Saturday, May 25, 2013

दिल्ली डायरीज : १

यह वीकेंड है...तुम्हारे उदास होने का समय.तुम कमरे में अकेले बैठे हो..सोचते हो की वीकेंड दोस्तों के साथ बिताना चाहिए..लेकिन कौन से दोस्त?कौन दोस्त हैं तुम्हारे यहाँ जो एक कॉल पर कहीं भी मिलने आ जाए?तुम बिस्तर पर रखे अपने फोन को उठाते हो.रिसीवड कॉल में पिछले सात दिनों में किन लोगों ने फोन किया तुम ये देखते हो..सिर्फ चार नाम हैं..एक तुम्हारे घर से जिसका नंबर Home के नाम से सेव है , दूसरा तुम्हारे पिताजी का, तीसरा तुम्हारी बहन का और चौथा तुम्हारे एक दोस्त का, जो किसी दुसरे शहर में रहता है और जिससे तुमने चार पांच दिन पहले बात की थी..तुम कल रात के बारे में सोचते हो.लैपटॉप पर एक उदास सी फिल्म चल रही थी और तुम इंतजार कर रहे थे..तुम इंतजार कर रहे थे की कोई तो तुम्हे फोन या मेसेज करे और तुम्हे वीकेंड पर कहीं साथ वक़्त बिताने बुलाये...तुम अपना फोन बार बार चेक करते हो..लेकिन कहीं कोई मेसेज कोई कॉल नहीं है.तुम्हे कमरे में एकाएक घुटन सी महसूस होने लगती है.तुम निकल जाते हो, मई की इस जलती दोपहरी में...कहीं भी जा सकते हो तुम..लेकिन इस वक़्त घर में नहीं रहना चाहते..मोबाइल के एफएम पर एक गाने की धुन बजती है.तुम्हे कुछ याद आता है.आज से इग्यारह साल पहले मई का ही एक दिन था वो..जब तुम पहली बार दिल्ली आये थे और वो तुम्हे दिल्ली घुमा रही थी...वो बस में तुम्हारे बगल में बैठी तुम्हारी उँगलियों से खेल रही थी, और बस में यह गाना लगातार बज रहा था..तुम्हे याद आता है उसका चेहरा, जब कनौट प्लेस में उस शाम आसमान की तरफ देखकर उसने कहा था "I want to fly like a bird".तुम दो घंटे उसके साथ कनौट प्लेस के गलियारों में घूमते रहे थे...तुम सोचते हो की शाम में घर जाते ही तुम अपनी डायरी खोल के बैठ जाओगे और मई के वे तीन दिन तुम अपनी डायरी में लिखोगे, जितना भी तुम्हे याद है..वो सब तुम लिख डालोगे, ताकि वो सारे पल तुम कहीं सहेज कर रख सको..



वो मई का एक दिन था..आज से ठीक इग्यारह साल पहले..
पिछले साल जो हुआ था उससे पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था की एक और हार सामने खड़ी थी.दिल्ली जाने का टिकट हाथ में था, लेकिन दिल्ली जाने का इरादा खत्म हो चूका था.जिस काम से दिल्ली जाना था, उस काम के होने की उम्मीद अब बची ही नहीं थी.उसी दिन उसका कॉल आया था, शहर में मेरी सबसे अच्छी दोस्त का कॉल.वो उन दिनों दिल्ली में थी और उसने एक घंटे तक मुझे समझाया था..दिल्ली का प्लान कैंसल न करने की विनती की थी.घर वालों ने भी दिल्ली का प्लान कैंसल न करने को कहा था."जाओ, जाकर घूम ही आओ", यही कहा था माँ ने उस शाम. रात भर मैं इस विषय पर सोचते रहा था और सुबह तक मैंने फैसला कर लिया था की मैं दिल्ली जाऊँगा.घर में अपना फैसला बताने के बाद सबसे पहले मैंने उसे कॉल किया था.फोन पर वो ख़ुशी से चिल्ला उठी थी.

अगले दिन ट्रेन थी, और मैं अपने दोस्त के साथ दिल्ली के निकल पड़ा था.रात भर ट्रेन में नींद नहीं आई.ट्रेन की खिड़की से सर टिकाकर मैं सोचने लगा -मैं दो दिन उसके साथ दिल्ली घूमूँगा..और तीसरे दिन वो मेरे साथ ही वापस मेरे शहर आएगी.सिर्फ ये ख्याल काफी था मुझे रात भर जगाये रखने के लिए.उसकी वपसी उसी दिन थी जिस दिन मैं वापस लौटने वाला था.वो अपनी दो दीदी और बड़ी दीदी की तीन साल की बेटी के साथ आने वाली थी.कितने जतन करने पड़े थे, कितने झूठ-सच बहाने बनाने पड़े थे एक साथ टिकट लेने के लिए..ये सिर्फ हमें ही पता था.सुबह ट्रेन ठीक अपने समय पर दिल्ली स्टेशन पहुँच चुकी थी.हमने जल्दी जल्दी स्टेशन के सामने एक होटल किराये पर लिया और मैं नीचे पब्लिक बूथ से उसे फोन करने चला गया.

"थैंक गौड!!एट लास्ट तुमने फोन किया..पता है मैं एक घंटे से फोन को घुर रही थी"...मेरे फोन करते ही उसने कहा था.मैंने अपना प्लान बताया की मुझे कहाँ कहाँ जाना है.मुझे कश्मीरी गेट के पास एक यूनिवर्सिटी में काम था, वहां तक कैसे जाना होगा ये समझाने के बाद उसने कहा की वो बारह बजे तक यूनिवर्सिटी ही डाईरेक्ट पहुँच जायेगी..मुझे उसने यूनिवर्सिटी के गेट के पास इंतजार करने को कहा था.मैं जल्दी जल्दी होटल में वापस गया, तैयार हुआ और कश्मीरी गेट के लिए निकल गया.मेरा दोस्त जो मेरे साथ आया था, उसे दुसरे काम थे तो वो होटल में ही रुक गया.

३० मई का वो दिन काफी गर्म दिन था.मैं समय से आधे घंटे पहले ही यूनिवर्सिटी के गेट के पास पहुँच गया था.वहीँ एक कोने में लगी एक बेंच पर बैठ गया और उसका इंतजार करने लगा.बारह बजते ही मेरा इक्साइट्मन्ट का लेवल भी अपने चरम पर पहुँच गया था.मेरी नज़रें यूनिवर्सिटी के गेट पर जाकर टिक गयीं.सवा बारह...साढ़े बारह...पौने एक बज गए थे...लेकिन उसका कोई पता नहीं था.मेरे मन में तरह तरह के ख्याल आने लगे..क्या आज वो नहीं आ पाएगी?एक बजने वाले हैं अब...अभी तक उसका कोई पता नहीं.अपनी इस फ्रस्ट्रेशन को छिपाने के लिए मैं एक मैगजीन लेकर बैठ गया, जिसे सुबह रेलवे स्टेशन पर मैंने खरीदा था.कुछ दो तीन ही मिनट हुए होंगे की मुझे एहसास हुआ कोई मेरे ठीक सामने खड़ा है और मुझे घूर रहा है.मैंने नज़रें उठाई तो सामने वो खड़ी थी.एक पल के लिए तो मैं उसे बिलकुल भी पहचान नहीं पाया था.बिलकुल ही अलग अवतार में थी वो..शायद दिल्ली का असर था उसपर..पीले रंग का एक कुरता, जींस, बड़े से गागल्ज़ और एक हैट..उसे हैट पहने हुए मैं पहली बार देख रहा था, और अगर वो अपने गागल्ज़ उतारकर मुझे नहीं देखती तो संभव था की मैं कुछ देर तक उसे एक अजनबी ही समझते रहता.

"अरे..सॉरी..सॉरी...यु हैव नो आईडिया आज क्या क्या हुआ...अचानक से बुआ आ गयीं थी और उन्होंने मुझे रोक लिया था..जैसे तैसे निकली हूँ...ट्रैफिक भी बहुत ज्यादा था..मैं तो बस समझो की भागते भागते आई हूँ..".बिना मांगे दिए गए उसके इस एक्सप्लेनेसन पर मैं मुस्कुरा उठा."अरे होता है..होता है, कोई बात नहीं.." मैंने उसका गिल्ट कम करने की कोशिश की.हम कुछ देर वहीँ बैठे रहे, उसी यूनिवर्सिटी की बेंच पर, एक बड़े से पेड़ के नीचे.हम दोनों को समझ में नहीं आ रहा था की क्या बात किया जाए..दोनों में से कोई भी ये नहीं चाहते थे की जिस काम से यूनिवर्सिटी आना हुआ है, उसकी चर्चा करें.उसे ये डर था की मैं पिछली बातों को याद कर के उदास हो जाऊँगा और मुझे डर इस बात का था की पिछली बातों को याद करके कहीं उसका गिल्ट और बढ़ न जाए.पिछले साल मेरे ख़राब रिजल्ट के लिए वो खुद को कसूरवार समझ बैठी थी.हम अक्सर ऐसी हालत में जब पता नहीं होता की क्या बात करें, तब एक दुसरे का मजाक उड़ाने लगते हैं..और ये ट्रिक हमेशा काम कर जाता है.."तुम तो आज मॉडल जैसी दिख रही हो".."और तुम बिलकुल राजेन्द्र कुमार के ज़माने के हीरो जैसे"..."कितनी गर्मी है तुम्हारे इस शहर में"..."तुम्हारा शहर तो जैसे हमेशा बर्फ से ढंका रहता है"..इन्ही मजाकों ने हमें उस दिन भी उस अन्कम्फर्टबल सिच्युएसन से बाहर निकाला था.

