Friday, January 31, 2014

दिल्ली डायरी (४)


जनवरी का ये आखिरी दिन है. मैं कॉफ़ी होम में बैठ कर कुछ तारीखें याद कर रहा हूँ. कुछ खत याद आ रहे हैं, जो यहाँ बैठ कर तुम्हें लिखा करता था. कुछ लम्हे जो यहाँ हमने और तुमने एक साथ बिताये थे. तुम्हें याद है न? जब से तुम्हें मैंने कॉफ़ी होम के बारे में बताया था तब से तुम कितनी बेताब हो गयी थी यहाँ आने के लिए और यहाँ की कॉफ़ी पीने के लिए. यहाँ मिलने वाली फ़िल्टर कॉफ़ी के बारे में जब भी तुम्हें बताया और जब कभी शाम में तुम मुझे फोन करती और तुम्हें मैं कहता कि मैं कॉफ़ी होम में बैठ कर फ़िल्टर कॉफ़ी पी रहा हूँ. तुम कितनी जल सी जाती थी. तुम प्यार से चिढ़ते हुए कहती “जला लो मुझे...और तुम्हें आता ही क्या है..” और मैं बस मुस्कुराते रहता था.

आज बड़े दिनों बाद कॉफ़ी होम आया हूँ तो मुझे अचानक कुछ बातें याद आ गयीं. असल में उन बातों का याद आना अचानक नहीं बल्कि स्वाभाविक था. आखिरी बार कॉफ़ी होम तुम्हारे साथ ही आया था और उस दिन के बाद सीधे आज आया हूँ. कॉफ़ी होम में आते ही दिसंबर के उस खूबसूरत दिन के साथ कुछ और बातें भी याद आते चली गयीं. मैं इस कैफे में आज उसी टेबुल पर जा बैठा था जहाँ बैठकर मैंने तुम्हें वो लम्बा सा खत लिखा था. याद है न तुम्हे वो खत? ऑफकोर्स तुम्हें याद होगा. तुम भूल भी कैसे सकती हो. वो खत तुम्हारे जन्मदिन का तोहफा था जो यहाँ बैठकर मैंने तुम्हारे लिए लिखा था.

अक्टूबर के आखिरी कुछ दिन थे वे. शायद बाईस या तेईस अक्टूबर का दिन था. याद नहीं सही से मुझे. उस दिन मैं बहुत बीमार था. सुबह जब आँख खुली तो पूरा बदन बुखार से तप रहा था. तुमने सुबह ही मुझे हिदायत दे दी थी कि दो दिन से तुम्हारी तबीयत ख़राब है, आज घर पर ही आराम करना. लेकिन मैं घर पर आराम करना नहीं चाह रहा था. तुम्हें ख़त लिखने का वो आखिरी दिन था. वरना एक दिन भी और देर करता मैं तो तुम्हें वक़्त पर शायद खत ना मिलता. उस दिन मैं चाहता तो घर में भी बैठकर तुम्हें खत लिख सकता था, लेकिन घर में बैठ कर कुछ भी लिखना मेरे लिए हमेशा मुश्किल काम रहा है. ख़त, कवितायें या डायरी लिखने के लिए मैं अकसर किसी पार्क या कैफे में चला आता हूँ.

कुछ चालीस मिनट का वक़्त लगता है मुझे अपने घर से कॉफ़ी होम आने में. शहर का ये मेरा सबसे पसंदीदा कैफे हैं जहाँ अकसर शाम में मैं देर तक बैठता हूँ. यहाँ आने के लिए चालीस मिनट की दूरी कभी अखरी नहीं मुझे. लेकिन उस दिन उस चालीस मिनट में कम से कम मैंने चालीस बार ये सोचा था कि आज मुझे घर पर ही रुक जाना चाहिए था. हिम्मत जवाब दे रही थी. कमजोरी इस कदर थी. लेकिन तुम्हें खत लिख कर पोस्ट करना था. मैं कैफे पहुँचा और एक फ़िल्टर कॉफ़ी, स्नैक्स आर्डर कर कैफे के अपने फेवरिट जगह पर आकर बैठ गया. बैग से मैंने वो लम्बा सा लेटर पैड निकाला और तुम्हें ख़त लिखना शुरू कर दिया. लिखना जो मैंने शुरू किया तो बस लिखते गया, बीच में सिर्फ एक बार एक कप और फिल्टर कॉफ़ी आर्डर करने के लिए मेरे हाथ रुके थे. मैं बहुत देर तक लिखता रहा था और लेटर पैड के नौवें पेज पर आकर मेरी कलम रुकी थी. उससे आगे लिखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. शायद तबीयत थोड़ी बिगड़ने लगी थी. मैंने खत लिखना वहीँ बंद कर दिया. तुमने गौर भी किया होगा न कि उस खत का कोई अंत था ही नहीं. वैसे खतों का अंत होता भी नहीं है...लेकिन उस खत को मैंने अचानक ही बंद किया था. तबीयत साथ देती अगर मेरी तो शायद मैं और कई पन्ने लिखते रहता.

