Friday, March 4, 2016


ठण्ड और कोहरे से लिपटी दिल्ली की सड़कों पर जैसे जैसे टैक्सी आगे बढ़ रही थी मुझे वो तमाम दिन दिल्ली के याद आ रहे थे जो तुम्हारे साथ इस शहर में बीते थे. नयी दिल्ली स्टेशन से घर जाने का रास्ता उन्हीं सब जगहों से होकर जाता था जहाँ कभी तुम्हारे साथ पूरी शाम घूमता था. कनौट प्लेस, मंडी हाउस, इंडिया गेट, पुराना किला, हुमाऊं का मकबड़ा, महरानी बाग़ और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, जहाँ तुम रहा करती थी. जिस भी रास्ते से टैक्सी गुज़र रही थी, हर कोने पर तुम्हारी यादें टंगी दिख रही थी. फिर वो मंडी हाउस की सड़कों पर तुम्हारा मेरा घंटों पैदल चलना हो या तुम्हारा वहाँ के थिएटरों में हर शाम कोई प्ले देखना..इसलिए नहीं कि तुम्हें प्यार था प्ले से. बल्कि इसलिए कि जाने किन कारणों से तुम्हें हमारा एक साथ प्ले देखना रोमांटिक लगता था. इंडिया गेट के पास घास पर तुम्हारा नंगे पावँ चलना हो, या पुराने किले के गेट के पास खड़े होकर तुम्हारा ये कहना कि मैं वापस जरूर आउंगी...सुबह के कोहरे में मुझे तुम्हारी इन स्मृतियों के सिवा कुछ और दिख नहीं रहा था.

शाम में तुम्हारे पसंदीदा कैफे में जाना भी प्री-प्लांड नहीं था. नए घर में पहुँचते ही मैं सामान अनपैक करने लगा था. वैसे तो ज्यादा सामान नहीं थे मेरे पास लेकिन कुछ कीमती कार्टन थे जिसमें मेरी किताबें, फिल्मों और गानों के सीडी और मेरी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत पलों के गवाह रहे तुम्हारे दिए तोहफे थे. किताबों का वो कॉर्टन खोल कर उन्हें अलमारी पर रख ही रहा था कि एक किताब हाथ से छूट नीचे गिर पड़ी. अपने आप कुछ पन्ने खुल गए. किताब उठाने बढ़ा हाथ और मेरी नज़रें, दोनो उस खुले पन्ने पर कुछ पल को ठहर गई. सामने ही एक दाग़ था, किताब के पूरे पन्ने पर पसरा बड़ा और गहरा सा दाग. पन्ने पर कुछ लिखा था. – “जो दाग मैंने तुमको दिया, इस दाग से किताब का चेहरा खिला, रखना इसे तुम निशानी बनाकर, पन्ने पर इसको हमेशा सजाकर..ओ प्रीतम बिन तेरे मेरे औ’ इस दाग के सिवा, इस जीवन में कुछ भी नहीं..कुछ भी नहीं..” पहले तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया, ये दाग कैसा और ये क्या लिखा है पन्ने पर? लेकिन दूसरे ही पल सब याद आ गया. तुम्हारी शरारत थी ये. किताब के पन्ने पर ये दाग तुम्हारी वजह से ही लगा था और फिर दाग लग जाने के बाद तुमनें पन्ने पर एक गाने को तोड़ मरोड़ कर लिख दिया था. सोच भी नहीं सकती तुम इसे पढ़ते ही अकेले कमरे में कितने ज़ोरों से हँस पड़ा था मैं. याद है तुम्हें तुम्हारी ये शरारत? क्या हाल किया था मेरे निर्मल वर्मा के उपन्यास “वे दिन” का तुमने? ये याद है न तुम्हें? 

तुम हमेशा हैरान होती थी न इस बात से कि मैं हमेशा इस किताब को क्यों पढ़ते रहता हूँ..मुझसे हर बार पूछा करती, “आखिर है क्या इस किताब में जो तुम इससे इतने अब्सेस्ट हो?” और मैं तुम्हें हर बार यही जवाब देता था – “पढ़ो और घुमो उस लड़के जिसे उसके दोस्त प्यार से इंडी बुलाते थे और रायना रैमन के साथ प्राग की गलियों में, तब समझोगी तुम कि क्या है इस किताब में...जादू है ये किताब.”. तुम लेकिन कभी इस किताब के तरफ ज्यादा आकर्षित हो ही नहीं सकी थी, फिर भी मैं दिल से चाहता था कि तुम ये किताब जरूर पढ़ो. मेरी तरह अब्सेस्ट भले न हो लेकिन एक बार तो जरूर पढ़ो और महूसस करो वो जो मैं किताब पढ़ते हुए महसूस करता हूँ.

उस शाम जब हम दोनों कैफे में बैठे हुए थे, इसी किताब पर बातें हो रही थी. मैं तुम्हें किताब के कुछ अंश पढ़ के सुना रहा था. तुम भी दिल से सुन रही थी. जाने अचानक तुम्हें क्या हुआ, प्रभावित हुई किताब के अंश से या जाने क्या ख्याल आया तुम्हारे मन में. मेरे हाथों से किताब तुमनें छीन लिया था, और कहा “मैं भी तो देखूँ पढ़कर वे दिन कैसे थे, कौन है ये रायना रायना रैमन और इंडी”. 

किताब के कुछ पन्नों पर तुमनें नज़र डाली थी और फिर जाने क्यों एक पन्ने पर आकर तुम अटक सी गयी. काफी देर तक तुम्हारी नज़रें उसी पन्ने पर जमी थीं. मैंने कनखियों से देखा था तुम्हें ये जानने के लिए तुम पढ़ क्या रही हो. वैसे उस पन्ने पर ऐसा बहुत कुछ था जहाँ तुम अटक सकती थी लेकिन मेरे लिए ये अंदाज़ा लगा पाना काफी कठिन था कि तुम असल में अटकी कहाँ हो? ये भी हो सकता था कि तुम्हें कोई भाग, कोई बात उस पन्ने पर ऐसी लग गयी हो जो तुम्हें काफी भा गयी हो. ऐसे में तुम अक्सर उन पक्तियों को दोबारा..तिबारा..चौबारा..तब तक पढ़ती रहती थी जब तक तुम्हारा मन न भर जाए और उसके बाद ही तुम आगे बढ़ती थी. अक्सर कहा करती थी तुम कि “किताब पढ़ो तो धीरे-धीरे, पूरा जायका लेकर पढ़ो. मिठाई की तरह होती हैं कुछ बातें किताबों में..तुम धीरे धीरे पढ़ना चाहते हो ताकि ये जल्दी खत्म न हो जाए.” इसके अलावा एक और वजह हो सकती थी तुम्हारे अटके रहने की. तुम अक्सर शब्दों में खो जाती थी. शब्दों को समझने में नहीं बल्कि शब्दों को देखने में, उनसे जान पहचान करने में और फिर उनसे दोस्ती करने में. ये भी तुम्हारे उन सारे लॉजिक में से एक था जो मुझे कभी समझ नहीं आया था. तुम अक्सर कहती थी मुझसे “देखो..ऐसा है कि तुम ‘आम लोगों’ के जैसे मैं तो हूँ नहीं, तुम सब से अलग, बहुत ख़ास हूँ मैं. मैं पहले शब्दों को देखती हूँ...अगर मुझे उनसें पोजिटिव वाइब्स मिलते हैं तो फिर मैं दोस्ती कर लेती हूँ, बातें करती हूँ उनसे.. उसके बाद आगे का पढ़ना तय होता है मेरा..”

पोजिटिव वाइब्स..? शब्दों से दोस्ती..? ये सब तुम्हारी बातें किसी भी नार्मल इंसान के समझ से बाहर की बातें थीं. मुझे कहाँ से समझ में आती?

तुम फिर अपने ट्रेडमार्क तरीके से मुझे और समझाने लगती... “देखो बात ऐसी है, कि तुम्हारे और मेरे में बहुत से बेसिक डिफरन्सेस हैं. तुम बाकी लोगों की तरह इस दुनिया के बेहद साधारण से प्राणी हो लेकिन मैं तो इस दुनिया की हूँ ही नहीं, किसी और दुनिया से आई हूँ मैं. तुम्हारे और मेरे अब्ज़र्व करने के तरीके भी अलग हैं. आब्वीअस्ली मेरी बातें तुम्हारे समझ से बाहर होंगीं.. फिर भी समझाती हूँ – देखो, तुम्हें पता है, तुम किताब में शब्दों को पढ़ते हो, समझते हो, महसूस भी करते हो. लेकिन मैं..मैं किताब में शब्दों को देखती हूँ, फिर उनसे दोस्ती कर लेती हूँ, फिर पढ़ती हूँ, समझती हूँ और महसूस करती हूँ.दोस्ती करना बहुत जरूरी है शब्दों से. बिना इसके कोई काम पूरा नहीं हो सकता..सब कुछ आधा अधुरा सा रहता है. So you see, I am complete reader. तुम सब से कहीं ज्यादा कम्प्लीट और डेडीकेटेड रीडर हूँ मैं..."

इस बार भी शायद इस किताब में तुम ऐसा ही कुछ कर रही थी. मशगुल थी किताब पढ़ने में पूरी तरह से तुम और मैं.. मैं तुम्हारी उन पुरानी बातों को तुम्हारे सामने बैठा याद कर रहा था. काफी देर तक जब तुम्हारे तरफ से मुझे कोई जवाब नहीं मिला तो मैंने टोका तुम्हें, “पसंद आ रही है किताब तुम्हें? कैसी लगी?”.
तुम बिलकुल चौंक सी गयी थी मेरे पूछने पर. तुम्हारे एक हाथ में किताब थी और एक हाथ में “स्पगेटी”. मेरे बोलने से तुम अचानक हड्बडा सी गयी थी और अचानक तुम्हारे हाथों से वो स्पगेटी का बाईट नीचे किताब पर गिर पड़ा था. 

मैं जब तक कुछ बोलता तुम्हें, तुम चिल्ला पड़ी थी... “ओह सॉरी सॉरी...सब इस उल्लू के वजह से हुआ है. मैंने जान बुझकर कुछ भी नहीं किया है..”. जानती हो, शुरू में तो मुझे लगा था कि तुम मुझसे सॉरी बोल रही हो. मैं लगभग बोलना ही वाला था कि “कोई बात नहीं..ये सब होते रहता है..” तुमनें तुरंत मेरी गलतफहमी दूर गयी थी.. “ओ साहब..मैं आपको सॉरी नहीं बोल रही हूँ बल्कि आप पर ही गुस्सा हूँ मैं. नुकसान कर दिया मेरे एक बाईट का और ‘स्पगेटी’ को भी नीचे गिरा दिया. बेचारा स्पेगेटी......मेरे मुहँ तक आया भी नहीं था कि टेबल पर दम तोड़ दिया इसने..”

मैंने पूरे हैरत भरे नज़रों से तुम्हें देख रहा था. कमाल की लड़की है ये...एक तो किताब पर पूरा स्पेगेटी गिरा दिया और अब बातें बना रही है ये लड़की. थोड़ा नकली गुस्सा दिखाने की मैंने कोशिश की और डांटा तुम्हें - “जानती भी हो कितना सम्हाल के रखता हूँ मैं ये किताब...और देखो क्या कर दिया तुमनें इसका..अब क्या करूँ इसका? बोलो? ”

मुझे लगा था तुम थोड़ा गिल्ट फील करोगी लेकिन तुमनें तो उल्टा ताव दिखाते कहा – “अब क्या करूँ से तुम्हारा मतलब क्या है? दिमाग जो थोड़ा सा इधर उधर कोने में बचा हुआ है उसका इस्तेमाल करो. किताब लो, सामने वाशरूम है.. जाओ..जाकर धो लो किताब को?”
सच कहूँ? बड़ी जोरों की हँसी आई थी मुझे. लेकिन जैसे तैसे खुद को सम्हालते हुए फिर से गुस्से में मैंने पूछा तुमसे – “किताब को धो दूँ? दिमाग तो सही है न तुम्हारा?”

इस बार भी तुम उसी तरह ताव दिखाते, थोड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए कहने लगी - “तुम्हें आखिर इंजिनियर बना किसने दिया? हाथ तुम्हारे गंदे हो जाते हैं तो धोते हो न हाथों को? तो किताब अगर गंदे हो जायेंगे तो धोयोगे नहीं क्या तुम किताब को? मतलब इतने आसन सवालों को भी सोल्व नहीं कर सकते तो बड़े बड़े इंजीनियरिंग प्रोब्लम को कैसे सोल्व कर सकोगे तुम? मेन्टेन सम स्टैण्डर्ड... जाओ अब किताब को धो कर लाओ वरना मैं धो लेती हूँ.”

मैं अब ज्यादा देर तक अपने चेहरे पर नकली गुस्सा नहीं रख पाया था और जोरों से हँस पड़ा था तुम्हारी इस बेवकूफीपने पर.. प्यार भी आने लगा था तुम्हारी इन मासूम सी नादान सी बातों पर. हाँ किताब को तुमनें बर्बाद कर दिया था, लेकिन उसका ज्यादा गम नहीं था. वैसे भी तुम्हारे सामने इस बात का गम करना या गुस्सा दिखाना मैं अफोर्ड भी नहीं कर सकता था. याद है उस दिन भी तुमनें अपनी गलती नहीं मानी थी और अंत तक अपनी ही बात पर डटी रही कि तुम्हारी कोइ गलती नहीं थी, वो तो मेरी गलती की वजह से किताब पर स्पेगेटी गिरा था. अंत में किताब पर से वो स्पेगेटी भी मैंने ही साफ़ किया था और तुम्हारे मुताबिक़ जो मैंने “घोर अपराध” किया था उस शाम, उसकी सजा भी तुमनें उसी शाम मुझे दे दी थी..... मेरे जेब से मेरा वालेट निकाल लिया था तुमनें और कहा था, “चलो.. देखते हैं आज तुम्हारे वालेट में कितने पैसे बचते हैं...” .

आज किताब का वही पन्ना सामनें खुला है, वही शब्द किताब से झाँक रहे हैं जहाँ तुम्हारी नज़रें अटकी थीं और जिसके ऊपर तुमनें एक गाने के कुछ लाइन तोड़ मरोड़ कर लिख दिए थे इस उद्देश्य के साथ कि किताब का ये दाग मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाता रहेगा -

हवा से उसका स्कार्फ बार बार फडफडा जाता था.उसके बाहर कुछ भूरी लटें माथे पर छितर आयीं थीं-धुप में चमकती हुईं."पास आ जाओ, वरना तुम हवा में उड़ जाओगी."मैंने हँसते हुए कहा.वह बिलकुल मुझसे सट गई.मुझे लगा वह ठिठुर रही है.मैंने अपना मफलर उतारकर उसके गले में लपेट दिया.उसने कुछ कहने के लिए मुहँ उठाया.उसे मालुम नहीं था, मेरा चेहरा उसके सिर पर है..तब अचानक मेरे होंठ उसके मुहं पर घिसटते गए...फिर वे ठहर गए, कनपटियों के नीचे कुछ भूरे बालों पर...."सुनो"...उसने कहा.किन्तु इस बार मैंने कुछ नहीं सुना.मेरे होंठ इस बार उसके मुहं पर आए आधे वाक्य पर जम गए.उसका उठा मुहँ निर्वाक-सा उठा रहा.कुछ देर तक मैं साँस नहीं ले सका.हवा बहुत थी, लेकिन हम उसके नीचे थे.हम बार बार साँस लेने के लिए ऊपर आते थे...हाँफते हुए एक दुसरे की और देखते थे...दीखता कुछ भी न था-अधखुले होंठ, ओवरकोट के कॉलर का एक हिस्सा, हम दोनों पर फडफडाता हुआ बेचैन सा स्कार्फ....

बातें बाकी..

वे दिन, स्पेगेटी और वो दाग - [ दिल्ली डायरीज ]

Sunday, February 21, 2016

काफी सालों बाद इस शहर में आ रहा हूँ. वैसे ज्यादा साल तो नहीं हुए, बस तीन चार साल ही तो हुए हैं अभी लेकिन ऐसा लगता है जैसे जाने कितना अरसा बीत गया हो. तुम जब तक इस शहर में रही मुझे हमेशा बुलाती रही. कितनी बार रूठी भी मुझसे. गुस्से में लड़ बैठती थी…“तुम्हें अपने शहर से ऐसा क्या लगाव है कि तुम मेरे लिए भी उसे छोड़ नहीं सकते?” और मैं अक्सर तुम्हें ये कहकर बहलाने की कोशिश करता कि बस तीन चार महीने की बात है, फिर हम और तुम एक ही शहर में रहेंगे.” तुमने लेकिन कभी मेरी इस बात का भरोसा नहीं किया. जवाब में कहती थी “यहाँ से हमेशा के लिए चली जाऊँगी तब आना तुम इस शहर में.” देखो नियति का खेल...हुआ भी तो कुछ ऐसा ही न. तुम्हें इस शहर से गए अभी दो महीने ही तो हुए थे कि मेरा तबादला यहाँ हो गया.

दिल्ली में तुम अब नहीं हो, और शायद मेरी ज़िन्दगी में भी. सोचा तो था कि कम से कम इस शहर में तो रहने नहीं आऊंगा. तुम्हारे जाने के बाद शहर के हर कोने से तुम्हारी आवाजें सुनाई देंगी मुझे. आसान नहीं होगा यहाँ के उन्हीं सड़कों पर घूमना जहाँ कभी हम तुम साथ घूमते थे. लेकिन दिल्ली आने का फैसला लेना मेरी मजबूरी थी. होता है न कि कभी कभी आपके पास कोई रास्ता नहीं होता, सिवाए उसके जो सामने हो और हमें ना चाहते हुए भी उसी रास्ते को चुनना पड़ता है. कुछ ऐसा ही हुआ दिल्ली शिफ्ट होने का फैसला लेने में भी. अब सोचता हूँ तो लगता है सच में मुझे बहुत पहले ही दिल्ली आ जाना चाहिए था. शायद कुछ और हो सकता था.. शायद जो हुआ उसे बदला जा सकता था.. 

आज भी जैसे मुझे तीन साल पहले का वो वक्त अच्छे से याद है जब आखिरी बार इस शहर में आया था मैं. तुम भी थी मेरे साथ. तुम एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरे शहर आई थी और फिर मुझे बिना बताये ही तुमने अपने साथ साथ मेरा भी दिल्ली तक का टिकट बुक करवा लिया था. याद है न तुम्हें? कितनी जिद्दी थी तुम. एकदम इम्पल्सिव. “ये चाहिए तो चाहिए.. तुम्हें चलना है मेरे साथ तो चलना है.” इसके आगे कुछ सूझता भी कहाँ था तुम्हें? कितने हथकंडे अपनाये थे तुमने मुझे अपने साथ दिल्ली लाने के लिए. मेरे ऑफिस में धरने पर बैठ गयी थी कि तुम्हें तो दिल्ली अपने साथ ले जाऊँगी. ब्लैकमेल करना भी तो खूब आता था तुम्हें. कभी खाना पीना छोड़ने की धमकी देती तो कभी मुझसे ज़िन्दगी भर बात न करने की धमकी देती. वैसे इन दोनों बातों में से तुम कर तो कुछ भी नहीं पाती ये मैं अच्छे से जानता था फिर भी तुम्हारी बात मान कर दिल्ली आने के लिए राजी हो गया था. तुम लेकिन मुझे इतने आसानी से कहाँ छोड़ने वाली थी. याद है न पूरे सफ़र के दौरान तुम कैसे चिढ़ाती आई थी मुझे.. “तुम्हें किडनैप कर के दिल्ली ले जा रही हूँ. अब तुम्हें वापस तुम्हारे शहर मैं जाने नहीं दूँगी”.

रास्ते भर मुझे बेवकूफ बनाते, मुझे डराते और मुझसे लड़ते आई थी तुम. तुम जानती थी न कि कैसे मैं तुम्हारी झूठी मुठी नाराजगी से डर जाया करता था. तुम बस इसका फायदा उठाया करती थी. याद है कैसे ट्रेन में तुम नाराज़ हो गयी थी. मैंने ज़रा चाँद की तारीफ़ क्या कर दी थी तुम तो एकदम रूठ गयी थी. हुआ कुछ यूँ था कि रात में बातें करते हुए तुम थक गयी थी और आँखें बंद कर के तुम लेट गयी थी. मेरे हाथ में मेरे प्रिय शायर की किताब थी. ट्रेन की खिड़की के बाहर आसमान में चाँद नज़र आ रहा था. मैंने तुम्हें धीरे से कहा, देखो कितना खूबसूरत लग रहा है वो चाँद. एक शेर सुनाता हूँ उस चाँद के ऊपर. शेर तो तुमने सुन लिया और तारीफ़ भी कर दिया तुमने. लेकिन उसके बाद? उसके बाद कैसे गुस्सा हो गयी थी तुम. उलाहना भरे अन्दाज़ मे तुमनें शिकायत की थी.. “हाँ बस आसमान में लटके उस चाँद की ही तारीफ़ करते रहो तुम..इस अपने इस चाँद को तो देखो भी न जो तुम्हारे सामने है.” मैं तो एकदम जैसे निरुत्तर सा हो गया था. “अरेssरेss....मैं तो...” ही मेरे मुहँ से बस निकल पाया था. सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी थी मेरी. मैं जान रहा था कि ये तुम्हारी एक नयी बदमाशी है लेकिन फिर भी मैं बेतरह डर गया था. 