कुछ देर बाद मैंने उसे गेट के पास के एक दूकान से आईसक्रीम लाकर दी और खुद यूनिवर्सिटी की ऑफिस की तरफ बढ़ा.वो वहीँ उसी बेंच पर बैठी रही, वो मेरी लायी हुई मैगज़ीन को उलट पुलट कर देख रही थी.मैं कतार में खड़ा था.वो बार बार मेरी तरफ देखे जा रही थी.जब भी मेरी नज़रें उससे मिलती तब वो फ़ौरन अपनी नज़रें वापस मैगज़ीन की तरफ मोड़ ले रही थी..कुछ देर बाद उसने मैगज़ीन बैग में रख दिया और सिर्फ मुझे देखने लगी...वो शायद कुछ सोच रही थी..उसके चेहरे पर उसका वो रेगूलर एक्स्प्रेसन दिखाई नहीं दे रहा था..उसके उस चेहरे पर कई सारे सवाल टंगे हुए थे जिसे शायद मैंने पढ़ लिया था..और इस बार मैंने अपनी नज़रें दूसरी तरफ मोड़ ली..मैंने तब तक दोबारा उसके तरफ मुड़ के नहीं देखा जब तक मेरा काम नहीं हो गया और मैं कतार से बाहर नहीं आ गया.मैं जब वापस उसके पास आया तो उसने मुझसे सिर्फ इतना ही कहा "मुझे बड़ी प्यास सी लगी है..चलो सामने एक कैंटीन है, मैं कोल्डड्रिंक पियूंगी".कैंटीन की तरफ जाते हुए मैंने पूछा उससे "तुम जानना नहीं चाहती मेरा काम हुआ या नहीं".उसने कुछ भी नहीं कहा...कुछ देर हमारे बीच चुप्पी रही और फिर मैंने ही कहा "देखो शायद हो ही जाए मेरा काम..थोड़ी उम्मीद नज़र तो आई है". मेरे इस जवाब से उसका चेहरा खिल गया था.."सच में??????? वाऊ..ग्रेट...अब तो मैं कोल्डड्रिक के साथ पेस्ट्री भी खाऊँगी..जाओ लेकर आओ मेरे लिए".उसने चहकते हुए मुझसे कहा.

"देखो अभी हमारे पास बहुत समय है..मैं घर पे दीदी को कह के आई हूँ की मैं शाम सात बजे तक घर आउंगी..चलो पहले लाल किला चलते हैं, फिर कनौट प्लेस".कोल्डड्रिंक पीते हुए वो प्लान बना रही थी.वो एक अच्छा खासा गरम दिन था और ऐसे में मुझे घुमने की कोई ख़ास ईच्छा नहीं थी...मैंने कहना चाहा की हम यहीं शाम तक बैठ कर बातें कर सकते हैं..तुम जितने चाहो कोल्डड्रिंक पी लो, मैं रोकूंगा नहीं.लेकिन उसका तर्क था "तुम लाल-किला के इतने नज़दीक आकर वहां नहीं गए तो उसे बहुत बुरा लगेगा...बेईज़्ज़्ती हो जायेगी उसकी".उसका ये कहना था की हम दोनों वहां से लाल किला के लिए निकल गए, उसी तपती दोपहर में..उसने अपना हैट जबरदस्ती मुझे पहना दिया था और खुद अपने सर को उसने अपनी ओढ़नी से उसने ढक लिया था, उसी ओढ़नी से जो कुछ देर पहले उसके बैग के हैंडल में बंधा लटक रहा था...जो मुझे बड़ा अटपटा सा लगा था और जिसे देख मैं इस नतीजे पर पहुंचा था की शायद ये ओढ़नी इसने बैग के श्रृंगार के लिए खरीदा होगा.हम लाल किला पहुँच गए थे...वो मुझे एक गाईड की तरह लाल किले के बारे में बता रही थी, पता नहीं लालकिला के सम्बन्ध में उसकी जानकारी कितनी सच थी और कितनी मनगढ़त..उसकी खुद की कल्पनाएँ...मैंने उसकी बातों को सुनते हुए अनसुना कर दिया और वहां पत्थरों पर जगह जगह लिखे गए डिसक्रिप्सन को पढने लगा.गर्मी के बावजूद वो जगह मुझे अच्छी लग रही थी, किले के अन्दर हवा अच्छी आ रही थी और मेरा दिल तो कह रहा था की बस अब शाम तक यहीं बैठे रह जाएँ...लेकिन उसे कनौट प्लेस जाने की पता नहीं क्यों इतनी उत्सुकता थी.

कनौट प्लेस..एक ऐसा नाम जो न जाने मैं कब से सुनते आ रहा हूँ.उसके मुहं से तो खैर हजारों बार सुन चूका था..मैं भी देखना चाहता था की आखिर वहां क्या ऐसी बात है जो वो उसे दिल्ली की शान कहती है.हमने बस से जाने के बजाये ऑटो से कनौट प्लेस जाना बेहतर समझा.ऑटो पर वो मेरे साथ बैठी मुझे पुरे दिल्ली की जानकारी देते जा रही थी..."ये देखो..इसे दरियागंज मोहल्ला कहते हैं..याद है तुम्हे टी.वी पर आता था...गुमशुदा तलाश केंद्र..दरियागंज...यहाँ किताबों के दूकान होते हैं..देखो वो जो सामने कैफे है न, हम जब भी छुट्टियों में पुरानी दिल्ली आते हैं तो वहां कोल्ड-कॉफ़ी जरूर पीते हैं..ये देखो दिल्ली गेट...ये प्रगति मैदान...यहाँ प्रदर्शनियां लगती हैं..तरह तरह की...और वो देखो उधर..पता है क्या है? किसी का घर है..किसका मालुम है? यह अप्पू का घर है..अप्पू घर..समझे"..इतना कहकर वो जोरों से हँसने लगी..उसकी बात में जो शरारत छिपी थी, उसे मैं समझ गया था और मैं थोड़ा झेंप सा गया. "ये देखो मेरा फेवरिट रोड...बाराखम्बा रोड..लगता है न डिट्टो फोरेन जैसा...दिल्ली है हुजुर ये...हमारी बूटीफुल दिल्ली...इस रोड पर बड़े बड़े कम्पनियों के ऑफिस हैं..सारे बड़े लोग यहीं काम करते हैं...मेरे छोटे वाले अंकल भी पहले यहीं काम करते थे अब अमेरिका चले गए..और वो देखो सामने कनौट प्लेस आ गया..एकदम गोल गोल चक्कर जैसा है ये...पता है ये कितने ज़माने से मेरी दिल्ली की शान है..." वो मुझे ये सब डिटेल में बता रही थी और मैं किसी गंवार बेवकूफ की तरह अपनी बड़ी बड़ी आँखें फाड़ मुहं खोले उसे देख रहा था..उसकी बातों को सुन रहा था...कभी कभी ऑटो से बाहर झाँक कर बड़ी बड़ी बिल्डिंगे देखने लगता तो कभी सड़कें...मैं जब भी उसकी बातों को नज़रंदाज़ कर के इधर उधर देखता था तो वो नाराज़ हो जाती.."मिस्टर..ये बिल्डिंग तुम बाद में भी देख सकते हो....वो सुनो जो मैं कह रही हूँ तुमसे...ये ज्ञान की बात फिर कौन तुमसे कहेगा?" मैं फिर से उसकी बातें सुनने लगता.

ऑटो वाले ने हमें सीधा पालिका बाजार के सामने वाली सड़क के पास छोड़ा था.ऑटो वाले को मैं पैसे देने ही वाला था की उसने मेरा हाथ पकड़ के पीछे खींच लिया.."नो वे मिस्टर..आप मेरे शहर में आये हैं..यहाँ आप पैसे नहीं दे सकते..वरना ये शहर मुझे ये कहकर ताने मारेगा की अपने दोस्त से खर्च करवा दिया तुमने...आपको बस अपने शहर में मेरे लिए पैसे देने की इज़ाज़त है".मैंने भी उसके इस बात का कोई विरोध नहीं किया..और उलटे उससे कहा "अच्छा ये बात है...तो देखो, सामने आइसक्रीम की एक ट्रौली है...चलो मुझे खिलाओ आईसक्रीम".
"वाऊ  ये हुई न बात...कम औन!! अभी आईसक्रीम खिलाती हूँ." वो लगभग उछलते कूदते हुए उस आइसक्रीम वाले के पास पहुँच गई थी..और मैं उसके पीछे पीछे..




जारी...