कॉफ़ी होम से जब मैं निकल रहा था तो मुझे ये सोच बड़ी हैरत हो रही थी कि मैं पिछले दो दिन बिस्तर पर पड़ा रहा था. बैठने की हिम्मत नहीं थी, और यहाँ बैठकर ढाई घंटे में तुम्हें इतना बड़ा खत लिखा दिया. उस शाम घर पहुँचते पहुँचते बुखार थोड़ा और बढ़ गया था. लेकिन मुझे इसकी ज़रा भी चिन्ता नहीं थी. तुम्हें खत लिख कर भेजना था, सो मैं भेज चूका था. कैसे भूल सकता हूँ, जब तुम्हें वो खत मिला था. तुम कितनी खुश हो गयी थी...तुमने उसी वक़्त मुझे फोन किया था और कहा था “दिल्ली से मेरे लिए एक ख़त आया है...”. तुम्हारी आवाज़ से तुम्हारी ख़ुशी का अंदाज़ा हो रहा था मुझे. मैं शायद भूल भी नहीं पाऊँगा खत मिलने पर तुम्हारा वो रिएक्शन . उस समय मुझे लगा की तुम्हें ख़त लिखने में जो भी थोड़ी बहुत तकलीफ हुई थी मुझे, वो बिलकुल “वर्थ” थी.

तुम पहली बार यहाँ जब आई थी, वो दिसंबर का एक दिन था न? सात दिसंबर का दिन था वो. हम उस दिन पूरा शहर घूमे थे. सुबह से शाम तक. उसके आसपास के दिन बड़े संघर्ष के दिन थे. उलझनों से भरे हुए. कुछ अपनों की बातों ने तुम्हें बहुत दुःख पहुँचाया था. उन बातों से तुम्हारे दिल को बहुत ठेस पहुंची थी. तुम बिलकुल टूट गयी थी. रात भर तुम फोन पर रोती रही थी और मैं तुम्हें समझाने की, तुम्हें सँभालने की कोशिश कर रहा था. बड़ी मुश्किल से रात के एक बजे तुम्हें नींद आ पायी थी. लेकिन मैं पूरी रात जागा रहा था. अचानक जो बातें सामने आई थी वो कैसे सुलझेगी ये सोच रहा था. तुम्हारे बारे में सोच रहा था. कल का दिन कैसे बीतेगा उसके बारे में सोच रहा था. हमने पूरा दिन दिल्ली घूमने का प्लान बनाया था, लेकिन वो घूमना अब “आउट ऑफ़ क्वेश्चन” था. मैं बस इतना चाह रहा था कि तुम्हारी सभी परेशानियाँ खत्म हो जाए. रात भर मैं प्रार्थना करते रहा था, कि तुम जब सुबह जागो तो सब कुछ ठीक हो जाए. शायद ऊपर बैठा कोई खुदा है जरूर. प्रार्थनाओं में असर भी होता है, ये हमने उस दिन देखा था. चमत्कार जैसा ही कुछ कहेंगे न उसे कि सुबह तुमने मुझे फोन किया था और कहा था “आ जाओ, हम चलेंगे घूमने”. तुम्हारी आवाज़ थोड़ी बेहतर लगी थी मुझे और मैं तुमसे मिलने के लिए निकल पड़ा था.

पूरे रास्ते मैं सोचता रहा था कि आज क्या होगा? कैसा बीतेगा आज का दिन? तुमने तो कह दिया कि हम चलेंगे? लेकिन उन बातों का क्या होगा? वो उलझन कैसे सुलझेगी? जब तक दिमाग में वो बातें चलती रहेंगी तब तक क्या हम दोनों पूरे मन से शहर घूम भी पायेंगे? एन्जॉय कर पायेंगे? लेकिन तुमने बड़े विश्वास से कहा था कि “चले आओ, हम घूमने चलेंगे...ना भी चले तो कम से कम तुम्हारा साथ रहेगा पूरे दिन....मेरे लिए यही सबसे बड़ी बात होगी”

तुम जब मेरे सामने आई थी तो तुम्हारा चेहरा देख कर मेरा दिल एकदम बैठ सा गया था. हमेशा खिला हुआ सा रहने वाला तुम्हारा चेहरा मुरझाया हुआ था. एक फीकी मुसकराहट तुम्हारे चेहरे पर थी. मुझे देखते ही तुमने थोड़ा और मुस्कुराने की थोड़ी कोशिश की, लेकिन पूरी तरह कामयाब नहीं हो पायी. दिल ने कहा कि तुम्हें उसी वक़्त गले लगाकर कहूँ “घबराओ मत, सब ठीक हो जायेगा”.

तुम जानती हो मैंने कितनी मुश्किल से खुद को सँभाला था उस वक़्त. सोचता हूँ आज कि अगर मेरे चेहरे पर
तुम्हें वो भाव दिख जाते जो तुमसे मिलने के आधे घंटे पहले तक थे, तो तुम क्या करती ? तुम खुद को संभाल पाती या नहीं? मैं तुम्हें सम्हाल पाता या नहीं? बहुत जतन करना पड़ा था मुझे अपने चेहरे पर वो मुसकराहट लाने के लिए. मेरी वो कोशिश लेकिन व्यर्थ नहीं थी. मुझे यूँ मुस्कुराता देख तुम्हारे उस मुरझाये चेहरे पर एक अलग रौनक , एक अलग ही चमक आ गयी थी....है न?