वो तो कहो कि अच्छा हुआ एक शेर उसी वक़्त याद आ गया था मुझे... “तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है / तेरे आगे चाँद पुराना लगता है”. थोड़ी खुश हो गयी थी तुम ये शेर सुनते ही. लेकिन हाथ आये इस मौके को इतने आसानी से कैसे जाने देती तुम. उस शेर के अलावा पूरी ग़ज़ल सुनी थी तुमने मुझसे और फिर जाकर कहा था, “चलो अभी के लिए माफ़ करती हूँ लेकिन मेरे बजाये उस चाँद की तारीफ़ करने का जो गुनाह तुमनें किया है न उसकी सजा तुम्हें दिल्ली में मिलेगी...दिल्ली में.”.

ऐसी ही थी तुम. मुझे ना तो कभी ये पता लग पाता था कि किस बात पर तुम गुस्सा हो और न ये कि तुम्हारा गुस्सा कब झूठा मुठा है और कब सच में गुस्सा हो गयी तुम. 

तुम तो इस बात पर भी गुस्सा हो जाती थी कि रेलवे डिपार्टमेंट ने ट्रेन में साइड-लोअर बर्थ क्यों नहीं अलोट किया तुम्हें? जब कभी तुम्हारे कहने पर मैंने तुम्हारा टिकट बुक करवाया है और अगर गलती से भी साइड लोअर बर्थ की जगह कोई दूसरी बर्थ तुम्हें अलोट हो जाती कभी, तब तो मेरी शामत आ जाती थी. बताओ ज़रा, रेलवे डिपार्टमेंट की गलती की सजा भी तुम मुझे ही देती थी. वैसे तुम अब्सेस्ट थी साइड लोअर बर्थ के लिए. साइड लोअर बर्थ ट्रेन के डब्बे के तुम्हें इतने पसंद थे कि तुम कहा करती “यार कोई ऐसा सिस्टम नहीं है कि मैं हर ट्रेन में ये साइड लोअर बर्थ अपने नाम से बुक करवा लूं ज़िन्दगी भर के लिए? रेलवे डिपार्टमेंट उस बर्थ पर रिजर्व का बोर्ड लगा दे मेरे नाम से. मैं जब भी आऊं, मेरे लिए ये बर्थ खाली रहे.कोई और न बैठे.” मेरी जान खा जाती थी तुम इस बात पर. मुझसे कहती “जाओ जाकर पता लगाओ ऐसा कोई सिस्टम है या नहीं.” मैं बात टालने की कोशिश करता तो तुम फिर मुझे ताने सुनाने लगती.. “शाहजहाँ ने मुमताज के लिए ताजमहज बनवा दिया और तुम मेरे लिए ये एक छोटा सा काम नहीं कर सकते? और बातें करते हो ज़िन्दगी भर मेरी ख्वाहिशों को पूरा करने की? डोंट टॉक टू मी..” और तुम फिर गुस्सा हो जाती.

सच में पागल थी तुम!

तुम्हारी उन बातों को और उस ट्रेन के सफ़र के छत्तीस घंटों को याद करते हुए इस बार के पैतालीस घंटे कैसे बीत गए पता भी नहीं चला. रात में पहुँचने वाली ट्रेन सुबह छः बजे दिल्ली पहुँची थी. पूरे नौ घंटे की देरी से.

मैं जानता हूँ अगर ये बात भी तुम्हें बताऊंगा तो तुम खूब हंसोगी. मेरा मजाक भी उड़ा दोगी. जाने कहाँ से तुम्हें वो लॉजिक सुझा था. मैंने जब भी ट्रेन का सफ़र अकेले किया है हमेशा ट्रेन देर से ही रही है..आज तक ऐसा नहीं हुआ कि किसी भी ट्रेन ने मुझे एकदम सही वक़्त पर पहुँचा दिया हो. यहाँ तक कि राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेन भी नहीं. लेकिन जब कभी तुम्हारे साथ मैं आया हूँ तो ट्रेन हमेशा राईट टाइम पर.. राईट टाइम भी ऐसी वैसी नहीं, अगर चार पचपन ट्रेन का वक़्त है तो इधर घड़ी की सुई चार पचपन पर गयी और उधर ट्रेन प्लेटफोर्म पर लगी. ये सच में कमाल का इत्तेफाक था. इत्तेफाक नहीं बल्कि चमत्कार था. मुझे कभी समझ नहीं आया इसके पीछे का लॉजिक. लेकिन तुम तो तुम थी. इसमें भी तुमने एक लॉजिक ढूँढ निकाला था. कहती थी मुझसे “तुम थोड़े खडूस टाइप हो न, एकदम सीरियस और नॉन रोमांटिक. देखो इसलिए ट्रेन तुम्हारे अकेले रहने पर देर करती है” और मैं इस दुनिया की सबसे प्यारी, रोमांटिक, सेंसिबल और इमोशनल लड़की हूँ न. मेरे साथ जब भी आये हो कभी ट्रेन ने देर की? नहीं न? फिर...?

मैं जवाब भी क्या देता तुम्हारी इन बातों का. सच कहूँ तो अक्सर तुम्हारी इन बेवकूफी भरी बातों को मैं एन्जॉय करना चाहता था, इसलिए अक्सर मैं कुछ नहीं कहता तुम्हारे अजीबोगरीब लॉजिक पर. 

पैतालीस घंटे के ट्रेन के सफ़र ने वैसे ही बैंड बजा दिया था मेरा और ट्रेन से उतरने के बाद ठण्ड ने हालत ख़राब कर दी थी मेरी. जब तक ट्रेन पर था ठंड का पता नहीं चल पाया था, लेकिन टैक्सी पर बैठते ही ठण्ड ने जैसे चारों ओर से जकड़ लिया था. दो स्वेटर और एक जैकेट के बाद भी मैं ठिठुर रहा था. मौसम भी तुम्हारे पसंद का था. सुबह का वक़्त, घना कोहरा और ठिठुरने वाली सर्द हवा. 

जैसे जैसे टैक्सी कैनौट प्लेस के आउटर सर्कल से गुज़र रही थी, मुझे याद आ रही थी वो आखिरी शाम जब हम कैनौट प्लेस में घूम रहे थे. सीपी के एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक और फिर तीसरे...जाने कितनी बार हमनें चक्कर लगा लिया था कनौट प्लेस का. ना तुम थक रही थी ना मैं. चलते हुए हम कितनी बातें कर रहे थे. मैं तुम्हें पुराने किस्से सुना रहा था. बहुत पहले के किस्से, बारह साल पहले जब हम और तुम मिले थे तब की बातें.. तुम्हें हमेशा लगता था कि ये असंभव है. सब कुछ ऐसे याद रखना जैसे मैं याद रखता हूँ, हर एक मोमेंट, जो जब हुआ था...जैसे हुआ था. उन सभी बातों को मैं कैसे याद रख लेता हूँ तुम हमेशा हैरान होती थी. तुम कहती थी अगर मैं तुम्हें नहीं जानती तो कभी इस बात पर यकीन नहीं कर सकती थी कि किसी को इतनी बातें इतनी यादें इतने डिटेलिंग के साथ याद रह सकती हैं. 

मेरे लिए लेकिन तुम्हारी बातों को याद रखना बड़ा ही सहज रहा है हमेशा से. कभी कोई एफर्ट नहीं लगाना पड़ा मुझे. कभी ये भी खुद से नहीं कहना पड़ा कि हाँ ये बातें तुम्हारी मुझे याद रखनी है, या इसे नहीं भूलूँगा कभी. बस ऐसे होते गया कि तुमसे जुड़ी छोटी से छोटी बात भी याद रहते गयी मुझे. तीन साल पहले की भी सभी बातें मुझे ठीक वैसे ही याद है जैसे हुई थी, उसी क्रम में. तुम्हारा मेरा कनौट प्लेस में घूमना, सेन्ट्रल पार्क में लकड़ी के बेंच पर एक दूसरे के कंधे पर सर टिकाये बैठे रहना और डूबते हुए सूरज को देखकर तुम्हारा कहना... "दिन ख़त्म हो गया, डूब गया सूरज...." और फिर मेरा तुम्हारे हाथों को अपने हाथों में लेकर कहना "कल फिर से नयी उम्मीद लिए नयी सुबह आएगी... और वो सुबह हमारी होगी." तुमनें बड़ी विश्वास भरी नज़रों से मुझे देखा था, और कहा था कि मुझे तुमपर यकीन है..तुम कभी मुझे खुद से दूर नहीं जाने दोगे..और मैंने भी तुमसे वादा किया था..कभी दूर नहीं जाने दूंगा तुम्हें.


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टैक्सी पर बैठे और भी कुछ याद आने लगता है, उसी शाम की तुम्हारी और मेरी कुछ और बातें.. लेकिन मैं अब ज्यादा बातें याद करना नहीं चाहता. बस आँख बंद कर के टैक्सी के शीशे से सर टिकाये बाहर देख रहा हूँ.. कनौट प्लेस कब का गुज़र चूका है...टैक्सी के स्टीरियो पर एक खूबसूरत गाना बज रहा है, वही गाना जिसे हम दोनों ने उस आखिरी शाम सुना था वाकमैन पर, और तुमसे मैंने कहा था..डोंट वरी, ऐसे इमोशनल गाने सुनकर मैं सड़कों पर तुम्हारी यादों में इधर उधर फिरता रहूँ, ऐसा वक़्त नहीं आने दूँगा.


आँखों में बसी हो पर दूर हो कहीं... 




बातें बाकी... 


आँखों में बसी हो पर दूर हो कहीं.. [दिल्ली डायरीज ]

Thursday, December 24, 2015

पहले की कड़ियाँ  भाग एक, भाग दो 

शाम गहराने लगी थी.. दोनों टेरेस से नीचे उतर आये थे. बारिश अब जोरदार होने लगी थी. लड़की का मन तो बिलकुल नहीं था वापस आने का लेकिन दोनों को नीचे आना पड़ा. दोनों को प्लेटफॉर्म  के बीचोबीच एक बेंच मिल गयी थी बैठने के लिए. बेंच पर बैठे हुए लड़की ने एक ख्वाहिश लड़के को बताई....तुम पेंटिंग करते हो न, मेरे लिए कभी एक पेंटिंग बनाना तुम...हमारे इस एक पल की पेंटिंग, जब इतने बड़े से स्टेशन की भीड़ में बस एक मैं हूँ और एक तुम, मैं तुम्हारे कंधे पर सिर टिकाये बैठी हुई हूँ. इस एक पल की, और इसी तरह के हमारे अनगिनत पलों की मैं पेंटिंग चाहती हूँ जिसे मैं तुम्हारे और मेरे कमरे की दीवारों पर सजाऊँगी. तुम्हारा और मेरा कमरा...होगा वो? जाने कैसा होगा? लेकिन जैसा भी होगा बहुत खूबसूरत होगा...मैं खूब अच्छे से उस कमरे को सजाऊँगी, लेकिन अगर नहीं हुआ तो...इस एक वाक्य को बोलते बोलते जाने क्यों लड़की की मुस्कान काँपने लगी थी. उसकी झील सी गहरी आँखें अचानक भर आई जिसे लड़के से छिपाने के लिए उसने तेज़ी से मुँह  दूसरी ओर फेर तक दूर किसी अदृश्य चीज़ को दिखा कर हँसना शुरू कर दिया.


लड़का लेकिन उसकी इतनी कोशिशों के बावजूद सब देख गया था. उसके मासूम चेहरे से एक पल के लिए अपनी नज़रें जो नहीं हटाता था वो. इसलिए उसकी हँसी और आंसू दोनों को नज़रंदाज़ करते हुए उसने लड़की का चेहरा जबरदस्ती अपनी और घुमा लिया....बताओ क्या चलने लगा तुम्हारे मन में अचानक??? कितनी अच्छी प्लानिंग तो थी तुम्हारी...अभी पेंटिंग बनवा रही थी तुम, कमरे को सजा रही थी और कमरे को सजाते हुए रुक गयी...आँखों में ये आँसूं कहाँ से आ गए?

लड़की अब तक बड़ी चालाकी से आँखों के बहते आंसुओं को पोंछ चुकी थी, और अपनी नकली हँसी से लड़के को बहलाने की कोशिश कर रही थी. लड़का लेकिन एक पल को भी उसकी चाल में नहीं आया. वो अब भी गंभीर था...समझ तो वो रहा था कि बात क्या है लेकिन फिर भी लड़की से सुनना चाहता था. कुछ देर की नाकाम कोशिश के बाद आखिर लड़की ने हथियार डाल ही दिए. बिना आसपास के लोगों की परवाह किये वो लड़के के सीने में छुप गयी.रुलाई के बीच उसके शब्द लड़के को साफ़ साफ़ सुनाई दे रहे थे....मुझे रोक लो..मैं जाना नहीं चाहती. तुमसे अलग नहीं होना चाहती मैं.

लड़का बहुत बेबस महसूस कर रहा था. काश ! रोक पाता उसको हमेशा के लिए...अपने पास..अपने साथ..पर सच्चाई वो दोनों ही जानते थे. वो तो बस चुपचाप उसके चारों और अपनी बाँहों  का घेरा बनाए उसे सान्त्वना दिए जा रहा था...सब ठीक होगा...हम तुम हमेशा साथ रहेंगे.

कुछ देर उसे चुप कराने की नाकाम सी कोशिश करने के बाद लड़के ने अचानक ब्रह्मास्त्र फेंका..अच्छा अच्छा सुनो, एक मिनट चुप होकर ज़रा मेरी बात तो सुन लो...बेहद इम्पोर्टेंट बात है. लड़की अचानक सुबकियों के बीच खामोश हो उसका मुँह  निहार ही रही थी कि लड़के ने उसी गंभीरता से पूछा...अगर नहाने भर का पानी हो गया हो तो बस करो...टंकी खाली न हो जाए...पहले तो लड़की वैसे ही उसे ताकती रही फिर बात का मतलब समझ आते ही वो सबकुछ भूल खिलखिला पड़ी थी. लड़के का मकसद पूरा हो गया था. उसके हलके हलके घूंसे खाता वो मुस्कुरा रहा था.

वो ग्यारह घंटे कब कहाँ और कैसे फुर्र हो गए, पता ही नहीं चला था. ट्रेन जब तक खुली आधी रात हो चुकी थी. लेकिन दोनों सोना नहीं चाहते थे. एक दूसरे की बातों में खोये दोनों की आँखों से नींदें कोसो दूर थी. नींद के साथ साथ लड़की के मन से ‘कोई क्या सोचेगा’ का डर भी गायब था. लड़के ने एक बार हलके से उसे टोका भी था..मैं अपनी बर्थ पर जाऊं अब? लोग क्या सोचेंगे? लड़की ने पहले तो उसे अजीब तरह से घूर के देखा, फिर उसके सामने हाथ नचा दिया...सोच कर कोई क्या उखाड़ लेगा जी??? मेरी बर्थ..मेरा टिकट..मेरे तुम..कहती हुई वो अचानक थोड़ा शर्मा गई...लड़का बोगी के उस हलके अँधेरे में भी उसके चेहरे की लाली देख गया था. उस दमकते चमकते मासूम से चेहरे वाली लड़की को यूँ छोड़ कर सोना तो लड़का भी नहीं चाहता था, सो चुपचाप उसकी बात मान गया

रात गहराने के साथ साथ कई घंटों की थकी लड़की की पलकें नींद से बोझिल होने लगी थी. पर लड़की भी मानो लड़के के साथ के हर पल को पूरी शिद्दत से जीना चाह रही थी. वो लड़के को नहीं जताना चाह रही थी पर उसी की तरह वो भी जानती थी कि शायद उन दोनों के साथ की यह आखिरी रात होगी. एक तरफ उन पलों में वो दोनों ही बेहद खुश थे, वहीँ हर पल के साथ उन दोनों को ही एक अजीब सी बेचैनी घेरे जा रही थी. लड़का जानबूझकर उसे कोई भी ऐसी बात नहीं करने दे रहा था जो उसे उदास कर दे.. वो उदास बिलकुल अच्छी नहीं लगती, ऊटपटांग बातें करते हुए, अजीबोगरीब लॉजिक झाड़ते हुए ही अच्छी लगती है वो.

बहुत देर तक नींद से लडती लड़की आखिर हारने लगी तो लड़के ने उसे डांट के सुलाना ही उचित समझा. लड़की ने अबकी उसकी बात मान तो ली, पर उसकी एक शर्त थी..वो उसका तकिया होगा...अपने साथ के इन आखिरी पलों में वो उसकी गोद में सर रख कर सोने का सुख महसूस करना चाहती थी. जाने कब से देखा गया अपना एक और सपना पूरा करना चाहती थी. लड़का भी उसके इस सपने से अच्छी तरह वाकिफ था..और कहीं न कहीं वो भी उसके इस सपने को पूरा करना चाहता था. इसलिए लड़की की तरह उसने भी “कोई क्या उखाड़ लेगा” वाला फंडा अपना लिया..

लड़की बेहद तसल्ली से उसकी गोद में सिर रखे उसके हथेली में अपनी हथेली जकड़े गहरी नींद सो गयी थी और उसके उस मासूम चेहरे को निहारते लड़के ने उसके माथे पर से आवारा भटकती जुल्फों को धीरे से उसके कानों के पीछे खोंसा...ऊपर मानो किसी अदृश्य शक्ति की ओर देख अपनी सनशाइन के लिए, अपनी मानसून प्रिंसेज के लिए कोई दुआ माँगी और आँखें मूँद ली...



लड़के को अब कलकत्ता की बाकी कोई बात इतना नहीं याद आती, क्यों कि जब भी वो याद करता है, उसे कलकत्ता का अपना आख़िरी दिन याद आता है...जिस दिन वो और उसकी सनशाइन...दोनों वापस आ रहे थे...| हावड़ा का वो प्लेटफ़ॉर्म...वहाँ बना वो बड़ा सा टेरेस...उस टेरेस से लडकी के साथ हुगली नदी को निहारते हुए लडकी की बकबक से आनंदित होना...वहाँ खड़े होकर उस लडकी के बचकाने-से लगने वाले सपने, उन ख्वाहिशों को सुनना और उनका पूरी गंभीरता से समर्थन कर उसकी आँखों में वो खुशी की चमक देखना...

आधी नींद...अधूरे ख़्वाब और एक सुहावना सफ़र - कोलकता डायरी (३)

Thursday, November 5, 2015


रात लड़के ने होटल में नहीं बल्कि एक ट्रेन के कूपे में बिताया था. ये भी एक मजेदार किस्सा था. एक दिन पहले जब सुबह लड़का हावड़ा स्टेशन पहुंचा, ट्रेन से उतरते ही उसे एक परिचित मिल गए. वो उसके दूर के चाचा थे जो रेलवे में कार्यरत  थे. अकसर रेलवे में काम करने वाले कर्मचारी स्टेशन से दूर जो वार्ड में ट्रेनें खड़ी रहती हैं, उसके खाली कम्पार्टमेंट में अपना घर बना लेते हैं. उन्होंने लड़के से जिद की, कहाँ होटल में पैसे बर्बाद करोगे, तुम दो दिन मेरे साथ ही रहो, रात भर गप्पे मारेंगे. लड़के ने भी सोचा कि चलो होटल के पैसे बचेंगे और रात भी बातों में कट जायेगी, सो उनके साथ चला आया था.