Friday, April 26, 2013

परफ्यूम की खुशबु


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तुम्हे परफ्यूम का बेहद शौक था न...तुम हमेशा अलग ही किस्म का एक परफ्यूम लगाती थी.तुम मुझे अक्सर उसका नाम बताया करती थी और मैं हमेशा उस परफ्यूम का नाम भूल जाया करता..देखो न अभी भी मुझे उस परफ्यूम का नाम याद नहीं आ रहा है...हाँ एक परफ्यूम का नाम याद आ रहा है जो की बेहद कीमती था और तुम्हारे किसी चाचा ने उसे विदेश से तुम्हे भेजा था जिसे बाद में तुमने मुझे गिफ्ट कर दिया था.शनेल नाम था न उस परफ्यूम का? शायद..
तुम्हे तो मालुम है, मुझे परफ्यूम बहुत ज्यादा पसंद नहीं..मैं तो बस जब कभी किसी शादी या पारिवारिक पार्टी में जा रहा होता तो थोडा बहुत परफ्यूम लगा लेता था..वो भी सिर्फ माँ के कहने पर..मैं अगर मना करता भी तो भी माँ डांट डपटकर परफ्यूम की एक दो बूंद शर्ट पर डाल ही दिया करती थी.मुझे परफ्यूम की स्ट्रोंग खुशबु से खासकर के इरिटेसन होती थी..अब भी होती है.लेकिन तुम...तुम परफ्यूम बिलकुल संतुलित मात्रा में लगाया करती थी..ना बहुत कम और ना ही बहुत स्ट्रोंग...बस इतना सा की जब भी तुम आसपास रहो तो परफ्यूम की खुशबु तुम्हारे होने का अहसास दिलाती रहे और तुम्हारे चले जाने के बाद भी बहुत देर तक उसकी खुशबु ज़हन में बसी रहे.तुम्हे तो परफ्यूम से इतना प्यार था की शायद ही कभी ऐसा हुआ हो की तुम मुझसे मिलने बिना परफ्यूम लगाये आई हो..मैं कभी कभी तुम्हे मजाक में इस गाने से छेड़ भी दिया करता था "तू धरती पे चाहे जहाँ भी रहेगी, तुझे तेरी खुशबु से पहचान लूँगा". तुम भी हँस कर कहा करती थी..."हाँ, नहीं तो..."

तुम्हे शायद पता नहीं होगा..मैंने कभी तुम्हे बताया ही नहीं..लेकिन तुम्हारी परफ्यूम की खुशबु का पहली बार मुझे अहसास तब हुआ था जब हम दोनों उस दिन कॉलेज में बस का फ़ीस जमा करने फीस काउंटर के पास खड़े थे..याद आया वो दिन तुम्हे? वो शनिवार का दिन था और मुझे बस की फीस जमा करनी थी..मैं कॉलेज थोडा जल्दी पहुँच गया था और सीधा कॉलेज के ऑफिस में दाखिल हुआ..वहां कोई भी स्टाफ मौजूद नहीं था..यूँ भी शनिवार को बस दो सेक्सन के क्लास कंबाईंड चलते थे...एक तुम्हारे और एक मेरे सेक्सन के..बाकी सभी की छुट्टियाँ होती थी.तो ऑफिस के स्टाफ भी आराम से आया करते थे.ऑफिस के एक कोने में फीस जमा करने का काउंटर था..काउंटर नंबर 9.मैं जैसे ही 9 नंबर काउंटर की तरफ बढ़ा तो मेरे पांव ठिठक गए..तुम उस काउंटर के पास खड़ी थी और वहां के स्टाफ के आने का इंतजार कर रही थी..मुझे तो एक पल विश्वास ही नहीं हुआ की तुम वहां खड़ी हो..कब से मैं तुमसे बात करना चाहता था, लेकिन हमारे बीच तो बस औपचारिक ही बातें हो पाती थी.."कौन सा पिरीअड होने वाला है", "क्या पढाया गया इस पिरीअड में"...बस इससे ज्यादा कुछ नहीं और ये बातें भी कभी कभी ही हो पाती थी...जब मैं तुम्हारे पीछे वाली बेंच पर बैठता था.इससे ज्यादा बातों का सिलसिला कभी आगे बढ़ा ही नहीं.सच कहूँ तो मेरी हिम्मत ही नहीं होती थी की तुमसे बातें शुरू कर सकूँ.मैंने जब तुम्हे काउंटर नंबर 9 पर देखा तो सोच लिया था की आज तुमसे बात करने का ये अच्छा मौका है.

मैं काउंटर के पास पहुंचा और तुम्हे देखकर थोड़ा मुस्कुराया..लेकिन तुमने मेरी मुस्कराहट का कोई जवाब नहीं दिया, और बिलकुल स्ट्रेट फेस बना कर तुम खिड़की के बाहर देखने लगी थी.मैं थोड़ा निराश हो गया.मैंने भी अपनी नज़रें मोड़ ली.तुम खिड़की के बाहर पेड़ों पर बैठे पंछियों को देख रही थी..मैं भी कभी उस तरफ देखता जिधर तुम देख रही थी तो कभी चुपके से तुम्हे देख लेता था.तुमने उस दिन वही अपना रेगुलर ब्रांड वाला परफ्यूम लगा रखा था..जिसकी भीनी भीनी सी खुशबु मुझे बड़ी अच्छी लग रही थी..हम थोड़े देर तक वहां अकेले ही खड़े रहे..लेकिन तुमने एक बार भी पलट के मेरी तरफ नहीं देखा था.मैं सोच ही रहा था की तुमसे कुछ बातें शुरू करूँ, की इतने में दनदनाता हुआ काउंटर का स्टाफ ऑफिस में आ धमका..उसने आते ही ऐसी जल्दबाजी दिखाई की हम दोनों जल्दी जल्दी अपने फॉर्म और पैसे निकालने लगे.तुम मेरे से आगे खड़ी थी और मैं तुम्हे देख-देख अपने पॉकेट से अपना वालेट निकाल रहा था, जबकि तुम बड़ी स्थिरता से अपने पर्स में पैसे टटोल रही थी..मेरी नज़र लगातार तुमपर ही थी की वालेट निकालते समय मेरे पॉकेट से कुछ खुल्ले पैसे नीचे फर्श पर गिर गए.मेरी बेवकूफी तो देखो...मुझे लगा था की वो पैसे तुम्हारे गिरे हैं और मैंने तुमसे कहा था  "देखो तुम्हारे पैसे नीचे गिरे हैं, उठा लो".तुमने इस कदर गुस्से में मुझे देखा था की अभी भी तुम्हारा वो चेहरा याद करने से सहम जाता हूँ...और ऐसा टफ लुक दिया जिससे साफ़ झलक रहा था जैसे तुम कह रही हो."इडियट...लाईन मारने का यही तरीका सुझा है तुम्हे"..तुम तो गुस्से में और उस टफ लुक में तुरत ऑफिस से बहार चली गयी...ये भी नहीं कहा तुमने की नीचे गिरे हुए पैसे मेरे नहीं हैं...और मैं वहां खड़ा खड़ा इस कदर एम्बैरस फील करने लगा की क्या बताऊँ.जैसे तैसे काउंटर पर रसीद कटवाई और क्लास जाने के बजाये मैं सीधा कॉलेज की छत पर भागते हुए चला गया.

मुझे उस वक़्त खुद पे बेहद गुस्सा आ रहा था और अपने उस स्टुपिड सी हरकत पर थोड़ी शर्म भी आ रही थी.उस दिन तीन पिरीअड थे और मैंने सोच लिया था की मैं एक भी क्लास अटेंड नहीं करूँगा.उस दिन तुम्हारे और मेरे सेक्सन की कम्बाइंड क्लास चलती थी और मैं नहीं चाहता था की तुम मेरे सामने आओ.मैंने सोच लिया था की कॉलेज की आखिरी बस जो की क्लास खत्म होने के आधे घंटे बाद जाती है, मैं उससे जाऊँगा..उस समय तक तुम पहली बस से घर जा चुकी होगी और फिर मैं एक दो दिन कॉलेज ही नहीं आऊंगा ताकि तुम्हारे सामने आने में मैं एम्बैर्स फील न करूँ.मैं वहीँ छत पर बैग से एक कहानी की किताब निकाल कर पढने लगा.

छुट्टी होने के करीब आधे घंटे बाद मैं नीचे कम्पाण्ड में आया.उस वक़्त तक लगभग सभी लड़के-लड़कियां जा चुके थे.मैं चुपचाप जाकर बस में बैठ गया और अपनी उस कहानी की किताब को पढने लगा.मैं जैसे ही बैठा की पता नहीं कहाँ से तुम दौड़ती हुई बस में दाखिल हो गयी.तुम्हे यूँ बस में चढ़ते देख मैं तो बिलकुल ही घबरा गया था...लेकिन तुम सीधा बस में आई और मेरी ही पास वाली सीट पर आकर बैठ गयी.मेरा तो दिल  सौ किलोमीटर की रफ़्तार से धड़कना शुरू कर दिया था.दिमाग ने काम करना बंद कर दिया....पूरी की पूरी बस खाली है और ये यहाँ मेरे पास आकर बैठी है...इसने पहली बस क्यों छोड़ दी...ऐसे कई सवाल मेरे मन में उमड़ने लगे थे..मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी उस वक़्त की तुम्हे देखूं..मैंने चुपचाप अपनी नज़रें उसी किताब पर गड़ा दी जिसे मैं पढ़ रहा था.तुम इतने पास आकर बैठ गयी थी, किताब का एक भी अक्षर क्या ख़ाक समझ में आता...लगातार सुबह वाली ही बात याद आ रही थी मुझे..जिससे मेरी शर्मिंदगी और बढती जा रही थी...मेरा पूरा ध्यान तुम्हरी तरफ लगा था..तुम उस समय बस की खिड़की के बाहर देख रही थी और मैं किताब पर नज़रें गड़ाए पन्ने पलटता रहा.

