थे, तभी तो बहुत खिल कर धूप निकली थी...कई दिन के छाए कोहरे के बाद...अचानक ही... लड़की ने चुपके से दुआ माँगी...लड़के की ज़िन्दगी में भी अभी जो कोहरा छाया है, वो भी ऐसे ही छँट जाए...

कॉलबेल बाद में बजी, चेहरे पर हज़ार वॉट की मुस्कान लिए हुए लड़की ने दरवाज़ा पहले खोल दिया. लड़का दो पल अपलक उसे देखता रह गया. 'मिस्टर...यूँ ही देखते रहने का इरादा है या अपनी एक इच्छा भी पूरी करोगे...?' कहते हुए जब तक वह कुछ समझ पाता, लड़की ने एक झटके से उसे अपनी बाँहों में भरा और जाने क्या फ़ुसफ़ुसाते हुए अलग भी हो गई...लड़का लाख पूछता रह गया, पर लड़की ने उसकी बात पूरी तौर से इग्नोर कर दी... वो कैसे बताती कि उसके इस अप्रत्याशित हरकत से हतप्रभ रह गए लड़के से उसने कहा था, 'Hold me back...tightly...You Stupid...'

लड़के को आया देख कर दी भी बाहर आ गई थी. उनसे बात करते हुए जितनी बार लड़के की निगाह लड़की से टकराई, वो उसे अपलक ताके जा रही थी...मानो उसकी मौजूदगी के हर पल को वो हमेशा के लिए अपनी यादों में फ़्रीज़ कर लेना चाहती हो. लड़का हमेशा की तरह सब समझ रहा था...उसकी न रुकने वाली बेतहाशा हँसी...उसकी वो हल्की सी मुस्कान...और उन सबके पीछे कहीं बहुत गहरे छिपे उसके आँसू...

लड़के को तो जैसे महारत हासिल थी उसका मन पढ़ने में...वो लाख कोशिश कर लेती कि उससे बात या मैसेज करते समय वो अपने मनोभाव छुपा ले, पर हर बार चोरी पकड़ी जाती. ऐसे में लड़की का फ़ेवरिट डायलॉग होता,'बताओ मिस्टर...ये तुमने अपना कैमरा छुपाया कहाँ है...? आखिर तुमको पता कैसे चल जाता है सब असलियत...’ जवाब में लड़का बस्स...क्यूँ बताऊँ...कह कर बात ऐसे पलट देता कि बातें खत्म होते-होते लड़की सब कुछ भूल कर बस खिलखिला रही होती. लड़की ने बहुत कोशिश की कि वो भी ये कला सीख जाए...जब कभी लड़का यूँ उदास हो, वो उसको भी हँसा सके...पर ऐसा हो कहाँ पाता था. लड़का हमेशा कहता था कि वो उसकी हर बात जानती है, पर फिर भी लड़के की उदासी के पलों में अक्सर उसे महसूस होता...उन दोनो के बीच कोई तो पारदर्शी दीवार थी...जिसके उस पार लड़के के दुःख थे और जहाँ उसका पहुँच पाना लड़के ने जानबूझ कर प्रतिबन्धित कर रखा है...

थोड़ी देर उनके पास बैठ कर...चाय-नाश्ता करवा कर दी ऑफ़िस चली गई थी. दी को उन दोनो पर पूरा भरोसा था. अकेले रहने के बावजूद दोनो अपनी सीमा से बाहर नहीं जाएँगे, ये वो बहुत अच्छे से जानती-मानती थी. घर से बाहर तो लड़की अनगिनत बार लड़के के साथ अकेली रही थी, पर घर की चारदीवारी में उसके साथ बिल्कुल अकेले रहने का यह पहला मौका था. कुछ देर वे दोनो ही एक अजीब सी खामोशी में घिरे बैठे रहे...फिर लड़की ने ही चुप्पी तोड़ी थी, 'सुनो साहब...ये न समझना कि तुम मेरे घर आए हो तो नवाबों की तरह बैठे रहोगे और मैं दौड़ दौड़ कर तुम्हारी चाकरी करूँगी...तुमको भी सब काम में मेरा हाथ बँटाना पड़ेगा...Is that clear...?'

लड़की और भी जाने क्या-क्या हिदायतें दिए जा रही थी, पर लड़का बस मन्द-मन्द मुस्कराता हुआ उसे अपलक देखे जा रहा था, मानो वो कोई बच्ची हो और वो उसकी तोतली ज़बान सुन कर आनन्दित हो रहा हो. लड़की सहसा चिढ़ गई, 'ऐसे न देखो मिस्टर...मैं तुमसे बड़ी हूँ...रिमेम्बर...?'  ये भी लड़की की अजीब सी सनक थी, उससे बड़ा बनने की...। इसके लिए उसने एक अजीब फ़ण्डा बनाया हुआ था,’तुम 87 में पैदा हुए हो...मैं 88 में...हुई न तुमसे एक साल बड़ी...? चलो, अब से आइन्दा इज्ज़त से पेश आना मेरे साथ...।' लड़का भी पलटवार करता,'अच्छाऽऽऽ...एक भी बात या हरकत बता दो अपनी जिससे साबित होता हो कि तुम बड़ी हो गई हो...बच्ची नहीं हो अब भी...?’ और लड़की बहुत याद करने पर भी एक बात ऐसी नहीं बता पाती थी, जो उसने लड़के के सामने समझदारी से की हो... ऐसे में वो बुरा सा मुँह बना कर रूठ जाती और फिर लड़के को ही मनाना पड़ता उसको...एक बच्ची की तरह...

लड़की उस दिन भी अपने उसी फ़ुलटूश बचकाने मूड में थी... ‘चलो जीऽऽऽ...भगवान जब मेरे सपने आज पूरे कर ही रहा है, तो छत पर चल कर धूप भी सेंकते हैं तुम्हारे साथ...’ लड़की लड़के का हाथ पकड़ कर उसे लगभग खींचते हुए छत पर ले गई...वहाँ भी उसकी बतकही में कोई कमी नहीं आई थी, पर जाने कैसे, किस मोड़ पर बात लड़की के जीवन के कुछ दुःखद पलों पर चली गई, दोनो ही नहीं जान पाए... लड़की नहीं चाहती थी कि सब कुछ जानने-समझने के बावजूद उस खूबसूरत से दिन...उन मधुर पलों में लड़का उसके आँसू देख कर ज़रा भी उदास हो...इस लिए जैसे ही भागने के लिए वो उठी, लड़के ने तेज़ी से उसका हाथ थाम उसे अपने सीने से लगा लिया. लड़की ने बहुत हल्का-सा विरोध किया, पर अन्दर-ही-अन्दर वो यही चाह रही थी. अपने सीने से कस कर चिपकी सुबकती लड़की के बालों में प्यार से हाथ फिराते लड़का सिर्फ़ यही दोहरा रहा था,’Its Okay Sweetheart...सब ठीक हो जाएगा...’

कुछ पलों में शान्त होकर भी लड़की वैसे ही उसके गले में बाँहें डाले आँखें बन्द किए खामोश बैठी रही. वो मन-ही-मन बुदबुदा रही थी,’भगवान जी...मुझे कभी इन बाँहों के घेरे से अलग न करना... कितना सकून...कितनी सुरक्षा है इनमें...। and you mister...Listen...Just hold me tightly, You Idiot..'


बिना कुछ भी सुने...बिना कुछ भी जाने...और बिना कुछ भी सोचे...लड़के ने भी अपनी आँखें मूँदी और मन में बोला...आमीन !!

कुछ पल...तुम्हारे नाम...

Wednesday, December 24, 2014

वो एक धूप का दिन था. कई दिनों बाद उस दिन धूप निकली थी. वैसे उन्हें तो सर्दियों के मौसम में धूप से कुछ ज्यादा प्यार न था, लेकिन फिर भी कभी कभी जाड़ों की नर्म धूप में उन्हें घूमना टहलना, पार्क में बैठकर सैंडविच खाना पसंद था.

बस के अन्दर बैठा वो खुश था ये सोच के कि आज वे बहुत देर तक पार्क में बैठ सकेंगे. वो यही सोच कर बस से उतरा था कि वो सीधा पार्क चले जाएगा, लेकिन हवा ठंडी थी. बेहद ठंडी. उसने बैग से अपना मफलर निकाल के कान और गले पर लपेट लिया. इतनी ठंडी हवा में आज पार्क में बैठना संभव नहीं होगा, उसने सोचा. बस के अन्दर से उसे बाहर कि सर्दी का आभास नहीं हुआ था. 

अपनी घड़ी देखी उसने. समय काफी है.. वो अभी चाहे तो बेकरी से दो सैंडविच पैक करवा सकता है, लेकिन उसे डर था कि वो पहले न आ जाए. पाँच मिनट का रास्ता था और वो तेज़ी से चलने लगा था. वो रीगल के पास आएगी. वो वहीँ उसका हमेशा इंतजार करती थी. 

लड़के को हमेशा डर रहता कि कहीं लड़की उससे पहले न आ जाए और उन दिनों अकसर ये होता था, वो उसके पहले पहुँच जाया करती थी. उस दिन भी वो खड़ी थी रीगल के सामने. कोई नयी फिल्म लगी थी और वो एक कोने में खड़ी होकर उस फिल्म के पोस्टर को देख रही थी. वो चुपके से उसके पास आकर खड़ा हो गया. लड़की उसे देखकर मुस्कुराने लगी लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे से मुसकराहट गायब हो गयी और एक चिढ़ उभर आयी चेहरे पर. लड़का समझ गया उसके गुस्से की वजह, वो मुस्कुराने लगा. 

“ऐसे क्या मुस्कुरा रहे हो बेवकूफों की तरह...ये दुनिया का सबसे आसान काम है और तुमसे ये भी नहीं होता...” लड़की ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा और लड़के के कानों पर बंधा मफलर उतार कर उसके गले में डाल दिया और नए सिरे से गिरह लगाने लगती. देखो हो गया बस. देखो अब कितना स्टाइलिश दिखता है ये. लड़की हमेशा चिढ़ जाती थी जब वो सर और कान पर मफलर लपेटे सामने आता था. ऐसे बूढ़े लोग पहनते हैं मफलर, वो कहती. और फिर थोड़ा गुस्से का नाटक करते हुए वो मफलर को बड़े एहतियात से उसके गले में एक टाई के जैसे बाँध देती. 

दोनों फिर निकल पड़ते घूमने. वे दिन भर कनॉट प्लेस घूमते थे. इनर सर्कल का एक चक्कर, आउटर सर्कल का एक  चक्कर और फिर इनर सर्कल.. दोनों तब तक कनॉट प्लेस के चक्कर लगाते रहते जब तक वे थक नहीं जाते. जब थक जाते तो वहाँ लगी सीमेंट की बेंचों पर बैठ जाते. सर्दियों में दिल्ली कितनी खूबसूरत लगती है न? कनॉट प्लेस को एक नज़र देखकर लड़की कहती. कनॉट प्लेस उसे दिल्ली का सबसे खूबसूरत इलाका लगता था. कनॉट प्लेस की ऊपरी मंजिल पर बने दुकानें, दफ्तरों और रेस्तरां को देखकर वो कहती, काश हमें ऊपरी मंजिल पर कोई कमरा मिल जाए किराये पर... कितना खूबसूरत व्यू होगा न? लड़का उसकी इस बात पर हँसने लगता, वो समझता कि वो मजाक कर रही है लेकिन लड़की का चेहरा एकदम शांत और गंभीर रहता. नहीं...ये मजाक नहीं कर रही है, लड़का सोचता. चलो एक आखिरी चक्कर लगाकर हम कॉफ़ी पीने चलते हैं, वो लड़की से कहता और वे दोनों फिर निकल जाते उस कैफे की तरफ जहाँ वे अकसर अपनी खाली दोपहरें बिताया करते थे. वे उन दोनों के खाली दिन थे, और दोनों अपना खाली वक़्त बिताने वहाँ जाया करते थे.

दो तीन गलियारों से चलते हुए वो कैफे आता जहाँ वो जाते थे, उन गलियारों में चलते हुए किसी किसी दुकान को देखकर लड़की ठिठक जाती, वो कुछ सोचने लगती. वहाँ के हर दुकान से उसकी कुछ न कुछ यादें जुड़ी हुई थी, वो शायद उन्हीं बातों को याद करती लेकिन कभी लड़के को बताती नहीं कि वो क्या सोच रही है. आर्चीज़  गैलेरी को देखकर उसे उस बूढ़ी औरत की याद आती जिसका एक बार लड़के ने उससे जिक्र किया था, जो उस दुकान में काउंटर पर रहती थी और लड़के के खरीदे एक तोहफे को देखकर उसने कहा था, “जिसके लिए ये खूबसूरत तोहफा खरीद रहे हो वो जरूर कोई स्पेशल होगी”. उस दिन लड़की इस बात को सुनकर बेहद खुश हो गयी थी.
कॉफ़ी हाउस के बाहर लड़की रुक जाती. वो उस कैफे के नाम के ऊपर लगे सिम्बल को देखने लगती. वो सिम्बल उसे कभी समझ नहीं आया. ‘ये क्या बकवास सिम्बल है?’ वो लड़के से पूछती. ‘ये दिल्ली टूरिज्म का सिम्बल है’. लड़का कहता. बकवास. वो कहती...‘इसमें डी और टी तो नज़र ही नहीं आ रहा तो कैसे हुआ दिल्ली टूरिज्म का सिंबल?हाँ टी तो दिख रहा है लेकिन डी तो किसी एंगल से नहीं, ये तो पी लग रहा है’. लड़के के पास लड़की के इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता. वो चुप रहता. लड़की फिर उसे उस सिम्बल के जाने कितने अलग अलग अर्थ उसे बताने लगती और लड़का मुस्कुराते हुए सुनते रहता. 

कैफे में दोनों एक ही टेबल पर अकसर बैठते, वो उन दोनों का एक तरह से रिजवर्ड सीट था. वो कोने में लगी एक टेबल थी, जहाँ पीछे जाने का दरवाज़ा था. वहाँ हवा आते रहती थी, और ठंड में वहाँ कोई बैठना नहीं चाहता था. लगभग वो टेबल खाली ही रहती थी. दोनों वहीँ बैठते थे, अगर किसी दिन उन्हें वो टेबल खाली नहीं मिलता तो लड़की कहीं और बैठने को तैयार नहीं होती और कैफे से बाहर आ जाती. उस टेबल पर लड़की अपने सारे समान ऐसे फैला कर रखती जैसे ये कैफे न हो उसका घर हो. बड़े ही करीने से एक के बाद एक सारे सामन वो टेबल पर रखती. स्कार्फ, दस्ताने, बैग, मोबाइल, एक छोटी डायरी जिसे वो हमेशा अपने ओवरकोट के जेब में रखती थी.
दिल्ली का ये इलाका, इस कैफे का इलाका लड़की को बहुत पसंद था, उन दिनों वे दिसंबर और जनवरी की दोपहरें यहीं बिताते थे. कैफे में दोनों बहुत देर तक बैठे रहते, और फिर जब वहाँ बैठे बैठे वे ऊब जाते, तो दोनों कैफे के ठीक सामने हनुमान मंदिर के पास आ जाते. वहाँ धूप आती थी और दोनों को वहाँ धूप में बैठना पसंद था. हनुमान मंदिर के सामने लोगों ने छोटे छोटे अपनी दुकानें खोल रखी थीं. टैटू बनाने वाले, भविष्य बताने वाले ज्योतिषी, मेहँदी लगाने वाले, चाय बेचने वाले, समोसे और कचौड़ियों की दुकानें. 

लड़की हर दुकान को बड़े गौर से देखती. ज्योतिषों को वहाँ टेबल कुर्सी लगाए बैठे हुए देखती तो अकसर सोचती, मैं भी किसी दिन अपना हाथ दिखवाऊंगी, लेकिन दिखलाती कभी नहीं थी. उसे भविष्य जानने की उत्सुकता थी लेकिन कभी खुद का हॉरस्कोप अख़बार में नहीं देखती थी, हाँ दूसरे लोगों का..उस लड़के का हॉरस्कोप हर रोज़ पढ़ती अख़बार में. लेकिन खुद का कभी जानने की कोशिश भी नहीं करती. जो होगा देख लेंगे, अभी से क्यों जानूँ मैं कि क्या होने वाला है ज़िन्दगी में. इससे तो इक्साइट्मन्ट ही खत्म हो जाएगा, वो कहती. सरप्राइज उसे पसंद थे. अच्छे बुरे दोनों तरह के सरप्राइज. ‘देखते हैं क्या होगा ज़िन्दगी में, अच्छा बुरा जो भी. अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, एक अच्छी मेमोरी दे जाएगा...एक यादगार पल, बुरा हुआ तो कुछ सिखा ही जाएगा’, वो कहती.

मेहँदी लगाने वालों को देखकर उसे भी मन करता मेहँदी लगवाने का, लेकिन लगवाती कभी नहीं थी. उसे बड़ा नाज़ था खुद पर. ‘मैंने तो मेहँदी लगाने का कोर्स किया है, इनसे कहीं बेहतर मेहँदी मैं लगा सकती हूँ’, वो कहती. ‘सोचती हूँ कि मैं भी यहाँ अपनी एक दुकान खोल लूँ? हम दोनों जो दिन भर में इतनी कॉफ़ी पी जाते हैं वो आराम से कवर हो जायेंगे, वो लड़के को कहती और सच में बैठकर दुकान खोलने की अपनी प्लानिंग लड़के को बताने लगती. 