 लड़के की रात थोड़ी बेचैनी में कटी थी. पूरी रात वो जागा रहा था. उसे इस बात की ख़ुशी थी कि वो होटल में ना रुक कर इस कूपे में रुका है, होटल में अकेले रहने से तो बेहतर है चाचा के साथ रुकना. इसी बहाने इतने अरसे के बाद मिले चाचा से कितनी सारी बातें हो गयी. उसके चाचा और उनके तीन चार और सहकर्मी जो वहां रुके थे, उन्होंने रात के खाने का इंतजाम भी कूपे में ही किया था. छोटा गैस चूल्हा से लेकर खाना बनाने के सारे इंतजाम उन लोगों ने कर रखे थे. देर रात तक बातें होती रही थी, और फिर सब सोने चले गए. लड़के की आँखों में लेकिन नींद कहीं न थी. वो दिन भर की बातों में खोया था. कूपे से उतर कर वो ट्रेन की  पटरियों के किनारे एक सीमेंट की  बेंच पर बैठ गया. बहुत सी बातें उसके मन में चल रही थी, कभी लड़की की  दिन भर की हरकतों को याद कर के उसको हँसी आती, कभी गिल्ट भी होता उसे कि ये एक ही तो मौका मिला था लड़की के साथ इस शहर को घूमने का, उसे एक और दिन यहाँ रुकना चाहिए था, अपने प्लान को एक्सटेंड कर लेना चाहिए था, तो कभी उसे थोड़ी बेचैनी होती.. दोनों में से किसी को ये नहीं पता था कि अब ऐसा लंबा साथ उन दोनों को कब मिलता है...मिलता भी है या नहीं? लड़का अपने जीवन के आगे की राह पर कदम बढाने वाला था, तो लडकी को भी उसकी किसी अनजानी मंजिल की तलाश में दूर जाना था. घर परिवार की कुछ बातें थी जिसके आगे लड़की बेबस थी. लड़का नहीं चाहता था कि लडकी एक सच्ची साथी बनने की चाह में एक बुरी बेटी बन जाए...इसलिए उसने एक बार भी उससे नहीं कहा...मत जाओ इतनी दूर...तुम्हारे बिना जीना भूल चुका हूँ मैं. रात भर लड़का बस यही दुआ माँगता रहा था, चाहे कुछ भी परिस्थितियां हों, हम दोनों कभी जुदा न हो. रात भर वो लड़की के बारे में और आने वाले दिनों के बारे में सोचता रहा. सुबह कब हुई ये लड़के को पता भी नहीं चल सका. 

उसके चाचा जब कूपे से बाहर आये तो उन्होंने देखा लड़का वहीँ सीमेंट की बेंच पर बैठा है. चाचा ने मजाक में सवाल भी किया, रात भर सोये नहीं क्या? लड़के ने बहाने से इस सवाल को टाल दिया. सुबह का नाश्ता  चाचा ने ही बनाया था, चाचा के बाकी के सभी साथी  सोये हुए ही थे. चाचा ने तो जिद की थी कि अगर कोई जरूरी काम नहीं हो तो वो उनके साथ उनके ऑफिस आ कर समय बिता सकता है, इसी बहाने थोड़ी और बातें हो जायेगी. लेकिन ये मुमकिन नहीं था. ट्रेन दोपहर बारह बजे की थी और लड़की ने पहले से कह रखा था कि वो दस बजे तक स्टेशन पहुँच जायेगी. लड़के ने बहाना बनाया कि उसके कुछ और साथी आने वाले हैं, वो चाचा से विदा लेकर सीधा हावड़ा स्टेशन के मुख्य द्वार पे आ गया जहाँ टैक्सियाँ लगती थी. लड़की ने वहीँ पर इंतजार करने कहा था उसे. 

हल्की  बारिश हो रही थी. मौसम सुबह से ही बड़ा खूबसूरत सा था. लड़के ने आसमान की तरफ देखकर एक बार फिर सोचा काश सच में कोई ऐसा चमत्कार हो जाए, एक दिन और दोनों को मिल जाए साथ रहने के लिए. लेकिन ये मुमकिन नहीं था. दो घंटे में ट्रेन खुलने वाली थी. ट्रेन पर भी दोनों साथ नहीं रह पायेंगे, लड़की का रिजर्वेशन एसी कम्पार्टमेंट में था और लड़के का सामान्य स्लीपर कूपे में. इस बात से भी लड़का थोड़ा उदास था. बार बार उसे एसी कम्पार्टमेंट में टिकट नहीं लेने का मलाल हो रहा था. 

लड़की ठीक समय पर स्टेशन पहुंची थी. स्टेशन के बाहर खड़ा वो लड़की को दूर से ही पहचान गया. वो टैक्सी में अपने दादा के साथ आई थी. दादाजी को देखकर लड़के का मन थोड़ा उतर गया. उसने सोचा था ट्रेन पर तो अलग अलग कम्पार्टमेंट में सीट हैं कम से कम स्टेशन पर तो दोनों को कुछ वक़्त साथ बिताने का मौका मिल जाए. 

दादाजी लेकिन टैक्सी से नीचे उतरे ही नहीं. लड़के से थोड़ी बात की और फिर उसी टैक्सी में जिसमे वो आये थे उससे ही वापस लौट गए. लड़का मन ही मन मुस्कुराने लगा, वो समझ गया था कि ये शरारत लड़की की ही है. उसने ही कहा होगा दादाजी से, आप बेवजह परेशान होंगे. मैं चली जाऊँगी . लड़के ने लड़की से पूछा.. “क्या बात है? दादाजी चले गए? ये साज़िश जरूर आपकी ही रही होगी?” लड़की हँसने लगी.. शरारती अंदाज़ में उसने कहा, “हाँ, जनाब, मैंने भेजा है दादू को वापस.. आपके साथ रहकर स्कीमें बनानीमुझे भी आ गया न अब. मैंने दादा से कहा कि मेरा ये नालायक दोस्त है न, उसका काम है मेरी हिफाज़त करना, करेगा मेरी हिफाज़त वो, आप निश्चिंत होकर जाइये. क्यों? ठीक कहा न मैंने?”लड़की उसे देखकर हँसने लगी. लड़का अकसर लड़की की ऐसी बातों पर चुप ही रहता है, थोड़ा झेंप सा गया वो. लड़की लेकिन पूरी बॉसगिरी दिखाते हुए कहने लगी, “चलो काम पर लग जाओ तुम..सामान उठाओ मेरा और चलो वेटिंग रूम की तरफ. 

आज शायद इन दोनों की सभी छोटी बड़ी दुआएं कबूल होने वाली थी और वो भी इतने आश्चर्यजनक तरीके से कि खुद इनको भी विश्वास नहीं हो पा रहा था. हावड़ा स्टेशन पर वेटिंग रूम प्लेटफोर्म की पहली मंजिल पर है. दोनों वेटिंग रूम जाने के लिए सीढियाँ चढ़ ही रहे थे कि अनाउंसमेंट  सुनाई दी.. For your kind attention please, Train number 12369 is running late by 6hrs and 30 minutes and will depart from howrah junction at 19:00 hrs. we’are sorry for the inconvenience. लड़की को तो पहले इस अनाउंसमेंट पर विश्वास ही नहीं हुआ, वो अनाउंसमेंट सुनते ही सीढ़ियों पर ही ख़ुशी से उछलने लगी. उछलने का मन तो वैसे लड़के का भी कर रहा था, लेकिन वो अपनी ख़ुशी को काबू में रखे हुए था, लड़की को जैसे तैसे खींचते तिरते वेटिंग रूम तक पहुँचा वो. लड़की को तो जैसे होश ही नहीं था. “कितना प्यारा लग रहा है न आज रेलवे का ये इरिटेटिंग सा अनाउंसमेंट. “Sorry for the inconvenience..” आज इस शब्द पर गुस्सा नहीं बल्कि प्यार आ रहा है, है न? लड़की ने लड़के की तरफ देखते हुए मुस्कुराते हुए कहा. 

लड़का भी उसकी  तरफ देखकर मुस्कुराने लगा. “हम दोनों यही चाहते थे न कि कुछ देर और साथ रहे, देखो हो गया न ये चमत्कार...” 

लड़की ने लड़के की बात को बीच में ही काट कर कहा – “तुम्हारा क्या हाथ है जी इसमें? इसे मैंने करवाया है..” वो फिर से अपने कुर्ते के कॉलर को गर्वीले अंदाज़ में हिलाती बोली.. “तुमसे तो मैंने कल ही कह दिया था न, Believe in Miracles. Miracles are waiting to be happen everywhere. देखा न आज तुमने इसका जीता जागता उदाहरण? अब अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारे सामने ही इस लेट हुए ट्रेन को कैंसल ही करवा दूँ..बोलो? कैंसल करवाना है? रुकना है एक दिन और मेरे शहर में मेरे साथ? लड़के को लड़की की इन बातों पर हँसी भी आ रही थी और थोड़ी हैरत भी, ये सच में कैसा इत्तेफाक है?

ट्रेन छः घंटे देर से चलने वाली थी, ये अनाउंसमेंट जब से लड़की ने कानों में गयी थी, उसका मन बाहर घूमने का होने लगा था. 

“सुनो, एक जगह है यहाँ, बोई पारा..माने कॉलेज स्ट्रीट.. ज्यादा दूर नहीं है, टैक्सी से तुरंत पहुँच जायेंगे, बस हावड़ा ब्रिज क्रॉस  करो और थोड़ी देर में कॉलेज स्ट्रीट..मेरी सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है, तुम्हें दिखाना चाहती हूँ, चलोगे घूमने वहां?” लड़का लेकिन थोडा दुविधाग्रस्त था, वो ये तय नहीं कर पा रहा था कि बाहर घूमने जाना सही होगा या नहीं. 

लड़के की इस दुविधा को लड़की ने भांप लिया था, “अरे साहब रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठ कर ट्रेन का इंतजार करने जैसा बोरिंग काम दूसरा नहीं, हाँ, अगर बारिश होती रहे, पूरे वेटिंग रूम में कोई न हो... डिट्टो इजाज़त जैसा कोई सीन हो तो फिर अलग बात है..चलो बाहर चलो..घूमो...भिगो बारिश में, फॉल इन लव विद माय सिटी....फॉल इन लव विद मी..” लड़का मुस्कुराने लगा, लेकिन फिर भी उसके मन में थोड़ी दुविधा थी. लड़की ने लड़के को तसल्ली देते हुए कहा, क्यों डर लग रहा है? खो जाने का डर है क्या मेरे शहर में? घबराओ नहीं तुम्हें तुम्हारे शहर सुरक्षित मैं पंहुचा दूंगी, मेरा वादा है. अब चलो सीधे से.. क्लॉक  रूम में लगेज रखते हैं और घूमने निकलते हैं. 

लड़की की जिद के आगे वैसे भी लड़के की एक नहीं चलती थी. दोनों टैक्सी से निकल गए कॉलेज स्ट्रीट की तरफ. 

हल्की  बारिश हो रही थी और लड़की के जिद की वजह से लड़के को टैक्सी लेनी पड़ी थी. वो अकेला रहता तो कभी टैक्सी लेने का ख्याल दिल में भी नहीं लाता. लेकिन लड़की का बस एक ही पॉइंट था. कोलकाता घूमो तो इन पीली टैक्सी में घूमो...वरना मत घूमो. टैक्सी में भी लड़की की गाइडगिरी चलती रही. हावड़ा ब्रिज का इतिहास तक लड़की को मालूम था. लड़का सोचता, ये जरूर दिल्ली और कोलकता  के ट्रैवेल गाइड बुक को रट कर बैठी होगी, वरना क्या ये मुमकिन है कि उसे इस तरह की जानकारी हो शहरों की. वैसे, लड़के को उसकी वो कहानियाँ  जो वो शहरों के बारे में सुनाती थी, अच्छी तो लगती थी लेकिन अब उसकी इन कहानियों में कितनी कहानियाँ  असली और कितनी उसकी मनगढ़ात होती थी ये कह पाना नामुमकिन था. उससे पूछने पर पिटे जाने का खतरा भी था. लेकिन जो भी हो, उसकी इन कहानियों से घूमने का मज़ा दुगुना तो हो ही जाता था. 

कॉलेज स्ट्रीट की सड़कों पर टहलते हुए लड़की उसे फिर से भुतहा कहानियाँ  सुनाने लगी....वही जो नेशनल लाइब्रेरी में घूमते हुए वहां के बारे सुनाया था..उसी के कन्टिन्यूएशन में. लड़की कहती, अगली बार तुम जब आओगे तो हम कोलकता  के सभी हौंनटेड हॉउस घूमने चलेंगे. लड़का थोड़ा चिढ़ते हुए कहा, तुम बस भुतहा कहानियाँ  ही सुनाओ, इतना खूबसूरत मौसम है और तुम्हें बस ये भुतहा कहानियां सूझ रही हैं. लड़की इसपर और भी चिढ गयी.. थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहती है, “एक बात तो बताओ, तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है जी? बचपना करो तो कहते हो, बचपना क्यों कर रही..तुम अब बड़ी हो गयी. देश दुनिया की बातें करो तो कहते हो पकाओ मत मुझे, गॉसिप करूँ तो मना करने लगते हो उसमें भी.. रोमांटिक बातें करो तब तो एकदम शर्मा से जाते हो...और अब भुतहा बातों पर भी तुम पाबंदी लगा रहे हो? तो मैं कौन सी बातें करूँ? तुम्हारी कार और फार्मूला वन रेसिंग वाली बातें जिसकी जानकारी मेरे पास जीरो बटा लड्डू है. तुम ही कहो? लड़की रूठ गयी थी. लड़का उसे मनाने लगा. अच्छा बाबा तुम्हें जो मन में आये वो बातें करो. मैं कुछ नहीं कहूँगा, लेकिन ऐसे मौसम में यूँ रूठो नहीं. लड़की ने बेपरवाही से कहा, “किसने कहा मैं रूठ गयी हूँ. मैं रूठती नहीं तुम्हारी ऐसी बातों से, हाँ गुस्सा भले हो जाती हूँ. तुम बस ऐसे में संभल के रहना, ऐसा गुस्सा जब मुझे आता है तो मुझे अकसर लगता है मेरे हाथों किसी का खून न हो जाए. किसी का से मेरा मतलब तो समझ रहे हो न?”

“हाँ मैडम, समझ रहा हूँ. अब ऐसी बातें की मैंने तो मेरी शामत पक्की है..यही न?” 
“शामत नहीं..तुम्हारी मौत पक्की है...”
बोई पारा में अपनी मानसून प्रिंसेज के साथ टहलना ऐसे खूबसूरत मौसम में ये उसके लिए सबसे यादगार पल था.टहलते हुए अपनी प्रिंसेज के साथ ये प्यारी सी खट्टी मीठी नोक झोंक का भी वो भरपूर आनंद ले रहा था. अपनी मानसून प्रिंसेज के हाथों में हाथ डाल के दुकानों के आगे से गुज़ारना, किताबें देखना उसे बहुत अच्छा लग रहा था. 

लड़की उसे कॉफ़ी हाउस लेकर गयी, जहाँ न जाने कितने बार वो पहले आ चुकी थी. लड़की उसे कॉफ़ी हाउस के इतिहास के बारे में बताती. इस पूरे इलाके के बारे में बताती उसे, जहाँ वो अकसर जब कोलकता  में रहती तो अपने दोस्तों के साथ किताबें खरीदने आती थी. लड़की शायद जान बूझकर लड़के को इस इलाके में लायी थी, सिर्फ तीन वजहों से. पहला तो ये कि लड़के को किताबें पढ़ना बहुत पसंद है और दूसरा ये कि इस मोहल्ले की अधिकतर बिल्डिंग ब्रिटिश राज के समय की हिस्टोरिकल  बिल्डिंग हैं, ऐसे मोहल्ले में घूमना लड़के को हमेशा पसंद आता था. और तीसरी वजह लड़की थी, उसका मानना था इस मोहल्ले से एन्सीएन्ट कोलकता  की खुशबु आती है. 

दोनों के पास समय का अभाव था, कॉलेज स्ट्रीट और उसके आसपास के इलाके वो सही से घूम भी नहीं पाए थे कि लड़का वापस चलने की जिद पे अड़ गया. लड़की का लेकिन और घूमने का मूड था. वो पार्क स्ट्रीट जाना चाहती थी. बच्चों सी जिद करने लगी वो. लेकिन लड़के ने इस बार कड़ा विरोध जताया. लड़की थोड़ी नाराज़ हो गयी.. “शहर मेरा है, मुझे पता है कोई गड़बड़ नहीं होगी, और तुम बेवजह डर रहे  हो”. इस बार लड़का भी पीछे नहीं रहा, उसने भी उसे डांटते हुए कहा, “तुम्हारा क्या है? तुम्हारा तो घर है..ट्रेन छूट जाए तो तुम तो चली जाओगी घर, लेकिन मैं क्या करूँगा? ट्रेन छुट गयी तो क्या टिकट मिलेगी इतनी जल्दी अगले दिन की?”. वैसे तो लड़की की बॉसगिरी लड़के के ऊपर हमेशा चलती थी लेकिन जब कभी लड़की को लड़का ऐसे डांटता तो लड़की थोड़ा सहम सी जाती. बड़े मासूमियत से उसने जवाब दिया.. “मैंने कब मना किया, चलो मेरे घर..रहो वहीँ जब तक तुम्हें टिकट नहीं मिल जाती..इससे अच्छी बात तो मेरे लिए हो ही नहीं सकती न...”. लड़का जैसे एकदम निशब्द सा हो गया. उसने आगे कुछ कहा ही नहीं. 

लड़की को भी एहसास होने लगा कि अब वापस लौट जाना ही बेहतर है, शाम भी हो रही थी और ट्रेन का वक़्त भी. 

वापस लौटते हुए लड़की अपनी एक और ख्वाहिश लड़के से कहने लगी, जो कुछ देर पहले उसने लड़के से कहा था जब लड़के ने उसे थोड़ी डांट लगाईं थी. - “इतनी सारी जगहें हैं इस शहर में जो मैं तुम्हें दिखाना चाहती हूँ, जैसे तुम मुझे अपना शहर दिखाते हो, ठीक वैसे ही मैं भी अपना शहर तुम्हें दिखाना चाहती हूँ. मैं भी चाहती हूँ जिन जगहों से मेरी यादें जुड़ी हैं, जिन जगहों से मुझे बेतरह प्यार है वहां तुम्हें ले जाऊं. दक्षिणेश्वर काली मंदिर का नाम सुना है? नाल्हात्ति कलि मंदिर का नाम सुना है?तारापीठ..अदायपीठ.. ये सब जगह जो दूर है यहाँ से..लेकिन सभी किसी न किसी वजह से मेरे दिल के बेहद करीब. मैं तुम्हारे साथ इन सब जगह जाना चाहती हूँ. मैं चाहती हूँ दुर्गा पूजा के समय तुम यहाँ रहो.. मेरे साथ मेरे शहर का दुर्गा पूजा देखो. और ये सब एक या दो दिन में तो मुमकिन नहीं न...” लड़की को थोड़ा उदास देख लड़के ने उसका दिल रखने के लिए कह दिया देखना ये ख्वाहिश भी हमारी जरूर पूरी होगी, जबकि वो भी जानता था लड़की की इस ख्वाहिश का पूरा होना शायद संभव न हो. 

भगवान् भी उन दिनों अजीब खेल खेलता था. इन दोनों की छोटी छोटी ख्वाहिशें अकसर वो पूरी कर देता था, लेकिन ऐसी कुछ बड़ी ख्वाहिशें थी उन दोनों की जिसे वो एक सिरे से खारिज कर देता था...बिलकुल उन पैरेंट्स की तरह जो बच्चे की हर दिन चॉकलेट  खाने की जिद तो पूरी कर देते हैं लेकिन अगर कुछ बड़ा मांग दे बच्चे तो एकदम से वो मना कर देते हैं. आज की एक छोटी सी ख्वाहिश कि काश एक दिन का वक़्त और मिल जाए, ये पूरी हो गयी लेकिन ये बड़ी ख्वाहिश जो लड़की ने अभी माँगा था, ऐसी और कितनी ख्वाहिश उन दोनों की जो भगवान् एक सिरे से खारिज कर देता था. 

वैसे आज की जो छोटी सी ख्वाहिश भगवान ने पूरी की थी, उसमें उन्होंने एक बड़ा प्यारा सा मॉडिफिकेशन भी कर दिया था. स्टेशन पहुचने पर दोनों को पता चला कि ट्रेन और भी लेट  हो गयी है. हावड़ा से कुछ किलोमीटर दूर बारिश और आंधी तूफ़ान की वजह से कुछ पेड़ पटरियों पर गिर गए थे जिससे लगभग सभी ट्रेनों को रीशेड्यूल किया गया था. इन दोनों की ट्रेन की शिड्यूलींग भी गज़ब तरीके से हुई थी. ट्रेन अब रात के ग्यारह बजे खुलने वाली थी. पूरे ग्यारह घंटे की देरी से. 

