Wednesday, July 15, 2015

“मीट क्यूट?”
“हाँ मीट क्यूट...”
“क्या बोल रही हो? ऐसा कोई भी शब्द नहीं है..”
“है...है ऐसा शब्द.. तुम्हें क्या पता.
याद है हमारी शुरुआत की कुछ मुलाकातें?”
“हाँ याद है..”
“जानते हो, वैसी मुलाकातें दो प्यार करने वालों की, जब दोनों पहली बार मिलते हैं एक दूसरे से. अंजान रहते हैं एक दूसरे से और वो पहली ना भूलने वाली प्यारी और यादगार मुलाकातें होती हैं, जब दोनों को लगता है दोनों एक दूसरे की तरफ किसी डोर से खिंचे  चले जा रहे हैं. वो मीट क्यूट होता है. हम दोनों की शुरू की कुछ मुलाकातें ऐसी ही थी.
 We didn’t run into each other, but somehow there was an invisible string pulling us closer. That sweet romantic moments like us…in which two individuals come together in most fascinating circumstances, dreamy, destined-to-fall-in-love-and-be-together-forever sort of way is the meet cute.”

“ये फिर से तुम्हारे मन की कोई बदमाशी है क्या? तुम्हारा कोई लॉजिक?”

“साहब ये बकवास नहीं है. कुछ पढ़ा लिखा कीजिये. इस मीट क्यूट पर जमाने से लोगों को विश्वास है. कितनी फ़िल्में बनी हैं बस इस एक शब्द पर, कितनी  किताबों में इसका जिक्र है...और तुम हो कि कुछ पता ही नहीं. ये बहुत प्यारा होता है. मीट क्यूट. तुम्हें सुनना है हमारे कौन कौन से मीट क्यूट हुए थे?”
“हाँ, सुनाओ..”
“तो सुनो...वैसे तो बहुत सी मुलाकातें थी, लेकिन ख़ास कर के पहली चार मुलाक़ात जिसके बाद हम एक दूसरे के करीब आये वो तुम्हें बताती हूँ. हमारे वे मीट क्यूट मोमेंट्स.”
हमारी सबसे पहली मुलाक़ात याद है तुम्हें? तुम उस टेक्नीकल सेमिनार प्रेजेंटेशन में पहला पुरस्कार जीते थे और मैं उसी दिन एक दूसरे इवेंट, सिंगिंग काम्पिटिशन में चौथे स्थान पे आई थी, मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिल सका था. मैं थोड़ी निराश और उदास थी. हम एक दोस्त के जरिये पहली बार मिले थे, पहली बार तुम्हारे बारे में पता चला था मुझे और पहली बार हम एक दूसरे से बात किये थे. तुमने मुझसे पूछा, कि तुम्हारा इवेंट कैसा रहा. मैंने जवाब दिया था, अच्छा होता इवेंट तो तुम्हारे पास जितनी बड़ी ट्रॉफी  है, उतनी बड़ी ट्रॉफी  मेरे पास भी होती. तुम शायद समझ गए थे मेरे कहने का मतलब. तुमने अपनी ट्रॉफी  मुझे देते हुए कहा था...किसने कहा तुमने कुछ नहीं जीता, ये लो तुम्हारा पुरस्कार और इसे अपने पास ही रखो. इन लोगों को कोई अक्ल नहीं किसकी आवाज़ सुरीली है और किसकी घिसी हुई, और ये जज बने फिरते हैं. मेरे लिए तो तुम ही विनर हो”.
सच में, कितने प्यारे तरीके से तुमने कहा था मुझसे, मैं तो उस वक़्त जैसे निहाल ही हो गयी थी. तुमने फिर मुझे अपनी ट्रॉफी  थमाई, और बड़े प्यार से मेरी तरफ देखा. हमने अनजाने ही एक दूसरे का हाथ थाम लिया था. यू नो, वो हमारा पहला मीट क्यूट था. 

फिर दूसरी मुलाक़ात.. दूसरी मुलाक़ात याद है तुम्हें? कुछ दिन बाद ही हुई थी हमारी दूसरी मुलाक़ात. मुलाकातें तो वैसे हर दिन होती थी, तुम मुझे देखते थे और मैं तुम्हें. तुम बुद्धू थे, बोलते नहीं थे कुछ और मैं सोचती रहती थी ये कब बात करने आएगा. उस दिन भी तो तुम कितने डरे हुए से थे न, और मैने तुम्हें परेशान भी तो कर दिया था. याद है न तुम्हें. कॉलेज ऑफिस में हमारी मुलाकात थी वो. शनिवार का दिन था. बहुत कम लोग उस दिन कॉलेज आते थे, और ऑफिस स्टाफ भी आम तौर पे गायब ही रहते थे. मैं एक कांउटर पे खड़ी थी, तुम अन्दर आये और चुपचाप मेरे पीछे खड़े हो गए, बुद्धू इतने थे कि चुप से रहे तुम बिलकुल. बस मुझे चुपचाप देख रहे थे, और मैं हर बार की तरह यही सोच रही थी, ये बेवकूफ बात क्यों नहीं कर रहा. हम दोनों ही अकेले थे वहाँ ,, कोई भी नहीं था. लेकिन तुम बिलकुल चुप से मेरे पीछे खड़े रहे. काउंटर स्टाफ जब अचानक दाखिल हुआ ऑफिस में तो तुमने  हड़बड़ी में जेब से कुछ निकालते वक़्त खुल्ले पैसे नीचे गिरा दिए थे. तुम्हें लगा वो पैसे मेरे पर्स से गिरे हैं, और तुमने कहा “सुनो, तुम्हारे पैसे नीचे गिरे हैं...”. मैंने एकदम टफ लुक देते हुए ये जताते हुए कि लाइन मारने का ये तरीका बहुत पुराना है, कहा था... “मेरे पैसे नहीं हैं, खुद गिराते हो पैसे और खुद मुझसे कहते हो कि तुम्हारे पैसे गिरें...ह्म्म्म?” तुम एकदम डर से गए थे. नहीं नहीं...कहते रह गए तुम और मैं अपनी इस बदमाशी पर मन ही मन खूब हँस रही थी. कुछ देर बाद घर वापसी के लिए मैं उसी कॉलेज बस में बैठ गयी जिसमें तुम बैठे थे. मैंने पहले ही तुम्हें देख लिया था कौन से बस में तुम बैठे हो. पूरी बस खाली थी फिर भी तुम्हारे बगल में ही आकर मैं बैठ गयी थी. थोड़ा अफ़सोस भी था मुझे कि तुम्हें बेवजह परेशान कर दिया, तुमसे बस में सॉरी कहा. तुम कोई किताब पढ़ रहे थे 
मैंने तुमसे पूछा “ये कौन सी किताब पढ़ रहे हो तुम?” 
तुमने कहा “प्यार की किताब पढ़ रहा हूँ...तुम भी पढ़ना”.
“प्यार की किताब पढ़ना मतलब? कहना क्या चाहते हो तुम?” मैंने फिर से एक टफ लुक देते हुए तुमसे कहा था? तुम फिर एकदम से हड़बड़ा गए.
“अरेररे..मेरे कहने का मतलब था रोमांटिक नॉवेल है ये ‘द नोटबुक’ नाम है इसका...सॉरी तुम्हें कुछ गलत लगा हो तो”
तुम एकदम से सफाई देने लगे थे मुझे, कितने क्यूट लग रहे थे तुम ऐसे सफाई देते हुए और मुझे लगातार हँसी आ रही थी. मैंने फिर तुम्हें कहा, चिल यार..मैं बस मजाक कर रही थी. तुम भी फिर मेरी तरफ देखकर मुस्कराने लगे थे. वो हमारा दूसरा मीट क्यूट था. 

इन दोनों मुलाकातों के बाद वैसे तो हमारी बातचीत होने लगी थी, लेकिन ज्यादा नहीं. हमारी अच्छी और पक्की दोस्ती किस दिन शुरू हुई थी ये याद है तुम्हें? तुम्हारे जन्मदिन से एक दिन पहले का दिन था वो. यही जुलाई का महीना था और उस दिन भी बारिश हो रही थी जैसे आज हो रही है. तुम उस दिन कॉलेज की सीढ़ियों पर अकेले बैठे थे और मेरी वापसी की बस छूट गयी थी. छूट क्या गयी थी, तुम्हें बैठे देख सीढ़ियों पर मैंने जान बूझकर बस छोड़ दिया था. सोचा,  देखती हूँ तुम मुझसे बात करते हो या नहीं. मुझे अपने पास बुलाते हो या नहीं. शुक्र था उस दिन तुमने टोका मुझे, “बस छूट गयी तुम्हारी...” तुमने पूछा था मुझसे, और मैंने तुम्हारे पास आकर कहा था “जान बूझकर छोड़ी है बस, तुमसे बात करने के लिए...” और मैं भी सीढ़ियों पर तुम्हारे पास आकर बैठ गयी. तुम्हारे लिए जन्मदिन का तोहफा पहले से मेरे बैग में रखा था, उसे मैंने तुम्हें दिया, तुमने पूछा मुझसे, तुम्हें कैसे पता मेरा जन्मदिन कल है? मैंने कहा था, आपके बारे में सब पता है हुज़ूर...और उसी पेन से जो मैंने तुम्हें तोहफे में दिया था, तुम्हारी हथेलियों पर लिख दिया था - हैप्पी बर्थडे टू यू, फ्रॉम योर स्वीट फ्रेंड. अपना नाम भी तुम्हारी हथेलियों पर लिखा था मैंने. तुम मुसकुरा दिए थे मेरी तरफ देख कर और कहा था मुझसे, “थैंक यु”. मुझे आज तक समझ नहीं आया वो थैंक यु किसके लिए था? तोहफे के लिए या तुम्हारी हथेलियों पर मैंने अपना नाम लिखा था उसके लिए...जिसके लिए भी था, वो हमारा तीसरा मीट क्यूट था. 

और चौथी मुलाक़ात..वो तो बेहद रूमानी सी थी. हम दोनों एक ही मार्केट में थे. एक ही दुकान में. तुम पहले से उस दुकान में थे और मैं वहां आ गयी...एंड लेट मी रीमाइन्ड यू अगेन, मैं तुम्हें फ़ॉलो नहीं कर रही थी, ये खुशफहमी जाने क्यों तुम्हें आज तक बनी रह गयी. बस होते गया ऐसा कि जिस जगह तुम थे वहीं मैं आ जाती थी. किस्मत यू  नो..किस्मत. दुकान से निकलते ही बारिश शुरू हो गयी. मैं अपना छाता लिए सड़क के किनारे आकर ऑटो के इंतजार में खड़ी हो गयी. तुम कुछ देर बाद दुकान से निकले, और स्टाइल मारते हुए अपने बाइक से मेरे पास आकर खड़े हो गए. “ऑटो नहीं मिलेगी...छोड़ दूँ तुम्हें घर?” तुमने पूछा था, और मैं तो हैरानी में तुम्हें बस देखती  रह गयी. ये गज़ब कैसे हो गया आज? तुम इतना हिचकते थे बात करने में और तुमने ही आकर पूछा. मैं भी झट से बाइक पर तुम्हारे पीछे बैठ गयी. 

देखो, तुम बारिश में भीग कर जाते, तुम्हारे पास बाइक थी, छाता नहीं. मेरे पास छाता था लेकिन घर जाने के लिए सवारी नहीं मिल रही थी. तुम मिल गए मुझे, तुमने ही आकर पूछा, और मैं तुम्हारे साथ बाइक पर बैठ गयी. मेरे लिए तो एकदम परफेक्ट मोमेंट था वो. पूरे रास्ते मैं बारिशों वाले गाने गाते आ रही थी और तुम मुस्करा रहे थे, मुड़ मुड़ के बहाने से मेरी तरफ देख रहे थे. मैंने तुमसे कहा जब आगे देखकर चलाईये हुज़ूर, कहीं एक्सीडेंट न हो जाए. तुमने जवाब दिया था “तुम्हें कुछ भी नहीं होने दूंगा, घबराओ मत”. हम चाचा के दुकान पे भी रुके थे और बारिश में भीगते हुए चाय पिये थे. चंदू के दुकान के भुट्टे भी खाए थे हमनें. मेरे लिए वो बारिश डेट थी तुम्हारे साथ. तुम पहली बार मेरे से इतना खुल के बात कर रहे थे और मैं तो बस मन ही मन खुश ही हुई जा रही थी. कितना रूमानी दिन था न वो. हमारा चौथा मीट क्यूट. 

जानते हो, अगर सोचो तो हमारी हर मुलाक़ात अब तक एक मीट क्यूट ही था. कितनी अच्छी यादें हैं न हर मुलाकात की. हम बेहद खुशनसीब हैं...पता है यहाँ लोगों को एक मीट क्यूट नहीं मिल पाता और हमारे देख लो कितने मीट क्यूट हुए हैं. जैसे सच्चा प्यार हर किसी को नहीं मिल पाता न, वो सोलमेट जैसा प्यार. ठीक वैसे ही मीट क्यूट सबके लिए नहीं होते, लेकिन हमारे लिए थे और वो भी इतने सारे...हमारे सभी मीट क्यूट...स्वीमीट क्यूट मुलाकातें.. 

स्वीमीट क्यूट मुलाकातें ? 

हाँ.. स्वीमीट क्यूट मुलाकातें. कितनी मीठी मुलाकतें होती हैं हमारी...तो वो सभी मीठी मुलाकतें को हम क्या कहेंगे न? स्वीमीट क्यूट(Sweemeet Cute) मुलाकातें ही न...!

मीट क्यूट

Tuesday, March 31, 2015

मेरे महबूब
जब दोपहर को
समुन्दर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं तो
आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करनें की क़ुव्वत मिलती है

कितना दर्द है मीना कुमारी की शायरी में, पढो तो लगता है कहाँ कहाँ ले जाती हैं ये नज्में उनकी हमें. दिल की किन बंद गलियों में हम टहलने लगते हैं, जाने क्या क्या याद आते जाता है...जाने क्या महसूस होते जाता है. आज मीना जी की पुण्यतिथि पर पढ़िए ये चार नज्में.

सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा
जैसे रात की तारीकी में
किसी ख़ानक़ाह का
खुला और रौशन ताक़
जहां मोमबत्तियाँ जल रही हो
ख़ामोश
बेज़बान मोमबत्तियाँ
या
वह सुनहरी जिल्दवाली किताब जो
ग़मगीन मुहब्बत के मुक़द्दस अशआर से मुंतख़ीब हो

एक पाकीज़ा मंज़र
सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा


२, 

हाँ, कोई और होगा तूने जो देखा होगा
हम नहीं आग से बच-बचके गुज़रने वाले

न इन्तज़ार, न आहट, न तमन्ना, न उमीद
ज़िन्दगी है कि यूँ बेहिस हुई जाती है

इतना कह कर बीत गई हर ठंडी भीगी रात
सुखके लम्हे, दुख के साथी, तेरे ख़ाली हात

हाँ, बात कुछ और थी, कुछ और ही बात हो गई
और आँख ही आँख में तमाम रात हो गई

कई उलझे हुए ख़यालात का मजमा है यह मेरा वुजूद
कभी वफ़ा से शिकायत कभी वफ़ा मौजूद

जिन्दगी आँख से टपका हुआ बेरंग कतरा
तेरे दामन की पनाह पाता तो आंसु होता

३,
दिन गुज़रता नहीं आता रात
काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नही बंटती

अकेलेपन के अन्धेरें में दूर दूर तलक
यह एक ख़ौफ़ जी पे धुँआ बनके छाया है
फिसल के आँख से यह छन पिघल न जाए कहीं
पलक पलक ने जिसे राह से उठाया है

शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका, देख, बड़ जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है

तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आँखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है

मीना कुमारी की शायरी(पांच)

Friday, February 27, 2015

तुम्हारी अनोखी ख्वाहिशों की लिस्ट में एक और ख्वाहिश थी...जिसे तुम लगभग हर शाम मुझे सुनाती थी. तुम्हें शब्द ईजाद करने की बीमारी आदत थी. अंग्रेजी के शब्दों के साथ इक्स्पेरिमेंट करना तुम्हारी हॉबी थी. अंग्रेजी का कोई भी नया शब्द तुम कहीं देख लेती तो उसे सीधा इस्तेमाल कर लेती थी, अपने खतों में, अपनी डायरी में या जहाँ भी तुम्हारा मन करे वहाँ... बिना ये जाने कि उस शब्द का अर्थ क्या है. एक दिन तो तुम्हें अजीब बुखार चढ़ा. अंग्रेजी के शब्दों का अविष्कार करने का बुखार. जाने कहाँ से तुम्हें एक दिन एक शब्द “Premious” सूझा था, और तुमने मेरी ही डायरी में अपने इस नए शब्द का इस्तेमाल किया था. “I am premious” तुमने लिखा था. इस शब्द का क्या अर्थ तुमने बताया था ये सही से याद नहीं. शायद इक्स्ट्रीम्ली प्रीशअस(Extremely Precious). उस शाम के बाद तुमपर जैसे धुन सवार हो गयी थी नए, अनोखे और अजीबोगरीब शब्दों का लिस्ट बनाने की. एक दिन मैंने तुमसे यूँ हीं बातों बातों में कह दिया था कि तुम अपने इन शब्दों का अगर एक पूरी लिस्ट तैयार करो तो जब तुम्हारी लिस्ट पूरी हो जायेगी, मैं तुम्हारे इजाद किये शब्दों के लिस्ट को किसी दिन पब्लिश करवा कर एक नायब किताब का रूप दे दूंगा. ये कह कर मैं तो ये बात भूल भी गया था लेकिन तुम्हारे मन में ये बात रह गयी थी.

तुमने बाकायदा एक पुराना टाइप राइटर जो तुम्हारे नाना का था उसे झाड़पोंछ कर निकाला और उसी टाइपराइटर में तुमने टाइप करना शुरू कर दिया था. तुमने शुरुआत में मुझे कुछ भी नहीं बताया था. तुम मुझे सरप्राइज देना चाहती थी. करीब दो ढाई महीने बाद जब मैं तुमसे कही उस बात को पूरी तरह भूल चूका था, तुमने एक शाम पाँच पन्नो के शब्दों की एक लिस्ट थमा दी मेरे हाथों में. “देखो मैंने लिखना शुरू कर दिया है, अब कुछ महीनो में ये पूरा हो जाएगा तो फिर इसको छपवाने की जिम्मेदारी तुम्हारी”, तुमने कहा और मैं हैरान सा होकर तुम्हें देखने लगा था. उसी शाम तुमने अपनी और मेरी डायरी में इस ख्वाहिश को भी जोड़ा था. लिखा था तुमने.. ‘Fun With Words, By Us’ नाम की किताब पब्लिश करवाना और उसके नीचे तुमने मुझसे दस्तखत करवाया था. हाँ, ये भी तुम्हारी आदत थी, डायरी के हर पन्ने पर लिखी ख्वाहिश के नीचे तुम अपने और मेरे दस्तखत लेती थी, समय और तारीख के साथ. 