देखो यहाँ चावल पर नाम लिखे जाते हैं. एक स्टाल के पास खड़ी होकर वो कहती लड़के से. सोचो, दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है. सोचो चावल पर नाम लिखते हैं ये, कैसे लिखते होंगे? उसके मन में उथल पुथल होने लगतीं, उसका मन करता उस दुकान वाले से जाकर एक सवाल करने का, ‘मेरा जन्मदिन है, मैं आपको खूब सारे चावल लाकर दे दूँगी, आप हर दाने पर मेरा नाम लिख दोगे? मेरे जन्मदिन पर जो आयेंगे वो देखेंगे चावल पर मेरा नाम लिखा है, ये कितना यूनिक लगेगा न? मैं पूछूं इनसे?’ वो लड़के से पूछती. लड़के को उसका ज़रा भी भरोसा नहीं था, वो सच में पूछ सकती थी ये बात उस दुकानदार से, वो उसे जबरदस्ती खींच कर उस स्टाल से दूर ले जाता. लड़की अकसर ऐसी यूनिक चीज़ें सोच लिया करती थी शायद इसलिए कि वो हमेशा खुद के लिए यूनिक चीज़ें चाहती थीं. 

यहाँ पर बन्दर कितने हैं, बंदरों को देखकर वो कहती. ‘उछलते कूदते इन बंदरों को देखो, बिना किसी फ़िक्र के बिना किसी चिंता के, फुल ऑफ़ लाइफ लगते हैं न ये बन्दर’. उसे बंदरों से बहुत डर लगता था लेकिन उन्हें देखकर वो खुश भी होती थी. 

एक बन्दर यूँहीं जब उसके पास उछल कर आया, वो बेहद डर गयी. लड़के का कोट पकड़ कर उस  में खुद को छुपा लिया उसने. लड़के ने बन्दर को भगा दिया लेकिन फिर भी वो कुछ देर तक उसी अवस्था में रही. तुम तो डर गयी देखो. डरती हो तुम इतना बंदरों से, लड़का उसे छेड़ने लगा. डरी नहीं मैं साहब, ये तो एक प्यारा मोमेंट था. वो कहती. ‘ये मोमेंट जो था अभी जिसे तुम डर कह रहे हो ये बंदरों की बदमाशी के वजह से था न. मैं तुम्हारे कोट में छिप  गयी थी, मुझे कितना अच्छा लगा. तुम्हें अच्छा लगा न? देखो कितना प्यारा सा वंडरफुल मोमेंट था ये. थैंक्स टू बंदर्स फॉर दिस वंडरफुल मोमेंट’. वो खिलखिलाकर हँस देती. 

दोनों बस स्टैंड की तरफ बढ़ जाते. चलते हुए वो लड़के के कोट के जेब में हाथ डाल देती. सर्दियों में ये उसकी आदत थी. दस्ताने वो सिर्फ एक हाथ में पहनती, एक हाथ उसका हमेशा लड़के की कोट में घुसा रहता था. बस स्टैंड तक जाने के दौरान वो अकसर लड़के से अपने एक सपने के बारे में बात करती. लगभग हर रोज़ ही. उसका एक अरमान था. वो लड़के से कहती, ‘चलो एक स्लीपिंग किट खरीदते हैं और उसे लेकर निकल जाते हैं कहीं भी, किसी भी दूसरे शहर, एक शहर से दूसरे शहर घूमते हैं, जहाँ मन किया वहीं अपना डेरा डाल लेंगे हम. 

हम जहाँ भी जायेंगे ये स्लीपिंग किट अपने कन्धों पर डाल के ले चलेंगे. जहाँ मन किया वहीं सो जायेंगे. किसी पार्क के किसी कोने में, किसी झील के किनारे, पहाड़ों पर. होटल में रुकना ही नहीं है हमें. कितनी भी सर्दी हो हम बाहर ही सो जायेंगे, जानते हो बहुत कम्फी होता है स्लीपिंग बैग, तुम्हें पता है मैं एक बार सो चुकी हूँ एक स्लीपिंग बैग में. 
‘ठण्ड में मर जायेंगे हम बाहर सोने से’. लड़का कहता उससे. 
बेकार की बातें न करो. लड़की चिढ़ जाती. ‘सोचो ये बेचारे बेघर लोग कैसे ठंड में रात गुज़ार देते हैं, हम तो फिर भी इतने कम्फी कम्फी स्लीपिंग बैग में सोये रहेंगे, कुछ भी पता नहीं चलेगा. वो कहती. बोलो चलोगे? बोलो? चलो निकलते हैं घूमने, आज ही शाम निकल जाते हैं. रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड जाकर देखते हैं जो पहली ट्रेन या बस मिली उससे निकल जायेंगे कहीं भी.. बोलो. चलोगे? बोलो जल्दी बोलो. वो जिद करने लगती. 

मजा आएगा. बहुत मज़ा आएगा. ठण्ड में खुले आकाश के नीचे सोना. सोचो तुम ज़रा. हाउ  फैसनेटिंग. गर्मियों में तो लोग सोते ही हैं लेकिन हम ठण्ड में बाहर सोयेंगे, दिसंबर और जनवरी की सर्दियों वाली रात में. हाउ वंडरफुल आईडिया इज दिस. हम दोनों स्लीपिंग बैग में कवर रहेंगे और बस हमारे चेहरे  बाहर ताक रहे होंगे आसमान को. हाउ रोमांटिक न? 

वो लड़के की तरफ देखने लगती. वो ऐसे ही अकसर लड़के को किसी विचित्र मायावी सपनों के देश में लेकर चली जाती, और लड़के को भी उसके साथ ये सब कल्पना करना अच्छा लगता था. वो भी खो जाता लड़की की इस सपनों की दुनिया में. वो दिल से चाहता, कि सच में हमें निकल जाना चाहिए  ऐसे ही घूमने, जैसे लड़की कह रही है. वो भी खो जाता लड़की के साथ साथ उसकी कल्पनाओं में. 

बस स्टैंड के ठीक सामने वाले दुकान में लड़की देखती कि स्लीपिंग किट बिकते हैं, वो जिद करने लगती, चलो न खरीदते हैं. लड़के की जवाब की प्रतीक्षा किये बैगर वो दुकान में घुस जाती. लड़का भी उसके पीछे पीछे दुकान में चला आता. 

दुकान वाले व्यक्ति से वो बोलती, हमें सबसे अच्छा स्लीपिंग किट दिखाईये, जिसमे कितनी भी ठण्ड हो, चाहे हम हिमालय पर चले जाएँ, हमें सर्दी न लगे. दुकान वाला उसके सवालों से कन्फ्यूज हो जाता. वो दिखाता जो उसके स्लीपिंग बैग होते वो. 

‘हम एक ही स्लीपिंग बैग लेते हैं, हमारे पैसे बच जायेंगे, वो कहती’. दुकान वाला लड़की की शरारती बातों से अंजान, कहता मैडम ये बस एक ही व्यक्ति के लिए बना है. ‘ओफ्फ्हो...मैं तो इतनी हलकी फुलकी हूँ, मैं इसमें एडजस्ट  कर जाऊंगी. है न? वो लड़के के तरफ देखती. 
‘बेशर्म हो तुम..’, लड़का कहता.
लड़की मुस्कुराने लगती.
दुकानदार कन्फ्यूजन में कभी लड़के को देखता तो कभी लड़की को और कभी उस स्लीपिंग बैग को जिसे देखकर लड़की ने कहा था कि हम दोनों एक में ही सो जायेंगे. 

शाम में दोनों बस से वापस लौटते थे. बस में खिड़की के पास बैठकर बाहर सड़कों को देखना, चल रहे लोगों को, गाड़ियों को देखना लड़की को पसंद था. वो खिड़की के बाहर देखकर जाने क्या क्या बोलती जाती, कभी खुद से कभी लड़के से. लड़के को ये समझ कभी नहीं आता कि कौन सी बात वो लड़के से बोल रही है और कौन सी बात खुद से. वो सो जाती लड़के के कन्धों पर. स्टॉप आने पर लड़का उसे उठाता. वो जागने से इंकार कर देती, ऐसे ही रहने दो न मुझे, वो लडके से कहती. ये मेरा सबसे बड़ा सुख है तुम्हारे कन्धों पर ऐसे सोना, लड़की कहती.

बस स्टैंड से लड़की के घर तक का रास्ता थोड़ा लम्बा था, लेकिन फिर भी वे रिक्शा नहीं लेते. वो बहुत चौड़ी और अच्छी सड़क थी. दोनों तरफ बड़े बड़े पेड़ लगे थे, पार्क थे सड़क के दोनों तरफ और उन दोनों को उस सड़क पर शाम के अँधेरे में चलना अच्छा लगता था. 

लड़का लड़की के अपार्टमेंट के अन्दर कभी नहीं जाता, वो बाहर  गेट के पास ही खड़ा रहता और तब तक खड़ा रहता जब तक लड़की अपार्टमेंट की सीढ़ियों से ऊपर न चले जाए, तब तक वो देखते रहता लड़की को. लड़की लेकिन गेट से अन्दर घुसने के बाद कभी पलट कर उसे नहीं देखती. वो हर दिन सोचता कि शायद लड़की पलट के देखेगी लेकिन नहीं देखती. वो मुस्कुरा देता, ‘ये नहीं देखने वाली’, खुद से ही कहता और आगे बढ़ जाता.

वापस उस लम्बी सड़क पर चलते हुए लड़के को बहुत अच्छा महसूस होता, उसका मन बहुत हल्का लगने लगता. वो मफलर खोलकर कान में लपेट लेता...और फिर याद आती लड़की की सुबह की फटकार. वो मुस्कुरा देता. वापस कान से मफलर निकाल कर गले में लपेट कर गिरह बाँधने की कोशिश करता, जैसे लड़की बाँधती थी. लेकिन उससे गिरह नहीं बंधती. ‘ये दुनिया का सबसे भारी काम है’, वो बुदबुदाता और गले में मफलर को यूँही लपेट लेता. 

दिल्ली के ये दिन, दिल्ली के सर्दियों के ये दिन उसके ज़िन्दगी के सबसे अच्छे दिनों में से हैं, वो सोचता और अपने घर की तरफ बढ़ जाता. 

गिरहें यादों की...

Sunday, December 14, 2014


दिसंबर तुम्हारे लिए हमेशा खुशियाँ लेकर आता था. तुम्हें दिसंबर से प्यार था ये हम सब जानते थे. दिसंबर के आते ही तुम खुश हो जाया करती थी. बेसब्री से इंतजार रहता था तुम्हें दिसंबर की पहली सुबह का. हाँ लेकिन जितना खुश तुम दिसंबर के आने पे होती थी, उतनी ही उदास तुम ये बात सोच कर हो जाया करती थी कि ये दिसंबर सिर्फ इकत्तीस दिनों में वापस चला जाएगा. मुझसे अकसर कहती थी तुम, कि जो तुम अगर दिसंबर के दिन बढ़वा दो तो दुनिया की सारी दौलत तुम्हारे नाम कर दूँगी.

तुम्हें सर्दियों में सुबह पार्क में टहलना अच्छा लगता था. सुबह के कोहरे में सड़कों पर चलना तुम्हें पसंद था. गर्मियों की सुबह जब लोग चार पाँच बजे जाग कर टहलने निकलते थे, तुम देर तक सोयी रहती थी लेकिन सर्दियों की सुबह जब सारे लोग रज़ाई में दुबके सोये रहते थे, तुम जाग जाया करती थी और मुझे ना चाहते हुए भी तुम्हारे साथ जागना पड़ता था. कितनी मिन्नतें करता था मैं तुमसे, कि सर्दियों में मुझे देर तक सोने दो, लेकिन तुम तो बस हुक्म दे दिया करती थी... एक घंटे में मिलो पार्क में. 

सुबह की शुरुआत हमारी उसी पार्क से होती थी, वो पार्क जो हमारे मोहल्ले का सबसे बड़ा पार्क था और जहाँ आते हुए हमेशा मुझे इस बात का डर रहता था कि कहीं मुझे किसी ने तुम्हारे साथ देख लिया तो? वैसे इसकी ज्यादा चिन्ता नहीं थी, सर्दियों में इतनी सुबह लोग भी कम आते थे, और मैं ख़ास सावधान भी रहता था. हम उस पार्क में पहुँचने वाले सबसे पहले लोगों में से रहते थे. तुम जहाँ टहलने में और बातें करने में मशगूल रहती थी, मैं तुम्हारी बातें सुनने में और आसपास नज़र दौड़ा कर ये देखने में व्यस्त रहता था कि कोई हमें देख तो नहीं रहा है. वैसे कोई जान पहचान वाले लोग भले न देखें, यूँ लोग तो हमें देखते थे ही. मुझे लगता है कि सुबह पार्क में हम दोनों को यूँ घूमते टहलते, बातें करते देख लोग शायद थोड़े हैरान भी होते होंगे, या क्या पता हँसते भी होंगे हम पर. पार्क में आये सभी लोगों में से सिर्फ हम दोनों ही ‘आउट ऑफ़ प्लेस’ लगते थे. एक तुम, जो सज धज कर सुबह आती थी. और दूसरा मैं, लेदर शू, लेदर जैकेट और जींस पहन कर सुबह मॉर्निंग  वाक करने आता था. ये तो तय था कि लोग हमें लवर्स समझते होंगे, वो भी मैड फॉर एच अदर टाइप लवर्स, जो एक दूसरे के लिए इतने पागल हैं कि सर्दियों की सुबह इतनी ठंड में भी पार्क में टहलने आ जाते हैं, हाथों में हाथ डाले टहलते हैं, बातें करते हैं. तुम कितना चिढ़ती थी जब मैं तुम्हें ये बात कहता था, कि देखो वे सारे हमें लवर्स समझते हैं. तुम चिढ कर कहती थी “लवर्स? ह्म्म्म...? हाँ यही समझते होंगे, मोरोन!! दोस्त हैं, ये तो समझते नहीं होंगे कोई”. बोल के तो देखे कोई लवर्स हमें, मेरे सामने... उसका जबड़ा  न तोड़ दूँ फिर कहना.. ये बोलते ही तुम सच में अपने मुक्के को दिखाती थी मुझे जिससे मैं डर जाता था. तुम्हारा कोई भरोसा भी कहाँ था, मजाक में ही सिर्फ ये दिखाने के लिए कि तुम्हें मुक्के चलाना आता है, कितनी  बार मुझपर बॉक्सिंग कर चुकी हो तुम.

उसी पार्क के पीछे वाला  गेट जो हनुमान मंदिर के तरफ खुलता था  वहाँ इम्तियाज चचा की चाय दुकान थी. सुबह टहलने आये सभी बुजुर्ग, महिलाएं और लड़के लड़कियाँ  वहाँ सुबह की पहली चाय पीते थे. हर सुबह उनके दुकान खुलने से पहले हम दोनों वहाँ पहुँच जाते थे. इम्तियाज चचा भी हमें पहचान गए थे. वो अकसर सुबह हमें देखकर एक ही बात दोहराते थे, मुझसे हँसते हुए कहते, ये लड़की मेरे दुकान के जागने से पहले जाग जाती है और चली आती है चाय पीने”. चचा की इस बात पर तुम चचा से कहती “सिर्फ आपके दुकान से पहले नहीं, इस लड़के और इस शहर से भी पहले मैं जाग जाती हूँ. यकीन न आये तो पूछ लीजिये इससे. मुझसे तो बड़ा परेशान रहता है ये लड़का. 
चचा हँसने लगते थे और उनके साथ मैं भी.

सच कहूँ तो मैं तुमसे परेशान तो बिलकुल नहीं था. तुमसे भला कभी परेशान हो सकता था मैं? लेकिन हाँ हर सुबह की तुम्हारी ये जिद कि पार्क में मिलना है, टहलना है, कोहरे में घूमना है, इस वजह से घर पर अकसर मुझे अजीब सिचुएशन का सामना करना पड़ता था. 

तुम तो तुम थी. बात मानना तो दूर, अपनी मर्ज़ी का करती थी. उन दिनों जबकि हम दोनों के पास मोबाइल फ़ोन था, तुम फिर भी मुझे हर सुबह लैंडलाइन फोन पर ही कॉल कर के जगाती थी. मेरे घर का वो पुराना लैंडलाइन फोन था, उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि तुम्हारे कॉल से घर के सभी लोग जाग जाते थे. अकसर पापा मुझे छेड़ने के अंदाज में कह भी देते थे, ये फ़ोन अब हमारे घर का मॉर्निंग  अलार्म हो गया है, ठीक पाँच बज कर पैंतीस मिनट पर ये हम सब को जगाता है.

कितनी बार तुम्हें मैं डांट चुका था कि तुम मेरे मोबाइल पर फोन किया करो. लेकिन तुम मानती कब थी? लैंडलाइन पर फोन करने की तुम्हारी सिर्फ एक वजह होती थी, तुम जानती थी कि ये फोन मेरे बिस्तर के पास वाले टेबल पर रखा होता था और तुम्हें यकीन था कि उसकी रिंग सुनकर मैं जाग जरूर जाऊँगा. मोबाइल का तुम्हें कोई भरोसा नहीं था. दरअसल मोबाइल का भरोसा तो था, लेकिन तुम्हें मेरा भरोसा नहीं था. तुम्हें जाने क्यों अकसर लगता था कि मैं सुबह जागने से बचने के लिए मोबाइल साइलेंट मोड में कर के न सो जाऊँ.
सुबह जब तुमसे मिलकर मैं वापस आता मैं जानता था कि मुझपर कैसे कैसे व्यंग बाण चलने वाले हैं, वापस आते ही पापा का सवाल होता “इतनी सुबह सुबह किसका फोन आता है आजकल? और फ़ोन के आते ही हड़बड़ाए हुए से कहाँ निकल जाते हो? पापा के ये पूछते ही, पीछे से माँ भी चुटकी लेने में देर न करती... “सुबह सुबह और कहाँ जाएगा? जॉगिंग करने ही जाता होगा...है न?” उधर से बहन बोलती “हाँ, वो बात तो है, लेकिन सुबह सुबह जॉगिंग करने लेदर शू, जीन्स और जैकेट पहन कर भाई क्यों जाता है? पापा भी एक आखिरी  तीर छोड़ते, “तो गर्मियों में भी किया करो जॉगिंग. सेहत के लिए अच्छा होता है न. गर्मियों के सुबह तो तुम घर से निकलते नहीं हो...”