दोनों पाँच बजे तक स्टेशन पहुँच  गए थे. ट्रेन इतनी देरी से खुलने वाली थी लेकिन फिर भी लड़की ने घर पर किसी को यह नहीं बताया था कि ट्रेन कितने घंटे देरी से है, सिर्फ फोन करके इतना भर कहा, ट्रेन कुछ घंटे देर हो गयी है. लड़के को आश्चर्य हुआ था...तुमने सच क्यों नहीं कहा? लडकी ने फिर उसी विजयी अंदाज़ में लड़के की और देखा था...बुद्धू...सही सही बोल देती अगर, तो दादा आकर मुझे घर न ले जाते? बड़े दुआओं के बाद  ये पल हमें मिला है, इसे क्यों ऐसे गंवाना? लड़का लेकिन लड़की के यूँ झूठ बोलने से थोड़ा असहज तो था लेकिन लड़की की ये बात भी सही थी. ये पल बड़े दुआओं के बाद मिले हैं हमें. इस पल को ऐसे नहीं गंवाना है. 

हावड़ा स्टेशन पर एक ऐसी जगह है जो लड़के की सबसे पसंदीदा जगह में से एक रही है. हावड़ा स्टेशन का टेरेस, जो बिलकुल खुला सा छत है. इस बारे में लड़की भी नहीं जानती थी. जानती भी कैसे, वो वेटिंग रूम में बैठी ही नहीं थी, आज पहली बार आई थी वो वेटिंग रूम. हमेशा नीचे प्लेटफॉर्म  पर ही बैठकर वो ट्रेन का इंतजार करती थी. और ये टेरेस वेटिंग रूम के दूसरी तरफ था. उसने लड़की को वो जगह दिखाई, ये जताने की कोशिश भी की कि देखो तुम्हारे शहर में तुम्हें ऐसा कुछ दिखा रहा हूँ मैं जो तुमने पहले नहीं देखा. लेकिन लड़की इस बात से ज़रा भी इम्प्रेस नहीं हुई. इसमें कौन सी बड़ी बात है, छत ही तो है ये बस. लड़का जानता था लड़की नाटक कर रही है. वो अपने अचरज मिश्रित उत्सुकता को छुपा लेने में माहिर थी.

टेरेस से गज़ब का व्यू आता था. नीचे एक कतार में खड़ी पीली टैक्सियाँ, सामने खुली हुई हुगली नदी, नदी में चलते स्टीमर्स और दूर हूगली के उस तरफ कोलकता  शहर का नज़ारा. दोनों बहुत देर तक वहां खड़े रहे...लड़की की न जाने कितनी ख्वाहिशें थी. वो उन ख्वाहिशों को एक एक कर के गिनाने लगी. काश हमारे पास कोई स्टीमर हो, हम समुद्र में बस घूमते रहे..कोई न हो हमारे आसपास. ना कोई शोर न कोई  परेशानी. सिर्फ हम दोनों रहे. काश ऐसी ही किसी नदी के पास अपना एक घर हो जहाँ दूर दूर तक बस हम तुम हों, दूसरा कोई और न हो...जहाँ की छत पर वो रोज़ अल्लसुबह अपने हाथों से चाय बनाकर लड़के को दे, और जानबूझकर उसमें चीनी कम डाले. पहली बात तो लड़का उसकी किसी भी बात में खामी निकालने वाला था ही नहीं पर अगर कभी भूले भटके वो बोलेगा, सुनो चाय में चीनी कम है तो वह झट से उसकी चाय का एक घूँट भर कर पूछेगी अब देखो...कितनी मीठी हो गयी न..वो जानती है लड़का ऐसे में अपनी जुबां से नहीं अपनी आँखों से काम लेता है...उसकी मुस्कान होठों से तैरती हुई उसकी आखों में उतर जाती है...और लड़की उसकी उन्हीं झील सी चमकती आँखों में जीवन भर के लिए छिप जाना चाहती थी. 

लडकी अपनी बहुत सारी ख्वाहिशें लड़के को बताती थी...पर ऐसी वाली कुछ ख्वाहिशें अब भी सिर्फ उसके दिल के एक कोने में रखी होती थी..वो नहीं चाहती थी कि उसका ये हसीन सपना जब पूरा हो तो उसके दिल में हल्का सा भी ये ख्याल आए कि लड़का पहले से ही सब कुछ जानता था. 

वैसे लडकी को पूरा यकीन था, लड़का हमेशा की तरह उसके मन की ये बात भी जान-समझ गया है, तभी तो यूँ रहस्मयी मुस्कान खिली है उसके होंठो पर...

लड़की धीरे धीरे गुनगुनाने लगी...

आई है खुशियों का पैगाम लेके बहारें,
ये पल है अपना, इस पल में आओ तकदीर अपनी सँवारे
खाली खाली इस जीवन में प्यार भर ले हम तुम दोनों
दीवाने जो करते अकसर, वो भी कर ले हम तुम दोनों
इन फासलों को आओ मिटा दें, एक दुसरे में खुद को छुपा लें,
इससे पहले कि ये दुनिया हमें आजमाए...

नदी, ख्वाहिशें और कुछ ख़्वाब अधूरे से...

Sunday, October 4, 2015


दो दिन से लगातार बारिश हो रही थी. सारे काम रुके पड़े थे. बाहर आने जाने के सारे कार्यक्रम टल गए थे. यूँ तो उसे बहुत काम थे, लेकिन ये बारिश एक बहाना बन कर आई थी उन कामों से फुर्सत निकालने के लिए. वैसे भी आजकल वो खुद के लिए वक़्त नहीं निकाल पाता, पिछले कुछ महीनों से व्यस्तता जो बढ़ गयी है.. ऐसे में बारिश का यूँ आ जाना उसे बड़ा अच्छा लग रहा था. “मौसम इतना अच्छा है...आज कुछ भी नहीं करना है मुझे. सिर्फ बारिश का आनंद लेना है” उसने खुद से ही कहा और हाथ में कॉफी का कप लिए बाहर टेरेस पे आ गया. आज कितने दिनों बाद वो टेरेस पे आया था, उसे खुद आश्चर्य हो रहा था. यूँ भी पिछले कुछ महीनों से जैसे इस व्यस्तता ने उसका पूरा शेड्यूल ही बदल के रख दिया है. कितनी चीज़ें वो पहले कर लेता था, फ़िल्में, किताबें और गजलों में उसकी रातें बीतती थी, अब तो रातें सिर्फ कंपनी के डाक्यूमेंट्स तैयार करने में निकल जाती हैं. लेकिन आज वो बिलकुल फुर्सत में था. बाहर होती बारिश, प्लेलिस्ट पर लगी गुलाम अली की ग़ज़लें और पुराने कुछ एल्बम जिसे उसने आज कई दिनों बाद अलमारी से निकाला था, ये सब उसे फिर वापस उसके पुराने दिनों में ले जा रहे थे, जो उसके सबसे प्यारे दिन थे. एलबम के ऊपर ही तो लिखा था उसने कभी, ब्रायन एडम्स के गाने की एक लाइन... “दोज वर द बेस्ट डेज़ ऑफ़ माय लाइफ..”.


आज जाने क्या क्या उसे याद आने लगा था, बहुत पहले की कई सारी बातें... उसका वो पुराना घर, बारिश के मौसम में घर के आगे की सड़क पर वाटरलॉगिंग की समस्या, उसके दोस्त जिनके साथ वो घर के पास के मैदान में बारिशों में क्रिकेट खेलता था और जिसकी वजह से घर में माँ से डांट सुनता था. उसे अपनी उस साथी की भी याद आ रही है जिसे वो प्यार से अपनी `सनशाइन' कहता था और बारिशों में प्यार से `मानसून प्रिंसेज'. एल्बम की पहली तस्वीर उसकी मानसून प्रिंसेज की ही थी, जिसे उसने कोलकता के `प्रिन्सेप घाट' पर तब खींचा था जब वे दोनों एक साथ कोलकता घूमे थे. उस तस्वीर को देखकर लड़के को एकदम हँसी आ गयी. कितनी शैतानी की थी इस लड़की ने उस दिन, सेल्फी लेने का फैशन आज का है लेकिन इस लड़की ने आज से दस साल पहले ही अपने पुराने याशिका के कैमरे से सेल्फी लिया था. दोनों बैठे हुए थे कोलकता के प्रिन्सेप घाट पर, लड़का कितना मना करते रहा था उसे...अरे इतने क्लोज अप से ली गयी तस्वीर में मैं हमेशा कॉन्शेस हो जाता हूँ, तस्वीर बेकार निकलती है, लेकिन लड़की ने उसकी एक नहीं सुनी थी... और फिर कुछ दिन बाद जब तस्वीर बन कर स्टूडियो से आई थी तो लड़की ने उस तस्वीर पर ग़ालिब का एक शेर लिख दिया था. “कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं / इक तीर मेरे सीने में मारा के हाय हाय “. वो तस्वीर और उसके नीचे लिखे इस शेर को देखकर लड़के को कोलकता के उन दो दिनों की तमाम बातें याद आने लगी जब वो अपनी मानसून प्रिंसेज के साथ, अपनी सबसे अच्छी दोस्त के साथ, दिन भर कोलकत्ता के सड़कों पर घूमता रहा था. वैसे तो आठ साल बीत गए लेकिन फिर भी मानो जैसे लड़के की ज़हन में वो बातें अब भी वैसी ही ताज़ा है जैसे कल की बात हो कोई.


ऐसी ही बारिश उस दिन भी हो रही थी जैसे आज हो रही. पूरे दिन हलकी बारिश होते रही थी और वे पूरे दिन भीगते हुए शहर घूमते रहे थे.

कोलकता , जो लड़के के लिए अंजान सा शहर था वहीँ लड़की उस शहर से बहुत अच्छे से वाकिफ थी. लड़की का जन्म उसी शहर में हुआ था लेकिन बाद में उसके पिता का तबादला हो गया और वो लड़के के शहर में रहने आ गयी. लड़के को उन दिनों कोलकता में काम लगा ही रहता था, और लड़की भी हर चार पाँच महीने में एक बार तो जाती ही थी अपने शहर. लेकिन ऐसा कभी इत्तेफाक नहीं हुआ कि दोनों एक समय पर ही कोलकता में रहे हों, हाँ दोनों की सबसे बड़ी ख्वाहिशों में से एक ये भी थी..कि कभी इत्तेफाक हो कि दोनों एक ही समय कोलकता में रहे और एक साथ कोलकता घूमें. दोनों प्रार्थना करते कि ये ख्वाहिश उनकी पूरी हो. वैसे तो उन दोनों की बहुत सी ख्वाहिशें अधूरी रह गयी थी लेकिन छोटी छोटी ख्वाहिशें अकसर पूरी भी हो जाती थी और वो भी इतने अजीबोगरीब तरीके से कि दोनों हैरान रह जाते थे.

जुलाई का महीना था वो, लड़की महीने भर के लिए अपने घर चली गयी थी और इसी बीच लड़के का एक काम कोलकता में निकल आया था. लड़का बड़ा उत्सुक था उसे यह खबर सुनाने के लिए, लेकिन ये खबर लड़की को जाने कैसे पहले ही मिल चुकी थी. लड़की की माने तो वो अपने कई “जासूस” लड़के के आसपास छोड़े रहती थी जिससे लड़के की पल पल की जानकारी लड़की को मिलते रहती थी. लड़के ने फोन पर जैसे ही कहा, तुम्हारे लिए खुशखबरी है, उधर से लड़की चहकती हुई बोली – जानती हूँ मिस्टर...जानती हूँ, आप कोलकता आ रहे हैं अगले सप्ताह. लड़के के बस इतना बोलने भर की देर थी, शुक्र है, मेरी दुआ कबूल तो हुई. लडकी ने तुरंत फोन पर ही मुँह बिचका दिया...सुनो मिस्टर, ये तुम्हारी नहीं, मेरी दुआओं का असर है...तुम फ़ालतू में क्रेडिट न लिया करो. लड़का हँस पड़ा. वो उसकी ऐसी बातों को बिना विरोध के चुपचाप स्वीकार कर लेता. उसके बाद लडकी का चहकन जैसे किसी मंदिर की घंटियों की तरह बस उसके कानो में रस घोलती रहती. लड़के का दिल ऐसे में चुपके से एक दुआ और मांग लेता...लड़की का ये चहकना कभी बंद न हो. लडकी का यह बचपना कभी न बड़ा हो....वो बड़ी होकर बिलकुल अच्छी नहीं लगती.

दोनों के पास तीन दिन का समय था, लेकिन तीन दिन बस नाम के थे, पहला दिन जिस दिन लड़का कोलकता पहुचने वाला था, वो पूरा दिन तो काम में ही निकल जाएगा, दूसरे दिन वो लड़की से मिलेगा और तीसरे दिन दोपहर बारह बजे की गाडी थी. लड़की इस बात से थोड़ी उदास हो गयी थी, लेकिन फिर भी दोनों खुश थे कि साथ में हैं कोलकता में, चाहे वो एक दिन का ही साथ क्यों न हो. एक दूसरे के साथ बिताए हुए कुछ लम्हें भी उनके लिए हमेशा बहुत महत्वपूर्ण होते थे, इसलिए चाहे एक दिन ही सही दोनों साथ तो रहेंगे, इस एक बात से दोनों बड़े खुश थे. दोनों ने साथ घूमने का प्लान बनाया. लड़का तो शहर से अंजान था, सारा प्लान लड़की ने ही बनाया. लड़के को एक दिन पहले ही फोन पर हिदायत मिल गयी थी लड़की से... सुनो मिस्टर..तुम सुबह नौ बजे मेरे घर पहुच जाना, मेरे साथ तुम ब्रेकफास्ट करोगे और फिर हम घूमने निकल जायेंगे...”. अब लड़की ने आदेश दे दिया था जिसे लड़के को हर हालत में मानना ही था. उसने धमका भी जो दिया था लड़के को.. “जानती हूँ..जानती हूँ तुम्हें बहुत काम है लेकिन ख़बरदार जो आने में नौ बजे से ज़रा भी देर की...शार्प एट नाइन आई विल बी वेटिंग फॉर यू...” हालाँकि लड़की के घर आकर ब्रेकफास्ट करने की बात सोच कर लड़का थोड़ा तो असहज हो गया था लेकिन ये लड़की का आदेश था, उसके पास उसकी बातों को उसके आदेशों को मानने के सिवा दूसरा कोई चारा भी नहीं था.

लड़की का घर बिलकुल एक ट्रेडिशनल बंगाली स्टाइल का बहुत पुराना लेकिन बड़ा खूबसूरत घर था. सामने छत के पूरे एक हिस्से पर एक कतार में बैगनी रंग के फूल लगे थे जो नीचे बालकनी तक लटक रहे थे. सिर्फ इन फूलों की वजह से उस पूरे सड़क में उसका मकान अलग दीखता था. दूर से ही पहचान में आ जाता. लड़का जो पहली बार आ रहा था, उसने दूर से ही मकान देखकर पहचान लिया था. लड़की ने पहले भी जाने कितनी बार कहा था, तुम बस मेरे मोहल्ले में कदम तो रखो...मेरा घर सामने दिख जाएगा तुम्हें...सबसे अलग, सबसे सुन्दर....जैसे मैं. मैं भी तो तुम्हें दिख जाती हूँ न दूर से ही, भीड़ में भी पहचान लेते हो मुझे, देखना वैसे ही तुम मेरे घर को भी पहचान लोगे. लड़का उसे छेड़ने के लिए कह देता, हाँ क्यों नहीं...जैसे तुम एंटिक पीस वैसे ही तुम्हारा घर भी होगा, एकदम एंटिक पीस. उसका घर लेकिन सच में उस पूरे सड़क में सबसे अलग दिख रहा था. घर के नज़दीक जैसे ही वो आया, सामने लड़की दिखी जो अपने लॉन के झूले पर बैठे हुए एक किताब हाथों में लेकर उसके आने का इंतजार कर रही थी. गेट के पास पहुँच कर बिना हाय हेल्लो किये उसने लड़की को छेड़ने के इरादे से कहा, “क्या बात है? लगता है किसी चौकीदार की तरह तुम बाहर बैठ कर घर की रखवाली कर रही हो या मेरा इंतजार हो रहा था???” लड़की ने भी फट से नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा.. “नौ बजे आना था न आपको.....साढ़े नौ आये हो.. बोलो मर्डर कर दूँ तुम्हारा?“. लड़का भी कहाँ चुप रहने वाला था.. “अच्छा जी, आप कर ही दो मर्डर, आपके शहर में आये हैं...जो चाहे वो कर लो..”. लड़की का नकली गुस्सा भी काफूर हो गया. दोनों एक साथ हँस पड़े.

लड़की के दादा और दादी घर पर थे जिन्होंने लड़के का बड़े अपनेपन से स्वागत किया. लड़की अपने दादाजी के बेहद करीब थी और उनकी बेहद लाडली भी. उसके दादा थे भी बड़े सुलझे दिल वाले व्यक्ति और बेहद बातूनी. वो लड़के से बातें करने लगे...पुराने ज़माने की, कब वो इस शहर में आये, कैसे ये घर बनाया, अपने घर परिवार की बातें और जाने क्या क्या. पूरा घर घुमाया उन्होंने लड़के को... लगभग सारे फर्नीचर पुराने ज़माने के थे घर में, वो सब के बारे में बड़े विस्तार से लड़के को बता रहे थे. एक बेहद पुराना आईना दिखा, जिसे देखकर लड़की ने लड़के के कानों में धीरे से कहा , ये देखिये साहब, बचपन से इसी आईने के सामने खड़े होकर खुद को संवारते आई हूँ, मुझे खूबसूरत इसी आईने ने बनाया है. चमत्कारी आईना है ये. लड़के ने इस बात का जवाब देना चाहा लेकिन सामने दादाजी खड़े थे, वो बस मुस्कुरा के रह गया.

बँगला, हिंदी और अंग्रेजी साहित्य की किताबों से मकान का एक कमरा भरा पड़ा था, जिसे लड़की के दादा लड़के को दिखाने लगे. लड़की तो जैसे इस मौके के ताक में थी. कमरे में घुसते ही उसने अपने दादा को कहा.. “दादू..आप तो बस इस लड़के पर नज़र रखियेगा, बहुत बड़ा आशिक है ये साहित्य का..कहीं किताबें जेब में भर के न ले जाए.” लड़के ने आँखें तरेर के लड़की को देखा. उसके दादा हँसने लगे. शुरू के आधे एक घंटे में ही इतना अपनत्व मिला लड़के को कि जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी. वो शायद इसी वजह से लड़की के घर आने में थोडा झिझक रहा था कि जाने उसके दादा दादी क्या सोचे. ब्रेकफास्ट के समय उसने धीरे से लड़की के कानों में कहा भी, यहाँ आना बड़ा अच्छा लग रहा है..मैं बेवजह कॉन्शेस हो रहा था. लड़की उसकी तरफ देखकर मुस्कुराई और फिर कुछ विजयी अंदाज़ में अपने कुर्ते के कॉलर को गर्वीले भाव में हिलाती बोली," टोल्ड यू न..."

लड़की के घर पूरे बंगाली स्टाइल का ब्रेकफास्ट(जो कि ब्रेकफास्ट कम लंच ज्यादा लग रहा था) के बाद वे नेशनल लाइब्रेरी की तरफ निकल आये थे, जो कि लड़की के घर से नज़दीक ही था. रास्ते में लड़का उससे ये पूछने की हज़ार कोशिश करता रहा कि ब्रेकफास्ट घर में किसने तैयार किया था. लड़की लेकिन अपनी बात पर अडिग रही..कि ब्रेकफास्ट उसने ही बनाया था. लेकिन लड़के को इस बात पर ज़रा भी भरोसा नहीं था. इतने स्वादिष्ट पकवान वो खुद बनाई है इस बात पर यकीन करना लड़के के लिए थोडा मुश्किल था. यकीन होता भी कैसे लड़के को? उन दिनों चाय और मैगी बनाने के सिवा लड़की को सिर्फ आलू के पराठे, जो कि गोल कम और भारत का नक्शा ज्यादा दीखते थे, बस यही बनाने आते थे. लड़के ने लड़की को छेड़ने के इरादे से एक सवाल किया, “अच्छा ये बताओ, वो जो सन्देश और रसगुल्ले थे वो भी तुमने बनाये थे क्या?”. लड़की आँख तरेरते हुए कहती है.. “शेफ समझे हो क्या तुम मुझे? वो बाज़ार से आये थे...”. लड़का फिर से छेड़ने के इरादे से कुछ पूछना चाहता है इससे पहले ही लड़की वार्निंग देते हुए कहती है, कोई भी ऐसा वैसा सवाल अब किये वो यहीं ऑटोरिक्शा से उतार के पिटाई कर दूंगी तुम्हारी...बस अक्ल ठिकाने आ जाएगी ” लड़का चुप हो गया. उसने चुप रहना ही उचित समझा, वैसे भी लड़की का भरोसा नहीं. वो कुछ भी कर सकती है.