उस शाम के बाद तुमने सच में वो लिस्ट बनानी शुरू कर दी थी. मुझे ये विश्वास ही नहीं हो रहा था कि तुमने कितने अच्छे से अपने अजीबोगरीब शब्दों को लिखे थे. बाकायदा अर्थ समझाया था तुमने, एक्स्प्लनेशन के साथ और उसका प्रयोग कैसे कर सकते हैं वो भी साथ में लिखा था तुमने. किसी डिक्शनेरी के तर्ज पर. अपने ईजाद किये शब्दों के साथ साथ तुमने अपने उस लिस्ट में कुछ बेहद आश्चर्यजनक और अजीबोगरीब अंग्रेजी के शब्द लिखे थे. जैसे एक शब्द मुझे याद आता है - “Pluviophile” जो तुम खुद के अकसर इस्तेमाल करती थी, जिसका अर्थ है “वो इंसान जिसे बारिश बहुत पसंद है, और जो बारिश में सुकून और प्यार पा लेता है. पहले मुझे लगा था ये शब्द भी तुम्हारे दिमाग की उपज है, लेकिन बाद में तुमने जाने किस किताब में इस शब्द का अर्थ दिखलाया था. ऐसे ही न जाने कहाँ कहाँ से कितने शब्द तुम खोज कर लाया करती थी. तुम कहती थी “इन्हीं अजीबोगरीब शब्दों को पढ़कर मुझे भी दिल करता है कि मैं भी ऐसे शब्दों का आविष्कार करूं जो बिलकुल डिफरेंट से हों और सुनने में बेहद प्यारे भी लगे जो. मुझे कम से कम एक हज़ार शब्दों का तो आविष्कार करना ही है. That’s my goal”. शब्दों को इजाद करने के मामले में कमाल की टैलेंटेड थी तुम. उस वक़्त तुम्हारी मैं अकसर खिंचाई कर दिया करता था, इन बेतुके आदतों को लेकर लेकिन सच कहूं तो मुझे अकसर तुम्हारी ये आदतें हैरान करती थीं. 

अपने इस लिस्ट बनाने के साथ साथ तुमने टाइपरायटर का एक और उपयोग शुरू कर दिया था. तुम्हारी ख्वाहिश थी कि तुम फिल्मों की कहानियों का कांसेप्ट और स्क्रिप्ट लिखो. तुम्हारे मन में जो विषय है उसपर तुम फिल्म बनाओ. शब्दों के लिस्ट के साथ साथ तुम अपने इस ख्वाहिश पर भी काम करना शुरू कर दिया था. 

एक फिल्म आई थी उन दिनों, “प्यार में कभी कभी”, फिल्म और फिल्म के गाने तुम्हें बेहद पसंद आये थे. उस फिल्म की एक ख़ास बात ये थी कि उसमें डाईरेक्टर, प्रोड्यूसर से लेकर संगीतकार और कलाकार से लेकर स्पॉट बॉय तक सभी नए थे. सभी की पहली फिल्म थी वो. मुझे सही से याद नहीं, लेकिन शायद फिल्म के शुरुआत में ये बात कही गयी थी. इसके साथ ही ये भी कहा गया था या शायद लिखा हुआ था फिल्म के क्रेडिट में कि “इस फिल्म से हम सभी दोस्तों की तकदीरें जुडी हुई हैं..” बस, जिस दिन तुमने ये फिल्म देखी थी, उसके अगले ही दिन से तुम ये जिद लेकर बैठ गयी कि हम सब भी एक फिल्म बनायेंगे एक साथ. जब वे सभी नए लोग मिलकर एक प्यारी फिल्म बना सकते हैं तो हम क्यों नहीं? उस फिल्म में भी तो सभी दोस्तों की कहानी थी, जैसे यहाँ हम सभी दोस्त हैं. कुछ भी अंतर नहीं है, उस फिल्म से उन लोगों ने जहाँ अपनी दोस्ती को फिल्म में दिखाया था हम अपनी दोस्ती को फिल्म में दिखाएँगे, और उनसे कहीं बेहतर प्यारी और खूबसूरत फिल्म बनेगी हमारी. हमें भी फिल्म बनानी चाहिए. 

हर बीतते दिन के साथ तुम्हारी ये फिल्म बनाने की ख्वाहिश और मजबूत होती जाती थी. तुमने तो सारे यूनिट के बारे में भी सोच लिया था. 

मुझसे कहती तुम “फिल्म की कहानी तुम और मैं मिलकर डेवलप कर देंगे. गाने तुम लिख देना, उसे कोरिओग्राफ  मैं कर दूँगी और एक्टिंग के लिए हम दोनों ही रहेंगे...मैं किसी और को लेने का रिस्क अफोर्ड नहीं कर सकती. हमारी लिखी स्क्रिप्ट पर जितने अच्छे से हम अभिनय कर सकेंगे उतना दूसरा नहीं”. म्यूजिक के लिए तुमने पिहू का नाम सोच रखा था, जो उन दिनों किसी इन्स्टिट्यूट से म्यूजिक सीख रही थी. प्लेबैक सिंगिंग के लिए भी तुम्हारे पास एक प्लान था. “मेरे किरदार के गाने तो मैं गा दूँगी..लेकिन तुम्हारे किरदार के लिए तुम कैसे गाओगे? इतने बेसुरे हो तुम? लोग भाग जायेंगे..चलो वी विल फिगर समथिंग आउट..” 

यानी एक तरह से फिल्म का पूरा क्रू तुम्हारे मन में फिक्स्ड था. बस कोई तगड़ा पैसे वाले व्यक्ति(किसी फिनन्सिर) को पकड़ना पड़ेगा, जिसका कोई अता-पता नहीं था और तुम इसके लिए एकदम क्लूलेस थी. किसे अपने जाल में लपेटा जाए, हर शाम तुम्हारी इसी बात की फ़िक्र में गुज़रती थी. 

तुम अपनी इन दो नयी आदतों के साथ इतना गंभीर थी, कि अकसर तुम अपने बैग में अपने इन दोनों ख्वाहिशों से जुड़े सभी कागजात लेकर चलती थी. तुम्हारे बैग में पन्ने भरे होते थे, कुछ में फिल्म की कहानी(सिरिअसली क्रेजी कहानियां) और कुछ में तुम्हारे अजीबोगरीब शब्दों के लिस्ट और उनके मानी. तुम हर शाम मुझे ये दोनों पढ़ के सुनाती थी. मुझे बड़े ध्यान से तुम्हारी बातें सुनना पड़ता था. नहीं सुनने का तो कोई स्कोप ही नहीं था. तुम किसी टीचर की तरह बीच में बस ये पता करने के लिए कि मैं सुन रहा हूँ या नहीं, अपनी कहानी से कुछ पूछ लेती थी. “अच्छा बताओ ये किसने कहा था?”, “उसकी दोस्त का नाम क्या था?” “इस शब्द का क्या अर्थ बताया था मैंने?” और अगर मैं जो कभी जवाब नहीं दे पाता तो मेरी खैर नहीं थी. हल्का भी मेरा ध्यान इधर उधर जाता तुम्हारी कहानियों से, मुझे बाकायदा सज़ा दिया करती थी तुम.

मैं सोचता था उन दिनों कि हर शाम वापस घर जाने के बाद तुम दूसरा कुछ काम करती ही नहीं होगी..अपना पूरा वक़्त तुम फ़िल्मी कहानियां और शब्दों को लिखने में लगा देती होगी, वरना इतने पन्ने तुम कैसे लिख सकती थी? सच कहूं तो कभी कभी तो मैं पढ़ते हुए थक भी जाता था. और एक दो कहानियों में तो हँसी आ जाती थी मुझे, कितनी मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाता था मैं ये मैं ही जानता हूँ. कितनी बार तो ऐसा भी हुआ है कि जैसे ही आखिरी पन्ना पढ़ा मैंने, और राहत की साँस ली कि चलो कहानी ख़त्म हुई...वैसे ही तुम जाने कहाँ से बैग से कुछ और पन्ने निकाल कर मुझे थमा देती थी. “एक और पन्ना?” मैं कहता. “क्यों पढ़ने का मन नहीं है? बोर हो रहे हो क्या?”, तुम इतने गुस्से में पूछती, मेरी हालत वैसे ही ख़राब हो जाती थी. “मेरी क्या शामत आई है जो मैं बोर हूँ..” मैं तुम्हें प्यार से कहता. तुम मुस्कराने लगती. प्यारी वाली मुसकराहट नहीं, बल्कि एक ईवल स्माइल देने की नाकाम कोशिश करती तुम, और कहती “ऐसे ही मेरे से डरते रहा करो. तुम्हारी भलाई इसी में है...”

बहुत समय तक तुम्हारी ये दो आदतें कायम रही थी. फिल्म के कहानियों का तो तुम्हारे मूड पर निर्भर होता था, कभी कभी तुम खुद ऊबने लगती, “बड़ा मेहनत वाला काम है , मुझसे नहीं होता” तुम कहती, तो कभी कभी बड़ी उत्साहित हो जाती थी फिल्म बनाने को लेकर. लेकिन अपने शब्दों के लिस्ट को तुम फिल्मों से भी ज्यादा गंभीरता से लिया करती थी. बहुत समय तक नए शब्दों को अपने लिस्ट में तुम जोड़ते गयी थी. यहाँ तक कि बाद में जब हम दोनों अलग अलग शहरों में रहने लगे थे तब भी तुम मुझे खत में अपने पूरे सप्ताह के ईजाद किये शब्दों को लिखना भूलती नहीं थी. बाद में जाने क्या हुआ तुमने ये अपनी ये आदत भी छोड़ दी थी, वजह शायद मैं अच्छे से जानता हूँ. एक बात जो उन दिनों तुम्हें मैंने कभी नहीं कहा था, आज कहता हूँ. तुम्हारी इस आदत के लिए भले मैं कभी तुम्हारी खिंचाई कर दिया करता था, लेकिन सच कहूं तो तुम्हारी इस आदत से मैं इम्प्रेस्ड था. तुम्हारी इस बेतुकी बेवजह की आदत की इज्ज़त करता था मैं. आज जब कभी तुम्हारी उस अजीबोगरीब आदत के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि वो सच में एक किताब बन सकती थी. तुम्हारी ही तरह बिलकुल डिफरेंट, इलोजिकल और नायाब किताब.

तुम्हारी ख्वाहिशें..२

Tuesday, February 24, 2015


तुम्हें याद तो है न तुम कितनी ऊट-पटांग हरकतें कभी करने लगती थी. किसी गाने को सुनकर उसमें कही बातों को इतना सिरिअसली ले लेती थी कि तुम्हें समझाना मुश्किल हो जाता था. गुलज़ार की वो नज़्म तो याद होगी ही तुम्हें? “एक दो चाँद से कूदे..” जनवरी की वो आखिरी शाम थी जब हम दोनों देर तक एक नए शहर के रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे थे, अपने शहर वापस जाने वाली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे और उस शाम तुम्हें मैंने ये नज़्म पहली बार वाकमैन पर सुनाया था. तुम्हे ये नज़्म बहुत पसंद आई थी. कैसे बच्चों जैसी जिद करने लगी थी तुम कि “चलो न चाँद पर चलेंगे, वहाँ से कूदेंगे....” पहले तो मैं समझ नहीं पाया. मुझे लगा हमेशा की तरह तुम्हारा बस ये मजाक है...यूँहीं बेवजह मुझे सताने के लिए ये जिद लेकर बैठ गयी... थोड़ा झल्ला भी गया था मैं. लेकिन तुम अपने जिद पर कायम थी. तुम तब तक नहीं मानी जब तक मैंने तुमसे ये वादा नहीं किया कि एक दिन हम जरूर चाँद पर जायेंगे. सोचता हूँ अकसर मैं कितनी लड़कियां होंगी तुम्हारी जैसी जो इस तरह की जिद लेकर बैठती होंगी. तुम्हारी ऐसी बातें तुम्हारे ऐसे बेवकूफिपना वाले जिद तुम्हारे सपनों की दुनिया का हिस्सा थे...तुम्हारे सपनों की एक अलग ही दुनिया थी. तुम्हारी ख्वाहिशों की भी एक अलग दुनिया थी.  एकदम जुदा और अजीब ख्वाहिशें थीं तुम्हारी, कुछ तो बेहदं प्यारी सी तो कुछ बेहद वीयर्ड.

तुम्हारे पास एक डायरी थी, जिसमें तुमने अपनी सारी ख्वाहिशें लिखती थी. सारे अजीबोगरीब और पागलपन वाली ख्वाहिशें तुम्हारी उसमें थे. वो डायरी तुम्हारे पास हमेशा रहती थी, तुम कहीं भी जाओ तुम उस डायरी को अपने संग रखती थी. उस शाम रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठकर अपनी उस डायरी में तुमने ये ख्वाहिश भी जोड़ दी थी, “चाँद से कूदना..,"

एक डायरी तुमने मुझे भी खरीदवा दी थी, जिसमें मुझे भी अपनी ख्वाहिशें लिखने को तुमने कहा था. लेकिन मेरी ऐसी कोई ख़ास ख्वाहिशें या विशेज थी भी नहीं जो मैं उसमें लिखता. तुम्हारी तरह तो ख्वाहिशों की लिस्ट तो बिलकुल भी नहीं थी मेरे पास. तुमने तब खुद ही मेरी डायरी में ख्वाहिशें लिखना शुरू कर दिया था. जो भी ख्वाहिश तुम अपनी डायरी में खुद के लिए लिखती, ठीक वही ख्वाहिशें मेरी डायरी में तुम लिख दिया करती थी. कभी जो तुम्हें टोकने की जुर्रत करता,  कि तुम क्यों मेरी डायरी में अपनी सभी स्टुपिड ख्वाहिश लिख देती हो, तुम नाराज़ हो जाती थी और फिर बाद में बड़े प्यार से खुद ही मुझे समझाने लगती. देखो, यु=मी न? , तो मेरी ख्वाहिशें = तुम्हारी ख्वाहिशें वाला हिसाब किताब मुझे समझाने लगती तुम.


मुझसे अगर पूछो तो मुझे तो तुम्हारी सभी ख्वाहिशें एकदम अनोखी और अजीब लगती थी, लेकिन तुम्हारी कुछ ख्वाहिशें थीं जो वीयर्ड होते हुए भी मुझे सोचने पर मजबूर कर देती थी. कभी कभी तो तुम उन ख्वाहिशों के जरिये मुझे अपने साथ पता नहीं कल्पनाओं के किस दुनिया में ले जाया करती थी.

एक तुम्हारी सबसे अलग सी विश जो तुमने लिखा था अपनी और मेरी डायरी में वो थी... टाईममशीन के जरिये पुराने दिनों में वापस जाना. ये ख्वाहिश वैसे तो बहुत से लोगों की हो सकती थी लेकिन इसके साथ तुमने इस ख्वाहिश को जिस तरह से डिस्क्राइब किया था, वो बिलकुल अलग सी और अनोखी थी. तुम्हारे पास एक पूरा प्लान तैयार था.

तुमने तो रिजर्व बैंक भी लूटने तक का ख्याल बना लिया था. कहा करती थी... उन दिनों के पुराने नोट्स रिजर्व बैंक में तो रखे मिल जायेंगे न हमें? तो जाने से पहले हमें वो भी अपने कब्ज़े में करना होगा. वे रुपये निकाल कर उसे अपने साथ ले जायेंगे. दो बहुत क्लियर लॉजिक थी तुम्हारी इस बात के पीछे, पहला तो ये कि आज के नोट उस ज़माने में चलेंगे नहीं, और दूसरा ये कि "जब आज के नोट उस ज़माने में नहीं चलेंगे तो हम क्या खाली हाथ जायेंगे वहाँ??ना..कभी नहीं.....हमें बैंक लूटना ही होगा..और पुराने दिनों के पैसे लेकर चलना ही होगा, दूसरा कोई ऑप्शन  नहीं है", तुम कहती थी.


तुम वापस उन दिनों में जाने की बात से ही बहुत इक्साइटड हो जाया करती थी. कहती मुझसे  "सोचो हम अगर उन दिनों में चले जायेंगे, तो हमारे कपड़े, यहाँ तक कि शक्ल सूरत देखकर भी उस समय के लोग बड़े हैरान होंगे, वे हमें एलिएंस समझेंगे. हम वहाँ उन दिनों में पहुच कर वहाँ के लोगों को बर्गर, पेस्ट्री और पिज़्ज़ा खिलाएंगे. उन्हें स्मार्टफोन और लैपटॉप दिखाकर हैरान कर देंगे. वो हमें जादूगर समझेंगे. हम उन दिनों में जाकर अपने अपने पसंदीदा फिल्मस्टार से भी मिलेंगे, उन्हें उनकी भविष्य में आने वाली फ़िल्में दिखाएँगे, वो चकित हो जायेंगे. वो जाने क्या समझेंगे हमें. हम उन दिनों में जाकर लोगों से ये भी कहेंगे, कि जितना अधिकतर लोगों का एक महीने का वेतन होता है, अपने ज़माने में हम तो कभी कभी उतने पैसे एक दिन में क्या एक घंटे में खर्च कर देते हैं. वो अजीब आश्चर्य में आँखें फाड़ के हमें देखेंगे हमारी बातों को सुनेंगे". इस तरह के जाने कितने ही प्लान तुम्हारे मन में पहले से तैयार थे.

तुम टाइममशीन के जरिये वापस अपने घर भी जाना चाहती थी, अपनी माँ को तुम उनके बचपन में देखना चाहती थी. तुम् अपनी परनानी को देखना चाहती थी, जिनकी न जाने कितनी कहानियां तुम अपनी माँ और नानी के मुहं से सुन चुकी थी. तुम उस दिन में वापस जाना चाहती थी जिस दिन तुम्हारा जन्म हुआ था, तुम मेरे बचपन को भी देखना चाहती थी. तुम मेरी माँ को भी उनके स्कूल और कॉलेज के दिनों में जाकर देखना चाहती थी. अक्सर तुम मेरी माँ की पुरानी तस्वीरों को देखकर कहा करती थी कि आंटी कितनी सुन्दर थी कॉलेज के दिनों में,  काश मैं आंटी जैसी सुन्दर होती. तुम चाहती थी कि तुम चुपचाप जाकर उन पुराने दिनों में अपनी माँ के आसपास कहीं बैठ जाओ, वो जहाँ जाएँ तुम उनके साथ साथ वहाँ जाओ. वो क्या कर रही हैं, क्या बातें कर रही हैं, किन लोगों से मिल रही हैं वो सब देखो तुम.

लेकिन जहाँ तुम्हारी ये ख्वाहिश थी वहीँ तुम्हारे मन में एक बात और अटकी रहती थी,  जो की मेरे हिसाब से भी एक वैलिड पॉइंट था. तुम कहती मान लो, जैसे मैं प्लान बना रही हूँ भविष्य में जाने की, वैसे ही कोई भविष्य का इंसान अभी इस वक़्त हमारे बीच मौजूद हो तो? और जैसे मैं सोच रही हूँ कि अपनी माँ के आगे पीछे घूमते रहने की बात, उनकी हर एक चीज़ को नोटिस करने की बात वैसे ही कोई हमारे बीच ही हो और हर पल हमें वो देख रहा हो. ये कहने के बाद तुम हर एक पर शक करने लगती...तुम्हें क्या लगता है? वो हो सकता है? देखो उसे...या वो लड़की जो हमें लगातार देख रही है? क्या लगता है तुम्हें? कुछ समय के लिए तुम्हारे इस खेल में मैं भी जुड़ जाता था और अपने इनपुट देने लगता.

तुम अपनी इस ख्वाहिश को लेकर बहुत सिरिअस थी, ऐक्चूअली इसी ख्वाहिश को लेकर नहीं, बल्कि तुम अपनी सभी ख्वाहिश को लेकर बहुत सिरिअस रहती थी. तुम्हें अपनी इन ख्वाहिशों पर मजाक करना पसंद नहीं था. जहाँ तुम्हारी ये टाईममशीन के जरिये वापस पुराने दिनों में जाने वाली ख्वाहिश थी वहीँ तुम्हारी एक और बड़ी ख्वाहिश थी जिसका जिक्र लगभग हर शाम मुझसे तुम करती थी. तुम्हारी एक अनोखी किताब की ख्वाहिश और फ़िल्में बनाने की ख्वाहिश. आज की शाम तुम्हारे इस ख्वाहिश के नाम कर रहा हूँ, अगली ख्वाहिश तुम्हारी अगले किसी शाम में.

...


आ चल डूब के देखें  एक दो चाँद से कूदें..