सिर्फ इस एक वजह से तुम्हें जाने कितनी बार कह चुका था मैं, तुम सुबह की अपनी ये जिद छोडो, शाम में तो हम रोज़ मिलते हैं. मुझे घर में कितने सवालों का सामना करना पड़ता है मालूम भी है तुम्हें?

लेकिन तुम्हें मेरी इस बात से ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता. तुम कहती “तुम बेशक परेशानियों का सामना करते रहो, लेकिन सुबह की चाय और पार्क में टहलने के वक़्त में कोई बदलाव नहीं होगा”. हाँ, वन्स इन अ ब्लू मून तुम्हें मुझपर दया आती या किसी दिन तुम मुझपर जरूरत से ज्यादा मेहरबान रहती तो कहती... “चल शॉपिंग पर चलते हैं, तुम्हारे लिए ट्रैक सूट और जूते खरीद लाती हूँ, फिर तो कोई सवाल नहीं पूछेगा न कि सुबह कहाँ जाते हो? तुम कह सकते हो बेझिझक कि जॉगिंग पर जाते हो, या इवन बेटर, आंटी से मैं बात करती हूँ, कहती हूँ कि रोज़ हमारी मॉर्निंग डेट होती है, आप प्लीज सवाल न पूछा कीजिये इससे”. 
नो  वे. मैं गुस्से में कहता. 
तुम समझ जाती थी कि तुम्हारी जीत हुई है और तुम मुस्कुराने लगती. मुझे मनाते हुए कहती, बस अप्रैल भर तो तुम्हें सुबह परेशान करूँगी मैं.. उसके बाद कहाँ? 

हम दोनों का हर दिन का कमोबेश यही शिड्यूल रहता था, कम से कम सुबह का शिड्यूल तो यही था, एकदम फिक्स्ड. बिना किसी बदलाव के. हाँ कभी कभी इस शिड्यूल में तुम या मैं एक दूसरे को सर्प्राइज़ देने के लिए थोड़ा बदलाव कर देते थे. जैसे की उस दिन हुआ था, वो जो तुम्हारे जन्मदिन की सुबह थी और उस दिन सुबह के शिड्यूल में बदलाव मैंने किया था. 

तुम्हारे जन्मदिन की सुबह की प्लानिंग मैंने दो दिन पहले से कर रखी थी जिसकी तुम्हें कोई खबर नहीं थी. तुम तो अपने जन्मदिन की सुबह भी बेखबर सोयी हुई थी. एक शाम पहले जो मैंने तुमसे कह दिया था कि सुबह आना मेरा मुमकिन नहीं है घर में कुछ काम है. तुम उदास तो बहुत हो गयी थी क्योंकि वो तुम्हारे जन्मदिन की सुबह थी और तुम चाहती थी कि मैं तुम्हारे साथ रहूँ. लेकिन घर पर काम की बात सुनकर तुमने भी कोई जिद नहीं की थी. 

उस सुबह ठीक साढ़े पाँच बजे मैंने तुम्हें फोन किया था. 

तुम गहरी नींद में थी. तुमने नींद में ही फोन रिसीव किया, दूसरी तरफ मैं था. फोन पर तुम्हारे लिए सड़क किनारे चाय दुकान पर खड़ा होकर फोन पर हैप्पी बर्थडे सॉंग गा रहा था, बिना इस बात की परवाह किये हुए कि आसपास वाले लोग देखेंगे मुझे, यूँ गाते सुनेंगे तो क्या सोचेंगे. और जिसके लिए मैं ये जन्मदिन का गाना गा रहा था, वो समझ रही थी कि वो कोई सपना देख रही है. हाँ मैडम, आपने उस सुबह यही तो समझा था.. कि आप कोई सपना देख रही हैं. “तुम यार सपने में इतने बेसुरे नहीं सुनाई देते..” यही इग्ज़ैक्ट शब्द थे जो तुमने उस सुबह नींद में कही थी मुझसे और जिसके वजह से तुम्हें जाने कितने समय तक मैं छेड़ता रहा था.. “तुम्हें तो मेरी आवाज़ बेसुरी लगती है..” और तुम जाने कितनी बार इस एक बात के लिए मुझसे माफ़ी माँग चुकी थी... “अरे यार मैं नींद में थी न...” 

तुम नींद में वैसे अकसर बातें करने लगती थी. रात में तो लगभग तुम्हारी आदत थी ये, तुम बातें करते हुए सो जाया करती थी.. कब तुम्हें नींद आ जाती थी ये तुम्हें खुद पता नहीं होता था, और तुम नींद में ही मुझसे बातें करते रहती थी. तुम्हारे कितने राज़ की बातें मैंने इस तरह ही तो जाना था. 

उस सुबह भी तुम नींद में थी और मुझसे बातें कर रही थी.. तुम्हें मैं नींद से जागने के लिए, उठने के लिए, बाहर आने के लिए फोन पर कह रहा था, और तुम समझ रही थी कि तुम फिर से कोई सपना देख रही हो.. और नींद में ही मुझसे बार बार कह रही थी.. “चुप भी रहो प्लीज, सुबह यूँ आर्डर देने का काम मेरा है. तुम क्यों मुझे आर्डर दे रहे हो और वो भी सपने में. मैं सोयी हुई हूँ अभी”. 

बड़ी मेहनत करनी पड़ी थी उस दिन तुम्हें ये यकीन दिलावाने के लिए कि मैं सच में तुम्हारे अपार्टमेंट के गेट के बाहर खड़ा हूँ. नींद में ही तुम चलते हुए अपनी खिड़की के पास आई थी, और जब मुझे तुमने खड़े देखा तब तुम्हें सच में यकीन आया था कि मैं तुम्हारे घर के बाहर खड़ा हूँ. 

किस तरह से तुम भागते हुए नीचे आई थी, कितनी हड़बड़ी में और आते ही कैसे मुझपर बरस पड़ी थी. “मरवा दिया था तुमने, ऐसे कोई शार्ट नोटिस देता है क्या? जानते भी हो कैसे आई हूँ मैं? माँ से बोलना पड़ा कि रश्मि ने अचानक बुला लिया...तुम सच में पागल हो”. 

मेरा तो मन किया उस वक़्त कि उलटे तुमसे पूछूं, अच्छा बताओ रोज़ सुबह ऐसे मुझे शोर्ट नोटिस देती हो तो मैं कैसे मैनेज करता हूँ? लेकिन वो तुम्हारा जन्मदिन था और मैं चाहता था कि जो भी छोटी प्लानिंग सुबह की मैंने की है उसे तुम एन्जॉय करो. 

तुम्हारा सारा गुस्सा वैसे तो काफूर हो गया था उसी वक़्त जब तुम्हें मैंने नीचे आने पर तुम्हारे ही अपार्टमेंट के गार्डन में खिला गुलाब का वो फूल दिया था, और तुम्हें जन्मदिन की बधाई दी थी. हाँ लेकिन तुम्हारे मन में कई सवाल अब भी उमड़े हुए थे... “तुम आज गाड़ी लेकर क्यों आये हो? और तुम कैसे आये आज? आज तो तुम्हें काम था?” गाड़ी के पिछली सीट पर रखे एक नए बैग को देखकर तुम्हें और आश्चर्य हुआ. ये बैग किसका है? और तुम इसे सुबह क्यों लेकर आये हो? तुम सुबह की बहुत सी बातों से कन्फ्यूज्ड हो रही थी और मैं तुम्हारे इस कन्फ्यूज अवस्था का मजा ले रहा था.

चलो चाय की दुकान पर, वहाँ चाय पीते हैं और तुम्हारे सभी सवालों का जवाब तुम्हें वहीं मिलेगा. मेरे इस जवाब से तुम और कन्फ्यूज हो गयी थी. 

चाय दुकान पहुँच कर तो तुम्हें और भी आश्चर्य हुआ. आमतौर पर इनकी चाय दुकान सुबह खुलती नहीं है, बस एक ठेले पर ये चाय बनाते हैं और हम वहीँ ठेले के पास खड़े होकर चाय पीते थे, लेकिन तुमने देखा कि दुकान खुली थी और बेंचे लगी हुई थीं. ये हो क्या रहा है आज? तुमने मेरी तरफ देखकर कहा था. सुबह से एक के बाद एक हर बात पर तुम्हें आश्चर्य हो रहा था – सुबह यूँ मेरा तुम्हारे घर आ जाना, पीछे वाली सीट पर उस रहस्मयी बैग का होना, और अब ये चाय दुकान का खुला होना, और उसपर भी सबसे बड़ी आश्चर्य की बात थी, चाय दुकान पर गाने बजते रहना... और वो भी तुम्हारी पसंद के गाने और दुकान पर आते ही चचा का तुम्हें जन्मदिन की बधाई देना. 

ये सब मेरे प्लानिंग का ही एक हिस्सा था. मैंने पहले ही शाम में आकर सब समझा दिया था इम्तियाज़ चचा को. सुबह सब मेरे प्लान के हिसाब से हो, इसके लिए मुझे थोड़ी मेहनत करनी पड़ी थी इम्तियाज चचा को मनाने में, लेकिन वो जल्द ही मान गए थे. एक कैसेट मैंने दे दिया था उन्हें जिसमें तुम्हारे पसंद के गाने रिकार्डेड थे.
हम्म...जन्मदिन की सुबह, ड्राइविंग थ्रू द सिटी, ठण्ड, कोहरा, चाय, अ पोसिबल गिफ्ट इन द बैग....अब? अब क्या? तुमने यही पूछा था न मेरे से. 

मैंने तुम्हें जवाब नहीं दिया बल्कि सड़क के तरफ इशारा किया, तुमने उधर देखा.. उधर से हमारे तीन दोस्त, समर, शिवी और अवि आ रहे थे. तुम लगभग ख़ुशी से उछल पड़ी थी, “अरे ये तो सरप्राइज बर्थडे पार्टी हो गयी मेरी...”

हाँ, वो सरप्राईज बर्थडे पार्टी ही थी तुम्हारी जिसे मैंने प्लान किया था. ये सब मैंने दो दिन पहले ही शाम में सोच लिया था, जब तुम अपने स्विट्ज़रलैंड की छुट्टियों के बारे में बता रही थी. वहाँ जिस होटल में तुम रुकी थी, उसके सामने ही एक कैफे था, जो चौबीसों घंटे खुला रहता था, और जहाँ तुम हर दिन सुबह की ठण्ड और कोहरे में कॉफ़ी पीती थी और जहाँ एक सुबह तुमने अपनी छोटी बहन का जन्मदिन सेलिब्रेट किया था. तुम्हारे ऊपर उस सुबह का हैंगोवर अब तक हावी था, और हर शाम तुम उस सुबह का जिक्र करती थी. शायद तब से ही मैंने ये सोचा था कि कुछ ऐसा अपने शहर में करूँगा, तुम जब रहोगी यहाँ.. तुम्हारे जन्मदिन की सुबह. और आज वही सुबह थी. 

मैं खुश था कि  जो मैंने सोचा था वो सब ठीक वैसा ही हुआ. हम पाँच दोस्त, चाय दुकान पर बैठे तुम्हारे जन्मदिन को सेलिब्रेट कर रहे थे. केक जो मैं पहले ही लेते आया था, और मैगी नूडल्स जो चचा की मेहरबानी से सुबह उनके दुकान पर ही बनी थी और चाय. तुम सुबह की इस छोटी सी पार्टी से बहुत खुश थी. “वन ऑफ़ द बेस्ट बर्थडे मॉर्निंग ..” तुमने कहा था. तुम खुश थी, तो मैं भी खुश था. 

हाँ, लेकिन फिर भी एक सवाल तो तुम्हारे मन में अब भी था, कि मेरी गाड़ी के पीछे वाली सीट पर कौन सा बैग रखा है? और वो बैग किसका है? हाँ तुम्हारा वो अंदाज़ा सही था, कि उसमें तुम्हारे लिए तोहफें रखे थे. एक नहीं बल्कि कई सारे तोहफे...एक वूलेन स्कार्फ, ईअररिंग , दो किताबें, एक डायरी, दो फिल्म के सीडी, बहुत से चॉकलेट्स  और मेरी बनाई वो आखिरी पेंटिंग, जिसमें लिखा था.. “Dare to Dream !


कोहरा...ठण्ड और चाय की चुस्कियों में घुली यादें...

Sunday, October 19, 2014

वो लड़के के उँगलियों से खेल रही थी. उसी उँगली से जिसपर कुछ देर पहले लड़की की शैतानी की वजह से एक हलकी खराश लग गयी थी, और लड़की ने अपने बैग से लाल रिबन निकाल कर लड़के के उस उँगली पर बाँध दिया था. वो लड़के की उँगली को हाथ में लेकर, अपनी आँखें बंद कर के जाने कौन सा मंतर पढ़ रही थी, या शायद खुद से बातें कर रही थी...

“ये क्या पागलपन है, बस एक छोटी सी खराश ही तो है, ये रिबन बाँधने की क्या जरूरत है?”, लड़के ने कहा.
“देखो, मेरे बैग में एक बैंड-एड भी रखा है, मैं चाहती तो तुम्हारी उँगली पर उसे भी बाँध सकती थी, लेकिन वो कितना अन-रोमांटिक होता.. कम से कम थोड़ा तो फ़िल्मी टाइप फील लेने दो मुझे. देखते नहीं कैसे हीरोइन हीरो की कटी उँगली पर अपने साड़ी के पल्लू का एक हिस्सा फाड़ कर बाँध देती है?
“अच्छा, तुम तो लेकिन साड़ी नहीं पहनी हो, चलो साड़ी न सही, अपने दुपट्टे का ही कोना फाड़ कर बाँधती. और भी फ़िल्मी टाइप फील आता न?”.

लड़की शायद चिढ़ गयी इस बात से. वो अजीब शक्ल बनाकर लड़के को देखने लगी. थोड़ी देर चुप रही वो और फिर मुहँ बिचकाकर कहती है..
“जाओ मिस्टर ये मेरा फेवरिट दुपट्टा है, तुम्हारी इस स्टुपिड उँगली की वजह से मैं अपना दुपट्टा फाड़ दूँ? ना...नेवर..! और दूसरी बात ये कि फिल्म में जाने क्या गलत-सलत दिखाते हैं. पता नहीं फिल्म में कैसे हीरोइन अपने दुपट्टे या साड़ी के पल्लू को इतने आसानी से फाड़ लेती है, और वो भी इतना ऐक्यूरट कि हीरो के उँगली पर उसके साड़ी के पल्लू का वो टुकड़ा एक बैंड-एड की तरह  फिट आये, न बड़ा न छोटा. मुझे तो लगता है जरूर हीरोइन के उँगलियों में ब्लेड लगा होता होगा, वरना इतने आसानी से साड़ी या दुपट्टे का पल्लू फटता है क्या? मुझसे तो नहीं फटता, इसलिए मैंने आसान उपाए सोचा, ये रिबन बाँध दिया..!

उँगली में बंधे रिबन का एक सिरा हाथ में लेकर वो कहने लगी... जानते हो इस दुनिया में कितनी ही छोटी छोटी चीज़ें हैं जिनके बारे में हम नहीं सोचते, लेकिन अगर देखो तो वो कितने मायने रखती है. एक साधारण सा लाल रिबन, एक रिंग, एक किताब, कुछ कवितायें, किसी कागज़ पर पड़े कुछ कॉफ़ी के धब्बे, किसी के बोले महज दो शब्द ‘रिमेम्बर मी’..! कभी कभी इंसान के लिए कितनी जरूरी सी हो जाती हैं ये छोटी छोटी बातें, ये तुमने सोचा है कभी? कुछ के लिए तो अपनी ज़िन्दगी वापस पाने का ये जरिया बन जाती हैं.

तुम्हें वो फिल्म तो याद होगी न जिसमें भविष्य की कहानी थी, जिसमें दिखाया गया था कि आज से बहुत साल बाद कुछ ऐसा होगा कि लोग इमोशनलेस हो जायेंगे. एक ऐसा विश्व युद्ध होता है उस फिल्म में, जिसके बाद दुनिया से प्यार, मोहब्बत, एहसास सब खत्म हो जाते हैं. जहाँ इमोशनल होना एक अपराध माना जाता है. हँसने वालों को रोने वालों को प्यार करने वालों को पकड़ लिया जाता है, रस्सी से जकड़ा जाता है, कोड़े बरसाए जाते हैं उनपर, मार दिया जाता है उन्हें. ऐसी दुनिया बन बन जाती है. हँसना, रोना, गाना, नाचना, कहानियां पढ़ना, किताबें पढ़ना, कवितायें पढ़ना... सब अपराध हो जाता है उस दुनिया में. यहाँ तक कि अपनी पसंदीदा पेंटिंग रखना भी या अपने बीवी, प्रेमी या बेटे बेटियों की तस्वीर पास में रखना भी गुनाह माना जाता है, और जिसकी सज़ा बस मौत होती है.

उसमें जो नायक है, वो उसी निर्दयी पुलिस का हिस्सा है जो इमोशनल लोगों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें पकड़ते हैं और उन्हें मार देते हैं. लेकिन कुछ ऐसा होता है फिल्म के नायक के साथ जिससे उसमें वापस से वही एहसास जीवित हो जाते हैं, उसमें फिर से प्यार जागने लगता है. जानते हो न कैसे? उसकी बीवी के एक लाल रिबन से, जिसे वो अपने पॉकेट में बाकी पुलिस वालों से छुपा कर रख लेता है, अपने दोस्त के पास मिली एक कविताओं की किताब से, जिसे वो पढ़ता है हर रात, उस छोटे से प्यारे से ‘पपी’ के वजह से, जिसे उन निर्दयी पुलिस वालों से बचा लाता है अपने पास, अपनी बीवी के कहे दो शब्द ‘‘रिमेम्बर मी’ से, जो उसे तब याद आता है जब वो उस लाल रिबन को अपने हाथों में लेता है.