नेशनल लाइब्रेरी दोनों दोपहर में पहुँचे थे. वहां लड़की के कोई रिश्तेदार काम करते थे जिससे पास लेने में ज्यादा दिक्कत नहीं आई. लड़की शायद नेशनल लाइब्रेरी बहुत बार आ चुकी थी.. वो इस जगह के बारे में एक कुशल गाइड की तरह लड़के को सब कुछ बता रही थी. नेशनल लाइब्रेरी के अन्दर घूमते हुए लड़की उस जगह की जाने कितनी कहानियां उसे सूना रही थी. डरावनी कहानियां...भुत प्रेतों की कहानियां. उसने बताया कि नेशनल लाइब्रेरी सिर्फ लाइब्रेरी होने के वजह से ही नहीं बल्कि शहर के सबसे चर्चित हॉटेड हाउस होने के वजह से भी मशहूर है. यहाँ रात में एक औरत की आत्मा भटकती है. वो लड़के को किसी सीक्रेट चैंबर के बारे में बताने लगी जो लाइब्रेरी में है. पहले तो लड़के ने उसकी बात को मजाक में टाल दिया, लेकिन लड़की सिरिअस थी. उसने बताया कि कैसे रातों में यहाँ जिसने ये लाइब्रेरी बनवाया था उसकी बीवी के क़दमों की आहट सुनाई देती है. लड़की ने एक और प्रचलित कहानी सुनाई, कि जिस औरत की आत्मा यहाँ भटकती है उसे सभी चीज़ों को उसके जगह पर रखने की आदत थी. जब भी कोई व्यक्ति यहाँ अकेले किताब पढ़ रहा होता है और किताबों को वो ठीक शेल्फ पर नहीं रखता तो उसे वो औरत उस व्यक्ति को अपने होने का एहसास करवाती है. लड़का थोड़ा सहम गया. वो हालांकि डर तो नहीं रहा था लेकिन फिर भी जाने कैसे ऊसके मुहं से अचानक निकल पड़ा कि चलो चलते हैं यहाँ से. बस फिर क्या था..लड़की को तो वैसे भी मौका चाहिए होता है, और वो मौका उसे मिल गया, “साहब..आप डर गए?? ..अरे रे...डरिये नहीं..मैं हूँ न आपके साथ. आपको कुछ नहीं होने दूंगी..अरे बहुत याराना है अपना आत्माओं से..और तो और सुना है शरीफ आत्मा है वो, किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया उसने, और क्या पता वो सुन्दर हो और आपको डराने के बजाये आप पर लाइन मारने लगे..”. लड़की की बे सिरपैर वाली बातें सुनकर लड़का थोड़ा झेंप सा गया और फिर हंसने लगा.

लाइब्रेरी के अन्दर लड़की को बैठने की ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, वो तो लाइब्रेरी के लॉन में टहलना चाहती थी, बाहर सीढ़ियों पे बैठना चाहती थी. फुहारों में भीगना चाहती थी. लड़का दो पल सोचने लगा, बाहर टहलने का इरादा सही है या नहीं. लेकिन लड़की बाहर लॉन में टहलने की जिद पर अड़ी रही.. “अरे हुज़ूर ये बादल आपकी मानसून प्रिंसेज के बड़े अच्छे दोस्त हैं, एग्रीमेंट है इनका मेरे साथ... जब मैं चाहूंगी तभी बारिश होगी...तुम्हें क्या लगता है? आज बारिश अपने मर्जी से हो रही है? नहीं साहब...ख़ास आज के लिए मैंने प्लान बनाया है, बादलों को पहले से हिदायत मिल गयी थी मुझसे, कि दिन भर हलकी फुहार होते रहे और हम बारिश में भीगते रहे..अब चलो मेरे इस प्लान की बैंड न बजाओ तुम. लड़का लड़की की ऐसी प्यारी जिदों को मुस्कुराकर स्वीकार कर लेता. दोनों बहुत देर तक नेशनल लाइब्रेरी के लॉन में टहलते रहे. लड़की उसे इस जगह से जुडी अपनी यादें बताती रही और लड़का लड़की की बातों में खो सा गया. हलकी फुहारों में भीगना, लड़की का हाथ थामे नेशनल लाइब्रेरी के लॉन में टहलना उसे बहुत सुकून दे रहा था. बहुत देर तक दोनों नेशनल लाइब्रेरी के सीढ़ियों पर बैठे रहे थे. मन ही मन लड़का दुआ करता कि ये पल बस थम सा जाए यहीं.

नेशनल लाइब्रेरी के बाद लड़की उसे जाने कहाँ कहाँ घुमाती रही.. पूरा वो इलाका, वहीँ वो बड़ी हुई थी...कितने दुकान वालों से तो उसके परिचय थे. सड़क पर टहलते हुए वो कभी कभी लड़के को धमका भी देती, मेरे शहर में आये हुए हो और वो भी मेरे इलाके में...जैसा मैं कहूँ वैसा करते चलो बस..वरना उठवा लूँगी तुम्हें. विक्टोरिया मेमोरियल, काली घाट, प्रिन्सेप घाट जो उसकी सबसे प्रिय जगह में से एक थी... प्रिन्सेप घाट जो कि जाने कितने वजहों से लड़की के दिल के बेहद करीब रहा लड़की उसे वहां ले आई थी. इस जगह लड़का पहले कभी नहीं आया था. इतना शांत, इतना खूबसूरत जगह कि लड़के को पहली नज़र में ही प्यार हो गया था उस जगह से. प्रिन्सेप घाट पर टहलते हुए लड़की अपनी एक और ख्वाहिश की बात करने लगी, जो थोडा तो फ़िल्मी थी लेकिन बेहद प्यारी ख्वाहिश थी वो उसकी. सोचो ज़रा, काश कभी ऐसा हो बारिश होती रहे दिन भर और हम तुम भीगते हुए शहर घूमते रहे वो जैसे अमिताभ और मौशमी चैटर्जी घूम रहे थे न उस फिल्म में, वो गाना था न “रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन...” ठीक वैसे ही. बस शहर मुंबई की जगह कोलकाता हो और अमिताभ के जगह तुम...वैसे ही कोट टाई पहने और मौसमी चटर्जी की जगह मैं, साड़ी में. लड़के ने कहा, तुम बस ऑब्सेस्ड हो उस गाने से. लड़की ने जवाब दिया... “बारिश में भीगते हुए छप छप कर पैरों से पानी उड़ाते दोनों पूरा शहर घूमे थे...यू नो इट्स द मोस्ट रोमांटिक थिंग टू डू. लड़के ने उसका हाथ अपनी हाथों में ले लिया, उसके माथे को चुमते हुए कहा उसने, वो है या नहीं मोस्ट रोमांटिक थिंग टू डू ये मैं नहीं जानता, लेकिन ये पल, ये मोमेंट हमारे...मेरे लिए तो यही प्यार के पल हैं.. द मोस्ट रोमांटिक मोमेंट फॉर मी इज राईट नाउ...दिस मोमेंट.....

वो जुलाई की आखिरी शाम थी लड़की के साथ प्रिन्सेप घाट पर बैठकर सनसेट देखना, ये सबसे सुखद था. वे अनमोल पल अपनी पूरी अमिटता के साथ लड़के की दिलो दिमाग पर हमेशा के लिए अंकित हो गया था.

सूर्यास्त के समय दोनों का मन थोड़ा बोझिल हो गया था, दोनों ये बात जानते थे कि बस यही एक दिन था उनके पास जो अब खत्म होने को आया था. लड़की अपने घर चली जायेगी, और लड़का वापस रेलवे स्टेशन. प्रिन्सेप घाट पर लड़के के कंधे पर सर रख कर लड़की ने फिर एक दुआ मांगी, काश कल की ट्रेन हमारी कैंसल हो जाए या कोई भी ऐसा चमत्कार हो कि बस एक..सिर्फ एक और दिन हम साथ रहे. लड़का उसकी इस नादानी पर मुस्कुराने लगा. वो कुछ कहता इससे पहले ही लड़की ने समझ लिया क्या कहना है उसे, और फिर मुँह बिचकाते हुए कहती है, तुम जानते ही क्या हो मिस्टर? चमत्कार हमारे आसपास होते रहते हैं. यूं जस्ट हैव टू बिलीव इन मिरेकलस. इस बार शायद लड़का भी लड़की की इस नादानी पर विश्वास करना चाहता था..लड़की का हाथ अपने हाथ में लिए दूर ढलते हुए सूरज को देखकर उसने भी एक दुआ मांगी, बस एक..सिर्फ एक और दिन हमें साथ रहने का मौका मिल जाए...काश..!”


लड़की लगातार गुनगुना रही थी और लड़के के कानों में लड़की की आवाज़ गूंज रही थी...
पहले भी यूँ तो बरसे थे बादल
पहले भी यूँ तो भीगा था आँचल
अब के बरस क्यों सजन,
सुलग सुलग जाये मन




...जारी

बारिश, सनशाइन और कोलकता - कोलकता डायरी

Wednesday, July 15, 2015

“मीट क्यूट?”
“हाँ मीट क्यूट...”
“क्या बोल रही हो? ऐसा कोई भी शब्द नहीं है..”
“है...है ऐसा शब्द.. तुम्हें क्या पता.
याद है हमारी शुरुआत की कुछ मुलाकातें?”
“हाँ याद है..”
“जानते हो, वैसी मुलाकातें दो प्यार करने वालों की, जब दोनों पहली बार मिलते हैं एक दूसरे से. अंजान रहते हैं एक दूसरे से और वो पहली ना भूलने वाली प्यारी और यादगार मुलाकातें होती हैं, जब दोनों को लगता है दोनों एक दूसरे की तरफ किसी डोर से खिंचे  चले जा रहे हैं. वो मीट क्यूट होता है. हम दोनों की शुरू की कुछ मुलाकातें ऐसी ही थी.
 We didn’t run into each other, but somehow there was an invisible string pulling us closer. That sweet romantic moments like us…in which two individuals come together in most fascinating circumstances, dreamy, destined-to-fall-in-love-and-be-together-forever sort of way is the meet cute.”

“ये फिर से तुम्हारे मन की कोई बदमाशी है क्या? तुम्हारा कोई लॉजिक?”

“साहब ये बकवास नहीं है. कुछ पढ़ा लिखा कीजिये. इस मीट क्यूट पर जमाने से लोगों को विश्वास है. कितनी फ़िल्में बनी हैं बस इस एक शब्द पर, कितनी  किताबों में इसका जिक्र है...और तुम हो कि कुछ पता ही नहीं. ये बहुत प्यारा होता है. मीट क्यूट. तुम्हें सुनना है हमारे कौन कौन से मीट क्यूट हुए थे?”
“हाँ, सुनाओ..”
“तो सुनो...वैसे तो बहुत सी मुलाकातें थी, लेकिन ख़ास कर के पहली चार मुलाक़ात जिसके बाद हम एक दूसरे के करीब आये वो तुम्हें बताती हूँ. हमारे वे मीट क्यूट मोमेंट्स.”
हमारी सबसे पहली मुलाक़ात याद है तुम्हें? तुम उस टेक्नीकल सेमिनार प्रेजेंटेशन में पहला पुरस्कार जीते थे और मैं उसी दिन एक दूसरे इवेंट, सिंगिंग काम्पिटिशन में चौथे स्थान पे आई थी, मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिल सका था. मैं थोड़ी निराश और उदास थी. हम एक दोस्त के जरिये पहली बार मिले थे, पहली बार तुम्हारे बारे में पता चला था मुझे और पहली बार हम एक दूसरे से बात किये थे. तुमने मुझसे पूछा, कि तुम्हारा इवेंट कैसा रहा. मैंने जवाब दिया था, अच्छा होता इवेंट तो तुम्हारे पास जितनी बड़ी ट्रॉफी  है, उतनी बड़ी ट्रॉफी  मेरे पास भी होती. तुम शायद समझ गए थे मेरे कहने का मतलब. तुमने अपनी ट्रॉफी  मुझे देते हुए कहा था...किसने कहा तुमने कुछ नहीं जीता, ये लो तुम्हारा पुरस्कार और इसे अपने पास ही रखो. इन लोगों को कोई अक्ल नहीं किसकी आवाज़ सुरीली है और किसकी घिसी हुई, और ये जज बने फिरते हैं. मेरे लिए तो तुम ही विनर हो”.
सच में, कितने प्यारे तरीके से तुमने कहा था मुझसे, मैं तो उस वक़्त जैसे निहाल ही हो गयी थी. तुमने फिर मुझे अपनी ट्रॉफी  थमाई, और बड़े प्यार से मेरी तरफ देखा. हमने अनजाने ही एक दूसरे का हाथ थाम लिया था. यू नो, वो हमारा पहला मीट क्यूट था. 

फिर दूसरी मुलाक़ात.. दूसरी मुलाक़ात याद है तुम्हें? कुछ दिन बाद ही हुई थी हमारी दूसरी मुलाक़ात. मुलाकातें तो वैसे हर दिन होती थी, तुम मुझे देखते थे और मैं तुम्हें. तुम बुद्धू थे, बोलते नहीं थे कुछ और मैं सोचती रहती थी ये कब बात करने आएगा. उस दिन भी तो तुम कितने डरे हुए से थे न, और मैने तुम्हें परेशान भी तो कर दिया था. याद है न तुम्हें. कॉलेज ऑफिस में हमारी मुलाकात थी वो. शनिवार का दिन था. बहुत कम लोग उस दिन कॉलेज आते थे, और ऑफिस स्टाफ भी आम तौर पे गायब ही रहते थे. मैं एक कांउटर पे खड़ी थी, तुम अन्दर आये और चुपचाप मेरे पीछे खड़े हो गए, बुद्धू इतने थे कि चुप से रहे तुम बिलकुल. बस मुझे चुपचाप देख रहे थे, और मैं हर बार की तरह यही सोच रही थी, ये बेवकूफ बात क्यों नहीं कर रहा. हम दोनों ही अकेले थे वहाँ ,, कोई भी नहीं था. लेकिन तुम बिलकुल चुप से मेरे पीछे खड़े रहे. काउंटर स्टाफ जब अचानक दाखिल हुआ ऑफिस में तो तुमने  हड़बड़ी में जेब से कुछ निकालते वक़्त खुल्ले पैसे नीचे गिरा दिए थे. तुम्हें लगा वो पैसे मेरे पर्स से गिरे हैं, और तुमने कहा “सुनो, तुम्हारे पैसे नीचे गिरे हैं...”. मैंने एकदम टफ लुक देते हुए ये जताते हुए कि लाइन मारने का ये तरीका बहुत पुराना है, कहा था... “मेरे पैसे नहीं हैं, खुद गिराते हो पैसे और खुद मुझसे कहते हो कि तुम्हारे पैसे गिरें...ह्म्म्म?” तुम एकदम डर से गए थे. नहीं नहीं...कहते रह गए तुम और मैं अपनी इस बदमाशी पर मन ही मन खूब हँस रही थी. कुछ देर बाद घर वापसी के लिए मैं उसी कॉलेज बस में बैठ गयी जिसमें तुम बैठे थे. मैंने पहले ही तुम्हें देख लिया था कौन से बस में तुम बैठे हो. पूरी बस खाली थी फिर भी तुम्हारे बगल में ही आकर मैं बैठ गयी थी. थोड़ा अफ़सोस भी था मुझे कि तुम्हें बेवजह परेशान कर दिया, तुमसे बस में सॉरी कहा. तुम कोई किताब पढ़ रहे थे 
मैंने तुमसे पूछा “ये कौन सी किताब पढ़ रहे हो तुम?” 
तुमने कहा “प्यार की किताब पढ़ रहा हूँ...तुम भी पढ़ना”.
“प्यार की किताब पढ़ना मतलब? कहना क्या चाहते हो तुम?” मैंने फिर से एक टफ लुक देते हुए तुमसे कहा था? तुम फिर एकदम से हड़बड़ा गए.
“अरेररे..मेरे कहने का मतलब था रोमांटिक नॉवेल है ये ‘द नोटबुक’ नाम है इसका...सॉरी तुम्हें कुछ गलत लगा हो तो”
तुम एकदम से सफाई देने लगे थे मुझे, कितने क्यूट लग रहे थे तुम ऐसे सफाई देते हुए और मुझे लगातार हँसी आ रही थी. मैंने फिर तुम्हें कहा, चिल यार..मैं बस मजाक कर रही थी. तुम भी फिर मेरी तरफ देखकर मुस्कराने लगे थे. वो हमारा दूसरा मीट क्यूट था. 

इन दोनों मुलाकातों के बाद वैसे तो हमारी बातचीत होने लगी थी, लेकिन ज्यादा नहीं. हमारी अच्छी और पक्की दोस्ती किस दिन शुरू हुई थी ये याद है तुम्हें? तुम्हारे जन्मदिन से एक दिन पहले का दिन था वो. यही जुलाई का महीना था और उस दिन भी बारिश हो रही थी जैसे आज हो रही है. तुम उस दिन कॉलेज की सीढ़ियों पर अकेले बैठे थे और मेरी वापसी की बस छूट गयी थी. छूट क्या गयी थी, तुम्हें बैठे देख सीढ़ियों पर मैंने जान बूझकर बस छोड़ दिया था. सोचा,  देखती हूँ तुम मुझसे बात करते हो या नहीं. मुझे अपने पास बुलाते हो या नहीं. शुक्र था उस दिन तुमने टोका मुझे, “बस छूट गयी तुम्हारी...” तुमने पूछा था मुझसे, और मैंने तुम्हारे पास आकर कहा था “जान बूझकर छोड़ी है बस, तुमसे बात करने के लिए...” और मैं भी सीढ़ियों पर तुम्हारे पास आकर बैठ गयी. तुम्हारे लिए जन्मदिन का तोहफा पहले से मेरे बैग में रखा था, उसे मैंने तुम्हें दिया, तुमने पूछा मुझसे, तुम्हें कैसे पता मेरा जन्मदिन कल है? मैंने कहा था, आपके बारे में सब पता है हुज़ूर...और उसी पेन से जो मैंने तुम्हें तोहफे में दिया था, तुम्हारी हथेलियों पर लिख दिया था - हैप्पी बर्थडे टू यू, फ्रॉम योर स्वीट फ्रेंड. अपना नाम भी तुम्हारी हथेलियों पर लिखा था मैंने. तुम मुसकुरा दिए थे मेरी तरफ देख कर और कहा था मुझसे, “थैंक यु”. मुझे आज तक समझ नहीं आया वो थैंक यु किसके लिए था? तोहफे के लिए या तुम्हारी हथेलियों पर मैंने अपना नाम लिखा था उसके लिए...जिसके लिए भी था, वो हमारा तीसरा मीट क्यूट था. 

और चौथी मुलाक़ात..वो तो बेहद रूमानी सी थी. हम दोनों एक ही मार्केट में थे. एक ही दुकान में. तुम पहले से उस दुकान में थे और मैं वहां आ गयी...एंड लेट मी रीमाइन्ड यू अगेन, मैं तुम्हें फ़ॉलो नहीं कर रही थी, ये खुशफहमी जाने क्यों तुम्हें आज तक बनी रह गयी. बस होते गया ऐसा कि जिस जगह तुम थे वहीं मैं आ जाती थी. किस्मत यू  नो..किस्मत. दुकान से निकलते ही बारिश शुरू हो गयी. मैं अपना छाता लिए सड़क के किनारे आकर ऑटो के इंतजार में खड़ी हो गयी. तुम कुछ देर बाद दुकान से निकले, और स्टाइल मारते हुए अपने बाइक से मेरे पास आकर खड़े हो गए. “ऑटो नहीं मिलेगी...छोड़ दूँ तुम्हें घर?” तुमने पूछा था, और मैं तो हैरानी में तुम्हें बस देखती  रह गयी. ये गज़ब कैसे हो गया आज? तुम इतना हिचकते थे बात करने में और तुमने ही आकर पूछा. मैं भी झट से बाइक पर तुम्हारे पीछे बैठ गयी. 

देखो, तुम बारिश में भीग कर जाते, तुम्हारे पास बाइक थी, छाता नहीं. मेरे पास छाता था लेकिन घर जाने के लिए सवारी नहीं मिल रही थी. तुम मिल गए मुझे, तुमने ही आकर पूछा, और मैं तुम्हारे साथ बाइक पर बैठ गयी. मेरे लिए तो एकदम परफेक्ट मोमेंट था वो. पूरे रास्ते मैं बारिशों वाले गाने गाते आ रही थी और तुम मुस्करा रहे थे, मुड़ मुड़ के बहाने से मेरी तरफ देख रहे थे. मैंने तुमसे कहा जब आगे देखकर चलाईये हुज़ूर, कहीं एक्सीडेंट न हो जाए. तुमने जवाब दिया था “तुम्हें कुछ भी नहीं होने दूंगा, घबराओ मत”. हम चाचा के दुकान पे भी रुके थे और बारिश में भीगते हुए चाय पिये थे. चंदू के दुकान के भुट्टे भी खाए थे हमनें. मेरे लिए वो बारिश डेट थी तुम्हारे साथ. तुम पहली बार मेरे से इतना खुल के बात कर रहे थे और मैं तो बस मन ही मन खुश ही हुई जा रही थी. कितना रूमानी दिन था न वो. हमारा चौथा मीट क्यूट. 