आँखों की कश्ती में रात बिताई जाए
झीलों के पानी से नींद बिछाई जाए

चल दरिया बाँध ले पैरों से
चल सनसेट के रंग पहने तन पे,
बुद्धम शरणम् गाए

कुछ ऐसा करे जो हुआ नहीं..जो हुआ नहीं वो करें

चल जेबें भर ले तारों से..दाने छिटकाते चलें,
चल मफलर पहन के बादल के बारिश बरसाते चले

कुछ ऐसा करे जो हुआ नहीं..जो हुआ नहीं वो करें
चलो न कूदें


तुम्हारी ख्वाहिशें..

Monday, January 12, 2015

जो लड़का देखता था

वो दिसम्बर की एक सर्द सुबह थी. जिधर देखो घना कोहरा...लड़के ने खिड़की से बाहर झाँका और खुश हो गया. उसक पसन्दीदा वातावरण था. टी.वी की न्यूज़ एंकर लाख कहती रहे, घने कोहरे से जनजीवन अस्त-व्यस्त, लड़के की दिली तमन्ना थी कि आने वाले दो-तीन दिन यूँ ही रहें...घने कोहरे में डूबी सड़कें, पेड़-पौधे...और उनको चीरती दूर से आ रही किसी मोटर की मद्धिम सी हेडलाइट.

लड़के ने एक बार फिर घड़ी पर निगाह डाली. सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे. यानि लड़की से उसकी मुलाकात में मात्र 25 घण्टों का फ़ासला...और कुछ सौ किलोमीटर की दूरी... कल के बारे में सोच कर ही उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी. क्या करेगा वो कल, जब महीनों बाद उसकी ज़िन्दगी उसके सामने होगी...? वो तो जो करेगा, सो करेगा, पर लड़की कैसे और क्या करेगी, सोच के उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान खिल गई...पगली है वो तो...

हाँ सच में, पागल ही तो थी वो दुनिया की सबसे ज़्यादा भोली और मासूम लड़की...। दुनिया के लिए वह चाहे जो भी हो, उसके लिए हमेशा किसी बच्चे-सी मासूम ही रहेगी. उसकी हरकतें, ख़्वाहिशें, बातें, शिकायतें...उसकी उम्र की लड़कियों के मुकाबले वो कोरा पागलपन होगा, पर वो ऐसी ही थी...कम-से-कम उसके सामने वो अपने असली रूप में होती थी...हमेशा...

लड़की की नज़र से

जिस दिन से लड़के ने उसे बताया, मिलने को तैयार रहना, तुम्हारे शहर आ रहा हूँ...लड़की के मानो पंख लग गए थे. लड़के ने टिकट कन्फ़र्म होते ही सबसे पहले उसे ही सूचना दी थी. अपनी आदत के मुताबिक लड़की ने उसी समय उससे आने और जाने की दोनो ट्रेनों की पूरी डिटेल्स मँगवा ली थी. लड़के को कभी कभी हल्की कोफ़्त भी होती थी...वो कहीं भी जाए...मीलों दूर बैठी वो आखिर कर क्या लेगी...? क्या ड्राइवर के माथे पर दोनाली टिका कर बोलेगी, ट्रेन जल्दी-जल्दी...बिना रुके चलाने को...? या फ़िर बाकी की सब ट्रेनें रुकवा कर उसके लिए लाइन क्लीयर करवाएगी. पर उसकी बहुत सारी बचकानी ज़िदों की तरह वो हमेशा उसकी ये ज़िद भी मान जाता था...चुपचाप...

लड़की को भी वैसे तो कोहरा बहुत पसन्द था, पर जाने क्यों अबकी उसकी ख़्वाहिश थी कि जब लड़का उसके पास आए, आकाश में तेज़ धूप खिली रहे...पूरे दिन...

"मैं तुम्हारे साथ उस खिली धूप में छत पर बैठना चाहती हूँ..." लड़की ने जब कहा तो लड़का हल्का चौंक गया,'छत...? माने...? अबकी तुम बाहर नहीं मिलोगी क्या...?'

लड़की उसके सामने नहीं थी, पर वो जानता था, उसकी बात सुन कर उसने उसी यूनिक तरीके से मुँह बिचकाया होगा,‘आर यू आउट ऑफ़ योर माइंड ऑर वॉट, मिस्टर...? भूल गए, उस पूरे हफ़्ते घर में बस मैं और दी ही रहेंगे...पूरी फ़ैमिली निखिल भैय्या की शादी में शहर से बाहर रहेगी न...'

लड़के के दिल की धड़कन ये सोचने मात्र से बढ़ सी गई थी. सहसा लड़की भी खामोश हो गई थी... दोनो की चुप्पी भी मानो कितना कुछ कह रही थी. लड़की ने दिन गिने थे...मात्र पच्चीस दिन...और एक बार फ़िर कुछ लम्हें...कुछ घण्टे सिर्फ़ उन दोनो के...लड़की ने मन-ही-मन हिसाब लगाना शुरू कर दिया था....अब की मिलेगी तो क्या-क्या कहना है उसे लड़के से...सब कुछ उसने अपने मन की डायरी में नोट करना शुरू कर दिया था. लड़का तो अपने पास किसी भी रूप में ये सब बातें नोट कर भी लेता था, पर लड़की चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकती थी. घर पर किसी ने भी पढ़ लिया तो उसके बाद जो भयानक तूफ़ान आता, उसकी कल्पना मात्र से वह सिहर उठती थी. उसका जो भी हो, उसे परवाह नहीं थी, पर लड़के पर राई भर भी बात आए, ये उसे बिल्कुल गवारा नहीं था.

यूँ तो लड़का कभी उसकी किसी भी बात से इरीटेट नहीं होता था, या कम-से-कम उसे तो यही जताता था, पर जाने क्यों अब उससे ही जाने-अन्जाने ऐसी ग़लतियाँ होने लगी थी जिसे करने के साथ ही उसे अहसास हो जाता था कि उसकी वो ग़लती शायद माफ़ी के क़ाबिल नहीं... लड़के की जगह कोई और होता तो उसे कभी माफ़ न करता, पर वो तो बस वो ही था न...लड़की को दिल के किसी कोने में एक ढाँढस रहता था कि ज़िन्दगी में अगर कभी वह सच में ऐसा कुछ ग़लत कर बैठी, तो और कोई उसके साथ हो न हो, लड़का तब भी मजबूती से उसके साथ खड़ा नज़र आएगा. अबकी बार उसके पहले नम्बर पर उन सब गलतियों के लिए लड़के को एक्स्प्लनेशन देना था.

गिनते-गिनते आखिर वो दिन आ ही गया। रात में खुशी के मारे लड़की की नींद कई बार टूटी, पर सुबह वह हर दिन से ज़्यादा तरोताज़ा थी. भगवान भी जैसे उसके साथ थे, तभी तो बहुत खिल कर धूप निकली थी...कई दिन के छाए कोहरे के बाद...अचानक ही... लड़की ने चुपके से दुआ माँगी...लड़के की ज़िन्दगी में भी अभी जो कोहरा छाया है, वो भी ऐसे ही छँट जाए...

कॉलबेल बाद में बजी, चेहरे पर हज़ार वॉट की मुस्कान लिए हुए लड़की ने दरवाज़ा पहले खोल दिया. लड़का दो पल अपलक उसे देखता रह गया. 'मिस्टर...यूँ ही देखते रहने का इरादा है या अपनी एक इच्छा भी पूरी करोगे...?' कहते हुए जब तक वह कुछ समझ पाता, लड़की ने एक झटके से उसे अपनी बाँहों में भरा और जाने क्या फ़ुसफ़ुसाते हुए अलग भी हो गई...लड़का लाख पूछता रह गया, पर लड़की ने उसकी बात पूरी तौर से इग्नोर कर दी... वो कैसे बताती कि उसके इस अप्रत्याशित हरकत से हतप्रभ रह गए लड़के से उसने कहा था, 'Hold me back...tightly...You Stupid...'

लड़के को आया देख कर दी भी बाहर आ गई थी. उनसे बात करते हुए जितनी बार लड़के की निगाह लड़की से टकराई, वो उसे अपलक ताके जा रही थी...मानो उसकी मौजूदगी के हर पल को वो हमेशा के लिए अपनी यादों में फ़्रीज़ कर लेना चाहती हो. लड़का हमेशा की तरह सब समझ रहा था...उसकी न रुकने वाली बेतहाशा हँसी...उसकी वो हल्की सी मुस्कान...और उन सबके पीछे कहीं बहुत गहरे छिपे उसके आँसू...

लड़के को तो जैसे महारत हासिल थी उसका मन पढ़ने में...वो लाख कोशिश कर लेती कि उससे बात या मैसेज करते समय वो अपने मनोभाव छुपा ले, पर हर बार चोरी पकड़ी जाती. ऐसे में लड़की का फ़ेवरिट डायलॉग होता,'बताओ मिस्टर...ये तुमने अपना कैमरा छुपाया कहाँ है...? आखिर तुमको पता कैसे चल जाता है सब असलियत...’ जवाब में लड़का बस्स...क्यूँ बताऊँ...कह कर बात ऐसे पलट देता कि बातें खत्म होते-होते लड़की सब कुछ भूल कर बस खिलखिला रही होती. लड़की ने बहुत कोशिश की कि वो भी ये कला सीख जाए...जब कभी लड़का यूँ उदास हो, वो उसको भी हँसा सके...पर ऐसा हो कहाँ पाता था. लड़का हमेशा कहता था कि वो उसकी हर बात जानती है, पर फिर भी लड़के की उदासी के पलों में अक्सर उसे महसूस होता...उन दोनो के बीच कोई तो पारदर्शी दीवार थी...जिसके उस पार लड़के के दुःख थे और जहाँ उसका पहुँच पाना लड़के ने जानबूझ कर प्रतिबन्धित कर रखा है...

थोड़ी देर उनके पास बैठ कर...चाय-नाश्ता करवा कर दी ऑफ़िस चली गई थी. दी को उन दोनो पर पूरा भरोसा था. अकेले रहने के बावजूद दोनो अपनी सीमा से बाहर नहीं जाएँगे, ये वो बहुत अच्छे से जानती-मानती थी. घर से बाहर तो लड़की अनगिनत बार लड़के के साथ अकेली रही थी, पर घर की चारदीवारी में उसके साथ बिल्कुल अकेले रहने का यह पहला मौका था. कुछ देर वे दोनो ही एक अजीब सी खामोशी में घिरे बैठे रहे...फिर लड़की ने ही चुप्पी तोड़ी थी, 'सुनो साहब...ये न समझना कि तुम मेरे घर आए हो तो नवाबों की तरह बैठे रहोगे और मैं दौड़ दौड़ कर तुम्हारी चाकरी करूँगी...तुमको भी सब काम में मेरा हाथ बँटाना पड़ेगा...Is that clear...?'

लड़की और भी जाने क्या-क्या हिदायतें दिए जा रही थी, पर लड़का बस मन्द-मन्द मुस्कराता हुआ उसे अपलक देखे जा रहा था, मानो वो कोई बच्ची हो और वो उसकी तोतली ज़बान सुन कर आनन्दित हो रहा हो. लड़की सहसा चिढ़ गई, 'ऐसे न देखो मिस्टर...मैं तुमसे बड़ी हूँ...रिमेम्बर...?'  ये भी लड़की की अजीब सी सनक थी, उससे बड़ा बनने की...। इसके लिए उसने एक अजीब फ़ण्डा बनाया हुआ था,’तुम 87 में पैदा हुए हो...मैं 88 में...हुई न तुमसे एक साल बड़ी...? चलो, अब से आइन्दा इज्ज़त से पेश आना मेरे साथ...।' लड़का भी पलटवार करता,'अच्छाऽऽऽ...एक भी बात या हरकत बता दो अपनी जिससे साबित होता हो कि तुम बड़ी हो गई हो...बच्ची नहीं हो अब भी...?’ और लड़की बहुत याद करने पर भी एक बात ऐसी नहीं बता पाती थी, जो उसने लड़के के सामने समझदारी से की हो... ऐसे में वो बुरा सा मुँह बना कर रूठ जाती और फिर लड़के को ही मनाना पड़ता उसको...एक बच्ची की तरह...

लड़की उस दिन भी अपने उसी फ़ुलटूश बचकाने मूड में थी... ‘चलो जीऽऽऽ...भगवान जब मेरे सपने आज पूरे कर ही रहा है, तो छत पर चल कर धूप भी सेंकते हैं तुम्हारे साथ...’ लड़की लड़के का हाथ पकड़ कर उसे लगभग खींचते हुए छत पर ले गई...वहाँ भी उसकी बतकही में कोई कमी नहीं आई थी, पर जाने कैसे, किस मोड़ पर बात लड़की के जीवन के कुछ दुःखद पलों पर चली गई, दोनो ही नहीं जान पाए... लड़की नहीं चाहती थी कि सब कुछ जानने-समझने के बावजूद उस खूबसूरत से दिन...उन मधुर पलों में लड़का उसके आँसू देख कर ज़रा भी उदास हो...इस लिए जैसे ही भागने के लिए वो उठी, लड़के ने तेज़ी से उसका हाथ थाम उसे अपने सीने से लगा लिया. लड़की ने बहुत हल्का-सा विरोध किया, पर अन्दर-ही-अन्दर वो यही चाह रही थी. अपने सीने से कस कर चिपकी सुबकती लड़की के बालों में प्यार से हाथ फिराते लड़का सिर्फ़ यही दोहरा रहा था,’Its Okay Sweetheart...सब ठीक हो जाएगा...’

कुछ पलों में शान्त होकर भी लड़की वैसे ही उसके गले में बाँहें डाले आँखें बन्द किए खामोश बैठी रही. वो मन-ही-मन बुदबुदा रही थी,’भगवान जी...मुझे कभी इन बाँहों के घेरे से अलग न करना... कितना सकून...कितनी सुरक्षा है इनमें...। and you mister...Listen...Just hold me tightly, You Idiot..'


बिना कुछ भी सुने...बिना कुछ भी जाने...और बिना कुछ भी सोचे...लड़के ने भी अपनी आँखें मूँदी और मन में बोला...आमीन !!

कुछ पल...तुम्हारे नाम...

Wednesday, December 24, 2014

वो एक धूप का दिन था. कई दिनों बाद उस दिन धूप निकली थी. वैसे उन्हें तो सर्दियों के मौसम में धूप से कुछ ज्यादा प्यार न था, लेकिन फिर भी कभी कभी जाड़ों की नर्म धूप में उन्हें घूमना टहलना, पार्क में बैठकर सैंडविच खाना पसंद था.

बस के अन्दर बैठा वो खुश था ये सोच के कि आज वे बहुत देर तक पार्क में बैठ सकेंगे. वो यही सोच कर बस से उतरा था कि वो सीधा पार्क चले जाएगा, लेकिन हवा ठंडी थी. बेहद ठंडी. उसने बैग से अपना मफलर निकाल के कान और गले पर लपेट लिया. इतनी ठंडी हवा में आज पार्क में बैठना संभव नहीं होगा, उसने सोचा. बस के अन्दर से उसे बाहर कि सर्दी का आभास नहीं हुआ था. 

अपनी घड़ी देखी उसने. समय काफी है.. वो अभी चाहे तो बेकरी से दो सैंडविच पैक करवा सकता है, लेकिन उसे डर था कि वो पहले न आ जाए. पाँच मिनट का रास्ता था और वो तेज़ी से चलने लगा था. वो रीगल के पास आएगी. वो वहीँ उसका हमेशा इंतजार करती थी. 

लड़के को हमेशा डर रहता कि कहीं लड़की उससे पहले न आ जाए और उन दिनों अकसर ये होता था, वो उसके पहले पहुँच जाया करती थी. उस दिन भी वो खड़ी थी रीगल के सामने. कोई नयी फिल्म लगी थी और वो एक कोने में खड़ी होकर उस फिल्म के पोस्टर को देख रही थी. वो चुपके से उसके पास आकर खड़ा हो गया. लड़की उसे देखकर मुस्कुराने लगी लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे से मुसकराहट गायब हो गयी और एक चिढ़ उभर आयी चेहरे पर. लड़का समझ गया उसके गुस्से की वजह, वो मुस्कुराने लगा. 

“ऐसे क्या मुस्कुरा रहे हो बेवकूफों की तरह...ये दुनिया का सबसे आसान काम है और तुमसे ये भी नहीं होता...” लड़की ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा और लड़के के कानों पर बंधा मफलर उतार कर उसके गले में डाल दिया और नए सिरे से गिरह लगाने लगती. देखो हो गया बस. देखो अब कितना स्टाइलिश दिखता है ये. लड़की हमेशा चिढ़ जाती थी जब वो सर और कान पर मफलर लपेटे सामने आता था. ऐसे बूढ़े लोग पहनते हैं मफलर, वो कहती. और फिर थोड़ा गुस्से का नाटक करते हुए वो मफलर को बड़े एहतियात से उसके गले में एक टाई के जैसे बाँध देती. 

दोनों फिर निकल पड़ते घूमने. वे दिन भर कनॉट प्लेस घूमते थे. इनर सर्कल का एक चक्कर, आउटर सर्कल का एक  चक्कर और फिर इनर सर्कल.. दोनों तब तक कनॉट प्लेस के चक्कर लगाते रहते जब तक वे थक नहीं जाते. जब थक जाते तो वहाँ लगी सीमेंट की बेंचों पर बैठ जाते. सर्दियों में दिल्ली कितनी खूबसूरत लगती है न? कनॉट प्लेस को एक नज़र देखकर लड़की कहती. कनॉट प्लेस उसे दिल्ली का सबसे खूबसूरत इलाका लगता था. कनॉट प्लेस की ऊपरी मंजिल पर बने दुकानें, दफ्तरों और रेस्तरां को देखकर वो कहती, काश हमें ऊपरी मंजिल पर कोई कमरा मिल जाए किराये पर... कितना खूबसूरत व्यू होगा न? लड़का उसकी इस बात पर हँसने लगता, वो समझता कि वो मजाक कर रही है लेकिन लड़की का चेहरा एकदम शांत और गंभीर रहता. नहीं...ये मजाक नहीं कर रही है, लड़का सोचता. चलो एक आखिरी चक्कर लगाकर हम कॉफ़ी पीने चलते हैं, वो लड़की से कहता और वे दोनों फिर निकल जाते उस कैफे की तरफ जहाँ वे अकसर अपनी खाली दोपहरें बिताया करते थे. वे उन दोनों के खाली दिन थे, और दोनों अपना खाली वक़्त बिताने वहाँ जाया करते थे.

दो तीन गलियारों से चलते हुए वो कैफे आता जहाँ वो जाते थे, उन गलियारों में चलते हुए किसी किसी दुकान को देखकर लड़की ठिठक जाती, वो कुछ सोचने लगती. वहाँ के हर दुकान से उसकी कुछ न कुछ यादें जुड़ी हुई थी, वो शायद उन्हीं बातों को याद करती लेकिन कभी लड़के को बताती नहीं कि वो क्या सोच रही है. आर्चीज़  गैलेरी को देखकर उसे उस बूढ़ी औरत की याद आती जिसका एक बार लड़के ने उससे जिक्र किया था, जो उस दुकान में काउंटर पर रहती थी और लड़के के खरीदे एक तोहफे को देखकर उसने कहा था, “जिसके लिए ये खूबसूरत तोहफा खरीद रहे हो वो जरूर कोई स्पेशल होगी”. उस दिन लड़की इस बात को सुनकर बेहद खुश हो गयी थी.
कॉफ़ी हाउस के बाहर लड़की रुक जाती. वो उस कैफे के नाम के ऊपर लगे सिम्बल को देखने लगती. वो सिम्बल उसे कभी समझ नहीं आया. ‘ये क्या बकवास सिम्बल है?’ वो लड़के से पूछती. ‘ये दिल्ली टूरिज्म का सिम्बल है’. लड़का कहता. बकवास. वो कहती...‘इसमें डी और टी तो नज़र ही नहीं आ रहा तो कैसे हुआ दिल्ली टूरिज्म का सिंबल?हाँ टी तो दिख रहा है लेकिन डी तो किसी एंगल से नहीं, ये तो पी लग रहा है’. लड़के के पास लड़की के इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता. वो चुप रहता. लड़की फिर उसे उस सिम्बल के जाने कितने अलग अलग अर्थ उसे बताने लगती और लड़का मुस्कुराते हुए सुनते रहता. 