सोचो ज़रा, यही वो व्यक्ति था जिसे अपने दोस्त को मारने का हुक्म मिला था. इसके दोस्त की बस इतनी खता थी कि उसमें एहसास जीवित थे, वो साहित्य पढ़ता था, वो सबसे छुप कर कवितायें पढ़ता था, एक लड़की से प्यार करता था. और इसने अपने दोस्त को मारने से पहले एक बार भी नहीं सोचा कुछ. बस इसे हुक्म मिला, और अपने दोस्त को मारने चला आया था. इसने दोस्त को मारने से पहले उससे माफ़ी माँगी, दोस्त का जवाब था, ‘तुम्हें माफ़ी माँगने की जरूरत ही नहीं. तुम माफ़ी शब्द का अर्थ ही नहीं समझते, तुम एक मशीन हो’. और सोचो, अपने दोस्त को मारने के बाद उसमें कैसे बदलाव होते हैं, एक मशीन से इंसान बन जाता है वो, अपने दोस्त के पास मिली उस किताब से, लाल रिबन से, उस ‘पपी’ के वजह से. 

वैसे तो ये कहानी है, लेकिन सोचो दुनिया कितनी क्रूर हो सकती. ये कहते हुए लड़की काँप जाती है. लड़खड़ाई आवाज़ में वो आगे कहती है, सोचो अगर कभी ऐसा हुआ तो ऐसी दुनिया कितनी भयानक होगी. लोग कितने निर्दयी हो जायेंगे? अगर देखो तो शुरुआत अभी से ही हो गयी है, तुम्हें नहीं लगता ऐसा? अभी ही कौन सा लोगों को किसी के एहसास की कद्र है? बचे कितने हैं एहसास वाले लोग? वो लोग जिन्हें दूसरों की सच में फ़िक्र है, जो प्यार करना जानते हैं.. ऐसे लोग बचे ही कितने हैं? मेरे और तुम्हारे जैसे चंद लोग. बस. इसलिए मैं कहती हूँ, मेरे और तुम्हारे जैसे लोगों का होना इस दुनिया के लिए बेहद जरूरी है. ताकि लोगों में प्यार बचा रहे. लोग विश्वास कर सकें प्यार पर. आने वाले पीढ़ियों को ये न लगे कि प्यार महज एक शब्द है, और फिल्म पर दिखाए जाने वाला एक फार्मूला. 

तुम जानते हो? लोग कहते हैं न, ये प्यार, ये शायरी, ये कवितायें, कमज़ोर होती हैं, इंसान को कमज़ोर बनाती हैं... ये सच नहीं है, बल्कि ये इंसान को बहुत मजबूत बनाती हैं. तुम कविताओं को देख लो, तुम लिखते हो न कवितायें? क्या तुम जानते हो कवितायें खुद में कितनी स्ट्रोंग होती हैं? उनका कितना बड़ा प्रभाव पड़ता है इंसान पर? एक फिल्म थी, शायद तुमने भी देखी हो वो फिल्म.. उसमें कहा गया था “We don't read and write poetry because it's cute. We read and write poetry because we are members of the human race. And the human race is filled with passion. Poetry, beauty, romance, love, these are what we stay alive for.
तुम उस एक और फिल्म की ही बात ले लो न, तुमने और हमने एक साथ देखा था उसे, जिसमें पृथ्वी पूरी बर्बाद हो जाती है, लोग मंगल ग्रह पर रहने चले जाते हैं, लोगों की याददाश्त को भी हमेशा के लिए मिटा दिया जाता है, उस फिल्म में भी उस लड़के को बर्बाद हुए पृथ्वी के किसी कोने से एक कविताओं की किताब मिलती है, और उन कविताओं को पढ़कर उसमें कैसा बदलाव आता है. इंसानी रिश्तों पर उसे यकीन होने लगता है.

वो फिल्म याद है तुम्हें?? जहाँ लड़की की दी हुई  अंगूठी को छूते ही उस लड़के को अपनी पिछली कहानी याद आ जाती है? और वो उस लड़की को याद कर के रोने लगता है. वो फिर कैसे ढूँढ लाता है उस लड़की को, या फिर वो फिल्म ही ले लो, जिसमें लड़की के किताब में पड़े एक सूखे गुलाब के फूल को छूते ही वो एकदम से कैसे बेचैन हो जाती है, एक एक कर के उसके आँखों के सामने उसकी सारी पुरानी स्मृतियाँ वापस आने लगती है और अगले ही दिन वो निकल जाती है मीलों दूर अपने उस दोस्त को खोजने के लिए जिसने उसे वो गुलाब का फूल दिया था. 

जानते हो, इसलिए मैं कहती हूँ तुमसे, मेरी तरह छोटी छोटी बातों पर भी ध्यान दिया करो. कभी ऐसा हो जाये, किसी भी वजह से, ऐसी ही कोई बात हो जाए जो उन फिल्मों में हुआ था, और तुम भूल जाओ मुझे, तो मेरी वही छोटी छोटी इललॉजिकल बातें तुम्हें वापस मेरे पास लेकर आ जायेंगी, मेरी यही छोटी बेकार सी बातें , हरकतें देखना उस वक़्त तुम्हारी ज़िन्दगी का कितना बड़ा सहारा बन जायेगी. कभी कोई लड़की तुम्हें सड़क पर चीटियों को देखते मिले, उनसे बातें करते मिले तो तुम्हें याद आएगा, कि ऐसी कोई लड़की थी भी जिसे मैं जानता था, जो घंटों चीटियों से बातें करती थी, कभी आसमान में हवाई जहाज को उड़ते गौर से देखो तो तुम्हें याद आएगा कि कोई ऐसी लड़की थी, जो एरोप्लेन के पीछे बनते इन कॉनट्रेल्स को आसमान में बनी सड़क कहती थी...और न जाने ऐसी कितनी ही बातें तुम्हें याद आती रहेंगी, तुम तो जानते हो मेरे ऐसे हरकतें, काउंटलेस हैं, लेकिन इन हरकतों को तुम बेकार न समझना. कब मेरी कौन सी बात तुम्हारी ज़िन्दगी को कैसे बदल दे, ये तुम्हें अंदाजा भी नहीं हो पायेगा. ! 

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लड़का उतने आगे की बात नहीं सोचता कभी, किसे पता है आने वाले सालों में क्या हो? लेकिन एक बात वो जानता है, वो लड़की के उस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि कभी भी ऐसा हो सकता है कि वो लड़की को भूल जाए. लड़की समझती है कि लड़का उसकी इललॉजिकल बातों को इग्नोर कर दिया करता है, लेकिन जाने कितनी ही ऐसी छोटी छोटी बातें हैं जो लड़का आज भी याद रखे हुए है, वो बातें जो शायद लड़की को भी याद न हो, वो बातें जिसे सुन शायद लड़की को भी आश्चर्य हो कि कोई ये सब बातें भी याद रख सकता है.



नगमें हैं शिकवे हैं किस्से हैं बातें हैं
बातें भूल जाती हैं यादें याद आती हैं
ये यादें किसी दिल-ओ-जानम के
चले जाने के बाद आती हैं

बस्स...रिमेम्बर मी...

Saturday, October 4, 2014

अक्टूबर का महीना बड़ा ही खुशनुमा सा एक एहसास लेकर आता है. गर्मियों के दिन विदा होने को होते हैं, पेड़ों से पत्ते झर के गिरने लगते हैं, सर्दियों के आने की आहट सुनाई देने लगती है, मौसम अचानक थोड़ा ठंडा हो जाता है और हवाओं में चारों तरफ त्योहारों की खुशबू  बसी होती है.

हम दोनों के लिए ये अक्टूबर हमेशा बेहद खास रहा है. तुम्हारे लिए तो शायद बहुत पहले से ही अक्टूबर खास रहा होगा, लेकिन मेरे लिए अक्टूबर बस तब से ख़ास हुआ है जब से तुमसे मुलाकात हुई. तुमसे मिलने से पहले मौसमों के आने जाने से, महीनों के आने-जाने से मुझे फर्क नहीं पड़ता था. तुम्हारे आने के बाद ही हुआ कि हर मौसम से, हर महीने से एक रिश्ता बन गया. तुम्हें जानने के बाद ही मैंने ये जाना था कि मौसम भी इतने ख़ास हो सकते हैं कि उनका कोई नाम रख सकता है. तुम रखती थी मौसमों के नाम...तरह तरह के नाम, और हर नाम के पीछे तुम्हारी एक मजेदार लॉजिक होती थी. मिस्टिरीअस अक्टूबर, नॉस्टैल्जिक नवम्बर, टेंडर दिसम्बर, जैज़ी जनवरी जैसे नाम तुमने हर मौसम को दे रखे थे. लेकिन शायद जितना महत्वपूर्ण अक्टूबर और दिसम्बर महीना रहा है हम दोनों के लिए उतना शायद और कोई महीना नहीं रहा. 

किसे पता था कि दो अजनबी चलते हुए टकरा जायेंगे, इसी अक्टूबर महीने के आखिरी एक शाम में, जब तुम्हें जाना था पहली बार. किसे पता था कि इसी अक्तूबर की वो पहली तारीख होगी जब तुम्हें करीब से समझा था, तुम्हारे हर एक दर्द को महसूस किया था, तुम्हारे मुसकराहट के पीछे छुपे उस सच को, तुम्हारी उन तकलीफों को, उन बेचैनियों को महसूस किया था मैंने. 

तुम्हें याद है, अक्टूबर की ही वो आखिरी शाम थी न? तुम्हारी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत और महत्वपूर्ण दिन था वो. आखिरी ही कुछ पल बाकी थे अक्टूबर के विदा होने में, जब तुम्हें फ़ोन किया था मैंने और पहली बार फोन पर गाकर मैंने सुनाये थे बहुत से गाने तुम्हें, रात भर. फोन के दूसरे तरफ तुम बिलकुल चुप थी. लगातार रो रही थी, तुम्हारे आँसू गिर रहे थे, किसी तकलीफ से नहीं बल्कि ख़ुशी के आँसूं थे वो. “I am Overwhelmed”, तुम बस यही तीन शब्द कह पायी थी...मात्र ये तीन शब्द, इसके अलावा तुम कुछ भी बोल नहीं पायी थी. “तुम्हारे इन सब बातों पर रोने से, तुम्हारे इन आँसुओं की मुझे फिक्र नहीं होती. ये अच्छे आँसू हैं, ऐसे आँसू प्यारे लगते हैं..” यही कहा था न मैंने तुम्हें उस रात?

लोग नहीं समझेंगे इस बात को, ये नहीं समझ पायेंगे वे की तुम उस रात उस छोटी सी बात पर क्यों इतनी खुश हो गयी थी कि तुम लगातार बस रोये जा रही थी. बस गाना ही तो गाया था मैंने. लेकिन मेरे उस गाने की अहमियत क्या थी ये तुम जानती थी. सालों पहले जब किसी एक वजह से जिस लड़के ने गुनगुनाना छोड़ दिया था, तनहाई में भी कभी शायद ही कभी वो गुनगुनाया हो, वो सिर्फ एक लड़की की एक प्यारी, मासूम जिद के लिए उसे रात भर गाना सुनाते रहेगा. इसका शायद तुम्हें भी यकीन नहीं था. वो रात जो तुम्हारे लिए बहुत अहमियत रखती थी, तुम्हारे उस स्पेशल दिन पर वो मेरा तोहफा था. तुमने कहा था मुझसे, “कोई किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता है कि अपने कम्फर्ट ज़ोन से कोसों बाहर जाकर वो कोई ऐसा काम कर दे उस लड़की के लिए. ये सबसे अनमोल तोहफा दिया है तुमने आज मुझे” 

इसी अक्टूबर की वो तमाम खूबसूरत शामें थी न जब कॉफ़ी हाउस में तुम्हें मैं निर्मल वर्मा की कहानियां, फ़राज़ और ग़ालिब के शेर, गुलज़ार की नज्में, शमशेर की कवितायें सुनाता था. तुम बड़े ध्यान से बैठकर मुझसे सुनती थी कहानियां, कवितायें और बाद में मुझसे बहस करती. तमाम फ़ालतू सवालात तुम किया करती थी, “इस कहानी में ऐसे क्यों हुआ... वैसे क्यों नहीं हुआ?”, “तुम्हारे इन लेखक, शायरों को लिखना नहीं आता.. उल्टा पुल्टा शेर लिख डालते हैं”, और फिर तुम ग़ालिब के शेरो को गलत ठहरा कर उन्हें एडिट कर अपना वर्जन लिखती और फिर कहती, “देखो, शायरी ऐसे की जाती है, उन फ़ालतू शायरों को मत पढ़ा करो तुम...मुझे पढ़ा करो.......आई मीन मेरी शायरी को पढ़ा करो..” 

उन दिनों जब तुम दिल्ली में थी, इसी महीने के आसपास तुम्हें कुछ काम से आठ दस दिन लगातार गोल मार्केट के पास बेयर्ड लेन जाना पड़ता था. तुम चिढ़ती थी उस रोड से, और वहाँ के लोगों से. जिन दफ्तरों में तुम्हें काम होता वहाँ जाने से पहले और वहाँ से निकलने के बाद कितना कोसती थी वहाँ काम कर रहे लोगों को तुम. एक शाम जब एक दफ्तर से निराश वापस आ रही थी तुम, तुमने कहा था इस सड़क का नाम बेयर्ड लेन नहीं बल्कि बेदर्द लेन होना चाहिए..दिल ही नहीं यहाँ के लोगों के पास, और लगभग चिल्लाते हुए तुमने कहा था, “Get a life you idiots, morons..!” मैं इधर उधर देखने लगा था, कहीं कोई तुम्हें यूँ चिल्लाते हुए देख न ले... “बड़े बेआबरू होकर इस बेदर्द लेन से हम निकले...” ये गाते हुए तुम चली आ रही थी. ऐसे झूम रही थी तुम कि अगर आसपास उस वक़्त कोई हमें देख लेता तो समझता तुम नशे में हो. 

उन सारे मीठे पलों के अलावा भी कुछ बुरे पल इस महीने ने हमें दिए हैं. हमारे लिए सुख और दुःख का अजीब संगम होते रहा है इस महीने में. जहाँ एक तरफ हमारी कई अच्छी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं इस महीने से, तो दूसरी हमारी ज़िन्दगी के, और खासतौर पर तुम्हारी ज़िन्दगी के सबसे बुरे वक़्त की शुरुआत भी इसी महीने से हुई थी. इसी महीने की वो तीसरी तारीख थी जब तुम्हारी दीदी हमेशा के लिए हम सब से बहुत दूर चली गयीं थीं. और इसी महीने की वो आखिरी तारीख होती थी जब तुम्हारी उसी दीदी का जन्मदिन होता था, जिसे तुम कितने शानदार तरीके से सेलिब्रेट करती थी. इस महीने का ही वो कोई दिन था, जब तुमने पहली बार मुझे संकेत दिया था कि तुम्हें शहर छोड़कर हमेशा के लिए जाना पड़ सकता है. 

अक्टूबर की रात तो याद होगी न तुम्हें, जब हम दोनों दिल्ली से वापस अपने शहर लौट रहे थे. तुम उदास थी, क्योंकि वो अक्तूबर का वही दिन था, तुम्हारी उसी दीदी का जन्मदिन था जो कुछ साल पहले तुमसे दूर चली गयीं थीं. तुम्हें जाने कितने किस्से याद आ रहे थे, ट्रेन पर तुम उन तमाम किस्सों को मुझे सुना रही थी जो तुम्हारी दीदी से जुड़े हुए थे. तुम उदास हो गयी थी, तुम्हारे मन में जाने क्या चल रहा था....तुम्हें अपनी दीदी की कमी अचानक बहुत ज्यादा खलने लगी थी. “वो अपने साथ मुझे क्यों नहीं लेते गयीं”, तुमने पूछा था मुझसे और फिर मेरे काँधे पर अपना सर टिकाकार ट्रेन के खिड़की से बाहर देखती रही थी, जाने क्या सोचती रही थी तुम. मैंने तुम्हारे चेहरे को देखा, तुम्हारा पूरा चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था. मैं चुपचाप बस तुम्हारे पास बैठा हुआ था. कुछ ऐसे दुःख होते हैं जिसमें आप कुछ भी कह नहीं सकते. वो वक़्त मेरे लिए भी वैसा ही था. मैं कुछ भी नहीं कर सकता था. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि उस वक़्त तुम्हें क्या कहूँ? कौन सा ऐसा दिलासा दूँ मैं तुम्हें जो तुम्हारे आँसुओं को रोक सके. 

मुझे एक पल ये भ्रम भी हुआ कि जैसे तुम अपनी दीदी की वो तमाम कहानियां मुझे नहीं बल्कि उन्हें ही सुना रही हो, जैसे की वो तुम्हारे सामने बैठी हों, तुमसे बातें कर रही हों. मुझे अचानक लगने लगा कि तुम कहीं बहुत दूर निकल गयी हो.. मेरे सारे शब्द, मेरी सारी वो बातें जो तुम्हें समझाने के लिए मैं तुमसे कह रहा था, अचानक मुझे निरर्थक से लगने लगे थें. तुम बहुत देर तक बोलती रही थी और जब तुम शांत हुई, तो देखा मैंने तुम्हारे आँसू भी थम चुके थे. शायद तुम्हारी दीदी की कहानियों में ही तुम्हें कोई ऐसी कड़ी मिल गयी होगी जिसे पकड़ कर तुम वापस लौट आई थी. 