जानते हो, अगर सोचो तो हमारी हर मुलाक़ात अब तक एक मीट क्यूट ही था. कितनी अच्छी यादें हैं न हर मुलाकात की. हम बेहद खुशनसीब हैं...पता है यहाँ लोगों को एक मीट क्यूट नहीं मिल पाता और हमारे देख लो कितने मीट क्यूट हुए हैं. जैसे सच्चा प्यार हर किसी को नहीं मिल पाता न, वो सोलमेट जैसा प्यार. ठीक वैसे ही मीट क्यूट सबके लिए नहीं होते, लेकिन हमारे लिए थे और वो भी इतने सारे...हमारे सभी मीट क्यूट...स्वीमीट क्यूट मुलाकातें.. 

स्वीमीट क्यूट मुलाकातें ? 

हाँ.. स्वीमीट क्यूट मुलाकातें. कितनी मीठी मुलाकतें होती हैं हमारी...तो वो सभी मीठी मुलाकतें को हम क्या कहेंगे न? स्वीमीट क्यूट(Sweemeet Cute) मुलाकातें ही न...!

मीट क्यूट

Tuesday, March 31, 2015

मेरे महबूब
जब दोपहर को
समुन्दर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं तो
आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करनें की क़ुव्वत मिलती है

कितना दर्द है मीना कुमारी की शायरी में, पढो तो लगता है कहाँ कहाँ ले जाती हैं ये नज्में उनकी हमें. दिल की किन बंद गलियों में हम टहलने लगते हैं, जाने क्या क्या याद आते जाता है...जाने क्या महसूस होते जाता है. आज मीना जी की पुण्यतिथि पर पढ़िए ये चार नज्में.

सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा
जैसे रात की तारीकी में
किसी ख़ानक़ाह का
खुला और रौशन ताक़
जहां मोमबत्तियाँ जल रही हो
ख़ामोश
बेज़बान मोमबत्तियाँ
या
वह सुनहरी जिल्दवाली किताब जो
ग़मगीन मुहब्बत के मुक़द्दस अशआर से मुंतख़ीब हो

एक पाकीज़ा मंज़र
सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा


२, 

हाँ, कोई और होगा तूने जो देखा होगा
हम नहीं आग से बच-बचके गुज़रने वाले

न इन्तज़ार, न आहट, न तमन्ना, न उमीद
ज़िन्दगी है कि यूँ बेहिस हुई जाती है

इतना कह कर बीत गई हर ठंडी भीगी रात
सुखके लम्हे, दुख के साथी, तेरे ख़ाली हात

हाँ, बात कुछ और थी, कुछ और ही बात हो गई
और आँख ही आँख में तमाम रात हो गई

कई उलझे हुए ख़यालात का मजमा है यह मेरा वुजूद
कभी वफ़ा से शिकायत कभी वफ़ा मौजूद

जिन्दगी आँख से टपका हुआ बेरंग कतरा
तेरे दामन की पनाह पाता तो आंसु होता

३,
दिन गुज़रता नहीं आता रात
काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नही बंटती

अकेलेपन के अन्धेरें में दूर दूर तलक
यह एक ख़ौफ़ जी पे धुँआ बनके छाया है
फिसल के आँख से यह छन पिघल न जाए कहीं
पलक पलक ने जिसे राह से उठाया है

शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका, देख, बड़ जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है

तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आँखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है

मीना कुमारी की शायरी(पांच)

Friday, February 27, 2015

तुम्हारी अनोखी ख्वाहिशों की लिस्ट में एक और ख्वाहिश थी...जिसे तुम लगभग हर शाम मुझे सुनाती थी. तुम्हें शब्द ईजाद करने की बीमारी आदत थी. अंग्रेजी के शब्दों के साथ इक्स्पेरिमेंट करना तुम्हारी हॉबी थी. अंग्रेजी का कोई भी नया शब्द तुम कहीं देख लेती तो उसे सीधा इस्तेमाल कर लेती थी, अपने खतों में, अपनी डायरी में या जहाँ भी तुम्हारा मन करे वहाँ... बिना ये जाने कि उस शब्द का अर्थ क्या है. एक दिन तो तुम्हें अजीब बुखार चढ़ा. अंग्रेजी के शब्दों का अविष्कार करने का बुखार. जाने कहाँ से तुम्हें एक दिन एक शब्द “Premious” सूझा था, और तुमने मेरी ही डायरी में अपने इस नए शब्द का इस्तेमाल किया था. “I am premious” तुमने लिखा था. इस शब्द का क्या अर्थ तुमने बताया था ये सही से याद नहीं. शायद इक्स्ट्रीम्ली प्रीशअस(Extremely Precious). उस शाम के बाद तुमपर जैसे धुन सवार हो गयी थी नए, अनोखे और अजीबोगरीब शब्दों का लिस्ट बनाने की. एक दिन मैंने तुमसे यूँ हीं बातों बातों में कह दिया था कि तुम अपने इन शब्दों का अगर एक पूरी लिस्ट तैयार करो तो जब तुम्हारी लिस्ट पूरी हो जायेगी, मैं तुम्हारे इजाद किये शब्दों के लिस्ट को किसी दिन पब्लिश करवा कर एक नायब किताब का रूप दे दूंगा. ये कह कर मैं तो ये बात भूल भी गया था लेकिन तुम्हारे मन में ये बात रह गयी थी.

तुमने बाकायदा एक पुराना टाइप राइटर जो तुम्हारे नाना का था उसे झाड़पोंछ कर निकाला और उसी टाइपराइटर में तुमने टाइप करना शुरू कर दिया था. तुमने शुरुआत में मुझे कुछ भी नहीं बताया था. तुम मुझे सरप्राइज देना चाहती थी. करीब दो ढाई महीने बाद जब मैं तुमसे कही उस बात को पूरी तरह भूल चूका था, तुमने एक शाम पाँच पन्नो के शब्दों की एक लिस्ट थमा दी मेरे हाथों में. “देखो मैंने लिखना शुरू कर दिया है, अब कुछ महीनो में ये पूरा हो जाएगा तो फिर इसको छपवाने की जिम्मेदारी तुम्हारी”, तुमने कहा और मैं हैरान सा होकर तुम्हें देखने लगा था. उसी शाम तुमने अपनी और मेरी डायरी में इस ख्वाहिश को भी जोड़ा था. लिखा था तुमने.. ‘Fun With Words, By Us’ नाम की किताब पब्लिश करवाना और उसके नीचे तुमने मुझसे दस्तखत करवाया था. हाँ, ये भी तुम्हारी आदत थी, डायरी के हर पन्ने पर लिखी ख्वाहिश के नीचे तुम अपने और मेरे दस्तखत लेती थी, समय और तारीख के साथ. 

उस शाम के बाद तुमने सच में वो लिस्ट बनानी शुरू कर दी थी. मुझे ये विश्वास ही नहीं हो रहा था कि तुमने कितने अच्छे से अपने अजीबोगरीब शब्दों को लिखे थे. बाकायदा अर्थ समझाया था तुमने, एक्स्प्लनेशन के साथ और उसका प्रयोग कैसे कर सकते हैं वो भी साथ में लिखा था तुमने. किसी डिक्शनेरी के तर्ज पर. अपने ईजाद किये शब्दों के साथ साथ तुमने अपने उस लिस्ट में कुछ बेहद आश्चर्यजनक और अजीबोगरीब अंग्रेजी के शब्द लिखे थे. जैसे एक शब्द मुझे याद आता है - “Pluviophile” जो तुम खुद के अकसर इस्तेमाल करती थी, जिसका अर्थ है “वो इंसान जिसे बारिश बहुत पसंद है, और जो बारिश में सुकून और प्यार पा लेता है. पहले मुझे लगा था ये शब्द भी तुम्हारे दिमाग की उपज है, लेकिन बाद में तुमने जाने किस किताब में इस शब्द का अर्थ दिखलाया था. ऐसे ही न जाने कहाँ कहाँ से कितने शब्द तुम खोज कर लाया करती थी. तुम कहती थी “इन्हीं अजीबोगरीब शब्दों को पढ़कर मुझे भी दिल करता है कि मैं भी ऐसे शब्दों का आविष्कार करूं जो बिलकुल डिफरेंट से हों और सुनने में बेहद प्यारे भी लगे जो. मुझे कम से कम एक हज़ार शब्दों का तो आविष्कार करना ही है. That’s my goal”. शब्दों को इजाद करने के मामले में कमाल की टैलेंटेड थी तुम. उस वक़्त तुम्हारी मैं अकसर खिंचाई कर दिया करता था, इन बेतुके आदतों को लेकर लेकिन सच कहूं तो मुझे अकसर तुम्हारी ये आदतें हैरान करती थीं. 

अपने इस लिस्ट बनाने के साथ साथ तुमने टाइपरायटर का एक और उपयोग शुरू कर दिया था. तुम्हारी ख्वाहिश थी कि तुम फिल्मों की कहानियों का कांसेप्ट और स्क्रिप्ट लिखो. तुम्हारे मन में जो विषय है उसपर तुम फिल्म बनाओ. शब्दों के लिस्ट के साथ साथ तुम अपने इस ख्वाहिश पर भी काम करना शुरू कर दिया था. 

एक फिल्म आई थी उन दिनों, “प्यार में कभी कभी”, फिल्म और फिल्म के गाने तुम्हें बेहद पसंद आये थे. उस फिल्म की एक ख़ास बात ये थी कि उसमें डाईरेक्टर, प्रोड्यूसर से लेकर संगीतकार और कलाकार से लेकर स्पॉट बॉय तक सभी नए थे. सभी की पहली फिल्म थी वो. मुझे सही से याद नहीं, लेकिन शायद फिल्म के शुरुआत में ये बात कही गयी थी. इसके साथ ही ये भी कहा गया था या शायद लिखा हुआ था फिल्म के क्रेडिट में कि “इस फिल्म से हम सभी दोस्तों की तकदीरें जुडी हुई हैं..” बस, जिस दिन तुमने ये फिल्म देखी थी, उसके अगले ही दिन से तुम ये जिद लेकर बैठ गयी कि हम सब भी एक फिल्म बनायेंगे एक साथ. जब वे सभी नए लोग मिलकर एक प्यारी फिल्म बना सकते हैं तो हम क्यों नहीं? उस फिल्म में भी तो सभी दोस्तों की कहानी थी, जैसे यहाँ हम सभी दोस्त हैं. कुछ भी अंतर नहीं है, उस फिल्म से उन लोगों ने जहाँ अपनी दोस्ती को फिल्म में दिखाया था हम अपनी दोस्ती को फिल्म में दिखाएँगे, और उनसे कहीं बेहतर प्यारी और खूबसूरत फिल्म बनेगी हमारी. हमें भी फिल्म बनानी चाहिए. 

हर बीतते दिन के साथ तुम्हारी ये फिल्म बनाने की ख्वाहिश और मजबूत होती जाती थी. तुमने तो सारे यूनिट के बारे में भी सोच लिया था. 

मुझसे कहती तुम “फिल्म की कहानी तुम और मैं मिलकर डेवलप कर देंगे. गाने तुम लिख देना, उसे कोरिओग्राफ  मैं कर दूँगी और एक्टिंग के लिए हम दोनों ही रहेंगे...मैं किसी और को लेने का रिस्क अफोर्ड नहीं कर सकती. हमारी लिखी स्क्रिप्ट पर जितने अच्छे से हम अभिनय कर सकेंगे उतना दूसरा नहीं”. म्यूजिक के लिए तुमने पिहू का नाम सोच रखा था, जो उन दिनों किसी इन्स्टिट्यूट से म्यूजिक सीख रही थी. प्लेबैक सिंगिंग के लिए भी तुम्हारे पास एक प्लान था. “मेरे किरदार के गाने तो मैं गा दूँगी..लेकिन तुम्हारे किरदार के लिए तुम कैसे गाओगे? इतने बेसुरे हो तुम? लोग भाग जायेंगे..चलो वी विल फिगर समथिंग आउट..” 

यानी एक तरह से फिल्म का पूरा क्रू तुम्हारे मन में फिक्स्ड था. बस कोई तगड़ा पैसे वाले व्यक्ति(किसी फिनन्सिर) को पकड़ना पड़ेगा, जिसका कोई अता-पता नहीं था और तुम इसके लिए एकदम क्लूलेस थी. किसे अपने जाल में लपेटा जाए, हर शाम तुम्हारी इसी बात की फ़िक्र में गुज़रती थी. 

तुम अपनी इन दो नयी आदतों के साथ इतना गंभीर थी, कि अकसर तुम अपने बैग में अपने इन दोनों ख्वाहिशों से जुड़े सभी कागजात लेकर चलती थी. तुम्हारे बैग में पन्ने भरे होते थे, कुछ में फिल्म की कहानी(सिरिअसली क्रेजी कहानियां) और कुछ में तुम्हारे अजीबोगरीब शब्दों के लिस्ट और उनके मानी. तुम हर शाम मुझे ये दोनों पढ़ के सुनाती थी. मुझे बड़े ध्यान से तुम्हारी बातें सुनना पड़ता था. नहीं सुनने का तो कोई स्कोप ही नहीं था. तुम किसी टीचर की तरह बीच में बस ये पता करने के लिए कि मैं सुन रहा हूँ या नहीं, अपनी कहानी से कुछ पूछ लेती थी. “अच्छा बताओ ये किसने कहा था?”, “उसकी दोस्त का नाम क्या था?” “इस शब्द का क्या अर्थ बताया था मैंने?” और अगर मैं जो कभी जवाब नहीं दे पाता तो मेरी खैर नहीं थी. हल्का भी मेरा ध्यान इधर उधर जाता तुम्हारी कहानियों से, मुझे बाकायदा सज़ा दिया करती थी तुम.

मैं सोचता था उन दिनों कि हर शाम वापस घर जाने के बाद तुम दूसरा कुछ काम करती ही नहीं होगी..अपना पूरा वक़्त तुम फ़िल्मी कहानियां और शब्दों को लिखने में लगा देती होगी, वरना इतने पन्ने तुम कैसे लिख सकती थी? सच कहूं तो कभी कभी तो मैं पढ़ते हुए थक भी जाता था. और एक दो कहानियों में तो हँसी आ जाती थी मुझे, कितनी मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाता था मैं ये मैं ही जानता हूँ. कितनी बार तो ऐसा भी हुआ है कि जैसे ही आखिरी पन्ना पढ़ा मैंने, और राहत की साँस ली कि चलो कहानी ख़त्म हुई...वैसे ही तुम जाने कहाँ से बैग से कुछ और पन्ने निकाल कर मुझे थमा देती थी. “एक और पन्ना?” मैं कहता. “क्यों पढ़ने का मन नहीं है? बोर हो रहे हो क्या?”, तुम इतने गुस्से में पूछती, मेरी हालत वैसे ही ख़राब हो जाती थी. “मेरी क्या शामत आई है जो मैं बोर हूँ..” मैं तुम्हें प्यार से कहता. तुम मुस्कराने लगती. प्यारी वाली मुसकराहट नहीं, बल्कि एक ईवल स्माइल देने की नाकाम कोशिश करती तुम, और कहती “ऐसे ही मेरे से डरते रहा करो. तुम्हारी भलाई इसी में है...”

बहुत समय तक तुम्हारी ये दो आदतें कायम रही थी. फिल्म के कहानियों का तो तुम्हारे मूड पर निर्भर होता था, कभी कभी तुम खुद ऊबने लगती, “बड़ा मेहनत वाला काम है , मुझसे नहीं होता” तुम कहती, तो कभी कभी बड़ी उत्साहित हो जाती थी फिल्म बनाने को लेकर. लेकिन अपने शब्दों के लिस्ट को तुम फिल्मों से भी ज्यादा गंभीरता से लिया करती थी. बहुत समय तक नए शब्दों को अपने लिस्ट में तुम जोड़ते गयी थी. यहाँ तक कि बाद में जब हम दोनों अलग अलग शहरों में रहने लगे थे तब भी तुम मुझे खत में अपने पूरे सप्ताह के ईजाद किये शब्दों को लिखना भूलती नहीं थी. बाद में जाने क्या हुआ तुमने ये अपनी ये आदत भी छोड़ दी थी, वजह शायद मैं अच्छे से जानता हूँ. एक बात जो उन दिनों तुम्हें मैंने कभी नहीं कहा था, आज कहता हूँ. तुम्हारी इस आदत के लिए भले मैं कभी तुम्हारी खिंचाई कर दिया करता था, लेकिन सच कहूं तो तुम्हारी इस आदत से मैं इम्प्रेस्ड था. तुम्हारी इस बेतुकी बेवजह की आदत की इज्ज़त करता था मैं. आज जब कभी तुम्हारी उस अजीबोगरीब आदत के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि वो सच में एक किताब बन सकती थी. तुम्हारी ही तरह बिलकुल डिफरेंट, इलोजिकल और नायाब किताब.

तुम्हारी ख्वाहिशें..२

Tuesday, February 24, 2015


तुम्हें याद तो है न तुम कितनी ऊट-पटांग हरकतें कभी करने लगती थी. किसी गाने को सुनकर उसमें कही बातों को इतना सिरिअसली ले लेती थी कि तुम्हें समझाना मुश्किल हो जाता था. गुलज़ार की वो नज़्म तो याद होगी ही तुम्हें? “एक दो चाँद से कूदे..” जनवरी की वो आखिरी शाम थी जब हम दोनों देर तक एक नए शहर के रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे थे, अपने शहर वापस जाने वाली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे और उस शाम तुम्हें मैंने ये नज़्म पहली बार वाकमैन पर सुनाया था. तुम्हे ये नज़्म बहुत पसंद आई थी. कैसे बच्चों जैसी जिद करने लगी थी तुम कि “चलो न चाँद पर चलेंगे, वहाँ से कूदेंगे....” पहले तो मैं समझ नहीं पाया. मुझे लगा हमेशा की तरह तुम्हारा बस ये मजाक है...यूँहीं बेवजह मुझे सताने के लिए ये जिद लेकर बैठ गयी... थोड़ा झल्ला भी गया था मैं. लेकिन तुम अपने जिद पर कायम थी. तुम तब तक नहीं मानी जब तक मैंने तुमसे ये वादा नहीं किया कि एक दिन हम जरूर चाँद पर जायेंगे. सोचता हूँ अकसर मैं कितनी लड़कियां होंगी तुम्हारी जैसी जो इस तरह की जिद लेकर बैठती होंगी. तुम्हारी ऐसी बातें तुम्हारे ऐसे बेवकूफिपना वाले जिद तुम्हारे सपनों की दुनिया का हिस्सा थे...तुम्हारे सपनों की एक अलग ही दुनिया थी. तुम्हारी ख्वाहिशों की भी एक अलग दुनिया थी.  एकदम जुदा और अजीब ख्वाहिशें थीं तुम्हारी, कुछ तो बेहदं प्यारी सी तो कुछ बेहद वीयर्ड.

तुम्हारे पास एक डायरी थी, जिसमें तुमने अपनी सारी ख्वाहिशें लिखती थी. सारे अजीबोगरीब और पागलपन वाली ख्वाहिशें तुम्हारी उसमें थे. वो डायरी तुम्हारे पास हमेशा रहती थी, तुम कहीं भी जाओ तुम उस डायरी को अपने संग रखती थी. उस शाम रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठकर अपनी उस डायरी में तुमने ये ख्वाहिश भी जोड़ दी थी, “चाँद से कूदना..,"

एक डायरी तुमने मुझे भी खरीदवा दी थी, जिसमें मुझे भी अपनी ख्वाहिशें लिखने को तुमने कहा था. लेकिन मेरी ऐसी कोई ख़ास ख्वाहिशें या विशेज थी भी नहीं जो मैं उसमें लिखता. तुम्हारी तरह तो ख्वाहिशों की लिस्ट तो बिलकुल भी नहीं थी मेरे पास. तुमने तब खुद ही मेरी डायरी में ख्वाहिशें लिखना शुरू कर दिया था. जो भी ख्वाहिश तुम अपनी डायरी में खुद के लिए लिखती, ठीक वही ख्वाहिशें मेरी डायरी में तुम लिख दिया करती थी. कभी जो तुम्हें टोकने की जुर्रत करता,  कि तुम क्यों मेरी डायरी में अपनी सभी स्टुपिड ख्वाहिश लिख देती हो, तुम नाराज़ हो जाती थी और फिर बाद में बड़े प्यार से खुद ही मुझे समझाने लगती. देखो, यु=मी न? , तो मेरी ख्वाहिशें = तुम्हारी ख्वाहिशें वाला हिसाब किताब मुझे समझाने लगती तुम.