"कौन सी किताब है" अचानक तुमने पूछा था..
मैं तो कुछ सेकण्ड के लिए सच में हडबडा सा गया था और फिर झिझकते हुए मैंने बड़ी मुस्किल से कहा "शिवानी की कहानियों की किताब है".
"उम्म्म......शिवानी.......शिवानी कौन?" तुमने फिर से सवाल किया था..
"पता नहीं....कोई राईटर हैं...." मैंने फिर से झिझकते हुए तुम्हे जवाब दिया..
तुम्हारी नज़र कुछ देर तक उसी किताब पर जमी रही और फिर तुमने बड़े धीरे से और थोड़ा हिचकिचाते हुए मुझसे कहा था "अच्छा सुनो, सुबह मेरा मूड ठीक नहीं था, एक दोस्त से लड़ाई कर के ऑफिस आई थी...शायद थोडा रुड पेश आई मैं तुमसे..सॉरी".
मैंने तुम्हारी तरफ देखा...सुबह जो तुम्हारे चेहरे पर गुस्से की लकीरें थीं वो गायब थीं और एक बेहद प्यारी मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर सिमट आई थी..
"इट्स ऑलराईट.." मैंने तुमसे कहा था और तुम बिलकुल खिल सी गयी थी.
"वाऊ..गुड! मुझे बड़ा अफ़सोस आ रहा था की तुम्हारे साथ मैं इतना रयुडली पेश आई थी.." तुमने ये कहा और मुझे अपने चोकलेट का एक टुकड़ा तोड़ के दे दिया था.मेरी तो ख़ुशी की कोई सीमा ही नहीं थी...मैं तो ये सोच सोच के निहाल हुआ जा रहा था की तुम भी पूरा दिन मेरे बारे में सोचती रही हो और खुद आकर तुमने मुझसे माफ़ी मांगी..मैं तो सातवें आसमान पर पहुँच गया था.

जब तक तुम मेरे पास वाली सीट पर बैठी रही तब तक बस कहने को मेरे हाथ में किताब थी..मेरा ध्यान तो सिर्फ तुमपर लगा हुआ था..तुम खिड़की से बाहर देख रही थी और मैं चोरी चोरी तुम्हे देखना चाह रहा था..लेकिन तुम्हारे चेहरे तक आ आकर मेरी नज़रें खुदबखुद फिर से नीचे किताबों की तरफ मुड़ जा रही थी..कुछ देर बाद तुम मेरे से ठीक आगे वाली सीट पर अपनी सहेली के पास जाकर बैठ गयी.मैंने भी कुछ देर बाद उस किताब को बंद कर दिया और बस की खिड़की पर सर टिकाकर तुम्हे देखने लगा था..तुम्हारी परफ्यूम की खुशबु लगातार आ रही थी और हवा से तुम्हारी जुल्फें कभी कभी उड़ के मेरी तरफ आ जाया कर रही थीं जिसे तुम बिना पीछे मुड़े वापस ठीक कर ले रही थी...मुझे तुम्हे यूँ देखते रहना अच्छा लग रहा था...और तुम्हारी उस परफ्यूम की खुशबु से तो दिल दिमाग पर एक ताजगी सी आ जा रही थी...मैं मन ही मन एक गाने के बोल गुनगुनाने लगा..
"धीमी धीमी भीनी भीनी
खुशबू है तेरा बदन
सुलगे महके पिघले दहके
क्यूँ न बहके मेरा मन"

Saturday, February 9, 2013

मंदिर का सफ़र : २

मंदिर का सफ़र १ से आगे  

बस स्टैंड से मंदिर की दुरी लगभग दो-तीन किलोमीटर की थी.मंदिर तक जाने का रास्ता एक छोटे गाँव से होकर जाता था.कच्ची सड़क थी और सड़क के दोनों तरफ हरे भरे खेत थे.वो बार बार दौड़ के खेतों में चली जाती थी और किसी पेड़ की टहनी से झूलने लगती थी या फिर खेतों में पड़े पुराने साईकिल के टायर को दौड़ाने लगती...मुझे हर बार उसे डांट कर खींच कर वापस सड़क पर लाना पड़ता था...वो बहुत खुश दिखाई दे रही थी, और उसे खुश देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा था.पिछले कई दिनों से वो थोड़ी गुमसुम सी थी, लेकिन आज उसमे जैसे एक नयी उर्जा आ गयी थी...हम चलते चलते मंदिर के पास पहुँच गए थे...मंदिर के आसपास छोटे मोटे कई ढाबे थे.ढाबों को देखते ही मुझे भूख लग गयी.हमने वैसे भी सुबह से कुछ भी नहीं खाया था.मेरी ईच्छा हुई की नास्ता-पानी कर के आगे बढ़ा जाए..लेकिन वो मेरी इस बात पर नाराज़ हो गयी..."पूजा से पहले हम कुछ भी नहीं खा सकते" उसने डांटते हुए मुझे कहा.मुझे अब तक लग रहा था की वो सिर्फ यहाँ मंदिर घुमने के इरादे से आई है...लेकिन मैं गलत था...उसे बाकायदा पूजा करनी था...ठीक वैसे ही जैसे बाकी औरतें वहां पूजा कर रही थीं.पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और प्रसाद उसने मंदिर के सामने एक दुकान से खरीदी और बाकी औरतों के साथ कतार में खड़ी हो गयी.मैंने बाहर से ही मंदिर के दर्शन कर लिया था और अन्दर पंक्ति में खड़ा होने की मेरी कोई ईच्छा नहीं थी, लेकिन उसने ऐसी तीखी नज़रों से मुझे देखा की मैं भी चुपचाप कतार में जाकर खड़ा हो गया.

मंदिर में उसे पूजा करते लगभग दिन के बारह बज चुके थे.मुझे वैसे ही बहुत ज़ोरों से भूख लगी हुई थी, पूजा करते करते शायद उसे भी अच्छी खासी भूख लग गयी थी...हम मंदिर के पास ही एक ढाबे में गए और वो पूरी और जलेबियों पर एकदम टूट सी पड़ी...ढाबे से निकलने के बाद हम आसपास का इलाका घुमने लगे.इस मंदिर में हम दोनों पहले भी आ चुके थे और घूम भी चुके थे, लेकिन हम एक साथ मंदिर पहली बार आये थे और उसके साथ घुमने पर मुझे वही जगह बिलकुल नयी सी मालुम पड़ रही थी.

मंदिर के ठीक सामने एक बड़ा सा धर्मशाला था जिसका की काफी बड़ा सा कैम्पस था.उस कैम्पस में छोटी छोटी झोपड़ियाँ बनी हुई थीं और उन झोपड़ियों में दुकानें लगी हुई थीं...कैम्पस के ही अन्दर ही पूजा की सामग्री, प्रसाद और बच्चों के खिलौने के कई सारे दूकान एक पंक्ति में लगे हुए थे.कैम्पस को एक बार देखने से कोई मेला जैसा दृश्य मालुम होता था.उसने उन दुकानों से कई चीज़ें खरीदी...वे चीज़ें जिन्हें हम बचपन में दशहरा के मेले में खरीदते थे...प्लास्टिक के गागल्ज़,घड़ी....प्लास्टिक की गुड़िया और बासुंरी.खिलौने के दूकान के अलावा वहां कई छोटे छोटे मिठाई के दूकान भी बने हुए थे जहाँ से उसने कुछ मिठाइयाँ भी खरीद ली.मैंने उससे कहा "इनसे अच्छी मिठाइयाँ तो तुम्हे अपने मोहल्ले में मिल जायेगी", लेकिन उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया और बिना कुछ जवाब दिए मिठाई खरीदने लगी.

आसपास के खेतों में टहलते घूमते हम काफी थक चुके थे, और वहीँ एक पेड़ के पास बने सीमेंट की बेंच पर बैठ गए.उसकी इक्स्क्लूसिव शरारतें जारी थीं, की तभी मजाक में ही उसे पता नहीं कौन सी पुरानी बात याद हो आई.वो एकाएक मुझे अपने गाँव के बारे में बताने लगी.बड़ी धुंधली सी याद थी उसे अपने गाँव की और बचपन के बाद वो अपने गाँव वापस नहीं जा पायी थी.एक अरसे से उसकी ईच्छा थी की किसी गाँव को वो करीब से देखे, शायद इसलिए वो मेरे साथ मेरे गाँव जाना चाहती थी, वहां कुछ दिन रहना चाहती थी...ताकि वो गाँव में कुछ समय बिता सके.वो अक्सर अपने गाँव की बातें करती थी और वहां बिताये अपने बचपन के दिनों की...गाँव की बातें करते वक़्त अक्सर उसकी आँख भर आती थीं.ऐसे मौकों पर जब वो एकाएक बिना किसी वार्निंग के मजाक के मोड़ से बाहर निकल कर बिलकुल संजीदा सी हो जाती, तो मैं कभी समझ नहीं पाता की मुझे उस वक़्त क्या करना या कहना चाहिए और मैं बिलकुल खामोश होकर सिर्फ उसकी बातें सुनता रहता.उस दिन भी वैसा ही हुआ...कुछ देर हम वहीँ बैठे रहे, बिना एक दुसरे को देखे और बिना एक दुसरे से एक भी शब्द बोले...उसकी नज़रें बहुत देर से दूर खड़ी एक बैलगाड़ी पर टिकी हुई थी.शायद उस बैलगाड़ी को देखने के बाद उसे कुछ याद आया हो.मुझे उसने एक बार बताया था की जब वो बचपन में गाँव जाती थी, तो उसके दादा उसे बैलगाड़ी में बिठा कर खेतों में घुमाते थे.मैंने उस वक़्त उससे कुछ भी नहीं पूछा, थोड़ी देर बाद उसने खुद कहा, हमें शायद देर हो रही है...अब चलना चाहिए.