कैफे में दोनों एक ही टेबल पर अकसर बैठते, वो उन दोनों का एक तरह से रिजवर्ड सीट था. वो कोने में लगी एक टेबल थी, जहाँ पीछे जाने का दरवाज़ा था. वहाँ हवा आते रहती थी, और ठंड में वहाँ कोई बैठना नहीं चाहता था. लगभग वो टेबल खाली ही रहती थी. दोनों वहीँ बैठते थे, अगर किसी दिन उन्हें वो टेबल खाली नहीं मिलता तो लड़की कहीं और बैठने को तैयार नहीं होती और कैफे से बाहर आ जाती. उस टेबल पर लड़की अपने सारे समान ऐसे फैला कर रखती जैसे ये कैफे न हो उसका घर हो. बड़े ही करीने से एक के बाद एक सारे सामन वो टेबल पर रखती. स्कार्फ, दस्ताने, बैग, मोबाइल, एक छोटी डायरी जिसे वो हमेशा अपने ओवरकोट के जेब में रखती थी.
दिल्ली का ये इलाका, इस कैफे का इलाका लड़की को बहुत पसंद था, उन दिनों वे दिसंबर और जनवरी की दोपहरें यहीं बिताते थे. कैफे में दोनों बहुत देर तक बैठे रहते, और फिर जब वहाँ बैठे बैठे वे ऊब जाते, तो दोनों कैफे के ठीक सामने हनुमान मंदिर के पास आ जाते. वहाँ धूप आती थी और दोनों को वहाँ धूप में बैठना पसंद था. हनुमान मंदिर के सामने लोगों ने छोटे छोटे अपनी दुकानें खोल रखी थीं. टैटू बनाने वाले, भविष्य बताने वाले ज्योतिषी, मेहँदी लगाने वाले, चाय बेचने वाले, समोसे और कचौड़ियों की दुकानें. 

लड़की हर दुकान को बड़े गौर से देखती. ज्योतिषों को वहाँ टेबल कुर्सी लगाए बैठे हुए देखती तो अकसर सोचती, मैं भी किसी दिन अपना हाथ दिखवाऊंगी, लेकिन दिखलाती कभी नहीं थी. उसे भविष्य जानने की उत्सुकता थी लेकिन कभी खुद का हॉरस्कोप अख़बार में नहीं देखती थी, हाँ दूसरे लोगों का..उस लड़के का हॉरस्कोप हर रोज़ पढ़ती अख़बार में. लेकिन खुद का कभी जानने की कोशिश भी नहीं करती. जो होगा देख लेंगे, अभी से क्यों जानूँ मैं कि क्या होने वाला है ज़िन्दगी में. इससे तो इक्साइट्मन्ट ही खत्म हो जाएगा, वो कहती. सरप्राइज उसे पसंद थे. अच्छे बुरे दोनों तरह के सरप्राइज. ‘देखते हैं क्या होगा ज़िन्दगी में, अच्छा बुरा जो भी. अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, एक अच्छी मेमोरी दे जाएगा...एक यादगार पल, बुरा हुआ तो कुछ सिखा ही जाएगा’, वो कहती.

मेहँदी लगाने वालों को देखकर उसे भी मन करता मेहँदी लगवाने का, लेकिन लगवाती कभी नहीं थी. उसे बड़ा नाज़ था खुद पर. ‘मैंने तो मेहँदी लगाने का कोर्स किया है, इनसे कहीं बेहतर मेहँदी मैं लगा सकती हूँ’, वो कहती. ‘सोचती हूँ कि मैं भी यहाँ अपनी एक दुकान खोल लूँ? हम दोनों जो दिन भर में इतनी कॉफ़ी पी जाते हैं वो आराम से कवर हो जायेंगे, वो लड़के को कहती और सच में बैठकर दुकान खोलने की अपनी प्लानिंग लड़के को बताने लगती. 

देखो यहाँ चावल पर नाम लिखे जाते हैं. एक स्टाल के पास खड़ी होकर वो कहती लड़के से. सोचो, दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है. सोचो चावल पर नाम लिखते हैं ये, कैसे लिखते होंगे? उसके मन में उथल पुथल होने लगतीं, उसका मन करता उस दुकान वाले से जाकर एक सवाल करने का, ‘मेरा जन्मदिन है, मैं आपको खूब सारे चावल लाकर दे दूँगी, आप हर दाने पर मेरा नाम लिख दोगे? मेरे जन्मदिन पर जो आयेंगे वो देखेंगे चावल पर मेरा नाम लिखा है, ये कितना यूनिक लगेगा न? मैं पूछूं इनसे?’ वो लड़के से पूछती. लड़के को उसका ज़रा भी भरोसा नहीं था, वो सच में पूछ सकती थी ये बात उस दुकानदार से, वो उसे जबरदस्ती खींच कर उस स्टाल से दूर ले जाता. लड़की अकसर ऐसी यूनिक चीज़ें सोच लिया करती थी शायद इसलिए कि वो हमेशा खुद के लिए यूनिक चीज़ें चाहती थीं. 

यहाँ पर बन्दर कितने हैं, बंदरों को देखकर वो कहती. ‘उछलते कूदते इन बंदरों को देखो, बिना किसी फ़िक्र के बिना किसी चिंता के, फुल ऑफ़ लाइफ लगते हैं न ये बन्दर’. उसे बंदरों से बहुत डर लगता था लेकिन उन्हें देखकर वो खुश भी होती थी. 

एक बन्दर यूँहीं जब उसके पास उछल कर आया, वो बेहद डर गयी. लड़के का कोट पकड़ कर उस  में खुद को छुपा लिया उसने. लड़के ने बन्दर को भगा दिया लेकिन फिर भी वो कुछ देर तक उसी अवस्था में रही. तुम तो डर गयी देखो. डरती हो तुम इतना बंदरों से, लड़का उसे छेड़ने लगा. डरी नहीं मैं साहब, ये तो एक प्यारा मोमेंट था. वो कहती. ‘ये मोमेंट जो था अभी जिसे तुम डर कह रहे हो ये बंदरों की बदमाशी के वजह से था न. मैं तुम्हारे कोट में छिप  गयी थी, मुझे कितना अच्छा लगा. तुम्हें अच्छा लगा न? देखो कितना प्यारा सा वंडरफुल मोमेंट था ये. थैंक्स टू बंदर्स फॉर दिस वंडरफुल मोमेंट’. वो खिलखिलाकर हँस देती. 

दोनों बस स्टैंड की तरफ बढ़ जाते. चलते हुए वो लड़के के कोट के जेब में हाथ डाल देती. सर्दियों में ये उसकी आदत थी. दस्ताने वो सिर्फ एक हाथ में पहनती, एक हाथ उसका हमेशा लड़के की कोट में घुसा रहता था. बस स्टैंड तक जाने के दौरान वो अकसर लड़के से अपने एक सपने के बारे में बात करती. लगभग हर रोज़ ही. उसका एक अरमान था. वो लड़के से कहती, ‘चलो एक स्लीपिंग किट खरीदते हैं और उसे लेकर निकल जाते हैं कहीं भी, किसी भी दूसरे शहर, एक शहर से दूसरे शहर घूमते हैं, जहाँ मन किया वहीं अपना डेरा डाल लेंगे हम. 

हम जहाँ भी जायेंगे ये स्लीपिंग किट अपने कन्धों पर डाल के ले चलेंगे. जहाँ मन किया वहीं सो जायेंगे. किसी पार्क के किसी कोने में, किसी झील के किनारे, पहाड़ों पर. होटल में रुकना ही नहीं है हमें. कितनी भी सर्दी हो हम बाहर ही सो जायेंगे, जानते हो बहुत कम्फी होता है स्लीपिंग बैग, तुम्हें पता है मैं एक बार सो चुकी हूँ एक स्लीपिंग बैग में. 
‘ठण्ड में मर जायेंगे हम बाहर सोने से’. लड़का कहता उससे. 
बेकार की बातें न करो. लड़की चिढ़ जाती. ‘सोचो ये बेचारे बेघर लोग कैसे ठंड में रात गुज़ार देते हैं, हम तो फिर भी इतने कम्फी कम्फी स्लीपिंग बैग में सोये रहेंगे, कुछ भी पता नहीं चलेगा. वो कहती. बोलो चलोगे? बोलो? चलो निकलते हैं घूमने, आज ही शाम निकल जाते हैं. रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड जाकर देखते हैं जो पहली ट्रेन या बस मिली उससे निकल जायेंगे कहीं भी.. बोलो. चलोगे? बोलो जल्दी बोलो. वो जिद करने लगती. 

मजा आएगा. बहुत मज़ा आएगा. ठण्ड में खुले आकाश के नीचे सोना. सोचो तुम ज़रा. हाउ  फैसनेटिंग. गर्मियों में तो लोग सोते ही हैं लेकिन हम ठण्ड में बाहर सोयेंगे, दिसंबर और जनवरी की सर्दियों वाली रात में. हाउ वंडरफुल आईडिया इज दिस. हम दोनों स्लीपिंग बैग में कवर रहेंगे और बस हमारे चेहरे  बाहर ताक रहे होंगे आसमान को. हाउ रोमांटिक न? 

वो लड़के की तरफ देखने लगती. वो ऐसे ही अकसर लड़के को किसी विचित्र मायावी सपनों के देश में लेकर चली जाती, और लड़के को भी उसके साथ ये सब कल्पना करना अच्छा लगता था. वो भी खो जाता लड़की की इस सपनों की दुनिया में. वो दिल से चाहता, कि सच में हमें निकल जाना चाहिए  ऐसे ही घूमने, जैसे लड़की कह रही है. वो भी खो जाता लड़की के साथ साथ उसकी कल्पनाओं में. 

बस स्टैंड के ठीक सामने वाले दुकान में लड़की देखती कि स्लीपिंग किट बिकते हैं, वो जिद करने लगती, चलो न खरीदते हैं. लड़के की जवाब की प्रतीक्षा किये बैगर वो दुकान में घुस जाती. लड़का भी उसके पीछे पीछे दुकान में चला आता. 

दुकान वाले व्यक्ति से वो बोलती, हमें सबसे अच्छा स्लीपिंग किट दिखाईये, जिसमे कितनी भी ठण्ड हो, चाहे हम हिमालय पर चले जाएँ, हमें सर्दी न लगे. दुकान वाला उसके सवालों से कन्फ्यूज हो जाता. वो दिखाता जो उसके स्लीपिंग बैग होते वो. 

‘हम एक ही स्लीपिंग बैग लेते हैं, हमारे पैसे बच जायेंगे, वो कहती’. दुकान वाला लड़की की शरारती बातों से अंजान, कहता मैडम ये बस एक ही व्यक्ति के लिए बना है. ‘ओफ्फ्हो...मैं तो इतनी हलकी फुलकी हूँ, मैं इसमें एडजस्ट  कर जाऊंगी. है न? वो लड़के के तरफ देखती. 
‘बेशर्म हो तुम..’, लड़का कहता.
लड़की मुस्कुराने लगती.
दुकानदार कन्फ्यूजन में कभी लड़के को देखता तो कभी लड़की को और कभी उस स्लीपिंग बैग को जिसे देखकर लड़की ने कहा था कि हम दोनों एक में ही सो जायेंगे. 

शाम में दोनों बस से वापस लौटते थे. बस में खिड़की के पास बैठकर बाहर सड़कों को देखना, चल रहे लोगों को, गाड़ियों को देखना लड़की को पसंद था. वो खिड़की के बाहर देखकर जाने क्या क्या बोलती जाती, कभी खुद से कभी लड़के से. लड़के को ये समझ कभी नहीं आता कि कौन सी बात वो लड़के से बोल रही है और कौन सी बात खुद से. वो सो जाती लड़के के कन्धों पर. स्टॉप आने पर लड़का उसे उठाता. वो जागने से इंकार कर देती, ऐसे ही रहने दो न मुझे, वो लडके से कहती. ये मेरा सबसे बड़ा सुख है तुम्हारे कन्धों पर ऐसे सोना, लड़की कहती.

बस स्टैंड से लड़की के घर तक का रास्ता थोड़ा लम्बा था, लेकिन फिर भी वे रिक्शा नहीं लेते. वो बहुत चौड़ी और अच्छी सड़क थी. दोनों तरफ बड़े बड़े पेड़ लगे थे, पार्क थे सड़क के दोनों तरफ और उन दोनों को उस सड़क पर शाम के अँधेरे में चलना अच्छा लगता था. 

लड़का लड़की के अपार्टमेंट के अन्दर कभी नहीं जाता, वो बाहर  गेट के पास ही खड़ा रहता और तब तक खड़ा रहता जब तक लड़की अपार्टमेंट की सीढ़ियों से ऊपर न चले जाए, तब तक वो देखते रहता लड़की को. लड़की लेकिन गेट से अन्दर घुसने के बाद कभी पलट कर उसे नहीं देखती. वो हर दिन सोचता कि शायद लड़की पलट के देखेगी लेकिन नहीं देखती. वो मुस्कुरा देता, ‘ये नहीं देखने वाली’, खुद से ही कहता और आगे बढ़ जाता.

वापस उस लम्बी सड़क पर चलते हुए लड़के को बहुत अच्छा महसूस होता, उसका मन बहुत हल्का लगने लगता. वो मफलर खोलकर कान में लपेट लेता...और फिर याद आती लड़की की सुबह की फटकार. वो मुस्कुरा देता. वापस कान से मफलर निकाल कर गले में लपेट कर गिरह बाँधने की कोशिश करता, जैसे लड़की बाँधती थी. लेकिन उससे गिरह नहीं बंधती. ‘ये दुनिया का सबसे भारी काम है’, वो बुदबुदाता और गले में मफलर को यूँही लपेट लेता. 

दिल्ली के ये दिन, दिल्ली के सर्दियों के ये दिन उसके ज़िन्दगी के सबसे अच्छे दिनों में से हैं, वो सोचता और अपने घर की तरफ बढ़ जाता. 

गिरहें यादों की...

Sunday, December 14, 2014


दिसंबर तुम्हारे लिए हमेशा खुशियाँ लेकर आता था. तुम्हें दिसंबर से प्यार था ये हम सब जानते थे. दिसंबर के आते ही तुम खुश हो जाया करती थी. बेसब्री से इंतजार रहता था तुम्हें दिसंबर की पहली सुबह का. हाँ लेकिन जितना खुश तुम दिसंबर के आने पे होती थी, उतनी ही उदास तुम ये बात सोच कर हो जाया करती थी कि ये दिसंबर सिर्फ इकत्तीस दिनों में वापस चला जाएगा. मुझसे अकसर कहती थी तुम, कि जो तुम अगर दिसंबर के दिन बढ़वा दो तो दुनिया की सारी दौलत तुम्हारे नाम कर दूँगी.

तुम्हें सर्दियों में सुबह पार्क में टहलना अच्छा लगता था. सुबह के कोहरे में सड़कों पर चलना तुम्हें पसंद था. गर्मियों की सुबह जब लोग चार पाँच बजे जाग कर टहलने निकलते थे, तुम देर तक सोयी रहती थी लेकिन सर्दियों की सुबह जब सारे लोग रज़ाई में दुबके सोये रहते थे, तुम जाग जाया करती थी और मुझे ना चाहते हुए भी तुम्हारे साथ जागना पड़ता था. कितनी मिन्नतें करता था मैं तुमसे, कि सर्दियों में मुझे देर तक सोने दो, लेकिन तुम तो बस हुक्म दे दिया करती थी... एक घंटे में मिलो पार्क में. 

सुबह की शुरुआत हमारी उसी पार्क से होती थी, वो पार्क जो हमारे मोहल्ले का सबसे बड़ा पार्क था और जहाँ आते हुए हमेशा मुझे इस बात का डर रहता था कि कहीं मुझे किसी ने तुम्हारे साथ देख लिया तो? वैसे इसकी ज्यादा चिन्ता नहीं थी, सर्दियों में इतनी सुबह लोग भी कम आते थे, और मैं ख़ास सावधान भी रहता था. हम उस पार्क में पहुँचने वाले सबसे पहले लोगों में से रहते थे. तुम जहाँ टहलने में और बातें करने में मशगूल रहती थी, मैं तुम्हारी बातें सुनने में और आसपास नज़र दौड़ा कर ये देखने में व्यस्त रहता था कि कोई हमें देख तो नहीं रहा है. वैसे कोई जान पहचान वाले लोग भले न देखें, यूँ लोग तो हमें देखते थे ही. मुझे लगता है कि सुबह पार्क में हम दोनों को यूँ घूमते टहलते, बातें करते देख लोग शायद थोड़े हैरान भी होते होंगे, या क्या पता हँसते भी होंगे हम पर. पार्क में आये सभी लोगों में से सिर्फ हम दोनों ही ‘आउट ऑफ़ प्लेस’ लगते थे. एक तुम, जो सज धज कर सुबह आती थी. और दूसरा मैं, लेदर शू, लेदर जैकेट और जींस पहन कर सुबह मॉर्निंग  वाक करने आता था. ये तो तय था कि लोग हमें लवर्स समझते होंगे, वो भी मैड फॉर एच अदर टाइप लवर्स, जो एक दूसरे के लिए इतने पागल हैं कि सर्दियों की सुबह इतनी ठंड में भी पार्क में टहलने आ जाते हैं, हाथों में हाथ डाले टहलते हैं, बातें करते हैं. तुम कितना चिढ़ती थी जब मैं तुम्हें ये बात कहता था, कि देखो वे सारे हमें लवर्स समझते हैं. तुम चिढ कर कहती थी “लवर्स? ह्म्म्म...? हाँ यही समझते होंगे, मोरोन!! दोस्त हैं, ये तो समझते नहीं होंगे कोई”. बोल के तो देखे कोई लवर्स हमें, मेरे सामने... उसका जबड़ा  न तोड़ दूँ फिर कहना.. ये बोलते ही तुम सच में अपने मुक्के को दिखाती थी मुझे जिससे मैं डर जाता था. तुम्हारा कोई भरोसा भी कहाँ था, मजाक में ही सिर्फ ये दिखाने के लिए कि तुम्हें मुक्के चलाना आता है, कितनी  बार मुझपर बॉक्सिंग कर चुकी हो तुम.

उसी पार्क के पीछे वाला  गेट जो हनुमान मंदिर के तरफ खुलता था  वहाँ इम्तियाज चचा की चाय दुकान थी. सुबह टहलने आये सभी बुजुर्ग, महिलाएं और लड़के लड़कियाँ  वहाँ सुबह की पहली चाय पीते थे. हर सुबह उनके दुकान खुलने से पहले हम दोनों वहाँ पहुँच जाते थे. इम्तियाज चचा भी हमें पहचान गए थे. वो अकसर सुबह हमें देखकर एक ही बात दोहराते थे, मुझसे हँसते हुए कहते, ये लड़की मेरे दुकान के जागने से पहले जाग जाती है और चली आती है चाय पीने”. चचा की इस बात पर तुम चचा से कहती “सिर्फ आपके दुकान से पहले नहीं, इस लड़के और इस शहर से भी पहले मैं जाग जाती हूँ. यकीन न आये तो पूछ लीजिये इससे. मुझसे तो बड़ा परेशान रहता है ये लड़का. 
चचा हँसने लगते थे और उनके साथ मैं भी.

सच कहूँ तो मैं तुमसे परेशान तो बिलकुल नहीं था. तुमसे भला कभी परेशान हो सकता था मैं? लेकिन हाँ हर सुबह की तुम्हारी ये जिद कि पार्क में मिलना है, टहलना है, कोहरे में घूमना है, इस वजह से घर पर अकसर मुझे अजीब सिचुएशन का सामना करना पड़ता था. 