मुझसे अगर पूछो तो मुझे तो तुम्हारी सभी ख्वाहिशें एकदम अनोखी और अजीब लगती थी, लेकिन तुम्हारी कुछ ख्वाहिशें थीं जो वीयर्ड होते हुए भी मुझे सोचने पर मजबूर कर देती थी. कभी कभी तो तुम उन ख्वाहिशों के जरिये मुझे अपने साथ पता नहीं कल्पनाओं के किस दुनिया में ले जाया करती थी.

एक तुम्हारी सबसे अलग सी विश जो तुमने लिखा था अपनी और मेरी डायरी में वो थी... टाईममशीन के जरिये पुराने दिनों में वापस जाना. ये ख्वाहिश वैसे तो बहुत से लोगों की हो सकती थी लेकिन इसके साथ तुमने इस ख्वाहिश को जिस तरह से डिस्क्राइब किया था, वो बिलकुल अलग सी और अनोखी थी. तुम्हारे पास एक पूरा प्लान तैयार था.

तुमने तो रिजर्व बैंक भी लूटने तक का ख्याल बना लिया था. कहा करती थी... उन दिनों के पुराने नोट्स रिजर्व बैंक में तो रखे मिल जायेंगे न हमें? तो जाने से पहले हमें वो भी अपने कब्ज़े में करना होगा. वे रुपये निकाल कर उसे अपने साथ ले जायेंगे. दो बहुत क्लियर लॉजिक थी तुम्हारी इस बात के पीछे, पहला तो ये कि आज के नोट उस ज़माने में चलेंगे नहीं, और दूसरा ये कि "जब आज के नोट उस ज़माने में नहीं चलेंगे तो हम क्या खाली हाथ जायेंगे वहाँ??ना..कभी नहीं.....हमें बैंक लूटना ही होगा..और पुराने दिनों के पैसे लेकर चलना ही होगा, दूसरा कोई ऑप्शन  नहीं है", तुम कहती थी.


तुम वापस उन दिनों में जाने की बात से ही बहुत इक्साइटड हो जाया करती थी. कहती मुझसे  "सोचो हम अगर उन दिनों में चले जायेंगे, तो हमारे कपड़े, यहाँ तक कि शक्ल सूरत देखकर भी उस समय के लोग बड़े हैरान होंगे, वे हमें एलिएंस समझेंगे. हम वहाँ उन दिनों में पहुच कर वहाँ के लोगों को बर्गर, पेस्ट्री और पिज़्ज़ा खिलाएंगे. उन्हें स्मार्टफोन और लैपटॉप दिखाकर हैरान कर देंगे. वो हमें जादूगर समझेंगे. हम उन दिनों में जाकर अपने अपने पसंदीदा फिल्मस्टार से भी मिलेंगे, उन्हें उनकी भविष्य में आने वाली फ़िल्में दिखाएँगे, वो चकित हो जायेंगे. वो जाने क्या समझेंगे हमें. हम उन दिनों में जाकर लोगों से ये भी कहेंगे, कि जितना अधिकतर लोगों का एक महीने का वेतन होता है, अपने ज़माने में हम तो कभी कभी उतने पैसे एक दिन में क्या एक घंटे में खर्च कर देते हैं. वो अजीब आश्चर्य में आँखें फाड़ के हमें देखेंगे हमारी बातों को सुनेंगे". इस तरह के जाने कितने ही प्लान तुम्हारे मन में पहले से तैयार थे.

तुम टाइममशीन के जरिये वापस अपने घर भी जाना चाहती थी, अपनी माँ को तुम उनके बचपन में देखना चाहती थी. तुम् अपनी परनानी को देखना चाहती थी, जिनकी न जाने कितनी कहानियां तुम अपनी माँ और नानी के मुहं से सुन चुकी थी. तुम उस दिन में वापस जाना चाहती थी जिस दिन तुम्हारा जन्म हुआ था, तुम मेरे बचपन को भी देखना चाहती थी. तुम मेरी माँ को भी उनके स्कूल और कॉलेज के दिनों में जाकर देखना चाहती थी. अक्सर तुम मेरी माँ की पुरानी तस्वीरों को देखकर कहा करती थी कि आंटी कितनी सुन्दर थी कॉलेज के दिनों में,  काश मैं आंटी जैसी सुन्दर होती. तुम चाहती थी कि तुम चुपचाप जाकर उन पुराने दिनों में अपनी माँ के आसपास कहीं बैठ जाओ, वो जहाँ जाएँ तुम उनके साथ साथ वहाँ जाओ. वो क्या कर रही हैं, क्या बातें कर रही हैं, किन लोगों से मिल रही हैं वो सब देखो तुम.

लेकिन जहाँ तुम्हारी ये ख्वाहिश थी वहीँ तुम्हारे मन में एक बात और अटकी रहती थी,  जो की मेरे हिसाब से भी एक वैलिड पॉइंट था. तुम कहती मान लो, जैसे मैं प्लान बना रही हूँ भविष्य में जाने की, वैसे ही कोई भविष्य का इंसान अभी इस वक़्त हमारे बीच मौजूद हो तो? और जैसे मैं सोच रही हूँ कि अपनी माँ के आगे पीछे घूमते रहने की बात, उनकी हर एक चीज़ को नोटिस करने की बात वैसे ही कोई हमारे बीच ही हो और हर पल हमें वो देख रहा हो. ये कहने के बाद तुम हर एक पर शक करने लगती...तुम्हें क्या लगता है? वो हो सकता है? देखो उसे...या वो लड़की जो हमें लगातार देख रही है? क्या लगता है तुम्हें? कुछ समय के लिए तुम्हारे इस खेल में मैं भी जुड़ जाता था और अपने इनपुट देने लगता.

तुम अपनी इस ख्वाहिश को लेकर बहुत सिरिअस थी, ऐक्चूअली इसी ख्वाहिश को लेकर नहीं, बल्कि तुम अपनी सभी ख्वाहिश को लेकर बहुत सिरिअस रहती थी. तुम्हें अपनी इन ख्वाहिशों पर मजाक करना पसंद नहीं था. जहाँ तुम्हारी ये टाईममशीन के जरिये वापस पुराने दिनों में जाने वाली ख्वाहिश थी वहीँ तुम्हारी एक और बड़ी ख्वाहिश थी जिसका जिक्र लगभग हर शाम मुझसे तुम करती थी. तुम्हारी एक अनोखी किताब की ख्वाहिश और फ़िल्में बनाने की ख्वाहिश. आज की शाम तुम्हारे इस ख्वाहिश के नाम कर रहा हूँ, अगली ख्वाहिश तुम्हारी अगले किसी शाम में.

...


आ चल डूब के देखें  एक दो चाँद से कूदें..

आँखों की कश्ती में रात बिताई जाए
झीलों के पानी से नींद बिछाई जाए

चल दरिया बाँध ले पैरों से
चल सनसेट के रंग पहने तन पे,
बुद्धम शरणम् गाए

कुछ ऐसा करे जो हुआ नहीं..जो हुआ नहीं वो करें

चल जेबें भर ले तारों से..दाने छिटकाते चलें,
चल मफलर पहन के बादल के बारिश बरसाते चले

कुछ ऐसा करे जो हुआ नहीं..जो हुआ नहीं वो करें
चलो न कूदें


तुम्हारी ख्वाहिशें..

Monday, January 12, 2015

जो लड़का देखता था

वो दिसम्बर की एक सर्द सुबह थी. जिधर देखो घना कोहरा...लड़के ने खिड़की से बाहर झाँका और खुश हो गया. उसक पसन्दीदा वातावरण था. टी.वी की न्यूज़ एंकर लाख कहती रहे, घने कोहरे से जनजीवन अस्त-व्यस्त, लड़के की दिली तमन्ना थी कि आने वाले दो-तीन दिन यूँ ही रहें...घने कोहरे में डूबी सड़कें, पेड़-पौधे...और उनको चीरती दूर से आ रही किसी मोटर की मद्धिम सी हेडलाइट.

लड़के ने एक बार फिर घड़ी पर निगाह डाली. सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे. यानि लड़की से उसकी मुलाकात में मात्र 25 घण्टों का फ़ासला...और कुछ सौ किलोमीटर की दूरी... कल के बारे में सोच कर ही उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी. क्या करेगा वो कल, जब महीनों बाद उसकी ज़िन्दगी उसके सामने होगी...? वो तो जो करेगा, सो करेगा, पर लड़की कैसे और क्या करेगी, सोच के उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान खिल गई...पगली है वो तो...

हाँ सच में, पागल ही तो थी वो दुनिया की सबसे ज़्यादा भोली और मासूम लड़की...। दुनिया के लिए वह चाहे जो भी हो, उसके लिए हमेशा किसी बच्चे-सी मासूम ही रहेगी. उसकी हरकतें, ख़्वाहिशें, बातें, शिकायतें...उसकी उम्र की लड़कियों के मुकाबले वो कोरा पागलपन होगा, पर वो ऐसी ही थी...कम-से-कम उसके सामने वो अपने असली रूप में होती थी...हमेशा...

लड़की की नज़र से

जिस दिन से लड़के ने उसे बताया, मिलने को तैयार रहना, तुम्हारे शहर आ रहा हूँ...लड़की के मानो पंख लग गए थे. लड़के ने टिकट कन्फ़र्म होते ही सबसे पहले उसे ही सूचना दी थी. अपनी आदत के मुताबिक लड़की ने उसी समय उससे आने और जाने की दोनो ट्रेनों की पूरी डिटेल्स मँगवा ली थी. लड़के को कभी कभी हल्की कोफ़्त भी होती थी...वो कहीं भी जाए...मीलों दूर बैठी वो आखिर कर क्या लेगी...? क्या ड्राइवर के माथे पर दोनाली टिका कर बोलेगी, ट्रेन जल्दी-जल्दी...बिना रुके चलाने को...? या फ़िर बाकी की सब ट्रेनें रुकवा कर उसके लिए लाइन क्लीयर करवाएगी. पर उसकी बहुत सारी बचकानी ज़िदों की तरह वो हमेशा उसकी ये ज़िद भी मान जाता था...चुपचाप...

लड़की को भी वैसे तो कोहरा बहुत पसन्द था, पर जाने क्यों अबकी उसकी ख़्वाहिश थी कि जब लड़का उसके पास आए, आकाश में तेज़ धूप खिली रहे...पूरे दिन...

"मैं तुम्हारे साथ उस खिली धूप में छत पर बैठना चाहती हूँ..." लड़की ने जब कहा तो लड़का हल्का चौंक गया,'छत...? माने...? अबकी तुम बाहर नहीं मिलोगी क्या...?'

लड़की उसके सामने नहीं थी, पर वो जानता था, उसकी बात सुन कर उसने उसी यूनिक तरीके से मुँह बिचकाया होगा,‘आर यू आउट ऑफ़ योर माइंड ऑर वॉट, मिस्टर...? भूल गए, उस पूरे हफ़्ते घर में बस मैं और दी ही रहेंगे...पूरी फ़ैमिली निखिल भैय्या की शादी में शहर से बाहर रहेगी न...'

लड़के के दिल की धड़कन ये सोचने मात्र से बढ़ सी गई थी. सहसा लड़की भी खामोश हो गई थी... दोनो की चुप्पी भी मानो कितना कुछ कह रही थी. लड़की ने दिन गिने थे...मात्र पच्चीस दिन...और एक बार फ़िर कुछ लम्हें...कुछ घण्टे सिर्फ़ उन दोनो के...लड़की ने मन-ही-मन हिसाब लगाना शुरू कर दिया था....अब की मिलेगी तो क्या-क्या कहना है उसे लड़के से...सब कुछ उसने अपने मन की डायरी में नोट करना शुरू कर दिया था. लड़का तो अपने पास किसी भी रूप में ये सब बातें नोट कर भी लेता था, पर लड़की चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकती थी. घर पर किसी ने भी पढ़ लिया तो उसके बाद जो भयानक तूफ़ान आता, उसकी कल्पना मात्र से वह सिहर उठती थी. उसका जो भी हो, उसे परवाह नहीं थी, पर लड़के पर राई भर भी बात आए, ये उसे बिल्कुल गवारा नहीं था.

यूँ तो लड़का कभी उसकी किसी भी बात से इरीटेट नहीं होता था, या कम-से-कम उसे तो यही जताता था, पर जाने क्यों अब उससे ही जाने-अन्जाने ऐसी ग़लतियाँ होने लगी थी जिसे करने के साथ ही उसे अहसास हो जाता था कि उसकी वो ग़लती शायद माफ़ी के क़ाबिल नहीं... लड़के की जगह कोई और होता तो उसे कभी माफ़ न करता, पर वो तो बस वो ही था न...लड़की को दिल के किसी कोने में एक ढाँढस रहता था कि ज़िन्दगी में अगर कभी वह सच में ऐसा कुछ ग़लत कर बैठी, तो और कोई उसके साथ हो न हो, लड़का तब भी मजबूती से उसके साथ खड़ा नज़र आएगा. अबकी बार उसके पहले नम्बर पर उन सब गलतियों के लिए लड़के को एक्स्प्लनेशन देना था.

गिनते-गिनते आखिर वो दिन आ ही गया। रात में खुशी के मारे लड़की की नींद कई बार टूटी, पर सुबह वह हर दिन से ज़्यादा तरोताज़ा थी. भगवान भी जैसे उसके साथ थे, तभी तो बहुत खिल कर धूप निकली थी...कई दिन के छाए कोहरे के बाद...अचानक ही... लड़की ने चुपके से दुआ माँगी...लड़के की ज़िन्दगी में भी अभी जो कोहरा छाया है, वो भी ऐसे ही छँट जाए...

कॉलबेल बाद में बजी, चेहरे पर हज़ार वॉट की मुस्कान लिए हुए लड़की ने दरवाज़ा पहले खोल दिया. लड़का दो पल अपलक उसे देखता रह गया. 'मिस्टर...यूँ ही देखते रहने का इरादा है या अपनी एक इच्छा भी पूरी करोगे...?' कहते हुए जब तक वह कुछ समझ पाता, लड़की ने एक झटके से उसे अपनी बाँहों में भरा और जाने क्या फ़ुसफ़ुसाते हुए अलग भी हो गई...लड़का लाख पूछता रह गया, पर लड़की ने उसकी बात पूरी तौर से इग्नोर कर दी... वो कैसे बताती कि उसके इस अप्रत्याशित हरकत से हतप्रभ रह गए लड़के से उसने कहा था, 'Hold me back...tightly...You Stupid...'

लड़के को आया देख कर दी भी बाहर आ गई थी. उनसे बात करते हुए जितनी बार लड़के की निगाह लड़की से टकराई, वो उसे अपलक ताके जा रही थी...मानो उसकी मौजूदगी के हर पल को वो हमेशा के लिए अपनी यादों में फ़्रीज़ कर लेना चाहती हो. लड़का हमेशा की तरह सब समझ रहा था...उसकी न रुकने वाली बेतहाशा हँसी...उसकी वो हल्की सी मुस्कान...और उन सबके पीछे कहीं बहुत गहरे छिपे उसके आँसू...

लड़के को तो जैसे महारत हासिल थी उसका मन पढ़ने में...वो लाख कोशिश कर लेती कि उससे बात या मैसेज करते समय वो अपने मनोभाव छुपा ले, पर हर बार चोरी पकड़ी जाती. ऐसे में लड़की का फ़ेवरिट डायलॉग होता,'बताओ मिस्टर...ये तुमने अपना कैमरा छुपाया कहाँ है...? आखिर तुमको पता कैसे चल जाता है सब असलियत...’ जवाब में लड़का बस्स...क्यूँ बताऊँ...कह कर बात ऐसे पलट देता कि बातें खत्म होते-होते लड़की सब कुछ भूल कर बस खिलखिला रही होती. लड़की ने बहुत कोशिश की कि वो भी ये कला सीख जाए...जब कभी लड़का यूँ उदास हो, वो उसको भी हँसा सके...पर ऐसा हो कहाँ पाता था. लड़का हमेशा कहता था कि वो उसकी हर बात जानती है, पर फिर भी लड़के की उदासी के पलों में अक्सर उसे महसूस होता...उन दोनो के बीच कोई तो पारदर्शी दीवार थी...जिसके उस पार लड़के के दुःख थे और जहाँ उसका पहुँच पाना लड़के ने जानबूझ कर प्रतिबन्धित कर रखा है...

थोड़ी देर उनके पास बैठ कर...चाय-नाश्ता करवा कर दी ऑफ़िस चली गई थी. दी को उन दोनो पर पूरा भरोसा था. अकेले रहने के बावजूद दोनो अपनी सीमा से बाहर नहीं जाएँगे, ये वो बहुत अच्छे से जानती-मानती थी. घर से बाहर तो लड़की अनगिनत बार लड़के के साथ अकेली रही थी, पर घर की चारदीवारी में उसके साथ बिल्कुल अकेले रहने का यह पहला मौका था. कुछ देर वे दोनो ही एक अजीब सी खामोशी में घिरे बैठे रहे...फिर लड़की ने ही चुप्पी तोड़ी थी, 'सुनो साहब...ये न समझना कि तुम मेरे घर आए हो तो नवाबों की तरह बैठे रहोगे और मैं दौड़ दौड़ कर तुम्हारी चाकरी करूँगी...तुमको भी सब काम में मेरा हाथ बँटाना पड़ेगा...Is that clear...?'

लड़की और भी जाने क्या-क्या हिदायतें दिए जा रही थी, पर लड़का बस मन्द-मन्द मुस्कराता हुआ उसे अपलक देखे जा रहा था, मानो वो कोई बच्ची हो और वो उसकी तोतली ज़बान सुन कर आनन्दित हो रहा हो. लड़की सहसा चिढ़ गई, 'ऐसे न देखो मिस्टर...मैं तुमसे बड़ी हूँ...रिमेम्बर...?'  ये भी लड़की की अजीब सी सनक थी, उससे बड़ा बनने की...। इसके लिए उसने एक अजीब फ़ण्डा बनाया हुआ था,’तुम 87 में पैदा हुए हो...मैं 88 में...हुई न तुमसे एक साल बड़ी...? चलो, अब से आइन्दा इज्ज़त से पेश आना मेरे साथ...।' लड़का भी पलटवार करता,'अच्छाऽऽऽ...एक भी बात या हरकत बता दो अपनी जिससे साबित होता हो कि तुम बड़ी हो गई हो...बच्ची नहीं हो अब भी...?’ और लड़की बहुत याद करने पर भी एक बात ऐसी नहीं बता पाती थी, जो उसने लड़के के सामने समझदारी से की हो... ऐसे में वो बुरा सा मुँह बना कर रूठ जाती और फिर लड़के को ही मनाना पड़ता उसको...एक बच्ची की तरह...

लड़की उस दिन भी अपने उसी फ़ुलटूश बचकाने मूड में थी... ‘चलो जीऽऽऽ...भगवान जब मेरे सपने आज पूरे कर ही रहा है, तो छत पर चल कर धूप भी सेंकते हैं तुम्हारे साथ...’ लड़की लड़के का हाथ पकड़ कर उसे लगभग खींचते हुए छत पर ले गई...वहाँ भी उसकी बतकही में कोई कमी नहीं आई थी, पर जाने कैसे, किस मोड़ पर बात लड़की के जीवन के कुछ दुःखद पलों पर चली गई, दोनो ही नहीं जान पाए... लड़की नहीं चाहती थी कि सब कुछ जानने-समझने के बावजूद उस खूबसूरत से दिन...उन मधुर पलों में लड़का उसके आँसू देख कर ज़रा भी उदास हो...इस लिए जैसे ही भागने के लिए वो उठी, लड़के ने तेज़ी से उसका हाथ थाम उसे अपने सीने से लगा लिया. लड़की ने बहुत हल्का-सा विरोध किया, पर अन्दर-ही-अन्दर वो यही चाह रही थी. अपने सीने से कस कर चिपकी सुबकती लड़की के बालों में प्यार से हाथ फिराते लड़का सिर्फ़ यही दोहरा रहा था,’Its Okay Sweetheart...सब ठीक हो जाएगा...’