मैंने उससे कहा की हम वापस ट्रेन से चल सकते हैं..हमारा काफी वक़्त बच जाएगा..लेकिन उसने बस से ही जाने की जिद की...उसकी उस जिद में जिद वाली कोई बात नहीं थी, बल्कि एक विनम्र आग्रह जैसा कुछ था...वैसे तो बस से वापस लौटना मैं भी चाहता था लेकिन मुझे समय की फ़िक्र भी सता रही थी.मुख्य सड़क तक हम रिक्शे से आये थे.मंदिर से सड़क तक रिक्शे पर वो खामोश बैठी हुई थी.ऐसा नहीं की वो कुछ भी नहीं कह रही थी, वो बातें करती आ रही थी, लेकिन बेहद संतुलित और संजीदा बातें.. उसका ये रूप आसानी से नज़र नहीं आता, लेकिन जब कभी वो बेहद इमोशनल हो जाती है या कुछ ऐसा हो जाता है जो उसके दिल को अन्दर तक छू जाए, तब ऐसे मौके पर वो बेहद संजीदा हो जाती है.वो रुक रुक कर बातें करने लगती है.मुझे उसका ये रूप पसंद आता है....जब वो अपने इस मोड में आती है, तो कमाल की बातें करती है...अपने दिल की हर छोटी से छोटी बात बहुत खूबसूरती के साथ बिना किसी डर शर्म या हिचक से बताती है.

हमें बस स्टैंड पहुँचते ही बस मिल गयी.बस खाली ही थी इसलिए हमें सीट मिलने में भी ज्यादा तकलीफ नहीं हुई.हम बस में चढ़ गए...इस बार उसने विंडो सीट कब्ज़ा करने की कोशिश नहीं की...बल्कि मैंने खुद ही उसे विंडो सीट पर बैठने को कहा.वो मुझे देखकर मुस्कुरा दी.बाहर अच्छी खासी धुप निकल आई थी.वो लगातार बस की खिड़की से बाहर आसमान की तरफ देख लगी....

"तुम्हे कौनट्रेल्स पता है?" उसने पूछा.

कौनट्रेल्स?? नहीं तो क्या होता है....मुझे सच में कौनट्रेल्स नहीं पता था..

"तुम देखते हो न जब कभी कभी हवाई जहाज आसमान से गुज़रता है तो एक लम्बा सा लकीर अपने पीछे छोड़ते जाता है, देखने पर लगता है की जैसे वो उसकी पूंछ हो लेकिन वो असल में बादलों का कुछ वेपर ट्रेल जैसा होता है.पता है, मुझे हमेशा वो एक रहस्मयी सड़क सा दिखाई देता है...कभी कभी सोचती हूँ की अगर सच में वो कोई सड़क हो तो कहाँ तक जाता होगा....शायद स्वर्ग तक....अच्छा, सोचो ज़रा, अगर एक दिन हमें पता चले(सिर्फ हम दोनों को) की वो कौनट्रेल्स न होकर कोई जादुई सड़क है जो आसमान तक जाती है...और उस सड़क पर चलने का हुनर, वहां तक पहुँचने का राज़ मुझे और तुम्हे पता लग गया तो?...और मान लो अगर एक दिन हम उस सड़क पर सच में चलने लगे तो? धरती से कोई अगर उसी वक़्त आसमान की तरफ देखेगा तो उसे काफी ताज्जुब होगा की दो लोग आसमान में कैसे चल रहे हैं...अगर मुझे उस सड़क पर चलने का राज़ मालुम चला तो मैं यहाँ से कई सारे फुल और बहुत से खूबसूरत पौधे लेकर जाउंगी...और आसमान के उस कौनट्रेल्स वाली सड़क के दोनों तरफ फुल-पौधे लगाती जाउंगी....तुम्हे भी अपने साथ मैं लेकर चलूंगी...तुम दायीं तरफ पौधे लगते जाना और मैं बायीं तरफ...धरती से लोग अगर आसमान की तरफ देखेंगे तो उन्हें कितनी हैरानी होगी.....की आसमान में फुल कैसे उग आये हैं और वे जब मेरी तरफ देखेंगे तो शायद मेरे हाथों में फूलों को देखकर मुझे कोई परी समझ लेंगे..और तुम्हे मेरे साथ देखकर शहजादा समझेंगे.....तुम्हे क्या लगता है, अगर मैं आसमान से हाथ हिलाकर 'हाय'(hi) कहूँगी तो क्या कोई मुझे वापस जवाब देगा??हम्म्म्म???"
वो मेरे तरफ देखने लगी लेकिन बिना जवाब की प्रतीक्षा किये फिर कहने लगी
"क्या पता शायद उस सड़क पर चलते हुए मुझे कहीं कोई ऐसा एक दरवाज़ा दिख जाए जो स्वर्ग या वैसी ही किसी खूबसूरत सी दुनिया में खुलता हो....क्या पता वैसी कोई दुनिया जहाँ वो दरवाज़ा खुलता है वहां खुशियों का कोई बड़ा सा खजाना हो.....और शायद मैं उन खुशियों को बटोर कर किसी बहुत बड़े से थैले में भरकर लेते आ सकूँ....और अपने दोस्तों में, दुनियावालों में बाँट सकूँ..जिसको देखो वही उदास रहता है, और मुझे बिलकुल पसंद नहीं की मेरे आसपास रहने वाला कोई इन्सान उदास रहे..तुम भी कितने खोये खोये से और परेसान रहते रहते हो.मैं सबसे अच्छी और बड़ी वाली ख़ुशी तुम्हे दे दूंगी...और फिर अपने परिवार में बाटूंगी..फिर पुरे अपने मोहल्ले में, फिर शहर में, फिर पुरे देश में और फिर पूरी दुनिया में...सब मुझे हमेशा याद करेंगे...की कोई ऐसी भी लड़की थी जो अपने दोनों हाथों से खुशियाँ बंटती थी...." ये कहते ही उसकी दोनों हाथ हवा में फ़ैल गयीं...मैं उसकी बातों में सच में खो गया था और किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच चूका था...लेकिन शायद मेरी सिर्फ एक छोटी सी मुस्कराहट से वो कुछ ज्यादा उत्साहित नहीं हो सकी....और समझने लगी की मैं हमेशा की तरह उसकी बातों को नादानी भरी बातें समझ बैठा हूँ...जबकि ऐसा नहीं था..

वो मेरी ठंडी प्रतिक्रिया से ज्यादा खुश नहीं हुई....वो कहने लगी..."मुझे मालुम है, मैं अक्सर नादानी वाली बातें करती हूँ, शायद इसलिए तुम्हे मेरी ये बात भी मेरा बचपना और दुनियादारी से परे वाली बातें लगती होंगी....लेकिन देखो, दुनिया में कुछ भी मुमकिन है...एनी डैम मैजिक इन दिस वर्ल्ड इज पोसिबल.. पता है मुझे सबसे ज्यादा मैजिकल और आस्चार्जनक क्या लगता है...किसी बच्चे का पैदा होना...अगर सोचो तो वो कहीं नहीं है, जैसे हम और तुम...आज से बीस-पचीस साल पहले कहाँ थे?कहीं नहीं थे...और फिर एक दिन वो बच्चा इस दुनिया में आ जाता है.हम सबके सामने, हम सबके बीच बड़ा होता है...स्कुल जाता है, पढता है और फिर हमारे तुम्हारे जितना बड़ा हो जाता है....देखो ये कितना मैजिकल और रहस्यपूर्ण है... मुझे मालुम है दुनियावाले इसमें भी साईंस लगा देंगे और ये नहीं मानेगे की ये कोई चमत्कार है...लेकिन मेरे लिए तो ये एक चमत्कार ही है, भगवन का मैजिक....मुझे ये भगवन का सबसे बड़ा जादू लगता है, और जब ये पोसिबल है तब कुछ भी हो सकता है, आसमान में सड़क भी बन सकती है....यु नो व्हाट....जो लोग किसी भी जादू, मैजिक या मिस्त्री में विश्वास नहीं रखते...दे आर सिम्पली नॉट लिविंग." वो मेरे तरफ फिर देखने लगी और मेरे जवाब का इंतजार करने लगी.इस बार मैंने सिर्फ उसे इतना ही कहा, की तुम्हारी इन बातों को कभी भी मैं नादानी भरी बातें नहीं समझता.मुझे अच्छा लगता है जब तुम ऐसी बातें करती हो.वो थोडा आश्वस्त हो गयी.