तुम तो तुम थी. बात मानना तो दूर, अपनी मर्ज़ी का करती थी. उन दिनों जबकि हम दोनों के पास मोबाइल फ़ोन था, तुम फिर भी मुझे हर सुबह लैंडलाइन फोन पर ही कॉल कर के जगाती थी. मेरे घर का वो पुराना लैंडलाइन फोन था, उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि तुम्हारे कॉल से घर के सभी लोग जाग जाते थे. अकसर पापा मुझे छेड़ने के अंदाज में कह भी देते थे, ये फ़ोन अब हमारे घर का मॉर्निंग  अलार्म हो गया है, ठीक पाँच बज कर पैंतीस मिनट पर ये हम सब को जगाता है.

कितनी बार तुम्हें मैं डांट चुका था कि तुम मेरे मोबाइल पर फोन किया करो. लेकिन तुम मानती कब थी? लैंडलाइन पर फोन करने की तुम्हारी सिर्फ एक वजह होती थी, तुम जानती थी कि ये फोन मेरे बिस्तर के पास वाले टेबल पर रखा होता था और तुम्हें यकीन था कि उसकी रिंग सुनकर मैं जाग जरूर जाऊँगा. मोबाइल का तुम्हें कोई भरोसा नहीं था. दरअसल मोबाइल का भरोसा तो था, लेकिन तुम्हें मेरा भरोसा नहीं था. तुम्हें जाने क्यों अकसर लगता था कि मैं सुबह जागने से बचने के लिए मोबाइल साइलेंट मोड में कर के न सो जाऊँ.
सुबह जब तुमसे मिलकर मैं वापस आता मैं जानता था कि मुझपर कैसे कैसे व्यंग बाण चलने वाले हैं, वापस आते ही पापा का सवाल होता “इतनी सुबह सुबह किसका फोन आता है आजकल? और फ़ोन के आते ही हड़बड़ाए हुए से कहाँ निकल जाते हो? पापा के ये पूछते ही, पीछे से माँ भी चुटकी लेने में देर न करती... “सुबह सुबह और कहाँ जाएगा? जॉगिंग करने ही जाता होगा...है न?” उधर से बहन बोलती “हाँ, वो बात तो है, लेकिन सुबह सुबह जॉगिंग करने लेदर शू, जीन्स और जैकेट पहन कर भाई क्यों जाता है? पापा भी एक आखिरी  तीर छोड़ते, “तो गर्मियों में भी किया करो जॉगिंग. सेहत के लिए अच्छा होता है न. गर्मियों के सुबह तो तुम घर से निकलते नहीं हो...”

सिर्फ इस एक वजह से तुम्हें जाने कितनी बार कह चुका था मैं, तुम सुबह की अपनी ये जिद छोडो, शाम में तो हम रोज़ मिलते हैं. मुझे घर में कितने सवालों का सामना करना पड़ता है मालूम भी है तुम्हें?

लेकिन तुम्हें मेरी इस बात से ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता. तुम कहती “तुम बेशक परेशानियों का सामना करते रहो, लेकिन सुबह की चाय और पार्क में टहलने के वक़्त में कोई बदलाव नहीं होगा”. हाँ, वन्स इन अ ब्लू मून तुम्हें मुझपर दया आती या किसी दिन तुम मुझपर जरूरत से ज्यादा मेहरबान रहती तो कहती... “चल शॉपिंग पर चलते हैं, तुम्हारे लिए ट्रैक सूट और जूते खरीद लाती हूँ, फिर तो कोई सवाल नहीं पूछेगा न कि सुबह कहाँ जाते हो? तुम कह सकते हो बेझिझक कि जॉगिंग पर जाते हो, या इवन बेटर, आंटी से मैं बात करती हूँ, कहती हूँ कि रोज़ हमारी मॉर्निंग डेट होती है, आप प्लीज सवाल न पूछा कीजिये इससे”. 
नो  वे. मैं गुस्से में कहता. 
तुम समझ जाती थी कि तुम्हारी जीत हुई है और तुम मुस्कुराने लगती. मुझे मनाते हुए कहती, बस अप्रैल भर तो तुम्हें सुबह परेशान करूँगी मैं.. उसके बाद कहाँ? 

हम दोनों का हर दिन का कमोबेश यही शिड्यूल रहता था, कम से कम सुबह का शिड्यूल तो यही था, एकदम फिक्स्ड. बिना किसी बदलाव के. हाँ कभी कभी इस शिड्यूल में तुम या मैं एक दूसरे को सर्प्राइज़ देने के लिए थोड़ा बदलाव कर देते थे. जैसे की उस दिन हुआ था, वो जो तुम्हारे जन्मदिन की सुबह थी और उस दिन सुबह के शिड्यूल में बदलाव मैंने किया था. 

तुम्हारे जन्मदिन की सुबह की प्लानिंग मैंने दो दिन पहले से कर रखी थी जिसकी तुम्हें कोई खबर नहीं थी. तुम तो अपने जन्मदिन की सुबह भी बेखबर सोयी हुई थी. एक शाम पहले जो मैंने तुमसे कह दिया था कि सुबह आना मेरा मुमकिन नहीं है घर में कुछ काम है. तुम उदास तो बहुत हो गयी थी क्योंकि वो तुम्हारे जन्मदिन की सुबह थी और तुम चाहती थी कि मैं तुम्हारे साथ रहूँ. लेकिन घर पर काम की बात सुनकर तुमने भी कोई जिद नहीं की थी. 

उस सुबह ठीक साढ़े पाँच बजे मैंने तुम्हें फोन किया था. 

तुम गहरी नींद में थी. तुमने नींद में ही फोन रिसीव किया, दूसरी तरफ मैं था. फोन पर तुम्हारे लिए सड़क किनारे चाय दुकान पर खड़ा होकर फोन पर हैप्पी बर्थडे सॉंग गा रहा था, बिना इस बात की परवाह किये हुए कि आसपास वाले लोग देखेंगे मुझे, यूँ गाते सुनेंगे तो क्या सोचेंगे. और जिसके लिए मैं ये जन्मदिन का गाना गा रहा था, वो समझ रही थी कि वो कोई सपना देख रही है. हाँ मैडम, आपने उस सुबह यही तो समझा था.. कि आप कोई सपना देख रही हैं. “तुम यार सपने में इतने बेसुरे नहीं सुनाई देते..” यही इग्ज़ैक्ट शब्द थे जो तुमने उस सुबह नींद में कही थी मुझसे और जिसके वजह से तुम्हें जाने कितने समय तक मैं छेड़ता रहा था.. “तुम्हें तो मेरी आवाज़ बेसुरी लगती है..” और तुम जाने कितनी बार इस एक बात के लिए मुझसे माफ़ी माँग चुकी थी... “अरे यार मैं नींद में थी न...” 

तुम नींद में वैसे अकसर बातें करने लगती थी. रात में तो लगभग तुम्हारी आदत थी ये, तुम बातें करते हुए सो जाया करती थी.. कब तुम्हें नींद आ जाती थी ये तुम्हें खुद पता नहीं होता था, और तुम नींद में ही मुझसे बातें करते रहती थी. तुम्हारे कितने राज़ की बातें मैंने इस तरह ही तो जाना था. 

उस सुबह भी तुम नींद में थी और मुझसे बातें कर रही थी.. तुम्हें मैं नींद से जागने के लिए, उठने के लिए, बाहर आने के लिए फोन पर कह रहा था, और तुम समझ रही थी कि तुम फिर से कोई सपना देख रही हो.. और नींद में ही मुझसे बार बार कह रही थी.. “चुप भी रहो प्लीज, सुबह यूँ आर्डर देने का काम मेरा है. तुम क्यों मुझे आर्डर दे रहे हो और वो भी सपने में. मैं सोयी हुई हूँ अभी”. 

बड़ी मेहनत करनी पड़ी थी उस दिन तुम्हें ये यकीन दिलावाने के लिए कि मैं सच में तुम्हारे अपार्टमेंट के गेट के बाहर खड़ा हूँ. नींद में ही तुम चलते हुए अपनी खिड़की के पास आई थी, और जब मुझे तुमने खड़े देखा तब तुम्हें सच में यकीन आया था कि मैं तुम्हारे घर के बाहर खड़ा हूँ. 

किस तरह से तुम भागते हुए नीचे आई थी, कितनी हड़बड़ी में और आते ही कैसे मुझपर बरस पड़ी थी. “मरवा दिया था तुमने, ऐसे कोई शार्ट नोटिस देता है क्या? जानते भी हो कैसे आई हूँ मैं? माँ से बोलना पड़ा कि रश्मि ने अचानक बुला लिया...तुम सच में पागल हो”. 

मेरा तो मन किया उस वक़्त कि उलटे तुमसे पूछूं, अच्छा बताओ रोज़ सुबह ऐसे मुझे शोर्ट नोटिस देती हो तो मैं कैसे मैनेज करता हूँ? लेकिन वो तुम्हारा जन्मदिन था और मैं चाहता था कि जो भी छोटी प्लानिंग सुबह की मैंने की है उसे तुम एन्जॉय करो. 

तुम्हारा सारा गुस्सा वैसे तो काफूर हो गया था उसी वक़्त जब तुम्हें मैंने नीचे आने पर तुम्हारे ही अपार्टमेंट के गार्डन में खिला गुलाब का वो फूल दिया था, और तुम्हें जन्मदिन की बधाई दी थी. हाँ लेकिन तुम्हारे मन में कई सवाल अब भी उमड़े हुए थे... “तुम आज गाड़ी लेकर क्यों आये हो? और तुम कैसे आये आज? आज तो तुम्हें काम था?” गाड़ी के पिछली सीट पर रखे एक नए बैग को देखकर तुम्हें और आश्चर्य हुआ. ये बैग किसका है? और तुम इसे सुबह क्यों लेकर आये हो? तुम सुबह की बहुत सी बातों से कन्फ्यूज्ड हो रही थी और मैं तुम्हारे इस कन्फ्यूज अवस्था का मजा ले रहा था.

चलो चाय की दुकान पर, वहाँ चाय पीते हैं और तुम्हारे सभी सवालों का जवाब तुम्हें वहीं मिलेगा. मेरे इस जवाब से तुम और कन्फ्यूज हो गयी थी. 

चाय दुकान पहुँच कर तो तुम्हें और भी आश्चर्य हुआ. आमतौर पर इनकी चाय दुकान सुबह खुलती नहीं है, बस एक ठेले पर ये चाय बनाते हैं और हम वहीँ ठेले के पास खड़े होकर चाय पीते थे, लेकिन तुमने देखा कि दुकान खुली थी और बेंचे लगी हुई थीं. ये हो क्या रहा है आज? तुमने मेरी तरफ देखकर कहा था. सुबह से एक के बाद एक हर बात पर तुम्हें आश्चर्य हो रहा था – सुबह यूँ मेरा तुम्हारे घर आ जाना, पीछे वाली सीट पर उस रहस्मयी बैग का होना, और अब ये चाय दुकान का खुला होना, और उसपर भी सबसे बड़ी आश्चर्य की बात थी, चाय दुकान पर गाने बजते रहना... और वो भी तुम्हारी पसंद के गाने और दुकान पर आते ही चचा का तुम्हें जन्मदिन की बधाई देना. 

ये सब मेरे प्लानिंग का ही एक हिस्सा था. मैंने पहले ही शाम में आकर सब समझा दिया था इम्तियाज़ चचा को. सुबह सब मेरे प्लान के हिसाब से हो, इसके लिए मुझे थोड़ी मेहनत करनी पड़ी थी इम्तियाज चचा को मनाने में, लेकिन वो जल्द ही मान गए थे. एक कैसेट मैंने दे दिया था उन्हें जिसमें तुम्हारे पसंद के गाने रिकार्डेड थे.
हम्म...जन्मदिन की सुबह, ड्राइविंग थ्रू द सिटी, ठण्ड, कोहरा, चाय, अ पोसिबल गिफ्ट इन द बैग....अब? अब क्या? तुमने यही पूछा था न मेरे से. 

मैंने तुम्हें जवाब नहीं दिया बल्कि सड़क के तरफ इशारा किया, तुमने उधर देखा.. उधर से हमारे तीन दोस्त, समर, शिवी और अवि आ रहे थे. तुम लगभग ख़ुशी से उछल पड़ी थी, “अरे ये तो सरप्राइज बर्थडे पार्टी हो गयी मेरी...”

हाँ, वो सरप्राईज बर्थडे पार्टी ही थी तुम्हारी जिसे मैंने प्लान किया था. ये सब मैंने दो दिन पहले ही शाम में सोच लिया था, जब तुम अपने स्विट्ज़रलैंड की छुट्टियों के बारे में बता रही थी. वहाँ जिस होटल में तुम रुकी थी, उसके सामने ही एक कैफे था, जो चौबीसों घंटे खुला रहता था, और जहाँ तुम हर दिन सुबह की ठण्ड और कोहरे में कॉफ़ी पीती थी और जहाँ एक सुबह तुमने अपनी छोटी बहन का जन्मदिन सेलिब्रेट किया था. तुम्हारे ऊपर उस सुबह का हैंगोवर अब तक हावी था, और हर शाम तुम उस सुबह का जिक्र करती थी. शायद तब से ही मैंने ये सोचा था कि कुछ ऐसा अपने शहर में करूँगा, तुम जब रहोगी यहाँ.. तुम्हारे जन्मदिन की सुबह. और आज वही सुबह थी. 

मैं खुश था कि  जो मैंने सोचा था वो सब ठीक वैसा ही हुआ. हम पाँच दोस्त, चाय दुकान पर बैठे तुम्हारे जन्मदिन को सेलिब्रेट कर रहे थे. केक जो मैं पहले ही लेते आया था, और मैगी नूडल्स जो चचा की मेहरबानी से सुबह उनके दुकान पर ही बनी थी और चाय. तुम सुबह की इस छोटी सी पार्टी से बहुत खुश थी. “वन ऑफ़ द बेस्ट बर्थडे मॉर्निंग ..” तुमने कहा था. तुम खुश थी, तो मैं भी खुश था. 

हाँ, लेकिन फिर भी एक सवाल तो तुम्हारे मन में अब भी था, कि मेरी गाड़ी के पीछे वाली सीट पर कौन सा बैग रखा है? और वो बैग किसका है? हाँ तुम्हारा वो अंदाज़ा सही था, कि उसमें तुम्हारे लिए तोहफें रखे थे. एक नहीं बल्कि कई सारे तोहफे...एक वूलेन स्कार्फ, ईअररिंग , दो किताबें, एक डायरी, दो फिल्म के सीडी, बहुत से चॉकलेट्स  और मेरी बनाई वो आखिरी पेंटिंग, जिसमें लिखा था.. “Dare to Dream !


कोहरा...ठण्ड और चाय की चुस्कियों में घुली यादें...

Sunday, October 19, 2014

वो लड़के के उँगलियों से खेल रही थी. उसी उँगली से जिसपर कुछ देर पहले लड़की की शैतानी की वजह से एक हलकी खराश लग गयी थी, और लड़की ने अपने बैग से लाल रिबन निकाल कर लड़के के उस उँगली पर बाँध दिया था. वो लड़के की उँगली को हाथ में लेकर, अपनी आँखें बंद कर के जाने कौन सा मंतर पढ़ रही थी, या शायद खुद से बातें कर रही थी...

“ये क्या पागलपन है, बस एक छोटी सी खराश ही तो है, ये रिबन बाँधने की क्या जरूरत है?”, लड़के ने कहा.
“देखो, मेरे बैग में एक बैंड-एड भी रखा है, मैं चाहती तो तुम्हारी उँगली पर उसे भी बाँध सकती थी, लेकिन वो कितना अन-रोमांटिक होता.. कम से कम थोड़ा तो फ़िल्मी टाइप फील लेने दो मुझे. देखते नहीं कैसे हीरोइन हीरो की कटी उँगली पर अपने साड़ी के पल्लू का एक हिस्सा फाड़ कर बाँध देती है?
“अच्छा, तुम तो लेकिन साड़ी नहीं पहनी हो, चलो साड़ी न सही, अपने दुपट्टे का ही कोना फाड़ कर बाँधती. और भी फ़िल्मी टाइप फील आता न?”.

लड़की शायद चिढ़ गयी इस बात से. वो अजीब शक्ल बनाकर लड़के को देखने लगी. थोड़ी देर चुप रही वो और फिर मुहँ बिचकाकर कहती है..
“जाओ मिस्टर ये मेरा फेवरिट दुपट्टा है, तुम्हारी इस स्टुपिड उँगली की वजह से मैं अपना दुपट्टा फाड़ दूँ? ना...नेवर..! और दूसरी बात ये कि फिल्म में जाने क्या गलत-सलत दिखाते हैं. पता नहीं फिल्म में कैसे हीरोइन अपने दुपट्टे या साड़ी के पल्लू को इतने आसानी से फाड़ लेती है, और वो भी इतना ऐक्यूरट कि हीरो के उँगली पर उसके साड़ी के पल्लू का वो टुकड़ा एक बैंड-एड की तरह  फिट आये, न बड़ा न छोटा. मुझे तो लगता है जरूर हीरोइन के उँगलियों में ब्लेड लगा होता होगा, वरना इतने आसानी से साड़ी या दुपट्टे का पल्लू फटता है क्या? मुझसे तो नहीं फटता, इसलिए मैंने आसान उपाए सोचा, ये रिबन बाँध दिया..!

उँगली में बंधे रिबन का एक सिरा हाथ में लेकर वो कहने लगी... जानते हो इस दुनिया में कितनी ही छोटी छोटी चीज़ें हैं जिनके बारे में हम नहीं सोचते, लेकिन अगर देखो तो वो कितने मायने रखती है. एक साधारण सा लाल रिबन, एक रिंग, एक किताब, कुछ कवितायें, किसी कागज़ पर पड़े कुछ कॉफ़ी के धब्बे, किसी के बोले महज दो शब्द ‘रिमेम्बर मी’..! कभी कभी इंसान के लिए कितनी जरूरी सी हो जाती हैं ये छोटी छोटी बातें, ये तुमने सोचा है कभी? कुछ के लिए तो अपनी ज़िन्दगी वापस पाने का ये जरिया बन जाती हैं.

तुम्हें वो फिल्म तो याद होगी न जिसमें भविष्य की कहानी थी, जिसमें दिखाया गया था कि आज से बहुत साल बाद कुछ ऐसा होगा कि लोग इमोशनलेस हो जायेंगे. एक ऐसा विश्व युद्ध होता है उस फिल्म में, जिसके बाद दुनिया से प्यार, मोहब्बत, एहसास सब खत्म हो जाते हैं. जहाँ इमोशनल होना एक अपराध माना जाता है. हँसने वालों को रोने वालों को प्यार करने वालों को पकड़ लिया जाता है, रस्सी से जकड़ा जाता है, कोड़े बरसाए जाते हैं उनपर, मार दिया जाता है उन्हें. ऐसी दुनिया बन बन जाती है. हँसना, रोना, गाना, नाचना, कहानियां पढ़ना, किताबें पढ़ना, कवितायें पढ़ना... सब अपराध हो जाता है उस दुनिया में. यहाँ तक कि अपनी पसंदीदा पेंटिंग रखना भी या अपने बीवी, प्रेमी या बेटे बेटियों की तस्वीर पास में रखना भी गुनाह माना जाता है, और जिसकी सज़ा बस मौत होती है.

उसमें जो नायक है, वो उसी निर्दयी पुलिस का हिस्सा है जो इमोशनल लोगों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें पकड़ते हैं और उन्हें मार देते हैं. लेकिन कुछ ऐसा होता है फिल्म के नायक के साथ जिससे उसमें वापस से वही एहसास जीवित हो जाते हैं, उसमें फिर से प्यार जागने लगता है. जानते हो न कैसे? उसकी बीवी के एक लाल रिबन से, जिसे वो अपने पॉकेट में बाकी पुलिस वालों से छुपा कर रख लेता है, अपने दोस्त के पास मिली एक कविताओं की किताब से, जिसे वो पढ़ता है हर रात, उस छोटे से प्यारे से ‘पपी’ के वजह से, जिसे उन निर्दयी पुलिस वालों से बचा लाता है अपने पास, अपनी बीवी के कहे दो शब्द ‘‘रिमेम्बर मी’ से, जो उसे तब याद आता है जब वो उस लाल रिबन को अपने हाथों में लेता है.