कुछ पलों में शान्त होकर भी लड़की वैसे ही उसके गले में बाँहें डाले आँखें बन्द किए खामोश बैठी रही. वो मन-ही-मन बुदबुदा रही थी,’भगवान जी...मुझे कभी इन बाँहों के घेरे से अलग न करना... कितना सकून...कितनी सुरक्षा है इनमें...। and you mister...Listen...Just hold me tightly, You Idiot..'


बिना कुछ भी सुने...बिना कुछ भी जाने...और बिना कुछ भी सोचे...लड़के ने भी अपनी आँखें मूँदी और मन में बोला...आमीन !!

कुछ पल...तुम्हारे नाम...

Wednesday, December 24, 2014

वो एक धूप का दिन था. कई दिनों बाद उस दिन धूप निकली थी. वैसे उन्हें तो सर्दियों के मौसम में धूप से कुछ ज्यादा प्यार न था, लेकिन फिर भी कभी कभी जाड़ों की नर्म धूप में उन्हें घूमना टहलना, पार्क में बैठकर सैंडविच खाना पसंद था.

बस के अन्दर बैठा वो खुश था ये सोच के कि आज वे बहुत देर तक पार्क में बैठ सकेंगे. वो यही सोच कर बस से उतरा था कि वो सीधा पार्क चले जाएगा, लेकिन हवा ठंडी थी. बेहद ठंडी. उसने बैग से अपना मफलर निकाल के कान और गले पर लपेट लिया. इतनी ठंडी हवा में आज पार्क में बैठना संभव नहीं होगा, उसने सोचा. बस के अन्दर से उसे बाहर कि सर्दी का आभास नहीं हुआ था. 

अपनी घड़ी देखी उसने. समय काफी है.. वो अभी चाहे तो बेकरी से दो सैंडविच पैक करवा सकता है, लेकिन उसे डर था कि वो पहले न आ जाए. पाँच मिनट का रास्ता था और वो तेज़ी से चलने लगा था. वो रीगल के पास आएगी. वो वहीँ उसका हमेशा इंतजार करती थी. 

लड़के को हमेशा डर रहता कि कहीं लड़की उससे पहले न आ जाए और उन दिनों अकसर ये होता था, वो उसके पहले पहुँच जाया करती थी. उस दिन भी वो खड़ी थी रीगल के सामने. कोई नयी फिल्म लगी थी और वो एक कोने में खड़ी होकर उस फिल्म के पोस्टर को देख रही थी. वो चुपके से उसके पास आकर खड़ा हो गया. लड़की उसे देखकर मुस्कुराने लगी लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे से मुसकराहट गायब हो गयी और एक चिढ़ उभर आयी चेहरे पर. लड़का समझ गया उसके गुस्से की वजह, वो मुस्कुराने लगा. 

“ऐसे क्या मुस्कुरा रहे हो बेवकूफों की तरह...ये दुनिया का सबसे आसान काम है और तुमसे ये भी नहीं होता...” लड़की ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा और लड़के के कानों पर बंधा मफलर उतार कर उसके गले में डाल दिया और नए सिरे से गिरह लगाने लगती. देखो हो गया बस. देखो अब कितना स्टाइलिश दिखता है ये. लड़की हमेशा चिढ़ जाती थी जब वो सर और कान पर मफलर लपेटे सामने आता था. ऐसे बूढ़े लोग पहनते हैं मफलर, वो कहती. और फिर थोड़ा गुस्से का नाटक करते हुए वो मफलर को बड़े एहतियात से उसके गले में एक टाई के जैसे बाँध देती. 

दोनों फिर निकल पड़ते घूमने. वे दिन भर कनॉट प्लेस घूमते थे. इनर सर्कल का एक चक्कर, आउटर सर्कल का एक  चक्कर और फिर इनर सर्कल.. दोनों तब तक कनॉट प्लेस के चक्कर लगाते रहते जब तक वे थक नहीं जाते. जब थक जाते तो वहाँ लगी सीमेंट की बेंचों पर बैठ जाते. सर्दियों में दिल्ली कितनी खूबसूरत लगती है न? कनॉट प्लेस को एक नज़र देखकर लड़की कहती. कनॉट प्लेस उसे दिल्ली का सबसे खूबसूरत इलाका लगता था. कनॉट प्लेस की ऊपरी मंजिल पर बने दुकानें, दफ्तरों और रेस्तरां को देखकर वो कहती, काश हमें ऊपरी मंजिल पर कोई कमरा मिल जाए किराये पर... कितना खूबसूरत व्यू होगा न? लड़का उसकी इस बात पर हँसने लगता, वो समझता कि वो मजाक कर रही है लेकिन लड़की का चेहरा एकदम शांत और गंभीर रहता. नहीं...ये मजाक नहीं कर रही है, लड़का सोचता. चलो एक आखिरी चक्कर लगाकर हम कॉफ़ी पीने चलते हैं, वो लड़की से कहता और वे दोनों फिर निकल जाते उस कैफे की तरफ जहाँ वे अकसर अपनी खाली दोपहरें बिताया करते थे. वे उन दोनों के खाली दिन थे, और दोनों अपना खाली वक़्त बिताने वहाँ जाया करते थे.

दो तीन गलियारों से चलते हुए वो कैफे आता जहाँ वो जाते थे, उन गलियारों में चलते हुए किसी किसी दुकान को देखकर लड़की ठिठक जाती, वो कुछ सोचने लगती. वहाँ के हर दुकान से उसकी कुछ न कुछ यादें जुड़ी हुई थी, वो शायद उन्हीं बातों को याद करती लेकिन कभी लड़के को बताती नहीं कि वो क्या सोच रही है. आर्चीज़  गैलेरी को देखकर उसे उस बूढ़ी औरत की याद आती जिसका एक बार लड़के ने उससे जिक्र किया था, जो उस दुकान में काउंटर पर रहती थी और लड़के के खरीदे एक तोहफे को देखकर उसने कहा था, “जिसके लिए ये खूबसूरत तोहफा खरीद रहे हो वो जरूर कोई स्पेशल होगी”. उस दिन लड़की इस बात को सुनकर बेहद खुश हो गयी थी.
कॉफ़ी हाउस के बाहर लड़की रुक जाती. वो उस कैफे के नाम के ऊपर लगे सिम्बल को देखने लगती. वो सिम्बल उसे कभी समझ नहीं आया. ‘ये क्या बकवास सिम्बल है?’ वो लड़के से पूछती. ‘ये दिल्ली टूरिज्म का सिम्बल है’. लड़का कहता. बकवास. वो कहती...‘इसमें डी और टी तो नज़र ही नहीं आ रहा तो कैसे हुआ दिल्ली टूरिज्म का सिंबल?हाँ टी तो दिख रहा है लेकिन डी तो किसी एंगल से नहीं, ये तो पी लग रहा है’. लड़के के पास लड़की के इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता. वो चुप रहता. लड़की फिर उसे उस सिम्बल के जाने कितने अलग अलग अर्थ उसे बताने लगती और लड़का मुस्कुराते हुए सुनते रहता. 

कैफे में दोनों एक ही टेबल पर अकसर बैठते, वो उन दोनों का एक तरह से रिजवर्ड सीट था. वो कोने में लगी एक टेबल थी, जहाँ पीछे जाने का दरवाज़ा था. वहाँ हवा आते रहती थी, और ठंड में वहाँ कोई बैठना नहीं चाहता था. लगभग वो टेबल खाली ही रहती थी. दोनों वहीँ बैठते थे, अगर किसी दिन उन्हें वो टेबल खाली नहीं मिलता तो लड़की कहीं और बैठने को तैयार नहीं होती और कैफे से बाहर आ जाती. उस टेबल पर लड़की अपने सारे समान ऐसे फैला कर रखती जैसे ये कैफे न हो उसका घर हो. बड़े ही करीने से एक के बाद एक सारे सामन वो टेबल पर रखती. स्कार्फ, दस्ताने, बैग, मोबाइल, एक छोटी डायरी जिसे वो हमेशा अपने ओवरकोट के जेब में रखती थी.
दिल्ली का ये इलाका, इस कैफे का इलाका लड़की को बहुत पसंद था, उन दिनों वे दिसंबर और जनवरी की दोपहरें यहीं बिताते थे. कैफे में दोनों बहुत देर तक बैठे रहते, और फिर जब वहाँ बैठे बैठे वे ऊब जाते, तो दोनों कैफे के ठीक सामने हनुमान मंदिर के पास आ जाते. वहाँ धूप आती थी और दोनों को वहाँ धूप में बैठना पसंद था. हनुमान मंदिर के सामने लोगों ने छोटे छोटे अपनी दुकानें खोल रखी थीं. टैटू बनाने वाले, भविष्य बताने वाले ज्योतिषी, मेहँदी लगाने वाले, चाय बेचने वाले, समोसे और कचौड़ियों की दुकानें. 

लड़की हर दुकान को बड़े गौर से देखती. ज्योतिषों को वहाँ टेबल कुर्सी लगाए बैठे हुए देखती तो अकसर सोचती, मैं भी किसी दिन अपना हाथ दिखवाऊंगी, लेकिन दिखलाती कभी नहीं थी. उसे भविष्य जानने की उत्सुकता थी लेकिन कभी खुद का हॉरस्कोप अख़बार में नहीं देखती थी, हाँ दूसरे लोगों का..उस लड़के का हॉरस्कोप हर रोज़ पढ़ती अख़बार में. लेकिन खुद का कभी जानने की कोशिश भी नहीं करती. जो होगा देख लेंगे, अभी से क्यों जानूँ मैं कि क्या होने वाला है ज़िन्दगी में. इससे तो इक्साइट्मन्ट ही खत्म हो जाएगा, वो कहती. सरप्राइज उसे पसंद थे. अच्छे बुरे दोनों तरह के सरप्राइज. ‘देखते हैं क्या होगा ज़िन्दगी में, अच्छा बुरा जो भी. अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, एक अच्छी मेमोरी दे जाएगा...एक यादगार पल, बुरा हुआ तो कुछ सिखा ही जाएगा’, वो कहती.

मेहँदी लगाने वालों को देखकर उसे भी मन करता मेहँदी लगवाने का, लेकिन लगवाती कभी नहीं थी. उसे बड़ा नाज़ था खुद पर. ‘मैंने तो मेहँदी लगाने का कोर्स किया है, इनसे कहीं बेहतर मेहँदी मैं लगा सकती हूँ’, वो कहती. ‘सोचती हूँ कि मैं भी यहाँ अपनी एक दुकान खोल लूँ? हम दोनों जो दिन भर में इतनी कॉफ़ी पी जाते हैं वो आराम से कवर हो जायेंगे, वो लड़के को कहती और सच में बैठकर दुकान खोलने की अपनी प्लानिंग लड़के को बताने लगती. 

देखो यहाँ चावल पर नाम लिखे जाते हैं. एक स्टाल के पास खड़ी होकर वो कहती लड़के से. सोचो, दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है. सोचो चावल पर नाम लिखते हैं ये, कैसे लिखते होंगे? उसके मन में उथल पुथल होने लगतीं, उसका मन करता उस दुकान वाले से जाकर एक सवाल करने का, ‘मेरा जन्मदिन है, मैं आपको खूब सारे चावल लाकर दे दूँगी, आप हर दाने पर मेरा नाम लिख दोगे? मेरे जन्मदिन पर जो आयेंगे वो देखेंगे चावल पर मेरा नाम लिखा है, ये कितना यूनिक लगेगा न? मैं पूछूं इनसे?’ वो लड़के से पूछती. लड़के को उसका ज़रा भी भरोसा नहीं था, वो सच में पूछ सकती थी ये बात उस दुकानदार से, वो उसे जबरदस्ती खींच कर उस स्टाल से दूर ले जाता. लड़की अकसर ऐसी यूनिक चीज़ें सोच लिया करती थी शायद इसलिए कि वो हमेशा खुद के लिए यूनिक चीज़ें चाहती थीं. 

यहाँ पर बन्दर कितने हैं, बंदरों को देखकर वो कहती. ‘उछलते कूदते इन बंदरों को देखो, बिना किसी फ़िक्र के बिना किसी चिंता के, फुल ऑफ़ लाइफ लगते हैं न ये बन्दर’. उसे बंदरों से बहुत डर लगता था लेकिन उन्हें देखकर वो खुश भी होती थी. 

एक बन्दर यूँहीं जब उसके पास उछल कर आया, वो बेहद डर गयी. लड़के का कोट पकड़ कर उस  में खुद को छुपा लिया उसने. लड़के ने बन्दर को भगा दिया लेकिन फिर भी वो कुछ देर तक उसी अवस्था में रही. तुम तो डर गयी देखो. डरती हो तुम इतना बंदरों से, लड़का उसे छेड़ने लगा. डरी नहीं मैं साहब, ये तो एक प्यारा मोमेंट था. वो कहती. ‘ये मोमेंट जो था अभी जिसे तुम डर कह रहे हो ये बंदरों की बदमाशी के वजह से था न. मैं तुम्हारे कोट में छिप  गयी थी, मुझे कितना अच्छा लगा. तुम्हें अच्छा लगा न? देखो कितना प्यारा सा वंडरफुल मोमेंट था ये. थैंक्स टू बंदर्स फॉर दिस वंडरफुल मोमेंट’. वो खिलखिलाकर हँस देती. 

दोनों बस स्टैंड की तरफ बढ़ जाते. चलते हुए वो लड़के के कोट के जेब में हाथ डाल देती. सर्दियों में ये उसकी आदत थी. दस्ताने वो सिर्फ एक हाथ में पहनती, एक हाथ उसका हमेशा लड़के की कोट में घुसा रहता था. बस स्टैंड तक जाने के दौरान वो अकसर लड़के से अपने एक सपने के बारे में बात करती. लगभग हर रोज़ ही. उसका एक अरमान था. वो लड़के से कहती, ‘चलो एक स्लीपिंग किट खरीदते हैं और उसे लेकर निकल जाते हैं कहीं भी, किसी भी दूसरे शहर, एक शहर से दूसरे शहर घूमते हैं, जहाँ मन किया वहीं अपना डेरा डाल लेंगे हम. 

हम जहाँ भी जायेंगे ये स्लीपिंग किट अपने कन्धों पर डाल के ले चलेंगे. जहाँ मन किया वहीं सो जायेंगे. किसी पार्क के किसी कोने में, किसी झील के किनारे, पहाड़ों पर. होटल में रुकना ही नहीं है हमें. कितनी भी सर्दी हो हम बाहर ही सो जायेंगे, जानते हो बहुत कम्फी होता है स्लीपिंग बैग, तुम्हें पता है मैं एक बार सो चुकी हूँ एक स्लीपिंग बैग में. 
‘ठण्ड में मर जायेंगे हम बाहर सोने से’. लड़का कहता उससे. 
बेकार की बातें न करो. लड़की चिढ़ जाती. ‘सोचो ये बेचारे बेघर लोग कैसे ठंड में रात गुज़ार देते हैं, हम तो फिर भी इतने कम्फी कम्फी स्लीपिंग बैग में सोये रहेंगे, कुछ भी पता नहीं चलेगा. वो कहती. बोलो चलोगे? बोलो? चलो निकलते हैं घूमने, आज ही शाम निकल जाते हैं. रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड जाकर देखते हैं जो पहली ट्रेन या बस मिली उससे निकल जायेंगे कहीं भी.. बोलो. चलोगे? बोलो जल्दी बोलो. वो जिद करने लगती. 

मजा आएगा. बहुत मज़ा आएगा. ठण्ड में खुले आकाश के नीचे सोना. सोचो तुम ज़रा. हाउ  फैसनेटिंग. गर्मियों में तो लोग सोते ही हैं लेकिन हम ठण्ड में बाहर सोयेंगे, दिसंबर और जनवरी की सर्दियों वाली रात में. हाउ वंडरफुल आईडिया इज दिस. हम दोनों स्लीपिंग बैग में कवर रहेंगे और बस हमारे चेहरे  बाहर ताक रहे होंगे आसमान को. हाउ रोमांटिक न? 

वो लड़के की तरफ देखने लगती. वो ऐसे ही अकसर लड़के को किसी विचित्र मायावी सपनों के देश में लेकर चली जाती, और लड़के को भी उसके साथ ये सब कल्पना करना अच्छा लगता था. वो भी खो जाता लड़की की इस सपनों की दुनिया में. वो दिल से चाहता, कि सच में हमें निकल जाना चाहिए  ऐसे ही घूमने, जैसे लड़की कह रही है. वो भी खो जाता लड़की के साथ साथ उसकी कल्पनाओं में. 

बस स्टैंड के ठीक सामने वाले दुकान में लड़की देखती कि स्लीपिंग किट बिकते हैं, वो जिद करने लगती, चलो न खरीदते हैं. लड़के की जवाब की प्रतीक्षा किये बैगर वो दुकान में घुस जाती. लड़का भी उसके पीछे पीछे दुकान में चला आता. 

दुकान वाले व्यक्ति से वो बोलती, हमें सबसे अच्छा स्लीपिंग किट दिखाईये, जिसमे कितनी भी ठण्ड हो, चाहे हम हिमालय पर चले जाएँ, हमें सर्दी न लगे. दुकान वाला उसके सवालों से कन्फ्यूज हो जाता. वो दिखाता जो उसके स्लीपिंग बैग होते वो. 

‘हम एक ही स्लीपिंग बैग लेते हैं, हमारे पैसे बच जायेंगे, वो कहती’. दुकान वाला लड़की की शरारती बातों से अंजान, कहता मैडम ये बस एक ही व्यक्ति के लिए बना है. ‘ओफ्फ्हो...मैं तो इतनी हलकी फुलकी हूँ, मैं इसमें एडजस्ट  कर जाऊंगी. है न? वो लड़के के तरफ देखती. 
‘बेशर्म हो तुम..’, लड़का कहता.
लड़की मुस्कुराने लगती.
दुकानदार कन्फ्यूजन में कभी लड़के को देखता तो कभी लड़की को और कभी उस स्लीपिंग बैग को जिसे देखकर लड़की ने कहा था कि हम दोनों एक में ही सो जायेंगे. 

शाम में दोनों बस से वापस लौटते थे. बस में खिड़की के पास बैठकर बाहर सड़कों को देखना, चल रहे लोगों को, गाड़ियों को देखना लड़की को पसंद था. वो खिड़की के बाहर देखकर जाने क्या क्या बोलती जाती, कभी खुद से कभी लड़के से. लड़के को ये समझ कभी नहीं आता कि कौन सी बात वो लड़के से बोल रही है और कौन सी बात खुद से. वो सो जाती लड़के के कन्धों पर. स्टॉप आने पर लड़का उसे उठाता. वो जागने से इंकार कर देती, ऐसे ही रहने दो न मुझे, वो लडके से कहती. ये मेरा सबसे बड़ा सुख है तुम्हारे कन्धों पर ऐसे सोना, लड़की कहती.

बस स्टैंड से लड़की के घर तक का रास्ता थोड़ा लम्बा था, लेकिन फिर भी वे रिक्शा नहीं लेते. वो बहुत चौड़ी और अच्छी सड़क थी. दोनों तरफ बड़े बड़े पेड़ लगे थे, पार्क थे सड़क के दोनों तरफ और उन दोनों को उस सड़क पर शाम के अँधेरे में चलना अच्छा लगता था. 

लड़का लड़की के अपार्टमेंट के अन्दर कभी नहीं जाता, वो बाहर  गेट के पास ही खड़ा रहता और तब तक खड़ा रहता जब तक लड़की अपार्टमेंट की सीढ़ियों से ऊपर न चले जाए, तब तक वो देखते रहता लड़की को. लड़की लेकिन गेट से अन्दर घुसने के बाद कभी पलट कर उसे नहीं देखती. वो हर दिन सोचता कि शायद लड़की पलट के देखेगी लेकिन नहीं देखती. वो मुस्कुरा देता, ‘ये नहीं देखने वाली’, खुद से ही कहता और आगे बढ़ जाता.

वापस उस लम्बी सड़क पर चलते हुए लड़के को बहुत अच्छा महसूस होता, उसका मन बहुत हल्का लगने लगता. वो मफलर खोलकर कान में लपेट लेता...और फिर याद आती लड़की की सुबह की फटकार. वो मुस्कुरा देता. वापस कान से मफलर निकाल कर गले में लपेट कर गिरह बाँधने की कोशिश करता, जैसे लड़की बाँधती थी. लेकिन उससे गिरह नहीं बंधती. ‘ये दुनिया का सबसे भारी काम है’, वो बुदबुदाता और गले में मफलर को यूँही लपेट लेता. 

दिल्ली के ये दिन, दिल्ली के सर्दियों के ये दिन उसके ज़िन्दगी के सबसे अच्छे दिनों में से हैं, वो सोचता और अपने घर की तरफ बढ़ जाता. 

गिरहें यादों की...