ये उसकी ख्वाबों की दुनिया की बातें थीं....उसकी ख्वाबों की दुनिया ऐसी ही थी..कहाँ से कौन सी बात अचानक से सामने निकल आती थी किसी को पता भी नहीं चलता था....जब वो ऐसी बातें करती, तो मुझे हैरत होती थी की वो कहाँ तक सोच सकती है..उसकी इमैजनैशन की कोई हद नहीं थी....और कभी कभी ऐसी बातें करते वक़्त वो एक दो ऐसी बात भी कह जाती थी जिससे मैं अक्सर चौंक सा भी जाता था. उसने उस दिन कहा था "तुम्हे पता है, मैं अपने ख्वाबों के दुनिया में कुछ भी कर सकती हूँ...वहां कोई मुझपर बंदिश लगाने वाला नहीं होता..मैं अपने मर्जी से जी सकती हूँ...मैं कहीं भी जा सकती हूँ और कुछ भी कर सकती हूँ...कुछ भी....तुमसे शादी भी...

उसने इतने धीरे से ये आखिरी शब्द कहा की एक पल लगा की ये मेरा भ्रम है, लेकिन उसकी आँखों में ये शब्द बिलकुल साफ़ साफ़ छपे हुए थे..घबराहट से या शर्म से, मैं नहीं जानता....लेकिन उसकी पलकें नीची हो गयीं, और मेरी नज़रें उसके चेहरे पर उठ आयीं थीं और वहीँ अटकी रहीं...

हम दोनों के बीच जो जादू सा पल हो आया था वो तब टुटा जब बस में अचानक हंगामा होने लगा...एक शराबी बस में खुस आया था और वो बस के कंडक्टर से बहस करने लगा.उस शराबी के बस में यूँ अचानक आ जाने से हमारे बीच जो एक पल पैदा हुआ था वो अचानक से नष्ट हो गया.

शराबी और कंडक्टर की बहस तेज होने लगी...हाथापाई भी होने लगी थी.वो शराबी अपने हाथ में एक लाठी लिए हुए था और कह रहा था मुझे अमरीका जाना है..वो बस में कैसे घुस आया ये मुझे पता नहीं चल पाया था..शायद जबरदस्ती खुस आया था..वो अपने लाठी से कंडक्टर को धमका रहा था..ड्राइवर ने बस रोक दी और उसे धक्के दे कर बाहर निकाल दिया...कंडक्टर और कुछ बस के यात्री ने बस से उतर के उसकी थोड़ी पिटाई भी की.अचानक हुए इस हरकत से वो बहुत घबरा गयी थी.उसने मेरे बाहों में कस कर पकड़ लिया और बेहद घबराई आवाज़ में कहने लगी "पता नहीं कुछ लोग ऐसे कैसे हो जाते हैं".
मैं कुछ सोचने लगा...और फिर मैंने युहीं हंसी में उससे एक सवाल पूछा "सोचो अगर कल को तुम युहीं किसी बस में सफ़र कर रही हो और उस शराबी की तरह ही अचानक मैं बस में घुस आऊं..बिलकुल वैसे ही नशे में और बुरी हालत में...और लोग वैसे ही मुझे भी घसीटने-पीटने लगे....तो क्या करोगी तुम? क्या तुम सामने आकर कहोगी की इसे मैं जानती हूँ? मैंने ये सवाल मजाक में युहीं पूछ दिया था लेकिन वो मेरे इस सवाल से एकदम चौंक सी गयी और बेहद घबरा गयी.उसने अपने दोनों हाथों से मुझे पकड़ लिया था और उसकी आँखों से आंसू निकलने लगे...वो बिना कुछ कहे बस मेरी तरफ देखने लगी....उसके होंठ हिलने लगे...जैसे वो कुछ कहना चाह रही हो लेकिन कह नहीं पा रही हो....उसकी डबडबाई आँखों को देखकर एक पल के लिए खुद मैं भी अपने ही मजाक से भयभीत सा हो गया...मैं उसकी डबडबाई आँखों को ज्यादा देर सह नहीं सका और अपनी नजर दूसरी तरफ कर लिया.उसने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया और कांपती आवाज़ में उसने अटकते अटकते सिर्फ इतना ही कहा की 'तुम प्लीज ऐसी बुरी बातें फिर मत करना'.मुझे अपने उस सवाल पर और खुद पर बेहद गुस्सा आने लगा था.

हमारी बस शहर में प्रवेश कर चुकी थी, और मैं चाहता था की बस से उतरने से पहले उसका मन कुछ हल्का कर सकूँ....बहुत देर तक वो मेरे कंधे पर अपना सिर टिकाये रही थी और मैं बहुत देर से उससे तरह तरह की बातें कर रहा था, लेकिन मुझे उसका वो रूप जो सुबह था, मंदिर जाते हुए..बस में शरारत करते हुए....खेतों में दौड़ते हुए...कहीं दिखाई नहीं दे रहा था.मैं जानता था की वो आसानी से इस मोड से बाहर नहीं निकल पाएगी.जब बस लगभग स्टैंड में लगने वाली थी, तब मैंने कहा उससे "जानती हो ये अच्छे..ये सुख के दिन हैं..".वो विस्मित होकर मेरी तरफ देखने लगी...
"तुम्हारे साथ यूँ वक़्त गुज़ारना और तुम्हारे ख्वाबो की दुनिया में यूँ भटकना अच्छा लगता है.आज का ये दिन मैं कभी नहीं भूल सकूँगा.."
वो मुस्कुराने लगी...कहने लगी "तुम ऐसी बातें करते हो तो बहुत स्वीट लगते हो...ऐसी ही बातें करते रहना हमेशा, अगर मैं कहीं दूर चली जाऊं तब भी..
मुझे लगा की शायद उसका मन अब अच्छा हो गया है..
हम बस से उतर चुके थे..और उसने मुझे एक मिठाई का पैकट पकड़ा दिया और कहा "ये मैंने तुम्हारे लिए ख़रीदा था".वो रिक्शे से वापस अपने चली गयी.शाम के चार बज चुके थे लेकिन मैं उस स्टैंड से वापस जाने के बजाये काफी देर तक वहां इधर उधर घूमता रहा, बेवजह समय काटता रहा..जब कुछ देर बाद वापस घर की ओर बढ़ा तो एक अजीब सी ताजगी महसूस हो रही थी, वही पुराना सब कुछ (शाहर, घर, लोग) नए जैसे लग रहे थे...दिन भर भटकने के बाद भी मुझे थकावट महसूस नहीं हो रही थी..रात में भी बहुत देर तक मैं सो नहीं सका...बस में जो बातें वो करती आई थी, मैं उसी में उलझा रहा.

अब सोचता हूँ तो लगता है की जैसे वो कोई अलग ही ज़माना था जब उसके साथ मैंने वो खूबसूरत दिन बिताया था...वो अब किसी दुसरे ही जन्म की बात जान पड़ती है..सोचता हूँ की अगर अब कभी उस मंदिर में  दुबारा जाना हुआ तो पता नहीं फिर कितनी यादों के तहे खुलेंगे और मुझे फिर से उन पगडंडियों पर चलना पड़ेगा.

Sunday, February 3, 2013

मंदिर का सफ़र


वे साल के आखिरी दिन थे, उसकी एक जिद थी की वो मेरे साथ माता के मंदिर जाए, वो मंदिर जो शहर से पचास-साठ किलोमीटर दूर स्थित था.मैं कई दिनों से उसकी ये जिद टालता आया था लेकिन एक समय के बाद मुझे लगा की उसकी जिद को अब टालना असम्भव सा है.मैं उससे जब पूछता की सर्दियों में तुम्हे वहां जाने की इतनी जल्दी क्यों है, हम एक दो महीने बाद वहां जा सकते हैं, फरवरी या मार्च के महीने में.लेकिन वो हमेशा एक ही जवाब देती "आई हैव माई ओन रीजन्स'.उसके 'रीजन्स' का पता मुझे बाद में चला था. उसका मानना था की "साल के आखिरी दिन माता के मंदिर जाकर अपनी सारी गलतियाँ कन्फेस करना जरूरी है, उतना ही जरूरी जितना साल के शुरू में मंदिर में 'विशेज' माँगना.अगर पूरी इमानदारी से तुमने अपनी गलती कुबूल नहीं की तो तुम्हारी एक भी विशेज पूरी नहीं होंगी".उसके मंदिर जाने की दूसरी और मुख्य वजह मुझे कुछ दिनों बाद पता चली थी, वो चाहती थी की मेरे साथ मंदिर जाकर वो मेरे लिए भी कोई दुआ मांग सके.

उसके साथ शहर के बाहर जाने के बारे में सोचकर मैं थोडा चिंतित सा हो गया.चिंता की वजह थी की अगर हम ट्रैफिक में फंस गए(जिसकी सम्भावना ज्यादा थी, कोहरे की वजह से) तो वापस आने में शाम भी हो सकती है.मैं नहीं चाहता था की वापस आने में हमें देर हो...मैं चाहता था की कुछ भी हो जाए हमें दोपहर तक घर पहुँच जाना है.हमने तय किया था की सुबह जितनी जल्दी हो सके हम मंदिर के लिए निकल जायेंगे और यदि वापस आने में देरी हो गयी तो हम वहां से लोकल ट्रेन में वापस आ जायेंगे.एक दिन पहले ही शहर के बस स्टैंड जाकर हमने दो टिकट बुक करवाई थी.वैसे तो वहां जाने के लिए पहले से टिकट लेने की जरूरत नहीं थी, लेकिन उसे डर था की मैं फिर अपनी बात से मुकर जाऊँगा.मैंने उसे कह दिया था की सुबह जब मैं उसे फोन करूँ तो वो अपने घर से बस स्टैंड के लिए निकले.मैंने उसे कहा था की मैं सुबह ६ बजे फोन करूँगा.लेकिन अगली सुबह उसी ने मुझे आधे घंटे पहले फोन कर दिया.वो मंदिर जाने के बात से बड़ी उत्साहित थी, इतनी की उसे पूरी रात ठीक से नींद भी नहीं आई थी.ये उसने मुझे फोन पे बताया था. उत्साहित मैं भी था, इस बात से की उसके साथ मैं पूरा एक दिन बिता सकूँगा.