बातें करते हुए तुम थोड़ी शांत दिख रही थी... हालांकि रात की बातों का असर तो तुम्हारे चेहरे पर था लेकिन फिर भी तुम मुसकुरा रही थी. ये तुम्हारे उसी फाईटिंग स्पिरिट की ही बदौलत था जिसका मैं हमेशा से कायल रहा हूँ. दुखों तकलीफों से कैसे उबरा जाता है...हज़ार दर्द हों दिल में, फिर भी उन सब को इग्नोर करते हुए कैसे मुस्कुराया जाता है और कैसे खुश रहा जाता है ये कोई तुमसे सीखे. इस मामले में मुझे तो तुमसे हमेशा एक इन्स्परेशन मिलती रही है.

उस दिन भी तुम्हारी यही सोच थी कि जो भी हो, हमें दिन हँसते हुए बिताना है..एक दूसरे के साथ. हम घूमने निकल गए थे, सारी उलझनों को पीछे छोड़कर. और कमाल की बात देखो, मेरे आते ही वो सारी परेशानियां, वो सारी उलझनें बहुत हद तक सुलझते गयी थी. तुम इस बात से बहुत खुश हो गयी थी. तुमने कहा था मुझसे, कि देखो भगवान भी कितने चमत्कार करते हैं न. “थैंक यू गॉड ” तो तुमने उस दिन जाने कितनी बार कहा होगा.
हम पूरे दिन पुराना किला, जंतर मन्तर, इंडिया गेट और कनॉट  प्लेस घूमते हुए हम वापस आये थे. पुराने किले में बिताया समय कितना अच्छा था न. मैं तुम्हें एक गाइड की तरह सब कुछ दिखा रहा था. दीवारों की नक्काशी तुम्हें दिखाते हुए मैंने कहा था, ये देखो ये नक्काशी नहीं, आयतें लिखी हुई हैं. और वो बात कहते ही मुझे अचानक “आंधी” फिल्म का वो गाना “तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं” याद आ गया. मैं सही सही नहीं कह सकता लेकिन मुझे लगता है कि उस वक़्त तुम्हें भी इस गाने की याद आई होगी. तुमने भी मन में इसे गुनगुनाया होगा न? ये तो वैसे भी तुम्हारे पसंदीदा गानों में से एक है...है न? याद है एक सुबह जब मैंने तुम्हें फोन किया था और तुम्हें बताया था कि ये गाना मैं अभी सुन रहा हूँ, तो तुम फोन पर ही इस गाने को गुनगुनाने लगी थी और मैं जो भी काम कर रहा था और जो बातें तुमसे कहनी थी, वो सब भूल चूका था. बस तुम्हारे गाने में, तुम्हारी आवाज़ में मैं खो गया था. तुम नहीं मानती हो न तुम्हारी आवाज़ कितनी अच्छी है. ये मेरे से पूछो. दिल को कितना सुकून पहुंचती है तुम्हारी आवाज़. ये तुम नहीं जानती. तुम जान भी नहीं पाओगी कभी. तुम्हारी आवाज़ के लिए मेरी डिक्शनरी में सिर्फ एक ही शब्द है... सोलफुल.

पुराना किला और जंतर मंतर घूम कर जब हम कॉफ़ी होम पहुंचे, तब तक तुम थोड़ी थक चुकी थी. तुम सीधे वहीं चली गयी थी, जो कैफे का मेरा पसंदीदा कोना था. तुम उसी टेबुल पर जाकर बैठ गयी थी. मैंने अपना बैग तुम्हारे पास छोड़ दिया था और आर्डर देने काउंटर की तरफ गया. तुम्हें अचानक बदमाशी सूझ गयी थी. मैं फ़ूड काउंटर पर डोसा और कॉफ़ी के इंतजार में खड़ा था कि तुम मौका देखते ही झट से मेरे बैग में ताक-झाँक करने लगी. मेरी डायरी निकाल कर तुम पढ़ने लगी थी. काउंटर से मैं तुम्हें देखकर मुसकुरा रहा था और फिर तुम्हें थोड़ा चौंकाने के लिए मैं दौड़ते हुए तुम्हारे पास आ पहुँचा था और लगभग स्किड करते हुए तुम्हारे पास आ रुका था. तुम बिलकुल चौंक सा गयी थी. शायद थोड़ा डर भी गयी थी तुम. तुमने डायरी पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली, कि  कहीं मैं उसे छीन ना लूँ तुमसे. “जाओ...जाओ जाकर काउंटर के पास खड़े रहो, मैं तुम्हारी नहीं, अपनी डायरी पढ़ रही हूँ, तुम्हें क्या?” तुमने कहा था और मैंने तुम्हारे पीठ पर एक थपकी देते हुए कहा “पढ़ लो बदमाश”. उस समय तुम बिलकुल वैसे ही मुस्कुराई थी जैसे तुम अकसर मुस्कुराती हो. मुझे लगा कि जैसे जो मुस्कराहट तुम्हारे चेहरे से गायब हो गयी थी वो अब धीरे धीरे वापस लौट रही है.