अगली सुबह बेहद खूबसूरत हुई थी. हम रात भर सोये कहाँ थे. बस बैठे हुए थे पूरी रात एक दूसरे के पास. “देखो नवम्बर का महीना आ गया...., हेल्लो बोलो उसे”, उसने उगते हुए सूरज को देखकर कहा था. वो पूरी कोशिश कर रही थी, कि मुझे लगे वो वापस उस मस्ती वाले मूड में आ गयी है, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर मैं पिछली रात के बातों का हैंगओवर साफ़ देख रहा था. उसने अपने बैग से अपना एमपीथ्री प्लेयर निकाल लिया था, और इयरफ़ोन का एक टुकड़ा मेरे कान में ठूंस दिया था उसने, और एक अपने कान में. एक गाना बजने लगा था, और उस गाने को सुनते हुए मुझे अचानक उसकी पुरानी कही एक बात याद आ गयी थी, इस गाने को पहली बार सुन कर उसने पूछा था मुझसे, अच्छा बताओ... “पानी में गिरके सूरज कैसे बुझ सकता है, और हाथ में धूप कैसे मला जाता है?”. हम दोनों ही गाना सुनते हुए एक दूसरे को देखकर हँसने लगते हैं....वो गुनगुनाने लगती है...

आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में
आ सजदा करूं मैं तेरे हाथों में




ये महीना अक्टूबर का ऐसा ही है, जाने कितनी यादें जुड़ी हैं इस महीने से, कुछ बेहद प्यारी यादें तो कुछ बेहद बुरी यादें भी. तुम्हें याद है न तुमने इस महीने को ये नाम क्यों दिया था? तुम कहती थी की इस महीने में जो कुछ भी होता है वो या तो हद दर्जे का अच्छा होता है या फिर हद दर्जे का बुरा. बड़ा अजीब महीना है ये...समझ में ही नहीं आता की इसे किस कैटेगरी में रखूं, अच्छे वाले में या बुरे वाले में...इसलिए इसे मिस्टिरीअस अक्टूबर मैं कहूँगी...है भी वही, बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा, कभी समझ न आने वाला, खट्टे मीठे पलों वाला...बिटरस्वीट मिस्टिरीअस अक्टूबर!


मिस्टिरीअस अक्तूबर!

Tuesday, September 23, 2014


अकसर पुरानी अलमारियों में जाने कितनी यादें बंद होती हैं. उन अलमारियों को खोलना पुराने दिनों में वापस लौटना होता है, वापस उन दिनों में लौटना जो शायद आपके सबसे खूबसूरत दिन थे. अलमारी के किसी दराज में अगर कोई पोटली मिल जाए, जिसमें आपके जाने कितने लम्हे, कुछ किताबें, ग्रीटिंग्स, फोटोग्राफ बाँध कर रखी हुई हों तो आप ना चाहते हुए भी यादों के उन पगडंडियों पर चलने लगते हैं. पोटली में बाँध कर रखी एक रोमांटिक नॉवेल पर नज़र पड़ती है, जिसे आपकी सबसे अच्छी दोस्त ने आपको तोहफे में दिया था, और उस किताब पर नज़र पड़ते ही आपको सितम्बर की वो शाम याद आ जाती है जब अपने देर से आने की आदत से चिढ़कर उस किताब के कवर पर उसने लिख दिया था “मैं दुनिया की सबसे बड़ी पापी हूँ, हे भगवान, मुझे सज़ा देना, ऐसी कि मैं देर से आने की अपनी आदत ही भूल जाऊँ...” और फिर उसके नीचे छोटे अक्षरों में उसने लिखा था.... “लेकिन प्लीज, कोई सख्त सज़ा मत देना मुझे”. किताब के कवर पर लिखी  उसके इन मासूम बातों को पढ़कर चेहरे पर एक मुसकराहट आ जाती है और आँखों के सामने सितम्बर की वो शाम चली आती है जो आज से छः साल पहले बीती थी.

वे मेरे अच्छे दिन थे, कुछ पैसे हाथ में आ गए थे उन दिनों. पैसे हाथ में आ जाना उन दिनों मेरे लिए एक बड़ी बात हुआ करती थी. हलकी बारिश हो रही थी और हम दोनों दिल्ली के साउथ इक्स्टेन्शन मार्केट में घूम रहे थे. “आज बहुत खुश हूँ मैं, चलो तुम्हें उसी डिज़ाइनर शो रूम में शॉपिंग करवाता हूँ जहाँ पिछले शाम तुमने वो लहँगा पसंद किया था”, मैंने कहा उससे. उसने मेरी तरफ देखा, उसे एक पल लगा कि मैं मजाक कर रहा हूँ. लेकिन अगले ही पल जैसे ही मैंने उसका हाथ थामा और उस शोरूम की तरफ बढ़ने लगा, वो हैरान हो गयी थी. मुझे रोकने की कितनी कोशिश की उसने, “सुनो.. सुनो.. मेरी बात सुनो.. मैं बस मजाक कर रही थी.. वो लहँगा मुझे ख़ास पसंद भी नहीं आया था..” वो जानती थी वो शोरूम काफी महँगा था और मुझे उस शोरूम की तरफ जाने से रोकने के लिए जल्दबाजी में जाने कितने बहाने उसने बना दिए थे. लेकिन मैं पहले से सोच कर आया था कि मुझे क्या करना है. आखिर एक शाम पहले उसने पहली बार इतने सालों में मुझसे कुछ माँगा था, वो भी पूरे अधिकार से. मैं उसकी ये छोटी सी ख्वाहिश कैसे पूरा नहीं करता? “अगर तुम्हें वो लहँगा पसंद नहीं तो तुम बेशक उस लहँगे को ज़िन्दगी भर न पहनना, लेकिन आज तो मैं खरीदूंगा उसे”, मैंने कहा उससे और दुकान की तरफ बढ़ गया. 

वो भी अनमने भाव से मेरे पीछे पीछे उस शोरूम में दाखिल हुई. जो लड़की एक शाम पहले इस शोरूम में आने के बाद कपड़े देखने में इतनी व्यस्त हो गयी थी कि मुझसे सिर्फ हाँ ना में बात कर रही थी, वो आज उसी शोरूम के प्रति पूरी तरह से उदासीन थी. शोरूम में दाखिल होते ही उसने मुझसे कहा “जाने कितने का होगा लहँगा, मैं तो कल कीमत भी नहीं देख पायी थी..” मैं बस मुस्कुरा कर रह गया. कल शाम ही मैंने उस लहँगे की  कीमत पता कर ली थी, वाकई काफी महँगा था. लेकिन मुझे कीमत की परवाह नहीं थी. मैं बस जानता था कि उसने इतने सालों में पहली बार मुझसे कुछ माँगा है और मुझे उसकी वो ख्वाहिश पूरी करनी है.

शोरूम के उस कोने के तरफ हम पहुँच गए, जहाँ वो लहँगा था. मजेदार बात ये हुई कि उस लहँगे के प्राइस टैग में उसकी कीमत में एक शून्य कम था. शायद मिसप्रिंट की वजह से, लेकिन प्राइस टैग के इस मिसप्रिंट की वजह से ही वो ख़ुशी से उछल पड़ी थी. “सिर्फ 950 इसकी कीमत है? इस खूबसूरत लहँगे का? देखा? तुमने देखा? इतना खूबसूरत लहँगा और सिर्फ 950.. वाऊ!! मैं अभी ट्रायल कर के आती हूँ”, उसने कहा और अगले ही पल वो ट्रायल रूम में चली गयी. उसने मुहँ से लहँगा का ये कीमत सुनने के बाद एक पल के लिए मैं भी चौंक गया था, कल तो यहाँ का सेल्समैन 20% डिस्काउन्ट के बाद उस लहँगे का कीमत मुझे उतना बता चूका था. ये क्या माजरा है? मुझे ये समझते देर न लगा कि ये मिसप्रिंट का मामला है. लहँगे की कीमत उतनी ही थी...9500 लेकिन मिसप्रिंट की वजह से वो ये समझ बैठी थी कि लहँगे की कीमत सिर्फ 950 है. 

मुझे इस बात पर काफी हँसी आ रही थी, कि कुछ ही देर पहले यही लड़की मुझे ज्ञान दे रही थी.. “तुम्हारा ध्यान कहाँ रहता है? छोटी छोटी बातों पर जैसे मैं ध्यान देती हूँ, तुम भी ध्यान दिया करो. वैसी तुम्हारी गलती नहीं है, लेखक लोग वैसे भी खोये रहते हैं”, उसने मुझे ताना देते हुए कहा था और अभी यही लड़की अपनी ख़ुशी और इक्साइटमेंट में इतना भी कॉमन सेन्स नहीं लगा पायी, कि इतने महँगे स्टोर में मिल रहा इतना खूबसूरत लहँगा सिर्फ 950 में कैसे मिल सकता है? रुको, उसे आने देता हूँ उसके बाद उसकी खबर लेता हूँ, बहुत बड़ी अब्ज़र्वर बनती है वो. उसे इस बात पर छेड़ने का दिल किया लेकिन वो लहँगे की कीमत 950 समझ कुछ ज्यादा ही खुश हो गयी थी. उसकी वो ख़ुशी, उसके उस इक्साइटमेंट को मैं बुझाना नहीं चाहता था, इसलिए मैंने उसे कुछ भी नहीं बताया. भरपूर कोशिश की थी मैंने कि उसे इस ड्रेस की असली कीमत पता न चले, यहाँ तक कि लहँगा का बिलिंग करवाते समय भी उसे मैंने अपने आसपास भटकने नहीं दिया था, लेकिन बहुत सालों बाद एक दिन जब यूँहीं बातों के दौरान मेरे ही ज़बान से उस लहँगे की असली कीमत निकल गयी तो वो काफी गिल्ट में चली गयी थी. “खुद के लिए तो 950 के ड्रेस को भी खरीदने से पहले साढ़े नौ सौ बार सोचते हो और मेरे लिए दस हज़ार का लहँगा खरीद लिया, जस्ट लाइक दैट? "उसने कहा था.

उस शाम वैसे तो वो बहुत कारणों से खुश थी, एक लम्बे समय बाद वो मेरे साथ वक़्त बिता रही थी. दूसरा उसे दो दिन से लगातार तोहफे मिल रहे थे और तीसरा कि उसे एक बेहद खूबसूरत लहँगा मैंने तोहफे में दिया था जिसकी कीमत उसके हिसाब से साढ़े नौ सौ थी. एक रेस्टोरेन्ट में मुझे वो ले आई थी ये कहते हुए “चलो अब तुम मुझे लंच कराओ. पैसे तुम्हारे बचा दिए हैं मैंने. 

जब तक हम रेस्टोरेन्ट में बैठे रहे थे, वो दुनिया जहान की उलजुलूल बातें करती रही थी. कुछ ऐसे लॉजिक थे उसके जो सिर्फ वही दे सकती थी “तुम कभी मुझे किसी चॉकलेट के नाम से मत बुलाना, टैफी, बेरी, चेरी, चॉको-केक वगैरह कह कर तो मुझे हरगिज़ न बुलाना तुम. मानो तुम्हारा मन कर गया मुझे खाने का तो? मैं क्या करुँगी?” इस तरह की बच्चों सी बातें सिर्फ वही सोच सकती थी, सिर्फ वही कर सकती थी. मेरी बातों पर कभी कभी टोक भी दे रही थी मुझे, कभी डांट दे रही थी. “साहब ये जरूरी नहीं कि लड़कियों को गुलाबी रंग ही पसंद आते हैं, देखो मैं लड़की हूँ और मुझे ब्लैक, रेड, ब्लू और पर्पल पसंद हैं. गुलाबी मेरे लिस्ट में भी नहीं है. उसने जाने किस बात पर मुझसे कहा था.

उसकी बातें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं उस शाम. रेस्टोरेन्ट से लेकर जब तक हम मेट्रो स्टेशन न पहुँच गए, तब तक वो नॉन-स्टॉप अपने तमाम तोहफों का जिक्र करते जा रही थी, इन तीन चार दिनों में किसने उसे क्या गिफ्ट दिया, वो सारी बातें पूरे डिटेल में मुझे बताती जा रही थी. 

रास्ते में हलकी बारिश भी शुरू हो गयी थी, जो हमारे मेट्रो स्टेशन पहुँचने तक तेज़ हो गई थी. बारिश उसके साथ अकसर अजीब खेल खेलती थी. जहाँ अकसर उसे बारिशें उदासी से खींच बाहर लाती, उसके मूड को अच्छा कर देती तो कभी ये बारिशें ही उसके लिए उदासी का सबब बन जाती थीं. उसका मन बड़ा ही फ्रैजल था. हँसी-मजाक के मूड से बुरे मूड में आने में उसे वक़्त नहीं लगता था तो कभी बुरा मूड भी उसका चुटकियों में अच्छे मूड में तबदील हो जाता था. कब किस समय किस बात से वो अचानक सिरिअस  हो जायेगी इसका अनुमान लगा पाना नामुमकिन था. वो बिलकुल बच्चों जैसी बे-सिर पैर की बातें करते हुए भी अचानक सिरीअस हो सकती थी तो कभी बेहद गंभीर बातें करते हुए भी अचानक बे-सिर पैर की बातें करने लगती थी. खुद कहती थी वो.. मेरा मन बड़ा ही अन्प्रिडिक्टबल है.

मेट्रो के पूरे सफ़र के दौरान वो मेरा हाथ थामे हुए थी. रेस्टोरेन्ट में बैठकर वो जितनी उलजुलूल बातें कर रही थी, मेट्रो में वो उतनी ही शांत बैठी हुई थी. बस मेरा हाथ थामे वो सामने बैठे लोगों को देख रही थी. मेट्रो के उस कोच में कम भीड़ थी, सामने एक बूढ़े अंकल कोई किताब पढ़ रहे थे, तो एक व्यक्ति बड़े ही अजीब मुद्रा बनाये ऊंघ रहा था, जिसे देखकर उसे हँसी आ गयी थी, एक लड़का जो लगातार उसकी तरफ देखे जा रहा था, और जिसे देखकर उसने मुहँ बिचकाते हुए मुझसे कहा था ‘ब्लडी टपोरी.. देखो तो लाइन मार रहा है’. वहीं उसी कम्पार्ट्मन्ट में एक लड़की, अपने एक साल की बेटी और पति के साथ बैठी थी. “देखो तो कितना प्यारा परिवार है न इनका, उसकी बेटी कितनी प्यारी है..” उसने उनके तरफ देखते हुए कहा. “हम तीनों भी कभी ऐसे ही शॉपिंग कर के लौट रहे होंगे...है न? वो मेरी तरफ देख रही थी, मेरे जवाब के इंतजार में. मैं उसकी बातों का अर्थ समझ गया था, फिर भी अनजान बन कर मैंने पूछा, हम तीनों कौन? तुम और मैं तो दो ही हुए न? तीसरा कौन? 

तुम अभी से ही भूल गए? हमारी बेटी नहीं होगी क्या? देखना वो मेरी तरह ही खूबसूरत होगी, और बेहद समझदार. मैं उसे बिलकुल अपने जैसा बनाऊंगी. वो लगातार और एकदम तेज़ी से बोलते जा रही थी, जैसे कोई अपना सपना याद कर के उसे दोहरा रही हो. ये हमारा सपना ही तो था, जिसे हम दोनों कभी अपने बचपन के दिनों में दसवीं के पढ़ाई के दिनों में एक साथ देखे थे, तब जब हम दोनों आने वाले विपत्ति से बिलकुल ‘सेफ’ थे. थोड़ा भी अंदाज़ा होता हमें कि आने वाले दिन कैसे होंगे तो शायद हम दोनों खुली आँखों से ये सपना कभी नहीं देखते. वैसे मुझे लगता है उस उम्र में सभी कभी न कभी वैसा सपना देखते ही हैं. 

“नहीं, मुझे अब इतनी दूर का सोचना नहीं चाहिए न”, उसे जाने क्या याद आ गया. जितनी तेज़ी से वो अपने सारे सपने दोहरा रही थी, उतनी ही तेज़ी से उसने उन सब बातों पर ब्रेक लगा दिया था. बोलते बोलते एकदम से रुक गयी थी वो. 

“सुनो.. देखो, तुम उदास मत हो. देखना सब ठीक होगा”, मैं उसे दिलासा दे रहा था, जबकि मुझे खुद मालूम नहीं था कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला था. आगे कुछ और कहने की मैंने बहुत कोशिश की लेकिन हर वाक्य अधूरा ही रह जा रहा था मेरा. उसकी नज़रें लगातार उन तीनों पर जमी हुई थी जिनके वजह से उसे अचानक अपना इतना पुराना, अपना सबसे बड़ा सपना याद आया था. 

“रहने दो, आज ये बातें नहीं करेंगे हम. आज के खूबसूरत दिन जब मेरी इस खूबसूरत सी गुड़िया ने मेरे इतने पैसे बचा दिए, उसे इतने सारे तोहफे मिले हैं और देखो बारिश भी हो रही है, तो आज के इस खूबसूरत दिन हम खूबसूरत बातें ही करेंगे, नो डिप्रेसिंग टॉक, वरना तुम्हें सच में चॉकलेट समझकर खा जाऊँगा मैं. समझी तुम?” वो हँसने लगी थी. वो खुश हो जाती थी जब भी मैं उसे गुड़िया कह कर पुकारा करता था, और जब कभी उसके सिरिअस होने पर मैं यूँ उसे डांट दिया करता था. भूल जाती थी वो अपनी सारी तकलीफ सारी परेशानी कुछ पल के लिए, जब भी मैं मजाक में यूँ उसे डांटा करता था. 

“Aye Aye कैप्टन.. समझ गयी मैं.” कहा उसने और खड़ी हो गयी. “मेरी ट्रेनिंग का, मेरे संगत का देखो तुमपर कितना अच्छा असर हो रहा है. अब ऐसे मजाकिया डांट लगाना भी तुम सीख गए, पहले कितने बोरिंग थे तुम...मेरा जादू है ये”, उसने कहा. मैं मुस्कुराने लगा था. हमारा स्टेशन भी आ गया था तब तक और वो मेट्रो कोच से बाहर निकलते समय कुछ दिन पहले आई एक फिल्म का एक गीत गुनगुनाने लगी थी.. “मैं जो संग हूँ/ तेरे रंग हूँ / राहों से तेरी चुन लूँ मैं ख्वाब / हर लम्हा यूँ गुज़रे / के गहराता जाए प्यार”.