सोचो ज़रा, यही वो व्यक्ति था जिसे अपने दोस्त को मारने का हुक्म मिला था. इसके दोस्त की बस इतनी खता थी कि उसमें एहसास जीवित थे, वो साहित्य पढ़ता था, वो सबसे छुप कर कवितायें पढ़ता था, एक लड़की से प्यार करता था. और इसने अपने दोस्त को मारने से पहले एक बार भी नहीं सोचा कुछ. बस इसे हुक्म मिला, और अपने दोस्त को मारने चला आया था. इसने दोस्त को मारने से पहले उससे माफ़ी माँगी, दोस्त का जवाब था, ‘तुम्हें माफ़ी माँगने की जरूरत ही नहीं. तुम माफ़ी शब्द का अर्थ ही नहीं समझते, तुम एक मशीन हो’. और सोचो, अपने दोस्त को मारने के बाद उसमें कैसे बदलाव होते हैं, एक मशीन से इंसान बन जाता है वो, अपने दोस्त के पास मिली उस किताब से, लाल रिबन से, उस ‘पपी’ के वजह से. 

वैसे तो ये कहानी है, लेकिन सोचो दुनिया कितनी क्रूर हो सकती. ये कहते हुए लड़की काँप जाती है. लड़खड़ाई आवाज़ में वो आगे कहती है, सोचो अगर कभी ऐसा हुआ तो ऐसी दुनिया कितनी भयानक होगी. लोग कितने निर्दयी हो जायेंगे? अगर देखो तो शुरुआत अभी से ही हो गयी है, तुम्हें नहीं लगता ऐसा? अभी ही कौन सा लोगों को किसी के एहसास की कद्र है? बचे कितने हैं एहसास वाले लोग? वो लोग जिन्हें दूसरों की सच में फ़िक्र है, जो प्यार करना जानते हैं.. ऐसे लोग बचे ही कितने हैं? मेरे और तुम्हारे जैसे चंद लोग. बस. इसलिए मैं कहती हूँ, मेरे और तुम्हारे जैसे लोगों का होना इस दुनिया के लिए बेहद जरूरी है. ताकि लोगों में प्यार बचा रहे. लोग विश्वास कर सकें प्यार पर. आने वाले पीढ़ियों को ये न लगे कि प्यार महज एक शब्द है, और फिल्म पर दिखाए जाने वाला एक फार्मूला. 

तुम जानते हो? लोग कहते हैं न, ये प्यार, ये शायरी, ये कवितायें, कमज़ोर होती हैं, इंसान को कमज़ोर बनाती हैं... ये सच नहीं है, बल्कि ये इंसान को बहुत मजबूत बनाती हैं. तुम कविताओं को देख लो, तुम लिखते हो न कवितायें? क्या तुम जानते हो कवितायें खुद में कितनी स्ट्रोंग होती हैं? उनका कितना बड़ा प्रभाव पड़ता है इंसान पर? एक फिल्म थी, शायद तुमने भी देखी हो वो फिल्म.. उसमें कहा गया था “We don't read and write poetry because it's cute. We read and write poetry because we are members of the human race. And the human race is filled with passion. Poetry, beauty, romance, love, these are what we stay alive for.
तुम उस एक और फिल्म की ही बात ले लो न, तुमने और हमने एक साथ देखा था उसे, जिसमें पृथ्वी पूरी बर्बाद हो जाती है, लोग मंगल ग्रह पर रहने चले जाते हैं, लोगों की याददाश्त को भी हमेशा के लिए मिटा दिया जाता है, उस फिल्म में भी उस लड़के को बर्बाद हुए पृथ्वी के किसी कोने से एक कविताओं की किताब मिलती है, और उन कविताओं को पढ़कर उसमें कैसा बदलाव आता है. इंसानी रिश्तों पर उसे यकीन होने लगता है.

वो फिल्म याद है तुम्हें?? जहाँ लड़की की दी हुई  अंगूठी को छूते ही उस लड़के को अपनी पिछली कहानी याद आ जाती है? और वो उस लड़की को याद कर के रोने लगता है. वो फिर कैसे ढूँढ लाता है उस लड़की को, या फिर वो फिल्म ही ले लो, जिसमें लड़की के किताब में पड़े एक सूखे गुलाब के फूल को छूते ही वो एकदम से कैसे बेचैन हो जाती है, एक एक कर के उसके आँखों के सामने उसकी सारी पुरानी स्मृतियाँ वापस आने लगती है और अगले ही दिन वो निकल जाती है मीलों दूर अपने उस दोस्त को खोजने के लिए जिसने उसे वो गुलाब का फूल दिया था. 

जानते हो, इसलिए मैं कहती हूँ तुमसे, मेरी तरह छोटी छोटी बातों पर भी ध्यान दिया करो. कभी ऐसा हो जाये, किसी भी वजह से, ऐसी ही कोई बात हो जाए जो उन फिल्मों में हुआ था, और तुम भूल जाओ मुझे, तो मेरी वही छोटी छोटी इललॉजिकल बातें तुम्हें वापस मेरे पास लेकर आ जायेंगी, मेरी यही छोटी बेकार सी बातें , हरकतें देखना उस वक़्त तुम्हारी ज़िन्दगी का कितना बड़ा सहारा बन जायेगी. कभी कोई लड़की तुम्हें सड़क पर चीटियों को देखते मिले, उनसे बातें करते मिले तो तुम्हें याद आएगा, कि ऐसी कोई लड़की थी भी जिसे मैं जानता था, जो घंटों चीटियों से बातें करती थी, कभी आसमान में हवाई जहाज को उड़ते गौर से देखो तो तुम्हें याद आएगा कि कोई ऐसी लड़की थी, जो एरोप्लेन के पीछे बनते इन कॉनट्रेल्स को आसमान में बनी सड़क कहती थी...और न जाने ऐसी कितनी ही बातें तुम्हें याद आती रहेंगी, तुम तो जानते हो मेरे ऐसे हरकतें, काउंटलेस हैं, लेकिन इन हरकतों को तुम बेकार न समझना. कब मेरी कौन सी बात तुम्हारी ज़िन्दगी को कैसे बदल दे, ये तुम्हें अंदाजा भी नहीं हो पायेगा. ! 

_________________________________________________________________________


लड़का उतने आगे की बात नहीं सोचता कभी, किसे पता है आने वाले सालों में क्या हो? लेकिन एक बात वो जानता है, वो लड़की के उस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि कभी भी ऐसा हो सकता है कि वो लड़की को भूल जाए. लड़की समझती है कि लड़का उसकी इललॉजिकल बातों को इग्नोर कर दिया करता है, लेकिन जाने कितनी ही ऐसी छोटी छोटी बातें हैं जो लड़का आज भी याद रखे हुए है, वो बातें जो शायद लड़की को भी याद न हो, वो बातें जिसे सुन शायद लड़की को भी आश्चर्य हो कि कोई ये सब बातें भी याद रख सकता है.



नगमें हैं शिकवे हैं किस्से हैं बातें हैं
बातें भूल जाती हैं यादें याद आती हैं
ये यादें किसी दिल-ओ-जानम के
चले जाने के बाद आती हैं

बस्स...रिमेम्बर मी...

Saturday, October 4, 2014

अक्टूबर का महीना बड़ा ही खुशनुमा सा एक एहसास लेकर आता है. गर्मियों के दिन विदा होने को होते हैं, पेड़ों से पत्ते झर के गिरने लगते हैं, सर्दियों के आने की आहट सुनाई देने लगती है, मौसम अचानक थोड़ा ठंडा हो जाता है और हवाओं में चारों तरफ त्योहारों की खुशबू  बसी होती है.

हम दोनों के लिए ये अक्टूबर हमेशा बेहद खास रहा है. तुम्हारे लिए तो शायद बहुत पहले से ही अक्टूबर खास रहा होगा, लेकिन मेरे लिए अक्टूबर बस तब से ख़ास हुआ है जब से तुमसे मुलाकात हुई. तुमसे मिलने से पहले मौसमों के आने जाने से, महीनों के आने-जाने से मुझे फर्क नहीं पड़ता था. तुम्हारे आने के बाद ही हुआ कि हर मौसम से, हर महीने से एक रिश्ता बन गया. तुम्हें जानने के बाद ही मैंने ये जाना था कि मौसम भी इतने ख़ास हो सकते हैं कि उनका कोई नाम रख सकता है. तुम रखती थी मौसमों के नाम...तरह तरह के नाम, और हर नाम के पीछे तुम्हारी एक मजेदार लॉजिक होती थी. मिस्टिरीअस अक्टूबर, नॉस्टैल्जिक नवम्बर, टेंडर दिसम्बर, जैज़ी जनवरी जैसे नाम तुमने हर मौसम को दे रखे थे. लेकिन शायद जितना महत्वपूर्ण अक्टूबर और दिसम्बर महीना रहा है हम दोनों के लिए उतना शायद और कोई महीना नहीं रहा. 

किसे पता था कि दो अजनबी चलते हुए टकरा जायेंगे, इसी अक्टूबर महीने के आखिरी एक शाम में, जब तुम्हें जाना था पहली बार. किसे पता था कि इसी अक्तूबर की वो पहली तारीख होगी जब तुम्हें करीब से समझा था, तुम्हारे हर एक दर्द को महसूस किया था, तुम्हारे मुसकराहट के पीछे छुपे उस सच को, तुम्हारी उन तकलीफों को, उन बेचैनियों को महसूस किया था मैंने. 

तुम्हें याद है, अक्टूबर की ही वो आखिरी शाम थी न? तुम्हारी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत और महत्वपूर्ण दिन था वो. आखिरी ही कुछ पल बाकी थे अक्टूबर के विदा होने में, जब तुम्हें फ़ोन किया था मैंने और पहली बार फोन पर गाकर मैंने सुनाये थे बहुत से गाने तुम्हें, रात भर. फोन के दूसरे तरफ तुम बिलकुल चुप थी. लगातार रो रही थी, तुम्हारे आँसू गिर रहे थे, किसी तकलीफ से नहीं बल्कि ख़ुशी के आँसूं थे वो. “I am Overwhelmed”, तुम बस यही तीन शब्द कह पायी थी...मात्र ये तीन शब्द, इसके अलावा तुम कुछ भी बोल नहीं पायी थी. “तुम्हारे इन सब बातों पर रोने से, तुम्हारे इन आँसुओं की मुझे फिक्र नहीं होती. ये अच्छे आँसू हैं, ऐसे आँसू प्यारे लगते हैं..” यही कहा था न मैंने तुम्हें उस रात?

लोग नहीं समझेंगे इस बात को, ये नहीं समझ पायेंगे वे की तुम उस रात उस छोटी सी बात पर क्यों इतनी खुश हो गयी थी कि तुम लगातार बस रोये जा रही थी. बस गाना ही तो गाया था मैंने. लेकिन मेरे उस गाने की अहमियत क्या थी ये तुम जानती थी. सालों पहले जब किसी एक वजह से जिस लड़के ने गुनगुनाना छोड़ दिया था, तनहाई में भी कभी शायद ही कभी वो गुनगुनाया हो, वो सिर्फ एक लड़की की एक प्यारी, मासूम जिद के लिए उसे रात भर गाना सुनाते रहेगा. इसका शायद तुम्हें भी यकीन नहीं था. वो रात जो तुम्हारे लिए बहुत अहमियत रखती थी, तुम्हारे उस स्पेशल दिन पर वो मेरा तोहफा था. तुमने कहा था मुझसे, “कोई किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता है कि अपने कम्फर्ट ज़ोन से कोसों बाहर जाकर वो कोई ऐसा काम कर दे उस लड़की के लिए. ये सबसे अनमोल तोहफा दिया है तुमने आज मुझे” 

इसी अक्टूबर की वो तमाम खूबसूरत शामें थी न जब कॉफ़ी हाउस में तुम्हें मैं निर्मल वर्मा की कहानियां, फ़राज़ और ग़ालिब के शेर, गुलज़ार की नज्में, शमशेर की कवितायें सुनाता था. तुम बड़े ध्यान से बैठकर मुझसे सुनती थी कहानियां, कवितायें और बाद में मुझसे बहस करती. तमाम फ़ालतू सवालात तुम किया करती थी, “इस कहानी में ऐसे क्यों हुआ... वैसे क्यों नहीं हुआ?”, “तुम्हारे इन लेखक, शायरों को लिखना नहीं आता.. उल्टा पुल्टा शेर लिख डालते हैं”, और फिर तुम ग़ालिब के शेरो को गलत ठहरा कर उन्हें एडिट कर अपना वर्जन लिखती और फिर कहती, “देखो, शायरी ऐसे की जाती है, उन फ़ालतू शायरों को मत पढ़ा करो तुम...मुझे पढ़ा करो.......आई मीन मेरी शायरी को पढ़ा करो..” 

उन दिनों जब तुम दिल्ली में थी, इसी महीने के आसपास तुम्हें कुछ काम से आठ दस दिन लगातार गोल मार्केट के पास बेयर्ड लेन जाना पड़ता था. तुम चिढ़ती थी उस रोड से, और वहाँ के लोगों से. जिन दफ्तरों में तुम्हें काम होता वहाँ जाने से पहले और वहाँ से निकलने के बाद कितना कोसती थी वहाँ काम कर रहे लोगों को तुम. एक शाम जब एक दफ्तर से निराश वापस आ रही थी तुम, तुमने कहा था इस सड़क का नाम बेयर्ड लेन नहीं बल्कि बेदर्द लेन होना चाहिए..दिल ही नहीं यहाँ के लोगों के पास, और लगभग चिल्लाते हुए तुमने कहा था, “Get a life you idiots, morons..!” मैं इधर उधर देखने लगा था, कहीं कोई तुम्हें यूँ चिल्लाते हुए देख न ले... “बड़े बेआबरू होकर इस बेदर्द लेन से हम निकले...” ये गाते हुए तुम चली आ रही थी. ऐसे झूम रही थी तुम कि अगर आसपास उस वक़्त कोई हमें देख लेता तो समझता तुम नशे में हो. 

उन सारे मीठे पलों के अलावा भी कुछ बुरे पल इस महीने ने हमें दिए हैं. हमारे लिए सुख और दुःख का अजीब संगम होते रहा है इस महीने में. जहाँ एक तरफ हमारी कई अच्छी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं इस महीने से, तो दूसरी हमारी ज़िन्दगी के, और खासतौर पर तुम्हारी ज़िन्दगी के सबसे बुरे वक़्त की शुरुआत भी इसी महीने से हुई थी. इसी महीने की वो तीसरी तारीख थी जब तुम्हारी दीदी हमेशा के लिए हम सब से बहुत दूर चली गयीं थीं. और इसी महीने की वो आखिरी तारीख होती थी जब तुम्हारी उसी दीदी का जन्मदिन होता था, जिसे तुम कितने शानदार तरीके से सेलिब्रेट करती थी. इस महीने का ही वो कोई दिन था, जब तुमने पहली बार मुझे संकेत दिया था कि तुम्हें शहर छोड़कर हमेशा के लिए जाना पड़ सकता है. 

अक्टूबर की रात तो याद होगी न तुम्हें, जब हम दोनों दिल्ली से वापस अपने शहर लौट रहे थे. तुम उदास थी, क्योंकि वो अक्तूबर का वही दिन था, तुम्हारी उसी दीदी का जन्मदिन था जो कुछ साल पहले तुमसे दूर चली गयीं थीं. तुम्हें जाने कितने किस्से याद आ रहे थे, ट्रेन पर तुम उन तमाम किस्सों को मुझे सुना रही थी जो तुम्हारी दीदी से जुड़े हुए थे. तुम उदास हो गयी थी, तुम्हारे मन में जाने क्या चल रहा था....तुम्हें अपनी दीदी की कमी अचानक बहुत ज्यादा खलने लगी थी. “वो अपने साथ मुझे क्यों नहीं लेते गयीं”, तुमने पूछा था मुझसे और फिर मेरे काँधे पर अपना सर टिकाकार ट्रेन के खिड़की से बाहर देखती रही थी, जाने क्या सोचती रही थी तुम. मैंने तुम्हारे चेहरे को देखा, तुम्हारा पूरा चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था. मैं चुपचाप बस तुम्हारे पास बैठा हुआ था. कुछ ऐसे दुःख होते हैं जिसमें आप कुछ भी कह नहीं सकते. वो वक़्त मेरे लिए भी वैसा ही था. मैं कुछ भी नहीं कर सकता था. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि उस वक़्त तुम्हें क्या कहूँ? कौन सा ऐसा दिलासा दूँ मैं तुम्हें जो तुम्हारे आँसुओं को रोक सके. 

मुझे एक पल ये भ्रम भी हुआ कि जैसे तुम अपनी दीदी की वो तमाम कहानियां मुझे नहीं बल्कि उन्हें ही सुना रही हो, जैसे की वो तुम्हारे सामने बैठी हों, तुमसे बातें कर रही हों. मुझे अचानक लगने लगा कि तुम कहीं बहुत दूर निकल गयी हो.. मेरे सारे शब्द, मेरी सारी वो बातें जो तुम्हें समझाने के लिए मैं तुमसे कह रहा था, अचानक मुझे निरर्थक से लगने लगे थें. तुम बहुत देर तक बोलती रही थी और जब तुम शांत हुई, तो देखा मैंने तुम्हारे आँसू भी थम चुके थे. शायद तुम्हारी दीदी की कहानियों में ही तुम्हें कोई ऐसी कड़ी मिल गयी होगी जिसे पकड़ कर तुम वापस लौट आई थी. 

अगली सुबह बेहद खूबसूरत हुई थी. हम रात भर सोये कहाँ थे. बस बैठे हुए थे पूरी रात एक दूसरे के पास. “देखो नवम्बर का महीना आ गया...., हेल्लो बोलो उसे”, उसने उगते हुए सूरज को देखकर कहा था. वो पूरी कोशिश कर रही थी, कि मुझे लगे वो वापस उस मस्ती वाले मूड में आ गयी है, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर मैं पिछली रात के बातों का हैंगओवर साफ़ देख रहा था. उसने अपने बैग से अपना एमपीथ्री प्लेयर निकाल लिया था, और इयरफ़ोन का एक टुकड़ा मेरे कान में ठूंस दिया था उसने, और एक अपने कान में. एक गाना बजने लगा था, और उस गाने को सुनते हुए मुझे अचानक उसकी पुरानी कही एक बात याद आ गयी थी, इस गाने को पहली बार सुन कर उसने पूछा था मुझसे, अच्छा बताओ... “पानी में गिरके सूरज कैसे बुझ सकता है, और हाथ में धूप कैसे मला जाता है?”. हम दोनों ही गाना सुनते हुए एक दूसरे को देखकर हँसने लगते हैं....वो गुनगुनाने लगती है...

आ धूप मलूँ मैं तेरे हाथों में
आ सजदा करूं मैं तेरे हाथों में




ये महीना अक्टूबर का ऐसा ही है, जाने कितनी यादें जुड़ी हैं इस महीने से, कुछ बेहद प्यारी यादें तो कुछ बेहद बुरी यादें भी. तुम्हें याद है न तुमने इस महीने को ये नाम क्यों दिया था? तुम कहती थी की इस महीने में जो कुछ भी होता है वो या तो हद दर्जे का अच्छा होता है या फिर हद दर्जे का बुरा. बड़ा अजीब महीना है ये...समझ में ही नहीं आता की इसे किस कैटेगरी में रखूं, अच्छे वाले में या बुरे वाले में...इसलिए इसे मिस्टिरीअस अक्टूबर मैं कहूँगी...है भी वही, बिलकुल किसी मिस्ट्री जैसा, कभी समझ न आने वाला, खट्टे मीठे पलों वाला...बिटरस्वीट मिस्टिरीअस अक्टूबर!