तुम उस दिन बातें करते वक़्त मेरी तरफ नहीं देख रही थी. तुम्हारी नज़रें कभी डोसे की तरफ जाती तो कभी आसपास बैठे दूसरे लोगों की तरफ....लेकिन तुम साफ़ तौर पर मुझे नहीं देख रही थी...और जब कभी बातों के बीच हमारी नज़रें मिल जाती, तुम्हारे चेहरे पर एक मुसकराहट फ़ैल जाती थी. तुम क्यों मेरी तरफ नहीं देख रही थी, ये भी मैं अच्छे से समझता हूँ, जानता हूँ. लेकिन मैं...मैं तो पूरे वक़्त सिर्फ तुम्हें ही देखता रहा था. कुछ बातों से कैसे तुम इरिटेट होकर शक्लें बनाने लगी थी..,कैसे मेरी कुछ बदमाशी वाली बातों पर तुम मन ही मन मुसकुरा रही थी...मैं वो सब देख रहा था. तुम खुल के कुछ भी नहीं कह रही थी, लेकिन मैं सब समझ रहा था.
हम लोग शायद एक घंटे कॉफ़ी होम में बैठे होंगे न? तुम्हें भी वो जगह काफी पसंद आई थी, और तुमने कहा था कि  अगर  मैं यहाँ रहती तो तुम्हारे साथ अकसर यहाँ चली आया करती शाम में, कॉफ़ी पीने . वहाँ से निकल कर हम इंडिया गेट की तरफ बढ़ गए थे. मुझे थोड़ा अफ़सोस हुआ था मैंने पहले ही उधर जाने का प्लान बना लिया था और तुम्हें कनॉट  प्लेस घूमना था. तुमने कहा भी था न मुझसे. सच कहो तो मैं भी चाहता था तुम्हारे साथ कनॉट  प्लेस का एक चक्कर लगाना. तुम्हे मैं वो आर्चीस गैलरी दिखाना चाहता था जहाँ से मैंने तुम्हारे लिए तोहफे खरीदे थे. तुम्हारे गले के लिए एक खूबसूरत सा चेन भी तो मैंने वहीं से खरीदा था. उस दिन अर्चिस गैलरी के काउंटर पर बूढ़ी महिला बैठीं थीं. उन्हें जब मैं पैसे देने पहुँचा तो उन्होंने उस चेन को देखते ही कहा था “बहुत सुन्दर तोहफा है. फॉर समवन स्पेसिअल?”. मैंने हाँ में सर हिलाया. उन्होंने कहा “उसे बहुत पसंद आएगा.” मैंने उन्हें धन्यवाद कहा और बाकी पैसे लेकर दुकान के बाहर आ गया. एक पागलपन वाला ख्याल था. मैं चाहता था कि तुम्हें भी वहाँ ले जाऊं और उसी बूढ़ी महिला से मिलवाऊं. उन्हें बताऊँ कि इसी ख़ास लड़की के लिए मैंने कल आपके दुकान से वो तोहफा खरीदा था. अगर रात में अचानक वो सारी बातें ना हुई होतीं, तो मैं सच में तुम्हे अर्चिस गैलरी ले जाता और उस बूढ़ी महिला से मिलवाता तुम्हें

लेकिन हम कनॉट  प्लेस ना जाकर इंडिया गेट आ गए थे. हम कुछ देर तक इंडिया गेट घूमते रहे थे. तुमने वहाँ भी मुझसे कहा था कि तुम्हें कनॉट  प्लेस घूमना है. मैंने तुम्हारी इस बात को इग्नोर कर दिया था. क्योंकि हमारे पास समय कम था. “वापस जाकर मैं करुँगी भी क्या? इससे अच्छा है यहीं घूम लूँ मैं..” तुमने कहा था. लेकिन मैं अड़ा रहा था अपनी बात पर...कि यहाँ से हम वापस लौट जायेंगे. तुम थोड़ी उदास सी हो गयी थी. तुम वहाँ लगी एक सीमेंट की बेंच पर जाकर बैठ गयी थी. तुम्हारा चेहरा हल्का बुझा हुआ सा दिख रहा था. तुम कुछ कह नहीं रही थी, लेकिन तुम वहाँ से वापस नहीं जाना चाहती थी. तुम्हारे मन में उस वक़्त जो बातें चल रही थी वो सिर्फ मैं जान रहा था लेकिन खुल कर तुमसे कुछ कह नहीं पा रहा था. तुम भी खुल कर मुझसे कहाँ कुछ कह पा रही थी. तुम अपना ध्यान बँटाने के लिए वहाँ खेलते कुछ बच्चों को देखने लगी थी. तुमने कहा था मुझसे “यहाँ कितना अच्छा लग रहा है. कितना अच्छा माहौल है. और तुम इस खूबसूरत ऐट्मस्फिर को छोड़कर जाने के लिए कह रहे हो..यहाँ से मेरा तो जाने का दिल भी नहीं कर रहा. ऐसे खूबसूरत माहौल से जाना कितना उदास और बोरिंग सा ख्याल है”

लेकिन वक़्त सच में हो चला था और मैं चाहता था कि हम समय रहते ही वापस लौट जाएँ. वापस लौट आने पर भी तुम मेरे साथ एक डेढ़ घंटे तक रही थी. शाम के उस वक़्त तुम बहुत हद तक शांत हो चुकी थी. तुम्हारे मन के अन्दर जो तूफान उठे हुए थे, वो शांत हो गए थे. तुम्हारा मन स्थिर था. तुम अपनी युज्वल बदमाशी वाली बातें करने लगी थी. तुम खेलने लगी थी मेरे हाथों से. मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर तुम नाप रही थी.. “तुम्हारा हाथ सच में मेरे से बड़ा है” तुमने कहा था. फिर मैं तुम्हें तुम्हारे हाथों की रेखाओं से पहचान करवा रहा था... “ये देखो, इसे भाग्य रेखा कहते हैं,” ये देखो इस रेखा को ये कहते हैं....और जाने क्या क्या....” तुम मेरी बातें ऐसे सुन रही थी जैसे मैं सच में मैं हाथ की रेखाएं पढ़ना जानता हूँ.