मेट्रो का ये बीस मिनट का सफ़र कुछ ज्यादा ही जल्दी पूरा हो गया था. उसके जाने का वक़्त आ गया था. राजीव चौक मेट्रो की सीढ़ियों के पास खड़े होकर हम दोनों उसकी गाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे. हम दोनों एकाएक चुप हो गए थे, जब कभी शाम में यूँ अलग अलग अपने रास्तों पर जाना होता था, हमारे बीच बातें बिलकुल खत्म हो जाती थीं, बस एक चुप्पी चली थी हम दोनों के बीच. शाम का वो पल बड़ा सख्त पल होता था. बातों का स्टॉक दोनों के ही पास खत्म हो जाता था. बिलकुल बेमतलब और व्यर्थ की बातें करने लगते थे “इस जगह का नाम कनॉट प्लेस है तो मेट्रो स्टेशन का ना राजीव चौक क्यों?”, “ट्रैफिक आजकल कुछ ज्यादा हो गया है न”, ऐसी बातें जिनका हम दोनों से कोई सम्बन्ध नहीं था, हम एक दूसरे से पूछते थे, बस इसलिए कि हमारा ध्यान शाम के जुदाई के पल से डाइवर्ट रहे. 

उसकी गाडी आ चुकी थी, आकर रुकी हुई थी. ड्राईवर दो बार उसे इशारा कर चुका था चलने के लिए. लेकिन फिर भी वो मेट्रो की सीढ़ियों पर कुछ देर बैठी रही थी. दो बार उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन बस इतना कह कर रह गयी, कि “कल तो तुम्हारी ट्रेन है वापसी का...” मैंने कहा “हाँ....” 

“ह्म्म्म....”. उसने एक निःश्वास भरी...अपने बैग से अपना गागल्ज़ निकाला और उठकर जाने के लिए खड़ी हो गयी.

वो ठीक से खड़ी भी नहीं हुई थी अभी कि मैंने उसकी कलाई पकड़ ली. वो बिलकुल चौंक गयी. वो असमंजस में मेरी तरफ देखने लगी. “क्या हुआ?” नज़रों से उसने पूछा था मुझसे. 

मैं मुस्कुरा रहा था, वो बिलकुल क्लूलेस हो गयी थी. इसे क्या हुआ..? शायद यही सोच रही होगी वो. आगे वो कुछ कहती इससे पहले ही मैंने अपनी जेब से वो कंगन निकाला जो दिल्ली हाट में घूमते वक़्त उससे नज़रें बचा कर मैंने खरीद ली थी, वही कंगन जिसे देखते ही उसने कहा था, अहा कितना खूबसूरत कंगन है, ऐसा खूबसूरत कंगन मैंने आज तक नहीं देखा था. मैंने वो कंगन उसकी कलाइयों में सरका दिया. 

वो शॉकड होकर देखती रह गयी. 

“स्पीचलेस आई एम !!” उसने कहा था. फिर से वो वापस मेरे पास बैठ गयी. इसे तुमने कब खरीदा? शायद इतना ही कहा था उसने.. शायद कुछ और कहती वो, लेकिन इसका मौका नहीं मिल पाया. उसका ड्राईवर जो कि उसे चलने के लिए दो बार इशारा कर चूका था, शायद उसका सब्र टूट चुका था, आकर उसने पूछ लिया कि चलेंगी आप या अभी रुकेंगी? “चलूंगी मैं..” उसने कहा ड्राईवर से. 

उसके चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि उसे अभी जाने का मन नहीं था. लेकिन शाम में उसके पूरे परिवार को किसी फंक्शन  में जाना था, शायद इसलिए वो ड्राईवर जल्दबाजी दिखा रहा था. ड्राईवर के इस जल्दबाजी से वो थोड़ा इरिटेट हो गयी थी. 

“ये तुम्हारा ड्राईवर आज विलेन बन कर आ गया बीच में, देखो तो इस रोमांटिक मोमेंट को उसने बिलकुल बर्बाद कर दिया...जाते ही अपने अंकल से कह कर नौकरी से निकलवा देना इसे, फाइन वाइन लगा देना इसपर ढेर सारे...” , मैंने कहा. वो मुस्कुराने लगी. कहा कुछ भी नहीं उसने, बैग से जो उसने गागल्ज़ निकाला था, उसे पहना और अपनी गाड़ी के पिछली सीट पर जाकर बैठ गयी. 

अकसर ऐसा होता है कि जाते वक़्त वो मुड़ कर मुझे जरूर देखती है, लेकिन उस दिन उसने नहीं देखा मुड़ कर मुझे. मैं उसकी गाड़ी को दूर तक जाते देखता रहा, कुछ देर तक उसकी गाड़ी आगे एक रेड सिग्नल पर रुकी थी. गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी वो दिख रही थी, लेकिन वो ना ही अगल बगल देख रही थी ना सामने. मुझे ऐसा लगा कि वो लगातार बस उस कंगन को देखे जा रही थी जो उसकी कलाइयों में मैंने पहना दिया था. मुझे जाने क्यों ऐसा भ्रम हुआ कि उसने गागल्ज़ उतार कर अपनी आँखों को पोछा था. शायद आँखों में उसके कोई “इन्फेक्शन” हो गया, मैंने सोचा.


याद है तुम्हें
बारिश की वो शाम
हाथ में तेरे
थी मेरी भी हथेली
काँधे पे टिका
वो मासूम चेहरा
भीगी थी तुम
मैं भी भीगा-भीगा-सा
गीली ज़मीन
मन भी पनियारा
खामोश तुम
बारिश की बूँदों को
सुनती हुई
जैसे पाजेब कोई
तेरी हँसी-सी
छनकती हो कहीं
मैं भी खामोश
सुमधुर संगीत
सुनता रहा
सतरंगी कंगन
तेरे हाथ में
जिसे लिया था तूने
ज़िद करके
सावन के मेले से
वो नीली ड्रेस
जो पसन्द थी तुम्हें
मैं चाहता था
खरीदवा दूँ तुम्हें
जानता था मैं
परी लगोगी तुम
पहन उसे
तेरी नज़रें चुरा
झाँकी थी जेबें;
उसे पहन तुम
इतराई थी
चिड़िया-सी चहकी,
हिचकिचाई;
मैं मुस्करा के बोला,
सस्ती है, ले ली
संतुष्ट हुई तुम
धीमे से बोली
हाथ थाम के मेरा
जो पैसे बचे
चलो दावत खाएँ
मैं मुस्कराया
कैसे कह देता मैं
तुम्हारी हँसी
मेरी खाली जेबों में
खनक रही;
बीत गए बरसों
पर आज भी
जेब में तेरी हँसी
खनक ही जाती है...।

[ प्रियंका गुप्ता ] 

एक लम्बी पोस्ट से अगर आप बोर हो गए होंगे, तो इतना  विश्वास है कि मेरी दीदी की ये कविता आपको खुश कर जायेगी. असल में दीदी से पता चला इसे कविता नहीं बल्कि 'चोका' कहा जाता है. मुझे उतनी समझ नहीं इन विधाओं की तो मैं तो कविता ही कहूँगा इसे. बहुत ही प्यारी कविता है दीदी, इस कविता की वजह से पोस्ट खूबसूरत दिख रही है! 

जेब में रखी कुछ यादें

Saturday, September 6, 2014


मुझे लगता है कि बहुत सालों बाद भी जब भी दिल्ली या दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित कॉफ़ी हाउस का जिक्र होगा, मुझे तुम्हारी वो तमाम चिट्ठियाँ याद आएँगी जो यहाँ बैठकर तुम्हें मैं लिखा करता था, या फिर तुम्हारी लिखी वो तमाम चिट्ठियाँ जो यहाँ बैठकर मैं पढ़ा करता था. बीच के कुछ सालों में ईमेल, चैट और फ़ोन की आदत लगने की वजह से हम दोनों ने चिट्ठी लिखना एक दूसरे को लगभग बंद ही कर दिया था. तुम्हें फिर से चिट्ठी लिखने का सिलसिला भी इसी कॉफ़ी हाउस से शुरू था.

जिस ख़त से तुम्हें फिर से मैंने चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, वो तुम्हारे जन्मदिन पर लिखा एक बेहद लम्बा खत था, जिसे लिखने में मुझे तकरीबन तीन घंटे का वक़्त लग गया था. यहीं इसी कॉफ़ी हाउस से बैठकर तुम्हें वो खत लिखा था मैंने. अरसे बाद किसी को मैंने वैसा लम्बा खत लिखा था. लम्बे खत लिखने की आदत हम दोनों को तब से थी जब हम एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. मजेदार बात ये थी कि दोनों का लम्बे खत लिखना बंद होने की वजह और फिर इस आदत के शुरू होने की वजह एक ही थी. हम दोनों के कुछ ख़ास अपनों ने ही हमारी लम्बी चिट्ठी लिखने का अकसर मजाक उड़ाया, जिससे चिढ़ कर हम दोनों ने ही लोगों को लम्बे खत लिखने बंद कर दिए थे. तब हम दोनों एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. लम्बे खत फिर से लिखने की वजह हम दोनों ही बने एक दूसरे के लिए. तुम्हारे वजह से मैं लम्बे खत लिखने लगा था और मेरी वजह से तुम. हम दोनों की ये भूली हुई आदत फिर से लग गयी थी, यूँ  लम्बे खत लिखने की. तुमने एक खत में ये लिखा भी था न, और कितना सही लिखा था तुमने. तुमने कहा था - “देखो तो, मौका पाते ही पुरानी आदतें  उभर आती हैं...है न?? और आदत भी इतनी खूबसूरत. लम्बे खत लिखने की...” 

जानती हो, तुमने जिस खत से दोबारा चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, उस खत को मैंने इसी कॉफ़ी हाउस में बैठकर पढ़ा था. वो लम्बी चिट्ठी तुम्हारी दरअसल चिट्ठी नहीं बल्कि रोचनामचे टाइप की चिट्ठी थी, एक डायरी जैसा था वो...हर दिन कुछ न कुछ जोड़ा था तुमने उस चिट्ठी में और तब मुझे भेजा था तुमनें. मैं कॉफ़ी हाउस में ही बैठकर वो चिट्ठी पढ़ रहा था, लेकिन मुझे क्या पता था उस दिन कुछ ऐसा होगा मेरे से जिसकी उम्मीद खुद मैंने भी नहीं की थी. चिट्ठी पढ़ते वक़्त कुछ ऐसा मैं कर गया था, जानबूझकर नहीं बल्कि अनजाने में ही मेरे से वो हो गया था. अपनी  उस हरकत पर मैं बड़ा शर्मिंदा सा हो गया था. 

कॉफ़ी हाउस में बैठा मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था. एक हाथ में तुम्हारी चिट्ठी थी और एक हाथ से मैं सांभर वड़ा खा रहा था. तुम्हारी चिट्ठी पढ़ते वक़्त मैं किसी और ही दुनिया में चला जाता हूँ, बाकी कुछ भी ध्यान नहीं रहता मुझे. उस शाम भी मुझे बिलकुल ध्यान नहीं रहा था कि मेरे प्लेट में वड़ा रखा है जिसे मैं चम्मच से काट कर खा रहा हूँ. मेरा सारा ध्यान तुम्हारी चिट्ठी के ऊपर था, तभी पता नहीं कैसे वड़ा काटते हुए मेरे हाथ से चम्मच फिसल गया, और वड़ा का एक टुकड़ा सीधा उछल कर सामने वाले टेबल पर रखे प्लेट में जा गिरा. दो बुजुर्ग व्यक्ति बैठे हुए थे उस टेबल पर. मेरे तो होश उड़ गए थे. ये क्या हो गया मुझसे. मैं समझ गया था, आज अच्छी खासी बात बेवजह सुननी पड़ जायेगी. लेकिन वो दोनों बुजुर्ग बड़े मीठे स्वभाव वाले व्यक्ति थे. उन्होंने गुस्से से नहीं बल्कि मुस्कुराकर बड़े प्यार से कहा, “कोई बात नहीं बेटा, बस थोड़ा ध्यान रखा करो...”. उन्होंने तो बुरा नहीं माना लेकिन मेरे अन्दर हद दर्जे की एम्बैरेसमेन्ट फील आने लगी थी. मैं झटपट वहाँ से उठा और सीधा कैफे के बाहर आ गया. 

ऐसा मेरे साथ अकसर होता है, खासकर जब भी तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा होता हूँ मैं या फिर तुम्हारे ईमेल्स या मेसेज. कितनी ही बार मुझे ऐसे एम्बैरेसमेन्ट का सामना करना पड़ा है. वैसे मैं इसे एम्बैरेसमेन्ट नहीं बल्कि `स्वीट एम्बैरेसमेन्ट' कहता हूँ. मुझे उस वक़्त बड़ी हँसी सी आती है खुद पर. कॉफ़ी हाउस की ये घटना पहली घटना नहीं थी, एक और दिलचस्प किस्सा तब हुआ था, जब तुम्हारी ही लिखी एक चिट्ठी मैं यहाँ पढ़ रहा था, इसी कॉफ़ी हाउस में. 

उस शाम काफी भीड़ थी कॉफ़ी हाउस में. कुछ बुजुर्ग लोग एक लम्बे टेबल पर बैठे थे. बैठने की कहीं और जगह नहीं देखकर मैंने वहाँ बैठे लोगों से इजाज़त ली और उनके टेबल पर ही एक कोने में बैठ गया. मेरे बगल में बैठे बुजुर्ग अपनी टोली के साथ बातों में मगन थे और मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ने में. पास वाले बुजुर्ग ने एक प्लेट पकौड़ियाँ मँगवाई खाने को. वो पकौड़ियाँ मेरे हाथों के पहुँच के दायरे में थीं. मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था, और पढ़ते वक़्त ये भी ख्याल नहीं रहा कि मैंने सिर्फ कॉफ़ी आर्डर की है. मैं पास बैठे अंकल के प्लेट से पकौड़ियाँ लेकर बड़े इत्मिनान से खा रहा था. तीन चार पकौड़ियाँ मेरे पेट के अन्दर चली गयीं थी तब मुझे एकाएक ख्याल आया, ये मैं क्या कर रहा हूँ. बगल वाले अंकल मेरा ये गिल्ट भांप गए, और वो एकाएक हँसनें लगे. “कोई बात नहीं बेटा, हो जाता है. अब जब खा ही रहे हो, तो रुक क्यों गए, खाओ न..और आ जायेंगे”. उन्होंने कहा. लेकिन मैं इतना शर्मिंदा हो गया था, कि उनसे माफ़ी मांगी मैंने और तुरंत फिर वापस चला आया था.

सच में मुझे हैरत होती है कि मैं ऐसी हरकतें कैसे करने लगता हूँ. तुम्हें पता है न कितना डिसिप्लिन्ड पसंद व्यक्ति हूँ मैं. किसी से बात करने से लेकर सड़क पर चलने तक, गाड़ी चलाने तक हर बात कायदे से करने की आदत है मुझे. खोया खोया नहीं रहता सड़क पर चलते वक़्त. चिढ होती है जब देखता हूँ कोई मोबाइल में आँख गड़ाए सड़क पर चले जा रहा है. ऐसे लड़के या लड़कियों से कितना चिढ़ता था मैं, ये तुम जानती ही हो. लेकिन क्या ये पता है तुम्हें, जब मेरे पास नया स्मार्टफोन आया था, तो मैं भी अकसर ऐसे ही हरकतें कर दिया करता था. एक दो बार इन हरकतों की वजह से भी मुझे थोड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है. जैसे एक शाम का एक किस्सा है. 

मैं अपने भैया के साथ अपने मोहल्ले के मार्केट के किनारे बने पेवमेंट पर चल रहा था. वो पेवमेंट समतल नहीं थीं, कहीं ज्यादा स्लोप तो कहीं बिलकुल ऊँचा. ऐसी हालत उस पेवमेंट की थी. तुमने मुझे कुछ जरूरी मेसेज भेजे थे फेसबुक पर, मोबाइल पर फेसबुक का मेसेज टोन सुनाई दिया और मैंने झट से अपना मोबाइल पॉकेट से निकाला और चलते हुए ही मेसेज पढ़ने लगा. मेरा ध्यान चलने पर कम और तुम्हारे मेसेज पर ज्यादा था. यूँ कहो कि मेरा सारा ध्यान मेसेज पढ़ने पर ही था. जाने कहाँ से मेरा पैर फिसला, किस चीज़ से टकरा गया था मैं, मेसेज पढ़ते हुए ही, मोबाइल हाथ में लिए सड़क पर मैं फिसल गया, धम्म से नीचे गिरा सड़क पर. भैया आगे आगे चल रहे थे. उनके पीछे मुड़ने से पहले ही मैं झट से उठ गया, हाथ पैर झाड़ कर मैं उनके साथ हो लिया. चोट तो मुझे नहीं लगी थी लेकिन अपने मोहल्ले में गिरना, ऐसी जगह जहाँ आसपास के दुकान वाले मुझे अच्छे से जानते हैं, मुझे शर्मिंदा कर गया. ज्यादा शर्मिंदगी मुझे अगले दिन हुई थी, जब मार्केट के कोना पर चाट बनाने वाले लड़के ने पूछ दिया था मुझसे “भैया आप कल गिर गए थे...चोट तो नहीं लगी  थी आपको ज्यादा?” उस दिन के बाद लेकिन मैंने तय किया था कि अब कभी राह चलते हुए ऐसे मोबाइल का प्रयोग नहीं करूँगा मैं. उसके बाद से तुम्हारे मेसेज मुझे यूँ मिलते भी हैं, तो मैं सड़क के किनारे खड़ा होकर मेसेज पढ़ लेता हूँ लेकिन चलते हुए मेसेज करना उस दिन के बाद से मैं भूल ही गया.