मिस्टिरीअस अक्तूबर!

Tuesday, September 23, 2014


अकसर पुरानी अलमारियों में जाने कितनी यादें बंद होती हैं. उन अलमारियों को खोलना पुराने दिनों में वापस लौटना होता है, वापस उन दिनों में लौटना जो शायद आपके सबसे खूबसूरत दिन थे. अलमारी के किसी दराज में अगर कोई पोटली मिल जाए, जिसमें आपके जाने कितने लम्हे, कुछ किताबें, ग्रीटिंग्स, फोटोग्राफ बाँध कर रखी हुई हों तो आप ना चाहते हुए भी यादों के उन पगडंडियों पर चलने लगते हैं. पोटली में बाँध कर रखी एक रोमांटिक नॉवेल पर नज़र पड़ती है, जिसे आपकी सबसे अच्छी दोस्त ने आपको तोहफे में दिया था, और उस किताब पर नज़र पड़ते ही आपको सितम्बर की वो शाम याद आ जाती है जब अपने देर से आने की आदत से चिढ़कर उस किताब के कवर पर उसने लिख दिया था “मैं दुनिया की सबसे बड़ी पापी हूँ, हे भगवान, मुझे सज़ा देना, ऐसी कि मैं देर से आने की अपनी आदत ही भूल जाऊँ...” और फिर उसके नीचे छोटे अक्षरों में उसने लिखा था.... “लेकिन प्लीज, कोई सख्त सज़ा मत देना मुझे”. किताब के कवर पर लिखी  उसके इन मासूम बातों को पढ़कर चेहरे पर एक मुसकराहट आ जाती है और आँखों के सामने सितम्बर की वो शाम चली आती है जो आज से छः साल पहले बीती थी.

वे मेरे अच्छे दिन थे, कुछ पैसे हाथ में आ गए थे उन दिनों. पैसे हाथ में आ जाना उन दिनों मेरे लिए एक बड़ी बात हुआ करती थी. हलकी बारिश हो रही थी और हम दोनों दिल्ली के साउथ इक्स्टेन्शन मार्केट में घूम रहे थे. “आज बहुत खुश हूँ मैं, चलो तुम्हें उसी डिज़ाइनर शो रूम में शॉपिंग करवाता हूँ जहाँ पिछले शाम तुमने वो लहँगा पसंद किया था”, मैंने कहा उससे. उसने मेरी तरफ देखा, उसे एक पल लगा कि मैं मजाक कर रहा हूँ. लेकिन अगले ही पल जैसे ही मैंने उसका हाथ थामा और उस शोरूम की तरफ बढ़ने लगा, वो हैरान हो गयी थी. मुझे रोकने की कितनी कोशिश की उसने, “सुनो.. सुनो.. मेरी बात सुनो.. मैं बस मजाक कर रही थी.. वो लहँगा मुझे ख़ास पसंद भी नहीं आया था..” वो जानती थी वो शोरूम काफी महँगा था और मुझे उस शोरूम की तरफ जाने से रोकने के लिए जल्दबाजी में जाने कितने बहाने उसने बना दिए थे. लेकिन मैं पहले से सोच कर आया था कि मुझे क्या करना है. आखिर एक शाम पहले उसने पहली बार इतने सालों में मुझसे कुछ माँगा था, वो भी पूरे अधिकार से. मैं उसकी ये छोटी सी ख्वाहिश कैसे पूरा नहीं करता? “अगर तुम्हें वो लहँगा पसंद नहीं तो तुम बेशक उस लहँगे को ज़िन्दगी भर न पहनना, लेकिन आज तो मैं खरीदूंगा उसे”, मैंने कहा उससे और दुकान की तरफ बढ़ गया. 

वो भी अनमने भाव से मेरे पीछे पीछे उस शोरूम में दाखिल हुई. जो लड़की एक शाम पहले इस शोरूम में आने के बाद कपड़े देखने में इतनी व्यस्त हो गयी थी कि मुझसे सिर्फ हाँ ना में बात कर रही थी, वो आज उसी शोरूम के प्रति पूरी तरह से उदासीन थी. शोरूम में दाखिल होते ही उसने मुझसे कहा “जाने कितने का होगा लहँगा, मैं तो कल कीमत भी नहीं देख पायी थी..” मैं बस मुस्कुरा कर रह गया. कल शाम ही मैंने उस लहँगे की  कीमत पता कर ली थी, वाकई काफी महँगा था. लेकिन मुझे कीमत की परवाह नहीं थी. मैं बस जानता था कि उसने इतने सालों में पहली बार मुझसे कुछ माँगा है और मुझे उसकी वो ख्वाहिश पूरी करनी है.

शोरूम के उस कोने के तरफ हम पहुँच गए, जहाँ वो लहँगा था. मजेदार बात ये हुई कि उस लहँगे के प्राइस टैग में उसकी कीमत में एक शून्य कम था. शायद मिसप्रिंट की वजह से, लेकिन प्राइस टैग के इस मिसप्रिंट की वजह से ही वो ख़ुशी से उछल पड़ी थी. “सिर्फ 950 इसकी कीमत है? इस खूबसूरत लहँगे का? देखा? तुमने देखा? इतना खूबसूरत लहँगा और सिर्फ 950.. वाऊ!! मैं अभी ट्रायल कर के आती हूँ”, उसने कहा और अगले ही पल वो ट्रायल रूम में चली गयी. उसने मुहँ से लहँगा का ये कीमत सुनने के बाद एक पल के लिए मैं भी चौंक गया था, कल तो यहाँ का सेल्समैन 20% डिस्काउन्ट के बाद उस लहँगे का कीमत मुझे उतना बता चूका था. ये क्या माजरा है? मुझे ये समझते देर न लगा कि ये मिसप्रिंट का मामला है. लहँगे की कीमत उतनी ही थी...9500 लेकिन मिसप्रिंट की वजह से वो ये समझ बैठी थी कि लहँगे की कीमत सिर्फ 950 है. 

मुझे इस बात पर काफी हँसी आ रही थी, कि कुछ ही देर पहले यही लड़की मुझे ज्ञान दे रही थी.. “तुम्हारा ध्यान कहाँ रहता है? छोटी छोटी बातों पर जैसे मैं ध्यान देती हूँ, तुम भी ध्यान दिया करो. वैसी तुम्हारी गलती नहीं है, लेखक लोग वैसे भी खोये रहते हैं”, उसने मुझे ताना देते हुए कहा था और अभी यही लड़की अपनी ख़ुशी और इक्साइटमेंट में इतना भी कॉमन सेन्स नहीं लगा पायी, कि इतने महँगे स्टोर में मिल रहा इतना खूबसूरत लहँगा सिर्फ 950 में कैसे मिल सकता है? रुको, उसे आने देता हूँ उसके बाद उसकी खबर लेता हूँ, बहुत बड़ी अब्ज़र्वर बनती है वो. उसे इस बात पर छेड़ने का दिल किया लेकिन वो लहँगे की कीमत 950 समझ कुछ ज्यादा ही खुश हो गयी थी. उसकी वो ख़ुशी, उसके उस इक्साइटमेंट को मैं बुझाना नहीं चाहता था, इसलिए मैंने उसे कुछ भी नहीं बताया. भरपूर कोशिश की थी मैंने कि उसे इस ड्रेस की असली कीमत पता न चले, यहाँ तक कि लहँगा का बिलिंग करवाते समय भी उसे मैंने अपने आसपास भटकने नहीं दिया था, लेकिन बहुत सालों बाद एक दिन जब यूँहीं बातों के दौरान मेरे ही ज़बान से उस लहँगे की असली कीमत निकल गयी तो वो काफी गिल्ट में चली गयी थी. “खुद के लिए तो 950 के ड्रेस को भी खरीदने से पहले साढ़े नौ सौ बार सोचते हो और मेरे लिए दस हज़ार का लहँगा खरीद लिया, जस्ट लाइक दैट? "उसने कहा था.

उस शाम वैसे तो वो बहुत कारणों से खुश थी, एक लम्बे समय बाद वो मेरे साथ वक़्त बिता रही थी. दूसरा उसे दो दिन से लगातार तोहफे मिल रहे थे और तीसरा कि उसे एक बेहद खूबसूरत लहँगा मैंने तोहफे में दिया था जिसकी कीमत उसके हिसाब से साढ़े नौ सौ थी. एक रेस्टोरेन्ट में मुझे वो ले आई थी ये कहते हुए “चलो अब तुम मुझे लंच कराओ. पैसे तुम्हारे बचा दिए हैं मैंने. 

जब तक हम रेस्टोरेन्ट में बैठे रहे थे, वो दुनिया जहान की उलजुलूल बातें करती रही थी. कुछ ऐसे लॉजिक थे उसके जो सिर्फ वही दे सकती थी “तुम कभी मुझे किसी चॉकलेट के नाम से मत बुलाना, टैफी, बेरी, चेरी, चॉको-केक वगैरह कह कर तो मुझे हरगिज़ न बुलाना तुम. मानो तुम्हारा मन कर गया मुझे खाने का तो? मैं क्या करुँगी?” इस तरह की बच्चों सी बातें सिर्फ वही सोच सकती थी, सिर्फ वही कर सकती थी. मेरी बातों पर कभी कभी टोक भी दे रही थी मुझे, कभी डांट दे रही थी. “साहब ये जरूरी नहीं कि लड़कियों को गुलाबी रंग ही पसंद आते हैं, देखो मैं लड़की हूँ और मुझे ब्लैक, रेड, ब्लू और पर्पल पसंद हैं. गुलाबी मेरे लिस्ट में भी नहीं है. उसने जाने किस बात पर मुझसे कहा था.

उसकी बातें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं उस शाम. रेस्टोरेन्ट से लेकर जब तक हम मेट्रो स्टेशन न पहुँच गए, तब तक वो नॉन-स्टॉप अपने तमाम तोहफों का जिक्र करते जा रही थी, इन तीन चार दिनों में किसने उसे क्या गिफ्ट दिया, वो सारी बातें पूरे डिटेल में मुझे बताती जा रही थी. 

रास्ते में हलकी बारिश भी शुरू हो गयी थी, जो हमारे मेट्रो स्टेशन पहुँचने तक तेज़ हो गई थी. बारिश उसके साथ अकसर अजीब खेल खेलती थी. जहाँ अकसर उसे बारिशें उदासी से खींच बाहर लाती, उसके मूड को अच्छा कर देती तो कभी ये बारिशें ही उसके लिए उदासी का सबब बन जाती थीं. उसका मन बड़ा ही फ्रैजल था. हँसी-मजाक के मूड से बुरे मूड में आने में उसे वक़्त नहीं लगता था तो कभी बुरा मूड भी उसका चुटकियों में अच्छे मूड में तबदील हो जाता था. कब किस समय किस बात से वो अचानक सिरिअस  हो जायेगी इसका अनुमान लगा पाना नामुमकिन था. वो बिलकुल बच्चों जैसी बे-सिर पैर की बातें करते हुए भी अचानक सिरीअस हो सकती थी तो कभी बेहद गंभीर बातें करते हुए भी अचानक बे-सिर पैर की बातें करने लगती थी. खुद कहती थी वो.. मेरा मन बड़ा ही अन्प्रिडिक्टबल है.

मेट्रो के पूरे सफ़र के दौरान वो मेरा हाथ थामे हुए थी. रेस्टोरेन्ट में बैठकर वो जितनी उलजुलूल बातें कर रही थी, मेट्रो में वो उतनी ही शांत बैठी हुई थी. बस मेरा हाथ थामे वो सामने बैठे लोगों को देख रही थी. मेट्रो के उस कोच में कम भीड़ थी, सामने एक बूढ़े अंकल कोई किताब पढ़ रहे थे, तो एक व्यक्ति बड़े ही अजीब मुद्रा बनाये ऊंघ रहा था, जिसे देखकर उसे हँसी आ गयी थी, एक लड़का जो लगातार उसकी तरफ देखे जा रहा था, और जिसे देखकर उसने मुहँ बिचकाते हुए मुझसे कहा था ‘ब्लडी टपोरी.. देखो तो लाइन मार रहा है’. वहीं उसी कम्पार्ट्मन्ट में एक लड़की, अपने एक साल की बेटी और पति के साथ बैठी थी. “देखो तो कितना प्यारा परिवार है न इनका, उसकी बेटी कितनी प्यारी है..” उसने उनके तरफ देखते हुए कहा. “हम तीनों भी कभी ऐसे ही शॉपिंग कर के लौट रहे होंगे...है न? वो मेरी तरफ देख रही थी, मेरे जवाब के इंतजार में. मैं उसकी बातों का अर्थ समझ गया था, फिर भी अनजान बन कर मैंने पूछा, हम तीनों कौन? तुम और मैं तो दो ही हुए न? तीसरा कौन? 

तुम अभी से ही भूल गए? हमारी बेटी नहीं होगी क्या? देखना वो मेरी तरह ही खूबसूरत होगी, और बेहद समझदार. मैं उसे बिलकुल अपने जैसा बनाऊंगी. वो लगातार और एकदम तेज़ी से बोलते जा रही थी, जैसे कोई अपना सपना याद कर के उसे दोहरा रही हो. ये हमारा सपना ही तो था, जिसे हम दोनों कभी अपने बचपन के दिनों में दसवीं के पढ़ाई के दिनों में एक साथ देखे थे, तब जब हम दोनों आने वाले विपत्ति से बिलकुल ‘सेफ’ थे. थोड़ा भी अंदाज़ा होता हमें कि आने वाले दिन कैसे होंगे तो शायद हम दोनों खुली आँखों से ये सपना कभी नहीं देखते. वैसे मुझे लगता है उस उम्र में सभी कभी न कभी वैसा सपना देखते ही हैं. 

“नहीं, मुझे अब इतनी दूर का सोचना नहीं चाहिए न”, उसे जाने क्या याद आ गया. जितनी तेज़ी से वो अपने सारे सपने दोहरा रही थी, उतनी ही तेज़ी से उसने उन सब बातों पर ब्रेक लगा दिया था. बोलते बोलते एकदम से रुक गयी थी वो. 

“सुनो.. देखो, तुम उदास मत हो. देखना सब ठीक होगा”, मैं उसे दिलासा दे रहा था, जबकि मुझे खुद मालूम नहीं था कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला था. आगे कुछ और कहने की मैंने बहुत कोशिश की लेकिन हर वाक्य अधूरा ही रह जा रहा था मेरा. उसकी नज़रें लगातार उन तीनों पर जमी हुई थी जिनके वजह से उसे अचानक अपना इतना पुराना, अपना सबसे बड़ा सपना याद आया था. 

“रहने दो, आज ये बातें नहीं करेंगे हम. आज के खूबसूरत दिन जब मेरी इस खूबसूरत सी गुड़िया ने मेरे इतने पैसे बचा दिए, उसे इतने सारे तोहफे मिले हैं और देखो बारिश भी हो रही है, तो आज के इस खूबसूरत दिन हम खूबसूरत बातें ही करेंगे, नो डिप्रेसिंग टॉक, वरना तुम्हें सच में चॉकलेट समझकर खा जाऊँगा मैं. समझी तुम?” वो हँसने लगी थी. वो खुश हो जाती थी जब भी मैं उसे गुड़िया कह कर पुकारा करता था, और जब कभी उसके सिरिअस होने पर मैं यूँ उसे डांट दिया करता था. भूल जाती थी वो अपनी सारी तकलीफ सारी परेशानी कुछ पल के लिए, जब भी मैं मजाक में यूँ उसे डांटा करता था. 

“Aye Aye कैप्टन.. समझ गयी मैं.” कहा उसने और खड़ी हो गयी. “मेरी ट्रेनिंग का, मेरे संगत का देखो तुमपर कितना अच्छा असर हो रहा है. अब ऐसे मजाकिया डांट लगाना भी तुम सीख गए, पहले कितने बोरिंग थे तुम...मेरा जादू है ये”, उसने कहा. मैं मुस्कुराने लगा था. हमारा स्टेशन भी आ गया था तब तक और वो मेट्रो कोच से बाहर निकलते समय कुछ दिन पहले आई एक फिल्म का एक गीत गुनगुनाने लगी थी.. “मैं जो संग हूँ/ तेरे रंग हूँ / राहों से तेरी चुन लूँ मैं ख्वाब / हर लम्हा यूँ गुज़रे / के गहराता जाए प्यार”.

मेट्रो का ये बीस मिनट का सफ़र कुछ ज्यादा ही जल्दी पूरा हो गया था. उसके जाने का वक़्त आ गया था. राजीव चौक मेट्रो की सीढ़ियों के पास खड़े होकर हम दोनों उसकी गाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे. हम दोनों एकाएक चुप हो गए थे, जब कभी शाम में यूँ अलग अलग अपने रास्तों पर जाना होता था, हमारे बीच बातें बिलकुल खत्म हो जाती थीं, बस एक चुप्पी चली थी हम दोनों के बीच. शाम का वो पल बड़ा सख्त पल होता था. बातों का स्टॉक दोनों के ही पास खत्म हो जाता था. बिलकुल बेमतलब और व्यर्थ की बातें करने लगते थे “इस जगह का नाम कनॉट प्लेस है तो मेट्रो स्टेशन का ना राजीव चौक क्यों?”, “ट्रैफिक आजकल कुछ ज्यादा हो गया है न”, ऐसी बातें जिनका हम दोनों से कोई सम्बन्ध नहीं था, हम एक दूसरे से पूछते थे, बस इसलिए कि हमारा ध्यान शाम के जुदाई के पल से डाइवर्ट रहे. 

उसकी गाडी आ चुकी थी, आकर रुकी हुई थी. ड्राईवर दो बार उसे इशारा कर चुका था चलने के लिए. लेकिन फिर भी वो मेट्रो की सीढ़ियों पर कुछ देर बैठी रही थी. दो बार उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन बस इतना कह कर रह गयी, कि “कल तो तुम्हारी ट्रेन है वापसी का...” मैंने कहा “हाँ....” 

“ह्म्म्म....”. उसने एक निःश्वास भरी...अपने बैग से अपना गागल्ज़ निकाला और उठकर जाने के लिए खड़ी हो गयी.

वो ठीक से खड़ी भी नहीं हुई थी अभी कि मैंने उसकी कलाई पकड़ ली. वो बिलकुल चौंक गयी. वो असमंजस में मेरी तरफ देखने लगी. “क्या हुआ?” नज़रों से उसने पूछा था मुझसे. 

मैं मुस्कुरा रहा था, वो बिलकुल क्लूलेस हो गयी थी. इसे क्या हुआ..? शायद यही सोच रही होगी वो. आगे वो कुछ कहती इससे पहले ही मैंने अपनी जेब से वो कंगन निकाला जो दिल्ली हाट में घूमते वक़्त उससे नज़रें बचा कर मैंने खरीद ली थी, वही कंगन जिसे देखते ही उसने कहा था, अहा कितना खूबसूरत कंगन है, ऐसा खूबसूरत कंगन मैंने आज तक नहीं देखा था. मैंने वो कंगन उसकी कलाइयों में सरका दिया. 

वो शॉकड होकर देखती रह गयी. 

“स्पीचलेस आई एम !!” उसने कहा था. फिर से वो वापस मेरे पास बैठ गयी. इसे तुमने कब खरीदा? शायद इतना ही कहा था उसने.. शायद कुछ और कहती वो, लेकिन इसका मौका नहीं मिल पाया. उसका ड्राईवर जो कि उसे चलने के लिए दो बार इशारा कर चूका था, शायद उसका सब्र टूट चुका था, आकर उसने पूछ लिया कि चलेंगी आप या अभी रुकेंगी? “चलूंगी मैं..” उसने कहा ड्राईवर से. 