तुम नहीं चाहती थी कि मैं तुम्हे छोड़ कर वापस इतनी जल्दी लौट जाऊं. लेकिन मेरा लौटना जरूरी था. डेढ़ घंटे बस तुम्हारे लिए मैं रुक गया था. मैं जब वापस आ रहा था तो तुम बाहर गेट तक मुझे छोड़ने आई थी. जब तक मैं गली से मुड़ न गया था तब तक तुम देखती रही थी मुझे. बस पर जब बैठा मैं अपने घर की ओर जा रहा था तो कई सारी बातें दिमाग में चल रही थी. लेकिन सबसे ज्यादा आश्चर्य और ख़ुशी की बात ये थी कि हमने आज का पूरा दिन साथ बिताया था. कल रात जो बातें हो गयी थी, उससे दिन भर साथ रहना नामुमकिन सा लग रहा था. लेकिन ये तुम भी जानती हो और मैं भी कि हम दोनों का एक-साथ पूरा दिन बिताना कितना जरूरी था. वापस लौटते वक़्त मेरी नज़र मेरी पॉकेट में पड़ी एक कागज़ पर नज़र गयी. उमसे मैंने शहर के उन जगहों के बारे में लिखा था जहाँ तुम्हारे साथ मैंने जाने का प्लान बनाया था. मैंने उस नोट को एक बार पढ़ा और मन ही मन मन सोचा, अच्छा जब तुम अगली बार आओगी दिल्ली तो तुम्हें इन सब जगह मैं घुमाऊंगा.

Monday, January 20, 2014

एक खाली सा दिन


सुबह के छः बज रहे थे. हमेशा की तरह आज भी वो अलार्म बजने के पहले ही जाग गया था. जाड़ों की सुबह इतनी जल्दी जागने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन फिर भी वो जाग गया. रात में कई बार उसकी नींद टूटती रही थी. कुछ अनसुलझे सवाल ऐसे थे जिसका जवाब उसके पास नहीं था...रात भर वे सवाल उसे परेशान करते रहे थे. बहुत देर तक वो बिस्तर पर यूँ ही पड़ा रहा, जैसे फैसला नहीं कर पा रहा हो कि उठे या न उठे. तीन दिन उसके अच्छे बीते थे. तीन दिन से उसके रिश्तेदार आये हुए थे तो तीन दिन वो काफी व्यस्त रहा लेकिन कल रात उनके चले जाने के बाद वो फिर से एकदम खाली सा हो गया था. उसने अपनी आँखें फिर से बंद कर ली... उठने का भी क्या फायदा? ना तो उसके पास कोई काम है ना ही शहर में कोई ऐसा जिससे वो मिल सके या जिनके साथ वक़्त बिता सके. आज का दिन कैसे कटेगा? - उसने सोचा. बहुत याद करने की कोशिश की उसने, लेकिन कोई भी ख़ास काम उसे याद नहीं आया. कुछ जॉब एजन्सीस में उसे जाना तो है, लेकिन वो भी तब जब उधर से कोई फोन आएगा.

फिर से एक खाली सा बेकार सा निरर्थक सा दिन उसे बिताना है...एक कोरा दिन जिसका कोई हासिल नहीं. आज फिर पूरा दिन यूँ हीं बसों में शहर घूमते हुए काटना है – उसने सोचा. एक हलकी बेचैनी ने उसे पकड़ लिया. वो उठ कर सुस्त क़दमों से अपने घर की खिड़की के पास आ पहुँचा. शीशे की उस बड़ी सी खिड़की से सामने मुख्य सड़क दिखाई देती थी. वो हर सुबह उठ कर अपने घर के खिड़की के पास आता और लोगों को काम पर जाते हुए देखता. हर कोई किसी न किसी काम के लिए  सुबह तैयार होकर घर से निकलता....लेकिन वो...उसे कोई काम नहीं है...और वो अपने घर की खिड़की से बाकी लोगों को काम पर जाते देख रहा है...उसने सोचा वो शहर के उन लोगों में से है जो फ़िलहाल बेकार बैठे है और जिन्हें सिवाए दिन भर निरुद्देश्य इधर उधर भटकने के कोई दूसरा काम नहीं है.

उसे ये ख्याल हमेशा बड़ा भयावह सा लगता है....कि वो उन लोगों में से है जो अभी खाली हैं...बेकार हैं, और घरों में बैठे हैं. खिड़की से उसने आँखें मोड़ ली और गैस पर चाय चढ़ा कर उसने अपने कमरे को एक बार देखा...उसका वो कमरा सस्ते दामों पर मिला एक स्टूडियो अपार्टमेंट था. यूँ तो वो अकेला रहता था लेकिन उसके कमरे को देखने पर लगता था जैसे वो परिवार के साथ रहा रहा हो.. कई सारी चीज़ें उसने जमा कर रखी थी....और जब कभी वो अपने कमरे का यूँ जायजा लेता हमेशा उसे लगता कि उसे इतनी चीज़ें जमा कर के रखनी नहीं चाहिए थी. कोई अनजाना उसके घर आता तो उसके घर को देखकर ये सवाल जरूर पूछता उससे कि शादी हो गयी आपकी? वो चुपचाप “ना” में गर्दन हिला देता. वो व्यक्ति फिर कहता, आपके घर को देखने से लगता है आप परिवार के साथ रहते हैं...वो इसका कुछ भी जवाब नहीं देता. ‘परिवार के साथ रहना’, ‘शादी’ इसके बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं. उसकी माँ भले हर दो तीन दिन पर इस विषय पर बात कर लेती लेकिन वो हमेशा उसके सवाल को टाल देता. माँ भी उसकी मजबूरी समझती, और वो ज्यादा सवाल नहीं करती...बात को रोक दिया करती. “शादी” के लिए वो शायद तैयार नहीं था. उसे ये शब्द किसी दूर की चीज़ मालूम लगती थी. वो इस बारे में कभी नहीं सोचता था. ऐसी कई बातें थी जिसके बारे में वो कभी नहीं सोचता...कुछ भी नहीं सोचता...ये वैसी चीज़ें थी जो उसके वश में शायद नहीं थी.