जाने कितने सारे इस तरह के किस्से हैं मेरे. जाने कितनी बार अजीब अजीब हरकतें मेरे तरफ से हुई हैं. एक दिलचस्प किस्सा है, एक दिलचस्प से दिन का. मेरे लिए ये किस्सा एक यादगार किस्सा इसलिए भी है कि इसमें तुम भी हो. तुम्हें तो याद होगा ही वो दिन न जब कश्मीरी गेट बस अड्डे पर तुमसे मिला था मैं? 

दरअसल हम मिले नहीं थे उस दिन. बस एक दूसरे को दूर से ही देखे थे. बस एक घंटे के लिए तुम दिल्ली आई थी, तुम्हारी बस थी दोपहर में अम्बाला के लिए, और मैं तुमसे मिलने, बस तुम्हें एक झलक देखने के लिए बस स्टैंड आ पहुँचा था. तुम्हारे कुछ रिश्तेदार तुम्हारे साथ थे, वही कुछ रिश्तेदार जिनकी वजह से मुझे और तुम्हें जाने कितनी परेशानियों से गुज़ारना पड़ा था, वही कुछ रिश्तेदार जिनके वजह से हमने तय किया था कि उस दिन एक दूसरे के सामने नहीं आयेंगे हम. मैंने तुम्हें पहले से निर्देश दे तो दिए थे, कि मैं कहाँ पर खड़ा रहूँगा. तुम बस नज़रें उठा कर मेरी तरफ देख लेना, और यदि मौका मिला तो हम एक दूसरे के पास से गुज़रते हुए एक दूसरे को ‘हेल्लो’ भी बोल सकेंगे. लेकिन फिर भी तुम घबराई हुई थी. तुम्हारे मन में ये डर था, कहीं मुझे तुम्हारे रिश्तेदारों ने वहाँ बस स्टैंड पर देख लिया, तो बेवजह कहीं कुछ बात न बढ़ जाए. लेकिन मैंने तुम्हें आश्वस्त किया था कि मैं इन्विज़बल रहने में उस्ताद हूँ. तुम्हारे सिवा मुझे कोई नहीं देख पायेगा, इसकी जिम्मेदारी मेरी. तुम मेरे इस बात से निश्चिंत हो गयी थी. जैसा कि हमने तय किया था, उस दिन सभी कुछ वैसा ही हुआ था. हमनें दूर से ही एक दूसरे को देखा था, तुम मुझे देख कर मुस्कुराई थी उस दिन. मन में लेकिन हम दोनों के एक खलिश रह गयी, कि इतने करीब होने के बावजूद, कुछ मीटर की दूरी पर ही हैं हम दोनों और एक दूसरे से मिल नहीं सकते, बात नहीं कर सकते. लेकिन मन की इस एक चुभन के बावजूद हम दोनों बेहद खुश थे. हम दोनों ने एक दूसरे को देखा था, और हमें किसी ने नहीं देखा एक दूसरे को देखते हुए. हम दोनों दूर से ही एक दूसरे को देखकर खुश थे. 

कुछ देर बाद तुम्हारी बस अम्बाला के लिए रवाना हो गयी. तुम्हारे जाने के बहुत देर बाद तक मैं बस स्टैंड के उस प्लेटफोर्म पर बैठा रहा था जहाँ से तुम्हारी बस अम्बाला के लिए निकली थी. एक तो मैं तुम्हारे ख्यालों में गुम था, और दूसरा ये कि हर बार जब भी तुम मेरे सामने आती हो, जाने क्या हो जाता है मुझे, एक नशा सा छा जाता है आँखों पर. उस दिन भी शायद तुम्हारा ही नशा आँखों पर छाया हुआ था, शायद इसलिए मैं प्लेटफोर्म पर लगे एक बड़े से शीशे से जाकर टकरा गया था. हाँ, उस दिन यही हुआ था. कश्मीरी गेट बस अड्डे के प्लेटफोर्म से एक्जिट करने के लिए बेसमेंट में बने वेटिंग हॉल से गुज़रना पड़ता है. वेटिंग रूम में बड़े से शीशे के दरवाज़े बने हुए हैं, और मैं जाने तुम्हारे किन ख्यालों में गुम था, कि सीधा जाकर उस शीशे के दरवाज़े से ही मैं टकरा गया था, और जोर से टकराया था मैं. मेरे दरवाज़े से टकराने के साथ ही कुछ लोगों की निगाहें मुझपर उठ गयी थीं. कुछ की दबी सी हँसी भी निकल आई थी. मैं चुपचाप वहाँ से खिसक लिया, बाहर जब आया, तो खुद पर बेहद हँसी आ रही थी. मैं कैसे ऐसे टकराने लगा हूँ चलते हुए, लड़खड़ाने लगा हूँ चलते हुए...सच में बड़ा तगड़ा हैंगोवर होता है तुम्हारा मुझपर. 

ऐसे जाने कितने और किस्से मेरे साथ होते ही रहते हैं और हर बार ऐसे किस्से या ऐसे हादसों के बाद मैं तुम्हें मन ही मन गरिया भी देता हूँ, “बदतमीज़ लड़की, फिर से मुझे एम्बैरस करवा गयी”. लेकिन इन सब बातों के बावजूद, तुम्हारे ऊपर या तुम्हारी यादों के ऊपर या खुद के ऊपर कभी गुस्सा नहीं बल्कि हँसी आती है.. मैं बस मुस्कुरा देता हूँ ऐसे स्वीट एम्बैरेसमेन्ट पर.

स्वीट एम्बैरेसमेन्ट

Wednesday, August 27, 2014


मेरे साथ अकसर रातों में ऐसा होता है, किसी सपने के वजह से आधी रात में नींद टूट जाती है, और मैं एकदम हड़बड़ा के उठ बैठता हूँ. नींद टूटने के बाद कुछ पल के लिए तो मुझे पता भी नहीं चल पाता कि मैं कहाँ हूँ, किस कमरे में हूँ, किसके घर में हूँ, किस शहर में हूँ? जब पूरे होश में आता हूँ तो समझ आता है कि मैं दिल्ली के अपने कमरे में हूँ. ऐसा सिर्फ रातों में ही नहीं होता, दोपहर को भी जब कभी थका हुआ सो जाता हूँ और नींद खुलती है तो कुछ पल के लिए मैं पहचान ही नहीं पाता अपने इस कमरे को. मैं बड़े हैरानी से सामने की मेज, कुर्सी, टीवी, किताबों को देखता हूँ. सब चीज़ों को मैं इस तरह देखता हूँ जैसे इनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं, कुछ पल के लिए लगता है मैं किसी अजनबी के कमरे में आ गया हूँ, ये सब...ये कमरा ये घर असली नहीं है, ये बस एक भ्रम है. असली तो मेरा घर है, मेरे शहर का मेरा वो घर. मन बड़ा बेचैन हो जाता है. बहुत से ख्याल आने लगते हैं, मेरा ये घर नहीं तो मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्यों अब तक रुका हुआ हूँ मैं इस शहर में और शहर के इस घर में, जो मुझे अजनबी सा लग रहा है? जो भी सोच कर आया था इस शहर, क्या मैंने वो पा लिया ? नहीं. तो फिर क्यों मैं यहाँ अब तक टिका हुआ हूँ. रात की आधी नींद में आधे होश में ये सारे सवाल हमेशा परेशान करते हैं मुझे. सिर्फ मेरे साथ ही नहीं, शायद घर से बाहर रह रहे अधिकतर लोगों के साथ ऐसा होता होगा, खासकर उन लोगों के साथ जो कुछ सपने लेकर दूसरे शहर आये थे और वो उन सपनों को पूरा नहीं कर पायें. उस वक़्त वापस घर लौटने की बात दिमाग में बहुत तेज़ी से घूमने लगती है, लेकिन मैं उस बात को मन के किसी भीतरी कोने में धकेल देता हूँ. मन के अन्दर से आवाज़ आती है, कि तुम बेवकूफी कर रहे हो, किस चीज़ का इंतजार है तुम्हें अब? जो तुम्हें चाहिए था वो अब तक नहीं मिला, और कितना इंतजार करोगे तुम? जाओ वापस लौट जाओ. मैं मन की इन आवाजों को अनसुना कर देता हूँ. शायद एक बार घर छूट जाने के बाद वापस लौटना आसान नहीं होता. हाँ, घर लौटना आसान होता भी होगा, लेकिन उन लोगों के लिए जो जिस मकसद से घर से दूसरे शहर आये थे, उन्होंने वो मकसद पूरा कर लिया हो. लेकिन मेरे जैसे लोगों के लिए घर लौटना आसान नहीं होता. यूँ खाली हाथ वापस लौटना कोई चाहता भी नहीं.

अब ये सोचना भी अब मुश्किल लगता है कि जब ग्यारह-बारह साल पहले मैं अपने शहर से निकला था पढ़ाई के लिए दूसरे शहर, तो मेरे पास मात्र दो बैग थे, और अब देखता हूँ इस घर में मैंने कितना सामान इकट्ठा कर रखा है. हैरानी होती है कि मैंने कितना कुछ जमा कर लिया है घर में. हॉस्टल का वो कमरा याद आता है, जहाँ सबसे पहले मैं रुका था. सरस्वती माँ, हनुमान जी की मूर्तियाँ, कुछ कपड़े, कुछ किताबें और मेरा एक टेपरिकॉर्डर, इनके अलावा मेरे हॉस्टल रूम में कुछ भी नहीं था. और उस समय से लेकरं अब तक ऐसा लगता है कि मैंने एक दूसरा घर बसा लिया है यहाँ. बहुत से लोगों को ये नार्मल लगता होगा, लेकिन मुझे हैरानी होती है, पता नहीं क्यों किस बात कि हैरानी. घर से निकले ग्यारह-बारह साल हो गए, और पता भी नहीं चला? वक़्त ऐसे ही तो बीतता है, नहीं...बीतता वक़्त नहीं, बीतते हम लोग हैं. 

बारह साल पहले जब मैं दूसरे शहर आया था तो जाने क्या क्या मन में सोचा था. आँखों में जाने कितने सपने लिए हुए मैं चला था घर से. क्या हुआ उन सपनों? कुछ भी पता नहीं चल पाया. कैसे और क्यों वो इस कदर बेरहमी से टूट गए या कहूँ कि कुचले गए. मैं ये भी नहीं जानता. कुछ तो मेरी गलती रही थी और कुछ वक़्त और दोस्तों की मेहरबानी थी. बारह साल पहले दूसरे शहर में आया था, तब कुछ और बेशकीमती चीज़ें मेरे साथ थीं, जब मैं घर से चला था...जो तुमने मुझे दिया था....कुछ चिट्ठियाँ, तुम्हारे बेक किये हुए बिस्कुट, तुम्हारे दिए तोहफे जिनसे मेरा बैग भरा था, तुम्हारा प्यार और तुम...तुम मेरे साथ थी मेरे पास थी, जब मैं चला था अपने घर से दूर. क्या कहा था तुमने उस शाम जिस शाम मुझे जाना था. याद है? तुमने कहा था, तुम मुझसे दूर नहीं जा रहे, बल्कि मुझे पाने के लिए तुम पहला कदम उठाने जा रहे आज. आज सोचता हूँ तो लगता है जो भी मैं अपने साथ लेकर बारह साल पहले चला था किसी दूसरे शहर, सब कुछ तो छूट गया पीछे... तुम्हारा साथ, तुम्हारा प्यार.. सब कुछ जाने कहाँ पीछे छूट गया. इतने सामान मैंने इन बारह सालों में जमा कर लिए हैं, लेकिन फिर भी लगता है अकसर कितना खाली सा हो गया हूँ मैं. 

रातों को नींद में अकसर मुझे आवाजें सुनाई देती है, लगता है तुम मेरे से बातें कर रही हो. जैसे उस रात हुआ था. हुआ कुछ भी नहीं था, लाइट कटी हुई थी, और मैं सोया हुआ था. खिड़की खुली थी, मुझे जाने क्यों ऐसा भ्रम होने लगा कि तुम उस खिड़की के पास खड़ी हो, और मेरे लिए वही गाना तुम गा रही हो जो तुम अकसर गुनगुनाती थी.. “लग जा गले...”. मैं बिस्तर पर ही आँखें बंद किये लेटे रहा था. ये पागलपन है, लेकिन फिर भी जाने क्यों उस रात मुझे ये पक्का यकीन था, कि तुम कमरे में मौजूद हो, और ये डर भी था कि मैं जैसे ही अपनी आँखें खोलूँगा, तुम गायब हो जाओगी. और इसी डर से मैं अपनी आँखें नहीं खोल रहा था. तुम्हारी आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी, तुम्हारे कमरे में होने का एहसास था मुझे. लेकिन उस एहसास को टूटना था, वो टूट गया. अचानक से लाइट आई, और मेरी आँखें ना चाहते हुए भी खुल गयीं. कमरे में होने का तुम्हारा वो एहसास और तुम्हारी आवाज़ गायब हो गयी थी.

मुझे हमेशा ऐसा लगता है, जब भी मैं अकेले घर में रातों को रहता हूँ, तुम चुपके से मेरे पास आ जाती हो. मेरे से बातें करती हो, एक परछाई की तरह मेरे साथ साथ चलती हो. मेरे पूरे घर पर एक अधिकार सा जमा लेती हो. अकेले घरों में रहने पर शायद यूँ ही यादें परछाईं बनकर हमारे पीछे पीछे चलने लगती हैं. उनको रोकने वाला कोई नहीं होता. कोई बाउंड्री नहीं होती कि उन यादों को उन परछाइयों को रोक सके. वो परछाइयाँ तुम्हारे साथ रहती हैं, तुम उठते हो, बैठते हो, सोते हो, वो तुम्हारे साथ ही घर में मौजूद रहती हैं. तुम्हारे अलावा और कोई घर में होता है, तो ये परछाई भी दूर भाग जाती हैं, लेकिन जैसे ही तुम अकेले होते हो, ये परछाईं फिर से तुम्हारे साथ हो जाती हैं. कितनी बार सीढ़ियों पर, बालकनी पर खड़े होकर मैंने तुमसे बातें की हैं, बस तुम्हारे पास होने का एहसास भर होता था...कि तुम मेरे साथ खड़ी हो. जैसे उस रात हुआ था, मैं देर तक सो नहीं सका था...उठ कर अपने घर के बालकनी के पास आ गया, मुझे जाने क्यों ये भ्रम होने लगा कि तुम भी मेरे पास आकर खड़ी हो गयी हो. कितनी ही बातें की थी मैंने तुमसे. लोगों को ये बातें कहो तो तुम्हें पागल कह कर तुम्हारी बातों को हँसी में उड़ा देंगे. लेकिन मेरे साथ ऐसा ही होता है, तुम यूँ हीं मेरे साथ रहती हो हमेशा. 

आधी रात का ही वो वक़्त भी होता है जब मुझे अजीब अजीब सपने भी आते हैं. उन सपनों का अर्थ क्या है ये मैं कभी समझ नहीं पाता. एक बार देखा था तुम्हें सपने में. मैं एक पुल पर खड़ा था. तुम पुल के दूसरे तरफ खड़ी थी. और वो पुल बीच से टूटा हुआ था. तुम तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं नज़र आ रहा था. नीचे गहरी खाई थी और मैं सोच रहा था कि मैं किसी भी तरह तुम्हारे पास पहुँच जाऊँ, लेकिन कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था. दूसरे तरफ से तुम्हारी घबराई हुई आवाजें सुनाई दे रही थीं. तुम रो रही थी. मुझे अपने पास बुला रही थी. तुम कह रही थी... आ जाओ वरना मुझे सब ले जायेंगे हमेशा के लिए... तुमसे बहुत दूर. मैं नीचे उतरने की कोशिश करता हूँ, और तभी एक बहुत बड़ा सा धमाका होता है.. और मेरी नींद टूट जाती है. मैं बहुत घबरा जाता हूँ उस सपने से. पास पड़े अपने मोबाइल को उठाता हूँ, वक़्त देखता हूँ तो सुबह के चार बज रहे होते हैं. सोचता हूँ कि अकसर तुम्हारे सपने मैं इसी वक़्त क्यों देखता हूँ? 

मुझे हमेशा ये लगता है कि जितना ज्यादा मैं इन सपनों से डर जाता हूँ या घबरा जाता हूँ उतना कभी किसी भयानक सपने से, किसी भूत प्रेत वाले सपने से मैं नहीं डरा. जब भी तुमसे जुदा होने की बात किसी सपने में देखता हूँ, तुम्हें खुद से दूर जाते हुए देखता हूँ तो मैं बेहद डर जाता हूँ. हालाँकि अब डरने जैसी कोई बात नहीं रही, तुम बहुत दूर जा चुकी हो. लेकिन अब भी मैं बेहद डर जाता हूँ ऐसे सपनों से. 

हर शाम को मन में यूँहीं जाने कितनी बातें चलने लगती हैं. तुम्हारी कही बात याद आती है, कि तुम लिख लिया करो अपने मन में चल रही बातों को. तुम्हारे पास लिखने का हुनर है, तुम लिखकर खुद के मन को थोड़ा शांत कर सकते हो, लेकिन उनके बारे में सोचो जो लिख नहीं पाते अपने मन की बात, ना किसी से कह पाते हैं. वो बस घुटते रहते हैं अन्दर ही अन्दर. तुमने फिर कहा था, कुछ और न मिले लिखने को, कुछ समझ में ना आये क्या लिखना है, तो जितनी भी गालियाँ तुम्हें आती हैं(वैसे तो कम ही आती हैं), मुझे सुना देना. खूब गरिया देना मुझे, देखना तुम्हारा मन एकदम शांत सा हो जाएगा.

परछाइयों सी होती हैं यादें...