मैंने टिकट एक दिन पहले शाम में ही ले लिया था.दुसरे दिन सुबह मैं समय से बहुत पहले वहां पहुँच गया.सुबह बहुत ही घना कोहरा था.सर्दियों की सुबह इतने घने कोहरे और ठण्ड में किसी का इंतजार करना बेहद तकलीफदेह होता है.लेकिन मैं ठण्ड से ज्यादा परेसान नहीं था, जितना कोहरे से परेसान था, और कोहरे को देखते हुए बार बार ट्रैफिक में फंसने की चिंता मुझे सताने लगी थी.मैंने एक पल सोचा की मंदिर जाने का प्लान कैंसल ही कर दूँ, लेकिन दुसरे ही पल उसका वो उत्साहित सा चेहरा मेरी आँखों के सामने घुमने लगा.मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था.मैं इसी कशमकश में सड़कों पर टहल रहा था की वो आते हुए दिखी.उसने काली जींस और फर का उजला और लम्बा जैकट पहन रखा था.उसने हलके आसमानी रंग की ऊनी टोपी और हाथों में दस्ताने पहन रखे थे...उस ऊनी टोपी पर पिंक कलर के तीन गुलाब के फुल बने थे, जो बड़े सुन्दर से दिख रहे थे.उसने अपने नए वूडलैंड के जूते पहने हुए थे, ये वही जूते थे जिसे उसने बड़े मन से खरीदा था, और उसे शो-ऑफ़ करने का वो एक भी मौका नहीं छोडती थी.उन दिनों शहर में वूडलैंड का जूता पहनना एक बड़ी बात थी.कंधे पर उसने एक रंगबिरंगा सा फैंसी बैग लटका रखा था, जो उसके किसी रिश्तेदार ने विदेश से भेजा था.मुझे उसका वो बैग हमेशा बड़ा आकर्षक और बिलकुल हट के दीखता था.उसने एक भूरे रंग का वूलेन स्टोल गले में लपेट रखा था जिसे देख मुझे एक पुरानी बात याद आ गयी थी...मैंने एक दिन मजाक में उससे पूछा था "ये मफलर कहाँ से खरीदी हो", उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा और कहा था "ये मफलर नहीं स्टोल है".उसने स्टोल के एक सिरे से अपने सर को भी ढँक लिया था..वो बिलकुल एक गुडिया सी प्यारी और मासूम दिख रही थी.वो बेहद खूबसूरत दिख रही थी.सर्दियों में मुझे वो हमेशा दुसरे मौसमों की तुलना में ज्यादा खूबसूरत दिखती थी...वो जब कभी इतनी खूबसूरत दिखती, तो मैं चाह कर भी बहुत देर तक उसे लगातार देख नहीं पाता था.मन ही मन ये विश्वास करना भी मेरे लिए मुस्किल हो जाता था की इतनी खूबसूरत लड़की को मैं जानता हूँ,उसके साथ शहर घूमता हूँ और वो मेरी सबसे प्यारी दोस्त है.कभी कभी एक बेतुका सा ख्याल भी आता मन में की इतनी भोली, निश्चल और साफ़ मन की लड़की के साथ मुझे नहीं होना चाहिए.मैं किसी भी तरह इसके काबिल नहीं हूँ...लेकिन वो मेरे साथ थी, ये सच था और मुझे हमेशा इस बात का गर्व होता रहा की वो मेरी दोस्त थी.....


वो लगभग दौड़ते हुए मेरे पास आई, दोनों हाथों से मेरे कन्धों को पकड़ कर उसने कहा "फाइनली...हम जा रहे हैं.....गौड आई एम सो इक्साइटड".उसकी ख़ुशी देखकर कुछ देर के लिए मेरी चिंता और फ़िक्र खत्म हो गयी.उसने टिकट हाथ से छिनकर कहा "विंडो सीट मेरी है...तुम्हे बैठने नहीं दूंगी".मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा "ठीक है, तुम ही बैठना".वो मेरे इस बात से ज्यादा आश्वस्त नहीं हुई, और बस में दौड़ते हुए उसने विंडो सीट कैप्चर कर लिया और मेरी तरफ देखकर मुझे अंगूठा दिखाने लगी.बस अपने समय से निकली.मुझे बड़ी ख़ुशी और राहत हुई जब शहर से निकलते वक़्त हमें कोई ट्राफिक नहीं मिली, रोड बिलकुल खुली थी और बस रफ़्तार के साथ चलने लगी थी.

बस के शीशों पर ओस जम गया था जिससे बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं दे पा रहा था.वो खिड़की पर अपनी ऊँगली से शक्लें बनाने लगी, और उन्हें तब तक देखते रहती जब तक खिड़की पर फिर से ओस की फ्रेश बुँदे न चिपक जाती और उसकी बनाई शक्ल लगभग मिट नहीं जाती.वो तब फिर कोई नयी शकल बनाने लगती, और उसी शक्ल को देखते हुए उससे कुछ बात करने लगती.ये उसका खेल था.वो बीच बीच में मुझे देखती और कहती "तुम भी बात करो न इससे".मैं उसे थोड़ा चिढ़ा सा देता, और वो फिर से मुह फेर कर उन शक्लों से बात करने लगती.जब वो अपने इस खेल से उब गयी,तो उसने अपने दोनों हाथों को खिड़की के शीशे पर रख दिया, और जब कुछ देर बाद उसकी हथेलियाँ ओस से भींग गयी तो उसने जल्दी से उन्हें शीशे से हटा कर मेरे गालों पर रख दिया था.मुझे एक पल बड़ा इरिटेटिंग लगा.ठण्ड में कोई ऐसी हरकत करे तो इरिटेटिंग लगता ही है,लेकिन वो अपनी इस बेवकूफी पर बहुत खुश हो गयी और जोर से हंसने लगी, उसे हँसता देख मैं भी हंसने लगा था.आगे वाली सीट पर बैठे दो बुजुर्ग पीछे मुड़ के हमें देखने लगे.उनके देखने से शायद वो शरमा गयी थी....उसने अपना चेहरा मेरे जैकेट में छुपा लिया था.

खिड़की से बार शहर को कुहरे में लिपटे देखकर वो एकाएक अपने बीते दिनों में चली गयी, जब वो नवमी या दसवीं क्लास में थी और पहली बार लन्दन गयी थी, क्रिसमस की छुट्टियों में, अपने बड़े पापा के घर.उन दिनों वहां हमेशा बर्फ़बारी होती रहती थी और जब बर्फ गिरती तो सारा शहर बर्फ की चादर में ढँक जाता था.उसने अपनी बहनों के साथ पुरे गार्डन को सजाया था..बर्फ से लदे पेड़ों को रंग बिरंगे लाईटों से सजाया था..बहुत सारे झालर से पुरे गार्डेन को सजाया था, और दो बड़े बड़े सांता क्लॉस के टेडी गेट पर दरबान की तरह उसने लगा दिए थे, और दोनों के ऊपर बड़े बड़े अक्षरों में लिख दिया था "क्रिसमस में गिफ्ट्स लाने वाले अंकल".गार्डेन में एक बड़ा सा "स्नो गार्डन" का बोर्ड भी उसने और उसकी बहनों ने मिलकर लगा दिया था.वो ये बातें मुझे पहले भी कई बार बता चुकी थी,लेकिन मैं हर बार उतने ही उत्सुकता से उसकी बातें सुनता जैसे पहली बार उसकी बातें सुन रहा हूँ.अपने बचपन और लन्दन की बातें बताते वक़्त उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती थी.उसकी नॉस्टैल्जिक बातें सुन मुझे भी वो दिन याद आ गए जब मैं अपने गाँव जाया करता था, इसी रास्ते से जिससे होकर हम मंदिर जा रहे थे.मुझे याद आया की जब मैंने पहली बार अपने गाँव का जिक्र उससे किया था, तो उसने मुझसे कहा था की वो मेरे साथ मेरे गाँव जाना चाहती है, वहां घूमना चाहती है.उस दिन मैंने उसे ये नहीं बताया था की मेरा गाँव उस मंदिर से बहुत ज्यादा दूर नहीं है..नहीं तो वो मेरे गाँव चलने की भी जिद कर सकती थी.

उसकी छोटी मोटी बदमाशियां, शरारतें और नौटंकियाँ झेलते हुए हम आख़िरकार पहुँच गए थे, जितना हमने अंदाज़ा लगाया था उससे कहीं पहले.इस बात से मैं बड़ा खुश हुआ था.हमने मुख्य सड़क पर बस छोड़ी थी और वहां से मंदिर लगभग दो तीन किलोमीटर की दुरी पर था.मैंने उससे कहा की हम रिक्शा ले सकते हैं, लेकिन उसे रिक्शे से जाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी..वो मंदिर तक पैदल जाना चाहती थी...गाँव और खेतों से होते हुए...