अपने कमरे में वो ज्यादा देर रह नहीं सका...जल्दबाजी में या शायद फ्रस्टेशन में वो तैयार होकर बाहर निकल गया. यूँ भी दोपहर के समय वो पूरा दिन अकेले कमरे में नहीं रहता था...दिन में घर पर रहना हमेशा उसके लिए असंभव सा रहा है. काम ना भी रहता तो भी वो निकल जाता था घर से. घर से निकलते ही वो सामने वाले होटल में चला जाता जहाँ वो कुछ देर बैठता और सुबह का अख़बार पढ़ता, वहाँ उस होटल में वो सुबह की दूसरी कप चाय पीता और कभी मन करता तो सुबह का नाश्ता भी कर लेता. चाय नाश्ता के अलावा सुबह इस होटल में आने की उसकी एक और वजह थी... यहाँ उसे अपने ही जैसे कई लोग मिल जाते जो हर सुबह चाय पीने और नाश्ता करने आते थे. वे यहाँ लम्बी बहसें किया करते थे....कंपनियों के रिक्रूट्मन्ट प्रोसेस, मैनेजमेंट पोलिसिस से लेकर देश की पोलिटिकल व्यवस्था तक हर बात पर वो सिस्टम को जी भर कोसते. वो बस दूर बैठे हुए उन लोगों की बहस सुनते रहता...कभी वो बहस का हिस्सा नहीं बना...वैसे भी ऐसे लोगों से वो दूर ही रहना पसंद करता था. लेकिन सुबह का ये वक़्त, उन लोगों को यूँ बहस करते देख उसे अच्छा लगता....उसे ये यकीन होता कि उसकी तरह दुनिया में और भी कई लोग हैं जो अभी काम के तलाश में हैं और पूरा दिन खाली हैं.

होटल में बैठे हुए वो हर दिन सोचता कि ये फेज है, और ये फेज भी गुज़र जाएगा. लेकिन उसे सिर्फ काम की चिंता नहीं थी. काम आज नहीं तो कल उसे मिल ही जायेगा....वो कभी काम के बारे में ज्यादा नहीं सोचता. उसे दूसरी  चीज़ों की फ़िक्र ज्यादा रहती, अपनी बड़ी बहन की ज़िन्दगी में चल रही  कुछ बातों की, एक दोस्त की, जो ज़िन्दगी के क्रिटिकल फेज पर खड़ी है...अपने घर की कुछ बातें जो वो ना चाहते हुए भी सोचता है...आने वाले दिनों में ये समस्याएं कैसे और कब सुलझेंगी...सुलझेंगी भी  या और उलझ जायेंगी....उसका दिमाग इन बातों में लगा रहता. वो ये जानता कि इन बातों को सोचने का कोई ख़ास फायदा नहीं और वक़्त आने पर सब बातें सुलझते जायेंगी. लेकिन फिर भी अकसर ये सारी बातें बहुत देर तक उसके दिमाग में चलती रहतीं. ऐसा नहीं है कि उसके लिए ये कोई नयी बात है. पहले भी वो बहुत उलझनों से गुज़रा है...लेकिन उन दिनों वो हमेशा इन बातों को इग्नोर करने में कामयाब रहता था...अब शायद वक़्त जैसे जैसे बीतता जा रहा है, वो इन बातों को नजरंदाज आसानी से नहीं कर पाता.. शायद अब ऐसे बड़े शहर में अकेले रहना वो नहीं चाहता. शायद उम्र के इस मोड़ पर आकर अकेलापन उसे थोड़ा सताने लगा है. कई बार उसने सोचा कि वापस घर लौट जाए. माँ भी कई बार उसे वापस आ जाने के लिए कह चुकी है. एक दो बार कमज़ोर घड़ियों में उसने लगभग तय भी कर लिया था कि अब बस बहुत हुआ...अगले दिन ही यहाँ से सामान समेट कर वापस घर चले जाना है. जैसे यहाँ खाली हूँ, वैसे ही वहाँ रहूँगा. कम से कम घर पर इस बात का तो भरोसा रहेगा कि मैं अकेला नहीं हूँ...लेकिन घर लौटना इतना आसान नहीं है...घर लौटने का मतलब होगा अपनी हार स्वीकार कर लेना...उसने कुछ लाईनें पढ़ी थी एक कहानी में, हालाँकि वो मन की बात हो सकती है या नहीं ये वो नहीं जानता...लेकिन उसे कहानी की वो बात याद आती है... “एक उम्र के बाद तुम घर वापस नहीं जा सकते. तुम उसी घर में वापस नहीं जा सकते, जैसे जब तुमने उसे छोड़ा था.” . वो आँखें बंद कर के कुछ सोचने लगता है.