Sunday, June 29, 2014

आसमान में बादल छा गए थे. सुबह की बारिश के बाद जो हलकी धूप निकली थी, अब वो मिट चली थी, हवा अचानक बहुत तेज़ हो गयी थी. ऐसा लगता था कि आंधी आने वाली है. हम दोनों वहां से निकल चुके थे. उसने उसी बिल्डिंग के छत पर जाने की इच्छा जताई थी जहाँ हम पहले कभी शाम में जाया करते थे. वो गाड़ी में बिलकुल खामोश बैठी रही. किसी भी बातों में जैसे उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही. चर्च से निकलने के बाद उसने गाड़ी की चाबी भी मुझे थमा दी, ये कहते हुए कि अब वो आराम करेगी. इस बात के अलावा उसने मुझसे और कोई बात नहीं की. हाँ बस गाड़ी का एसी ऑफ कर के उसने दोनों तरफ की खिड़कियों को खोल दिया था और फिर आँखें मूंदे बैठी रही.

मुझे उसकी ये चुप्पी अखरने लगी थी. शायद उसकी आवाजें उसकी नॉन-स्टॉप बातें सुनने का मैं इतना आदी हो गया था, कि जब वो ऐसे बिलकुल शांत हो जाती थी तो मेरा मन बड़ा ही अशांत सा हो जाता था. मैं चाहता था कि वो बातें करें, कुछ भी कहे, बस ऐसे चुप न रहे. लेकिन वो खामोश थी. उसकी चुप्पी तुड़वाने का मुझे कोई भी तरीका सूझ नहीं रहा था. मैं शायद इसी कशमकश में था, मुझे ध्यान भी नहीं रहा था कब मैंने यूँ ही एक ग़ज़ल गुनगुनाना शुरू कर दिया था. 

उसने चौंक कर आँखें खोली.
“तुम गाना गा रहे थे??तुम??? तुम सच में गा रहे थे या बस मेरा वहम था?????” अपनी बड़ी बड़ी आँखों को उसने और बड़ा बना कर आश्चर्य में मुझे देखा. हाँ, उसके लिए तो ये दुनिया का आठवां अजूबा ही था न, मुझे गाते हुए सुनना. पहले जाने कितनी बार उसने जिद किया था लेकिन मजाल है मैंने कभी कोई गाना उसके सामने गाया हो. हाँ एक दो बार उसे यूं ही चिढ़ाने के लिए मैं खड़े होकर ‘जन गण मन’ गा देता था. वो हद इरिटेट हो जाती थी.

“हाँ, बस वो एक ग़ज़ल याद आ गयी थी तो....” मैंने कहा. 

“वाऊ !!!!!!!!!!!! I am so Lucky!! तुम गा रहे थे...और मैंने सुना तुम्हें गाते हुए. You have no idea what this means to me.” वो एकदम से इक्साइटेड हो गयी थी. मुझे अच्छा लगा उसे यूं खुश हुआ देखकर. एक पल के लिए उसके चेहरे पर वही मुस्कान आ गयी थी जो सुबह थी, जब वो गाड़ी की चाबी के लिए मुझसे झगड़ रही थी. मैंने गाना बंद किया तो उसने मुझे वो ग़ज़ल आगे गाने को कहा. मैं भी बिना कुछ सोचे, बिना उसकी बात टाले, गुनगुनाने लगा. 

कुछ देर वो मुझे सुनती रही “काश इस पल को मैं रिकॉर्ड कर के रख सकती अपने पास. काश !! काश!” उसने कहा. 

पूरे रास्ते मैं गुनगुनाते रहा था. वो बस आँखें बंद कर मेरा गुनगुनाना सुन रही थी. या वो सो रही थी ? मुझे पता नहीं चल पाया. पूरे रास्ते मैंने उसकी तरफ जब भी देखा उसकी आँखें बंद ही थीं. बिल्डिंग के पास पहुँच कर मैंने उसे धीरे से हिलाया “पहुँच गए हम...तुम सो रही थी?” 

“हम पहुँच भी गए? अभी तो निकले थे? तुम सच में बहुत तेज़ ड्राइव करते हो”.

मैं मन ही मन मुस्कुराने लगा. रास्ते भर ट्रैफिक थी और गाड़ी २०-३० के रफ्तार से चल रही थी और इसे लग रहा था कि मैंने बहुत तेज़ गाड़ी चलाई है.

“क्या सोचने लगी थी तुम?” मैंने पूछा
“तुम्हें सुन रही थी. तुम गा रहे थे.” उसने कहा. 
“तुम क्या सोच रही थी?” मैंने दोबारा वही सवाल दोहराया..

वो कुछ देर खिड़की से बाहर देखती रही, उसी कोक के बोतल के आकार के दुकान को जहाँ पहले हम पाँच रुपये वाली फाउंटेन कोक पिया करते थे. 

“मैं उस दिन के बारे में सोचने लगी थी, जब तुमने लगभग मेरी जान निकाल दी थी, कितना तेज़ गाड़ी चलाया था तुमने. मैं तो डर गयी थी.”
मैं मुस्कुराने लगा. “आज सा ही मौसम था न उस दिन?” 
“हाँ बारिश हो रही थी..” उसने कहा

और फिर उस दुकान की तरफ देखकर वो जाने क्या सोचने लगी थी. मुझे शायद पता था कि वो क्या सोच रही है. उस दुकान के पास से ही तो उस दिन हमने अपने सफ़र की शुरुआत की थी. और वो उधर ही देख रही थी. 

हमने उसी दुकान से एक कोल्डड्रिंक की बड़ी बोतल खरीदी, और एक बड़ा चिप्स का पैकेट, और बिल्डिंग के छत पर आ गए थे.  इस छत पर हम दोनों पाँच साल बाद आ रहे थे. छत अब काफी बदला हुआ सा लग रहा था. उन दिनों जब हम आते थे तो कोई भी छत पर दिखता नहीं था. हमारे अलावा किसी और का दखल नहीं था यहाँ. लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं थी. छत के एक कोने में दो प्रेमी जोड़े बैठे थे. 

“चलो, चलते हैं यहाँ से...कहीं और..” मैंने कहा. जाने क्यों उन दो लोगों को बैठे देख वहां, मुझे अजीब सा लगा. वो जिस पोजीशन में बैठे थे, उन्हें देख शायद मैं थोड़ा असहज सा हो गया था. थोड़ी असहज तो वो भी हो गयी थी.

“जस्ट इग्नोर देम. मुझे तो इस छत पर आकर ऐसा लग रहा है जैसे वर्षों बाद अपने घर लौट आई हूँ मैं..” उसने कहा. 

छत के उसी कोने पर हम बैठे थे जहाँ पहले बैठा करते थे. ये हमारी खुशकिस्मती थी कि छत का हमारा कोना खाली था. वहां आसपास रंगबिरंगे तरह-तरह के इश्तहारों के कागज़ और पैम्फ्लट बिखरे हुए थे. शायद उस बिल्डिंग में जो कोचिंग इन्स्टिटूट थें ये उन्हीं कोचिंग इन्स्टिटूट के इश्तहार रहे होंगे, जिनका अब कोई काम नहीं होगा और वो यहाँ लाकर फेंक दिए गए होंगे. 

उनमें से एक रंगीन कागज़ को मैंने उठाया “कुछ याद आया तुम्हें इस रंगीन कागजों को देखकर?” मैंने उससे पूछा. 
“नहीं तो...क्या?”
“तुम रंगीन नक़्शे यहाँ इसी तरह बिखेर दिया करती थी..”
“अरे हाँ!! कैसे भूल सकती हूँ मैं. I was so crazy about maps”. एकाएक याद आई बात पर वो खुश हो गयी थी. हाँ उसे नक़्शे खरीदने का शौक था. स्कूल में जीआग्रफी विषय में जो हम मैप्स इस्तेमाल करते थे, अलग-अलग महादेश, देश, राज्य, शहर के मैप, वो उन्हीं नक्शों को खरीद लिया करती थी. जब भी वो किसी स्टेशनरी के दुकान के आगे से गुज़रती, हमेशा एक मैप खरीद लेती थी. उसे इन मैप्स की कोई जरूरत नहीं थी, बस ये उसका एक शौक था. 
“तुम उन नक्शों से खेलती थी. याद है तुम्हें, एक बार तुमने एक दुकान से दो नक़्शे खरीदे थे, एक भारत का और एक अमरीका का, और मुझे दिखाते हुए कहा था तुमने, देखो मैंने दो रुपये में दो देशों को खरीद लिया...याद है?”
“हाँ याद है मुझे. और वो दुकान वाले अंकल कैसे कन्फ्यूज हो गए थे न, जब मैंने उनकी तरफ देखकर कहा था, अंकल मेरे पास दो देश हैं, एक आपके नाम कर दूँ?”
“वो थके हुए थे. तुम्हारी इस बात से वो हँसने लगे थे. उनकी दिन भर की थकान तुम्हारी इस एक बात से उतर गयी थी...” मैंने कहा. 
“वो जानते थे मुझे, कि मैं ऐसे ही पागलपन कि बातें करती हूँ.” 

इस मैप के चक्कर में कितने लोगों को उसने उलझन में डाला था. उसका एक प्रिय खेल भी था. हर देश, शहर के नक़्शे को वो अपने मनपसंद रंग से रंग लिया करती और सारे नक्शों को इसी छत पर बिखेर दिया करती थी. छोटे-छोटे पत्थर उनपर रख देती, ताकि हवा उन्हें उड़ा न ले जाए...और फिर उसका खेल शुरू होता - 
उसे कौन से शहर घूमना है, वहां जाकर वो क्या करेगी...क्या देखेगी...उस शहर की खासियत क्या है, उस शहर या देश में कौन-कौन ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे वो मिलेगी, वो एक के बाद एक मुझे ये सब सुनाती. ऐसा नहीं था कि हर दिन वो मुझे एक ही बात कहा करती थी. हमेशा उसके पास कुछ नयी बातें होती थी कहने के लिए. एक दिन उसके इसी खेल के बीच एक जोरदार आंधी आई, उसके सारे नक़्शे हवा में उड़ने लगे थे. वो दौड़कर सारे नक़्शे बटोरने की नाकाम कोशिश करने लगी, लेकिन सभी हवा में उड़ चुके थे. उसने उदास होकर कहा था “देखो ये आंधी कितनी बेरहम है, मेरे सपनों को उड़ा ले जा रही है”. मुझे याद तो नहीं लेकिन उसकी इस बात पर शायद मैंने कहा था “इन कागज़ के सपनों को उड़ा ले जाए भी आंधी तो क्या, तुम्हारी आँखों में जो सपने बसे हैं, तुम्हारी ख्वाहिशों को कभी कोई आंधी उड़ा कर ना ले जाए कभी...” 
उसने मेरी इस बात पर “आमीन” कहा था. 


“अच्छा आज तुमने दुआ में क्या माँगा? मैं पूछना भूल गयी.” उसके नक़्शे के खेल की जो बातें हो रही थीं, उसे काटते हुए उसने पूछा मुझसे. मैंने बिना सोचे जवाब दिया -
“तुम्हें...”
“सच?”
“हाँ सच..”
“और तुमने?”
“मैंने?...मैंने? ये कि लन्दन न्यूयॉर्क बोस्टन का झंझट सब कहीं पीछे छूट जाए और मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे शहर जा सकूँ, जहाँ तुम रहते हो और जहाँ की तुम इतनी तारीफें किया करते हो. 

कुछ देर हम दोनों चुप रहे. उसने आगे कहा..

“तुम जा रहे हो तीन दिनों बाद. मैं साथ चलूँ तुम्हारे? बोलो...अभी इसी वक़्त बोलो. कुछ न सोचो, बस बोलो. मेरा दिल रखने के लिए ही बोल दो, भले तीसरे दिन तुम मना कर देना. डांट देना मुझे, मत ले जाना...लेकिन अभी हाँ बोल दो”

मैं कुछ बोलता उसके पहले उसने खुद कहा 

“कैन यू प्लीज इग्नोर ऑल दिस? मेरे पागलपन की बातें हैं ये...भूल जाओ..”

मैं चुप रहा. 

ऊपर आसमान में काले बादल घिर आये थे. लगता था किसी भी समय बारिश हो सकती है. लेकिन उस वक़्त मुझे आसमान से होने वाली बारिश की चिंता नहीं थी. उसके आँखों से बस बरसात न हो, इस बात का डर था. 

“एक शेर तुम सुनोगे?” उसने आसमान की तरफ देखते हुए कहा.
“हाँ सुनाओ...”

"तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा”.

उसकी आँखों से आंसू छलक आये थे, आंसू की कुछ बूँदें मेरी पलकें भी भिगो गयीं थी. 

“तुम कब से शायरी करने लगी शायरा साहिबा” मैंने माहौल को थोड़ा हल्का बनाने की अपनी कोशिश की. 

“जब तुम्हारी बहुत याद आती थी तो अकसर उन बातों में खुद को उलझा लिया करती थी जो तुम्हें पसंद है... कविताओं, कहानियों और फिल्मों में. 
कभी सोचा है तुमने? आगे चल कर कहीं ऐसा हुआ हम महीनों-सालों बात न कर पाए, एक दूसरे की कोई खबर नहीं ले पाए हम तो?

मैंने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया.

“तुम्हें पता है होता है ऐसा कभी-कभी. मैं भी अकसर ऐसी बातें सोच कर परेशान होता हूँ. लेकिन तुम बताओ, क्या उम्र भर साथ निभाना ही सब कुछ होता है? हम साथ रहे या न रहे...ये वक़्त जो हम साथ बिता रहे हैं, ये वक़्त हमेशा हमारे साथ रहेगा, ये वक़्त जो हम एक दूसरे के साथ गुज़ार रहे हैं ये क्या कम है? तुमने मेरे लिए जो किया है, तुमने जिस तरह सम्हाला है मुझे, मैंने जिस तरह सम्हाला है तुम्हें, हर मोड़ पर, मुश्किल समय में हम साथ रहे, एक दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त बन कर, कभी एक दूसरे को हमने बिखरने नहीं दिया. एक दूसरे की सबसे बड़ी ताकत सबसे बड़ी प्रेरणा बने रहे. ये सब बातें, ये यादें, हमारा ये वक़्त हमसे कोई नहीं छीन सकता. आने वाला वक़्त भी नहीं. इन यादों पर सिर्फ और सिर्फ हमारा ही अधिकार रहेगा. हमेशा. आने वाले सालों में हम कहीं भी रहे, कितने भी दूर रहे, इन बातों को याद कर के मुस्कुरा तो सकेंगे, गर्व तो कर सकेंगे कि हमने कभी ऐसी दोस्ती निभाई थी जिसपर हमें नाज़ था, फख्र था. जो हर लिहाज से पवित्र है था, मासूम था...बहुत कम लोगों को ऐसी दोस्ती नसीब होती है. ये क्या कम है? तुम आज मुझसे एक वादा करो, आने वाले दिनों में चाहे कुछ भी हो, तुम हमेशा मेरी यादें को याद कर के मुसकुराओगी, कभी दुःखी नहीं होगी तुम. 

उसने मेरी बातों का कुछ जवाब नहीं दिया, बस वो मुस्कुराने लगी थी. आसमान से हलकी फुहारें होने लगी थीं. उसने अपने दोनों हथेलियों को आगे बढ़ा दिया, जैसे बारिश की बूंदों को पकड़ने की कोशिश कर रही हो. सामने के लैम्पपोस्ट पर बत्ती जल रही थी. बादल और बारिश के बीच उसकी रौशनी बड़ी अच्छी लग रही थी. वो उसी लैम्पपोस्ट को देखने लगी. 

“देखो तो लगता है ऐसे जैसे वो लैम्पपोस्ट न होकर एक लाइटहाउस हो.. तुम्हें पता है लाइटहाउस क्या होता है?” उसने कहा 

पाँचवीं क्लास के बच्चे भी इस सवाल का जवाब जानते थे, लेकिन मैं बिलकुल अंजान बना रहा... “लाइटहाउस? वो क्या होता है? मैंने पहली बार नाम सुना है”.

मेरी इस बदमाशी पर वो हँसने लगी. 

“जानते हो जब समंदर में जहाज खो जाते हैं, उन्हें रास्ता पता नहीं चलता, कोई उम्मीद नहीं नज़र आती कि अब वो कभी वापस अपने घर पहुँच पायेंगे, तब यही लाइटहाउस उनकी मदद करता है. लाइट हाउस उन्हें रास्ता दिखाता है और इसके रौशनी के सहारे वो किनारे तक आ जाते हैं, समंदर में खोने से, डूबने से बच जाते हैं वो. लाइटहाउस उन्हें बचा लेता है.” 

कुछ रुक कर कुछ सोचकर उसने आगे कहा 

“तुम मेरी ज़िन्दगी में भी एक लाइटहाउस की तरह ही तो हो...जाने कितनी बार तुमने मुझे रास्ता दिखाया है, मुझे अँधेरे से खींच बाहर निकला है. मुझे सम्हाला है. मुझे खोने से बचाते हो, मुझे डूबने नहीं देते. तुम मेरे लाइटहाउस हो. बस पूरी ज़िन्दगी मुझे तुम यूं ही रास्ता दिखाते रहना, खोने से, डूबने से बचाते रहना. तुम तो जानते हो कि मुझे डूबने से कितना डर लगता है. 

मैं उसके करीब आकर बैठ गया. उसने मेरे कंधे पर अपना सर रख दिया, बारिश रुक गयी थी, लेकिन फिर भी हम जाने कितनी देर तक वहां बैठे रहे. मेरे नज़रों के सामने वही शब्द घूम रहे थे जो उसने अभी कहा था “तुम मेरी ज़िन्दगी में एक लाइटहाउस की तरह हो..और वो आँखें बंद कर गुनगुनाना रही थी...


तुमको देखा तो ये खयाल आया
जिंदगी धूप तुम घना साया 

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की 
आज फिर दिल को हम ने समझाया 

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे 
हमने क्या खोया हमने क्या पाया 

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते 
वक़्त ने ऐसा गीत क्यों गाया


तुम मेरे लाइटहाउस हो