...contd

Monday, January 21, 2013

इसमें मेरा प्यार मिला हुआ है..


दिसंबर के महीने से लड़की को बेइन्तेहां प्यार था.वो दिसंबर को अक्सर 'टेन्डर दिसंबर' कहा करती थी.वो चाहती थी कि दिसंबर के महीने पर वो कोई फिल्म बनाये.उसने फिल्म का नाम भी सोच रखा था...'लव इन दिसंबर'...उसकी ज़िन्दगी के सबसे हसीन और उदास दिन दिसंबर के ही थे...तरह तरह के बेवकूफियों वाले कारनामे, नए नए शरारती एक्सपेरिमेंट उसने दिसंबर के दिनों में ही किये थे...वे दिसंबर के ही दिन थे जब लड़की ने खुल के जीना सीखा था.सुबह के ठण्ड में वो लड़के के साथ हर रोज़ कंप्यूटर क्लास जाती.सुबह के घने कोहरे में सड़कों पर चलना और सड़कों के किनारे छोटी छोटी गुमटियों में चाय पीना उसके शौक थे.वो जब कभी सुबह का घना कोहरा देखती तो बहुत खुश हो जाती और अक्सर लड़के से कहती.."काश मैं इस कोहरे को मुट्ठी में पकड़ के अपने बैग में रख सकूँ और घर जाने पर इसे अपने टेबल पर सजा के रखूं और दिन भर इस कोहरे के साथ खेलूं..".लड़का उसकी इस बात पर हँसता भी था और उसे चिढ़ता भी, लेकिन उसे कभी कोई फर्क नहीं पड़ता.

दिन भर वो दोनों शहर के एक कोने से दुसरे कोने बेवजह घूमते रहते और शाम में कोचिंग क्लास के बाद वे पार्क में जाकर बैठते.वहां वो दोनों दुनिया भर की बातें करते...कभी कभी वो दोनों अपनी अपनी ख्वाहिशें भी एक दुसरे को बताते.लड़की हमेशा अपने पास एक नोटबुक रखती...वो उस नोटबुक को बहुत सजा के रखा करती थी...दुनिया भर के स्टिकर्स, लैस, गोटे और सितारों से वो अपने नोटबुक को सजाय रखती...लड़के को उस नोटबुक में लिखी कोई भी बात समझ नहीं आती थी, लेकिन फिर भी जब कभी लड़की उस नोटबुक में लिखी बातें पढ़कर लड़के को सुनाती, वो सिर हिला कर बात को अच्छी तरह समझ जाने का नाटक करता.उस नोटबुक में लड़की ने एक अलग सेक्सन बना रखा था जिसमे वो अपनी ख्वाहिशें लिखती जाती...उसकी ख्वाहिशों की लिस्ट बड़ी लम्बी चौड़ी और विएर्ड सी थी और हर दुसरे तीसरे दिन वो लिस्ट अपडेट होते रहती.एक दिन लड़की ने अपने उस नोटबुक में एक नया सेक्सन बनाया जिसमे वो लड़के की ख्वाहिशें लिखना चाहती थी.उसे बड़ी हैरानी हुई जब आठवीं ख्वाहिश पर आकर लड़के ने कहा "बस, इससे ज्यादा और कुछ नहीं".
"छि...आठ ख्वाहिश....तुम पागल हो क्या...इतनी कम भी क्या ख्वाहिशें होती हैं....और वो भी इतने मामूली...नहीं, तुम मेरे दोस्त नहीं हो सकते....मेरी लिस्ट देख लो....डबल सेंचुरी के करीब है, और तुम बस आठ पर ही अटक गए....तुम शायरी वायरी पढ़ते रहते हो...मुझसे नहीं तो कम से कम हजारों ख्वाहिशें ऐसी वाली शायरी से तो इंस्पायर्ड हो....".लड़के ने उसे समझाने की कोई भी कोशिश नहीं की, बल्कि उसे देख मुस्कुराने लगा..कुछ देर कुछ सोचकर लड़की ने पूछा "अच्छा, मैं अपनी ख्वाहिशों वाले सेक्सन से कुछ तुम्हारे ख्वाहिशों वाले सेक्सन में कॉपी कर दूँ?देखो..मैं हमेशा भगवान् जी से प्रार्थना करती हूँ की वो इस डायरी में लिखी हर विश को पूरा कर दें..मान लो अगर उनको दया आ गयी और उन्होंने हमारे दस पंद्रह विशेज भी अगर पुरे कर दिए...और वो भी हमारे कॉमन वाले विशेज...तो सोचा ज़रा....कितना अच्छा होगा न?
लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा, "जो तुम्हे अच्छा लगे करो...".लड़की बेहद खुश हो गयी और जल्दी जल्दी अपनी कुछ ख्वाहिशें लड़के के विशेज वाली सेक्सन में कॉपी करने लगी....

इस तरह की बहकी बहकी हरकतें और बातें करना लड़की के लिए नया नहीं था...एक दिन पार्क में वो चुपके से लड़के के पास आई और बड़े प्यार से लड़के के कानों में कहा "ज़रा इधर तो देखो...तुम्हारे लिए मैं चोकलेट लायी हूँ....इसमें मेरा प्यार मिला हुआ है".लड़का आँखें फाड़ फाड़ कर उसे घूरने लगा...उसने लड़की की हर तरह की अजीब और बहकी बहकी हरकतें झेली थी, लेकिन अभी जो उसने किया उसका तो लेवल ही कुछ अलग सा था."आज पूरी तरह पागल हो गयी क्या?"..लड़के ने बड़े अजीब तरह से लड़की को घूरते हुए सवाल किया....लड़की थोड़ा सहम सी गयी और उसने बड़े मासूमियत से जवाब दिया "अरे...एक फिल्म मैं देख रही थी..उसमे हीरोइन हीरो से कहती है -मैं तुम्हारे लिए रोटी लायी हूँ, इसमें मेरा प्यार मिला हुआ है..मुझे ये लाईन बड़ा अच्छा लगा, और कब से सोच रही थी की इसे कहाँ यूज करूँ, तो तुम्हारा ख्याल आया और देखो मैंने कितने अच्छे से यूज कर दिया...और तुमने मुझे बेवजह ही इस तरह से डांट कर डरा दिया."लड़की की इस बात पर लड़के को बड़े जोर से हंसी आई, लेकिन उसने बड़ी मुस्किल से अपने हंसी पर काबू किया..और फिर उसने सवाल किया..."ये बताओ इसे तो तुमने बाज़ार से खरीद कर लाया है, खुद से तो बनाया नहीं...तो इसपर कैसे वो फिल्म का डायलोग फिट बैठेगा?".लड़की चुप हो गयी...वो कुछ सोचने लगी....और जब कुछ देर तक उसे कोई सही जवाब नहीं सुझा तो मायूस हो गयी...और बड़े उदास सी आवाज़ में उसने धीरे से कहा "तो क्या...मैंने ये चोकलेट नहीं बनाया लेकिन लेकर तो मैं आई हूँ न......उतने देर ये मेरे पास रहा...मेरे हाथ से टच होता रहा....मेरे बैग में भी पड़ा रहा...मेरे रूम के टेबल पर पड़ा रहा...कुछ न कुछ तो मेरा प्यार इसमें ट्रांसफर हो ही गया होगा न...कम से कम १% तो जरूर ही ट्रांसफर हुआ होगा और तुम बस हमेशा मेरा मजाक उड़ाते रहते हो".लड़की लड़के से बहुत नाराज़ हो गयी थी, इतना की उसने वो चोकलेट लड़के से छीन कर वापस अपने बैग में रख लिया.लड़की को मनाने के लिए लड़के को बहुत मेहनत करनी पड़ी...दुसरे दिन भी लड़की ने लड़के से ठीक से बात नहीं की, तब लड़के ने अपने पसंदीदा शायर की एक नज़्म लड़की को लिख भेजी, और लड़की ने समझा की वो नज़्म लड़के ने खुद लिखी है..और फिर अगली सुबह क्लास के बाद लड़की खुद लड़के के पास आई और आकर उसने कहा..."तुमने जो कल मुझे ये नज़्म लिख कर दी थी, उसे अभी खुद पढ़ के सुनाओ और मुझे चाय पिलाओ...तब तुम्हे माफ़ी मिलेगी".लड़के ने वैसा ही किया.लड़की ने लड़के को माफ़ तो कर दिया और दोनों फिर से एक साथ घुमने भी लगे लेकिन उस दिन के बाद कई दिनों तक लड़की ने लड़के को एक भी चोकलेट नहीं दिया...हाँ, लड़के को दिखा कर ललचा कर खाती जरूर रही लेकिन चोकलेट का एक बाईट भी लड़के को लेने नहीं दिया.


मुझको इतने से काम पे रख लो

जब भी सीने में झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूँ उसको

जब भी आवेज़ा उलझे बालों में
मुस्कुराके बस इतना सा कह दो
'आह, चुभता है ये अलग कर दो'

जब ग़रारे में पाँव फँस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
इक नज़र देख लो तो काफ़ी है

'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है
लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है
मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा

मुझको इतने से काम पे रख लो

[ गुलज़ार ]