"सर कुछ और चाहिए ?"

ये होटल के वेटर की आवाज़ थी. उसके सामने होटल का वेटर खड़ा था..उस वेटर ने उसे यूँ टोककर एकदम से उन ख्यालों से बाहर निकाल दिया था...जैसे अचानक ही किसी ने ब्रेक लगा दिया हो उन बातों पर...ऐसे पता नहीं कितनी ही बार हुआ होगा कि उस वेटर उसे किसी सोच से बाहर निकला है...यूँ टोक कर. हर बार वो सोचता कि  वेटर को वो बताये कि उसने कितना अच्छा कम किया उसके फ़ालतू के ख्यालों पर यूँ ब्रेक लगाकर...लेकिन वो बस मुस्करा कर उसे देखता है.
“नहीं......कुछ नहीं” कह कर होटल के बाहर निकल आया.

आज धूप निकली हुई है, दिन कितना अलग सा लग रहा है....होटल के बाहर निकलते ही उसने सोचा. पिछले कई दिनों से धूप के दर्शन नहीं हुए थे, और आज सुबह अचानक धूप निकल आई थी. दिन खुला हुआ सा लग रहा था. आज वो थोड़ा खुश भी था. खुश होने की वजह कुछ ख़ास नहीं थी. होटल में पैसे देते वक़्त जब उसने अपना वॉलट खोला तो उसे ये देखकर हलकी ख़ुशी हुई कि उसके जेब में अब भी तीन सौ रुपये बचे हुए हैं. उसे याद आया कि चार दिन पहले उसने पाँच सौ रुपये एटीएम् से निकाले थे और अब भी तीन सौ रुपये बचे हुए हैं. ये ख़ुशी की बात थी. चार दिनों में मात्र दो सौ रुपये का खर्च होना...ये किसी चमत्कार से कम नहीं था. उसे याद आया कि तीन दिन जो उसके रिश्तेदार उसके साथ रुके थे, उन्होंने उसे कुछ भी खर्च करने नहीं दिया था...इसी वजह से उसके पैसे बचे रह गए थे. उसने सोचा कि जो पैसे बच गए हैं उनसे आज शाम वो कुछ अपनी पसंद की चीज़ खरीद सकेगा. वैसे यूँ अपने वॉलट में ऐसे बचे हुए पैसे को देखना उसके लिए एक हलकी सी ख़ुशी नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी ख़ुशी की बात होती थी.

दिन भर वो जाने कहाँ कहाँ घूमता रहा...छत्तरपुर का मंदिर, क़ुतुब मीनार, पंचशील मार्ग जहाँ सड़क के दोनों तरफ अलग अलग देशों के एम्बेसीज हैं और जहाँ उसे पैदल टहलना अच्छा लगता है....इंडिया गेट....जंतर मंतर और पुराना किला, जो उसके लिए बहुत ख़ास है. जाने कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हैं इस पुराने किले से. पुराने किले के बाहर खड़े होकर वो उन सब बातो को याद करने लगता है, जो इस जगह से जुड़ी हैं. कुछ दिन याद आते हैं उसे...१० जनवरी, २ जून, ७ दिसंबर...यहाँ बिताये बहुत से खूबसूरत दिनों में से ये तीन दिन उसे याद रह गए हैं. वो किले के बाहर ही खड़ा रहता है. आमतौर पर वो किले के अन्दर जाने से बचता है. वो जानता है किले के अन्दर जाने का मतलब होगा कई सारे बातों को फिर से सोचना. वो ये नहीं चाह रहा था. वो दिन में अब और कोई भी चीज़ सोचना नहीं चाह रहा था. वो बस ये चाहता था कि  घर पहुँचने के पहले वो इतना थक जाए कि घर में जाते ही वो बस बिस्तर पर पसर जाए और एक लम्बी नींद ले सके.

शाम में जब वो थक कर घर आता तो हमेशा उसे एक अजीब सी तन्हाई पकड़ लेती...कुछ देर के लिए वो बहुत अकेला महसूस करता. ज्यादा देर नहीं, बस कुछ मिनट के लिए. यूँ भी शाम में अकेले घर में वापस आना थोड़ा तकलीफदेह होता है. जाड़ों के दिनों में अकेला घर शायद कुछ ज्यादा ही सूना सा लगता है. ख़ासकर के शाम में...एक अजीब सी गंध फैली होती है घर में, शायद तनहाई की गंध होती है वो. घर का दरवाज़ा खोलते ही वो अजीब सी गंध उसे हमेशा जकड़ लेती. वो घर का दरवाज़ा खोल कुछ देर सीढ़ियों के पास ही खड़ा रहता है. सामने कुछ लड़के दिखाई देते हैं जो अपने बालकनी  में खड़े होकर सिगरेट पी रहे होते हैं. वे पाँच लड़के हमेशा शाम में अपने बालकनी में दिख जाते हैं. उन्हें देख अकसर उसे वे दिन याद आते हैं जब वो अपने दोस्तों के साथ रहता था..वे उसके मस्ती के दिन थे. कुछ देर तक सीढ़ियों के पास खड़े रहने के बाद वो घर में दाखिल होता है. उसे पता होता है कि ये सर्दियों की शाम है. कोई और मौसम होता, गर्मियों के दिन होते तो वो खिड़की खोल कर बैठ सकता. छत पर जा सकता. अपने बालकोनी में बैठ सकता. लेकिन ये सर्दियों की शाम है...जो कि  बहुत सूनी सी, बहुत खामोश सी होती है. हर कुछ अपने जगह पर चुप...टेबल, कुर्सी, किताबें, लैपटॉप, दीवारें...सब चुप. टीवी भी तब तक चुप रहता जब तक उसे ऑन न करें. चालू  करने के बाद भी कुछ देर तक टीवी स्क्रीन पर ब्लू लाइट जलती रहती है...उसे अकसर लगता है जैसे टीवी की वो ब्लू लाइट उससे सवाल कर रही है....तुम सच में मुझे देखोगे? तुम्हारे पास कोई काम नहीं है? तुम्हारे कोई दोस्त नहीं हैं ? तुम मुझे देखते भी कहाँ हो....बस सामने बैठे रहते हो और जाने क्या सोचते रहते हो?