उसके चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि उसे अभी जाने का मन नहीं था. लेकिन शाम में उसके पूरे परिवार को किसी फंक्शन  में जाना था, शायद इसलिए वो ड्राईवर जल्दबाजी दिखा रहा था. ड्राईवर के इस जल्दबाजी से वो थोड़ा इरिटेट हो गयी थी. 

“ये तुम्हारा ड्राईवर आज विलेन बन कर आ गया बीच में, देखो तो इस रोमांटिक मोमेंट को उसने बिलकुल बर्बाद कर दिया...जाते ही अपने अंकल से कह कर नौकरी से निकलवा देना इसे, फाइन वाइन लगा देना इसपर ढेर सारे...” , मैंने कहा. वो मुस्कुराने लगी. कहा कुछ भी नहीं उसने, बैग से जो उसने गागल्ज़ निकाला था, उसे पहना और अपनी गाड़ी के पिछली सीट पर जाकर बैठ गयी. 

अकसर ऐसा होता है कि जाते वक़्त वो मुड़ कर मुझे जरूर देखती है, लेकिन उस दिन उसने नहीं देखा मुड़ कर मुझे. मैं उसकी गाड़ी को दूर तक जाते देखता रहा, कुछ देर तक उसकी गाड़ी आगे एक रेड सिग्नल पर रुकी थी. गाड़ी की पिछली सीट पर बैठी वो दिख रही थी, लेकिन वो ना ही अगल बगल देख रही थी ना सामने. मुझे ऐसा लगा कि वो लगातार बस उस कंगन को देखे जा रही थी जो उसकी कलाइयों में मैंने पहना दिया था. मुझे जाने क्यों ऐसा भ्रम हुआ कि उसने गागल्ज़ उतार कर अपनी आँखों को पोछा था. शायद आँखों में उसके कोई “इन्फेक्शन” हो गया, मैंने सोचा.


याद है तुम्हें
बारिश की वो शाम
हाथ में तेरे
थी मेरी भी हथेली
काँधे पे टिका
वो मासूम चेहरा
भीगी थी तुम
मैं भी भीगा-भीगा-सा
गीली ज़मीन
मन भी पनियारा
खामोश तुम
बारिश की बूँदों को
सुनती हुई
जैसे पाजेब कोई
तेरी हँसी-सी
छनकती हो कहीं
मैं भी खामोश
सुमधुर संगीत
सुनता रहा
सतरंगी कंगन
तेरे हाथ में
जिसे लिया था तूने
ज़िद करके
सावन के मेले से
वो नीली ड्रेस
जो पसन्द थी तुम्हें
मैं चाहता था
खरीदवा दूँ तुम्हें
जानता था मैं
परी लगोगी तुम
पहन उसे
तेरी नज़रें चुरा
झाँकी थी जेबें;
उसे पहन तुम
इतराई थी
चिड़िया-सी चहकी,
हिचकिचाई;
मैं मुस्करा के बोला,
सस्ती है, ले ली
संतुष्ट हुई तुम
धीमे से बोली
हाथ थाम के मेरा
जो पैसे बचे
चलो दावत खाएँ
मैं मुस्कराया
कैसे कह देता मैं
तुम्हारी हँसी
मेरी खाली जेबों में
खनक रही;
बीत गए बरसों
पर आज भी
जेब में तेरी हँसी
खनक ही जाती है...।

[ प्रियंका गुप्ता ] 

एक लम्बी पोस्ट से अगर आप बोर हो गए होंगे, तो इतना  विश्वास है कि मेरी दीदी की ये कविता आपको खुश कर जायेगी. असल में दीदी से पता चला इसे कविता नहीं बल्कि 'चोका' कहा जाता है. मुझे उतनी समझ नहीं इन विधाओं की तो मैं तो कविता ही कहूँगा इसे. बहुत ही प्यारी कविता है दीदी, इस कविता की वजह से पोस्ट खूबसूरत दिख रही है! 

जेब में रखी कुछ यादें

Saturday, September 6, 2014


मुझे लगता है कि बहुत सालों बाद भी जब भी दिल्ली या दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित कॉफ़ी हाउस का जिक्र होगा, मुझे तुम्हारी वो तमाम चिट्ठियाँ याद आएँगी जो यहाँ बैठकर तुम्हें मैं लिखा करता था, या फिर तुम्हारी लिखी वो तमाम चिट्ठियाँ जो यहाँ बैठकर मैं पढ़ा करता था. बीच के कुछ सालों में ईमेल, चैट और फ़ोन की आदत लगने की वजह से हम दोनों ने चिट्ठी लिखना एक दूसरे को लगभग बंद ही कर दिया था. तुम्हें फिर से चिट्ठी लिखने का सिलसिला भी इसी कॉफ़ी हाउस से शुरू था.

जिस ख़त से तुम्हें फिर से मैंने चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, वो तुम्हारे जन्मदिन पर लिखा एक बेहद लम्बा खत था, जिसे लिखने में मुझे तकरीबन तीन घंटे का वक़्त लग गया था. यहीं इसी कॉफ़ी हाउस से बैठकर तुम्हें वो खत लिखा था मैंने. अरसे बाद किसी को मैंने वैसा लम्बा खत लिखा था. लम्बे खत लिखने की आदत हम दोनों को तब से थी जब हम एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. मजेदार बात ये थी कि दोनों का लम्बे खत लिखना बंद होने की वजह और फिर इस आदत के शुरू होने की वजह एक ही थी. हम दोनों के कुछ ख़ास अपनों ने ही हमारी लम्बी चिट्ठी लिखने का अकसर मजाक उड़ाया, जिससे चिढ़ कर हम दोनों ने ही लोगों को लम्बे खत लिखने बंद कर दिए थे. तब हम दोनों एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. लम्बे खत फिर से लिखने की वजह हम दोनों ही बने एक दूसरे के लिए. तुम्हारे वजह से मैं लम्बे खत लिखने लगा था और मेरी वजह से तुम. हम दोनों की ये भूली हुई आदत फिर से लग गयी थी, यूँ  लम्बे खत लिखने की. तुमने एक खत में ये लिखा भी था न, और कितना सही लिखा था तुमने. तुमने कहा था - “देखो तो, मौका पाते ही पुरानी आदतें  उभर आती हैं...है न?? और आदत भी इतनी खूबसूरत. लम्बे खत लिखने की...” 

जानती हो, तुमने जिस खत से दोबारा चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, उस खत को मैंने इसी कॉफ़ी हाउस में बैठकर पढ़ा था. वो लम्बी चिट्ठी तुम्हारी दरअसल चिट्ठी नहीं बल्कि रोचनामचे टाइप की चिट्ठी थी, एक डायरी जैसा था वो...हर दिन कुछ न कुछ जोड़ा था तुमने उस चिट्ठी में और तब मुझे भेजा था तुमनें. मैं कॉफ़ी हाउस में ही बैठकर वो चिट्ठी पढ़ रहा था, लेकिन मुझे क्या पता था उस दिन कुछ ऐसा होगा मेरे से जिसकी उम्मीद खुद मैंने भी नहीं की थी. चिट्ठी पढ़ते वक़्त कुछ ऐसा मैं कर गया था, जानबूझकर नहीं बल्कि अनजाने में ही मेरे से वो हो गया था. अपनी  उस हरकत पर मैं बड़ा शर्मिंदा सा हो गया था. 

कॉफ़ी हाउस में बैठा मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था. एक हाथ में तुम्हारी चिट्ठी थी और एक हाथ से मैं सांभर वड़ा खा रहा था. तुम्हारी चिट्ठी पढ़ते वक़्त मैं किसी और ही दुनिया में चला जाता हूँ, बाकी कुछ भी ध्यान नहीं रहता मुझे. उस शाम भी मुझे बिलकुल ध्यान नहीं रहा था कि मेरे प्लेट में वड़ा रखा है जिसे मैं चम्मच से काट कर खा रहा हूँ. मेरा सारा ध्यान तुम्हारी चिट्ठी के ऊपर था, तभी पता नहीं कैसे वड़ा काटते हुए मेरे हाथ से चम्मच फिसल गया, और वड़ा का एक टुकड़ा सीधा उछल कर सामने वाले टेबल पर रखे प्लेट में जा गिरा. दो बुजुर्ग व्यक्ति बैठे हुए थे उस टेबल पर. मेरे तो होश उड़ गए थे. ये क्या हो गया मुझसे. मैं समझ गया था, आज अच्छी खासी बात बेवजह सुननी पड़ जायेगी. लेकिन वो दोनों बुजुर्ग बड़े मीठे स्वभाव वाले व्यक्ति थे. उन्होंने गुस्से से नहीं बल्कि मुस्कुराकर बड़े प्यार से कहा, “कोई बात नहीं बेटा, बस थोड़ा ध्यान रखा करो...”. उन्होंने तो बुरा नहीं माना लेकिन मेरे अन्दर हद दर्जे की एम्बैरेसमेन्ट फील आने लगी थी. मैं झटपट वहाँ से उठा और सीधा कैफे के बाहर आ गया. 

ऐसा मेरे साथ अकसर होता है, खासकर जब भी तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा होता हूँ मैं या फिर तुम्हारे ईमेल्स या मेसेज. कितनी ही बार मुझे ऐसे एम्बैरेसमेन्ट का सामना करना पड़ा है. वैसे मैं इसे एम्बैरेसमेन्ट नहीं बल्कि `स्वीट एम्बैरेसमेन्ट' कहता हूँ. मुझे उस वक़्त बड़ी हँसी सी आती है खुद पर. कॉफ़ी हाउस की ये घटना पहली घटना नहीं थी, एक और दिलचस्प किस्सा तब हुआ था, जब तुम्हारी ही लिखी एक चिट्ठी मैं यहाँ पढ़ रहा था, इसी कॉफ़ी हाउस में. 

उस शाम काफी भीड़ थी कॉफ़ी हाउस में. कुछ बुजुर्ग लोग एक लम्बे टेबल पर बैठे थे. बैठने की कहीं और जगह नहीं देखकर मैंने वहाँ बैठे लोगों से इजाज़त ली और उनके टेबल पर ही एक कोने में बैठ गया. मेरे बगल में बैठे बुजुर्ग अपनी टोली के साथ बातों में मगन थे और मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ने में. पास वाले बुजुर्ग ने एक प्लेट पकौड़ियाँ मँगवाई खाने को. वो पकौड़ियाँ मेरे हाथों के पहुँच के दायरे में थीं. मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था, और पढ़ते वक़्त ये भी ख्याल नहीं रहा कि मैंने सिर्फ कॉफ़ी आर्डर की है. मैं पास बैठे अंकल के प्लेट से पकौड़ियाँ लेकर बड़े इत्मिनान से खा रहा था. तीन चार पकौड़ियाँ मेरे पेट के अन्दर चली गयीं थी तब मुझे एकाएक ख्याल आया, ये मैं क्या कर रहा हूँ. बगल वाले अंकल मेरा ये गिल्ट भांप गए, और वो एकाएक हँसनें लगे. “कोई बात नहीं बेटा, हो जाता है. अब जब खा ही रहे हो, तो रुक क्यों गए, खाओ न..और आ जायेंगे”. उन्होंने कहा. लेकिन मैं इतना शर्मिंदा हो गया था, कि उनसे माफ़ी मांगी मैंने और तुरंत फिर वापस चला आया था.

सच में मुझे हैरत होती है कि मैं ऐसी हरकतें कैसे करने लगता हूँ. तुम्हें पता है न कितना डिसिप्लिन्ड पसंद व्यक्ति हूँ मैं. किसी से बात करने से लेकर सड़क पर चलने तक, गाड़ी चलाने तक हर बात कायदे से करने की आदत है मुझे. खोया खोया नहीं रहता सड़क पर चलते वक़्त. चिढ होती है जब देखता हूँ कोई मोबाइल में आँख गड़ाए सड़क पर चले जा रहा है. ऐसे लड़के या लड़कियों से कितना चिढ़ता था मैं, ये तुम जानती ही हो. लेकिन क्या ये पता है तुम्हें, जब मेरे पास नया स्मार्टफोन आया था, तो मैं भी अकसर ऐसे ही हरकतें कर दिया करता था. एक दो बार इन हरकतों की वजह से भी मुझे थोड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है. जैसे एक शाम का एक किस्सा है. 

मैं अपने भैया के साथ अपने मोहल्ले के मार्केट के किनारे बने पेवमेंट पर चल रहा था. वो पेवमेंट समतल नहीं थीं, कहीं ज्यादा स्लोप तो कहीं बिलकुल ऊँचा. ऐसी हालत उस पेवमेंट की थी. तुमने मुझे कुछ जरूरी मेसेज भेजे थे फेसबुक पर, मोबाइल पर फेसबुक का मेसेज टोन सुनाई दिया और मैंने झट से अपना मोबाइल पॉकेट से निकाला और चलते हुए ही मेसेज पढ़ने लगा. मेरा ध्यान चलने पर कम और तुम्हारे मेसेज पर ज्यादा था. यूँ कहो कि मेरा सारा ध्यान मेसेज पढ़ने पर ही था. जाने कहाँ से मेरा पैर फिसला, किस चीज़ से टकरा गया था मैं, मेसेज पढ़ते हुए ही, मोबाइल हाथ में लिए सड़क पर मैं फिसल गया, धम्म से नीचे गिरा सड़क पर. भैया आगे आगे चल रहे थे. उनके पीछे मुड़ने से पहले ही मैं झट से उठ गया, हाथ पैर झाड़ कर मैं उनके साथ हो लिया. चोट तो मुझे नहीं लगी थी लेकिन अपने मोहल्ले में गिरना, ऐसी जगह जहाँ आसपास के दुकान वाले मुझे अच्छे से जानते हैं, मुझे शर्मिंदा कर गया. ज्यादा शर्मिंदगी मुझे अगले दिन हुई थी, जब मार्केट के कोना पर चाट बनाने वाले लड़के ने पूछ दिया था मुझसे “भैया आप कल गिर गए थे...चोट तो नहीं लगी  थी आपको ज्यादा?” उस दिन के बाद लेकिन मैंने तय किया था कि अब कभी राह चलते हुए ऐसे मोबाइल का प्रयोग नहीं करूँगा मैं. उसके बाद से तुम्हारे मेसेज मुझे यूँ मिलते भी हैं, तो मैं सड़क के किनारे खड़ा होकर मेसेज पढ़ लेता हूँ लेकिन चलते हुए मेसेज करना उस दिन के बाद से मैं भूल ही गया.

जाने कितने सारे इस तरह के किस्से हैं मेरे. जाने कितनी बार अजीब अजीब हरकतें मेरे तरफ से हुई हैं. एक दिलचस्प किस्सा है, एक दिलचस्प से दिन का. मेरे लिए ये किस्सा एक यादगार किस्सा इसलिए भी है कि इसमें तुम भी हो. तुम्हें तो याद होगा ही वो दिन न जब कश्मीरी गेट बस अड्डे पर तुमसे मिला था मैं? 

दरअसल हम मिले नहीं थे उस दिन. बस एक दूसरे को दूर से ही देखे थे. बस एक घंटे के लिए तुम दिल्ली आई थी, तुम्हारी बस थी दोपहर में अम्बाला के लिए, और मैं तुमसे मिलने, बस तुम्हें एक झलक देखने के लिए बस स्टैंड आ पहुँचा था. तुम्हारे कुछ रिश्तेदार तुम्हारे साथ थे, वही कुछ रिश्तेदार जिनकी वजह से मुझे और तुम्हें जाने कितनी परेशानियों से गुज़ारना पड़ा था, वही कुछ रिश्तेदार जिनके वजह से हमने तय किया था कि उस दिन एक दूसरे के सामने नहीं आयेंगे हम. मैंने तुम्हें पहले से निर्देश दे तो दिए थे, कि मैं कहाँ पर खड़ा रहूँगा. तुम बस नज़रें उठा कर मेरी तरफ देख लेना, और यदि मौका मिला तो हम एक दूसरे के पास से गुज़रते हुए एक दूसरे को ‘हेल्लो’ भी बोल सकेंगे. लेकिन फिर भी तुम घबराई हुई थी. तुम्हारे मन में ये डर था, कहीं मुझे तुम्हारे रिश्तेदारों ने वहाँ बस स्टैंड पर देख लिया, तो बेवजह कहीं कुछ बात न बढ़ जाए. लेकिन मैंने तुम्हें आश्वस्त किया था कि मैं इन्विज़बल रहने में उस्ताद हूँ. तुम्हारे सिवा मुझे कोई नहीं देख पायेगा, इसकी जिम्मेदारी मेरी. तुम मेरे इस बात से निश्चिंत हो गयी थी. जैसा कि हमने तय किया था, उस दिन सभी कुछ वैसा ही हुआ था. हमनें दूर से ही एक दूसरे को देखा था, तुम मुझे देख कर मुस्कुराई थी उस दिन. मन में लेकिन हम दोनों के एक खलिश रह गयी, कि इतने करीब होने के बावजूद, कुछ मीटर की दूरी पर ही हैं हम दोनों और एक दूसरे से मिल नहीं सकते, बात नहीं कर सकते. लेकिन मन की इस एक चुभन के बावजूद हम दोनों बेहद खुश थे. हम दोनों ने एक दूसरे को देखा था, और हमें किसी ने नहीं देखा एक दूसरे को देखते हुए. हम दोनों दूर से ही एक दूसरे को देखकर खुश थे. 

कुछ देर बाद तुम्हारी बस अम्बाला के लिए रवाना हो गयी. तुम्हारे जाने के बहुत देर बाद तक मैं बस स्टैंड के उस प्लेटफोर्म पर बैठा रहा था जहाँ से तुम्हारी बस अम्बाला के लिए निकली थी. एक तो मैं तुम्हारे ख्यालों में गुम था, और दूसरा ये कि हर बार जब भी तुम मेरे सामने आती हो, जाने क्या हो जाता है मुझे, एक नशा सा छा जाता है आँखों पर. उस दिन भी शायद तुम्हारा ही नशा आँखों पर छाया हुआ था, शायद इसलिए मैं प्लेटफोर्म पर लगे एक बड़े से शीशे से जाकर टकरा गया था. हाँ, उस दिन यही हुआ था. कश्मीरी गेट बस अड्डे के प्लेटफोर्म से एक्जिट करने के लिए बेसमेंट में बने वेटिंग हॉल से गुज़रना पड़ता है. वेटिंग रूम में बड़े से शीशे के दरवाज़े बने हुए हैं, और मैं जाने तुम्हारे किन ख्यालों में गुम था, कि सीधा जाकर उस शीशे के दरवाज़े से ही मैं टकरा गया था, और जोर से टकराया था मैं. मेरे दरवाज़े से टकराने के साथ ही कुछ लोगों की निगाहें मुझपर उठ गयी थीं. कुछ की दबी सी हँसी भी निकल आई थी. मैं चुपचाप वहाँ से खिसक लिया, बाहर जब आया, तो खुद पर बेहद हँसी आ रही थी. मैं कैसे ऐसे टकराने लगा हूँ चलते हुए, लड़खड़ाने लगा हूँ चलते हुए...सच में बड़ा तगड़ा हैंगोवर होता है तुम्हारा मुझपर. 

ऐसे जाने कितने और किस्से मेरे साथ होते ही रहते हैं और हर बार ऐसे किस्से या ऐसे हादसों के बाद मैं तुम्हें मन ही मन गरिया भी देता हूँ, “बदतमीज़ लड़की, फिर से मुझे एम्बैरस करवा गयी”. लेकिन इन सब बातों के बावजूद, तुम्हारे ऊपर या तुम्हारी यादों के ऊपर या खुद के ऊपर कभी गुस्सा नहीं बल्कि हँसी आती है.. मैं बस मुस्कुरा देता हूँ ऐसे स्वीट एम्बैरेसमेन्ट पर.

स्वीट एम्बैरेसमेन्ट