हर शाम का यही खेल होता है. वो टीवी के सामने बैठ जाता और अपनी आखें बंद कर लेता...टीवी से वैसे भी उसे ज्यादा मतलब कभी नहीं रहा. लेकिन इन दिनों वो टीवी भी देखने लगा है. शाम के समय वो बस इसलिए इस इडियटबॉक्स को चालू  करता है, ताकि कमरे में कुछ आवाजें मौजूद रहे..तन्हाई शायद थोड़ी कम होती है ऐसे में....

वो कुर्सी पर बैठकर अपनी आँखें बंद कर लेता है और पुराने दिनों की बहुत सारी तस्वीरें घूम जाती हैं. एक के बाद एक...किसी स्लाइड शो की तरह. उन दिनों की तस्वीरें जब वो अपने शहर में था... गांधी मैदान, अपना बाज़ार, मौर्यालोक, बोरिंग रोड, लक्ष्मी काम्प्लेक्स, अशोक थिएटर....और न जाने कौन कौन जगहें. वो सब एक एक कर के उसे याद आती जाती हैं.

फोन की घंटी अचानक बजती है.

उसकी माँ का फोन है. वो घड़ी देखता है. शाम के इस वक़्त माँ उसे फोन जरूर करती है. उसे थोड़ा अजीब लगा जब माँ ने फोन पर सीधे से पूछ लिया “तुम ठीक तो हो?”. माँ के इस बात को उसने टाल दिया. बात करते हुए वो सोचता है, माँ ये सवाल जब भी पूछती है उससे, वो हमेशा दिमागी उलझनों से घिरा रहता है. ये माँ का युज्वल सवाल नहीं होता. वो बस कभी कभी ही ये सवाल पूछती और उस समय वो सच में बहुत उदास सा होता है. शायद माँ है वो, इसलिए उसे पता चल जाता होगा कि मैं थोड़ा परेशान सा हूँ...उसने सोचा.
वो झटके से उठा...और माँ से बात करते हुए ही अपने किचन की तरफ आ गया.. चाय बनाने के लिए गैस पर बर्तन चढ़ा देता है. माँ उससे तरह तरह की बातें करती है. उसके लिए वो एक स्वेटर बुन रही होती है, वो उसे उस स्वेटर के डिजाईन के बारे में बताती है. उसे ज्यादा समझ नहीं आता लेकिन माँ की बातों को सुनना उसे अच्छा लगता है. उसने हमेशा से अपनी माँ को अपना इन्स्परेशन माना है...जाने कितने ही ऐसे बुरे फेज थे, जब माँ ने उसे विश्वास दिलाया था...कि फ़िक्र की कोई बात नहीं...सब ठीक हो जाएगा. माँ से बातें करते हुए वो बहुत हल्का महसूस करता है. सामने चाय के बर्तन में चाय उबल रही  होती  है....चाय के बर्तन से उठती भाप को वो देखता है, और उसे लगता है कि जैसे माँ से बात करते हुए उसके मन की वो उलझनें,  वो चिन्ताएं भी चाय से उठती भाप के साथ हवा में उड़ कर गायब हो रही है...

उसका मन सच में बहुत शांत सा हो जाता है. उसे याद आता है कि सुबह उसके पास पैसे बचे थे और उन पैसों से एक अच्छे डिनर की व्यस्वस्था हो सकती है. वो घर में ताला बंद कर के बाहर निकल जाता है.....सोचता है आज के दिन कम से कम कुछ पैसे खुद पर खर्च करूँगा...! 


खाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ, फैलाया हुआ
ठोंकरे खाता हुआ खाली लुढ़कता डिब्बा

यूँ  भी होता है कोई खाली-सा बेकार-सा दिन
ऐसा बेरंग-सा बेमानी-सा बेनाम-सा दिन


[ गुलज़ार ]

Thursday, January 2, 2014

यादों में एक दिन - क्रिसमस

पच्चीस दिसंबर की वो सुबह थी. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी...मेरी नींद अचानक किसी आवाज़ से टूटी. पहले मुझे शक हुआ था कि कमरे में कोई है..क्योंकि बातें करने की आवाज़ आ रही थी. शायद पापा-माँ या फिर भैया या बहन होंगे, मैंने सोचा...लेकिन ठंड इतनी थी कि रजाई से बाहर मुहँ निकाल कर देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. आवाज़ें लगातार आ रही थीं और मुझे इस बात से थोड़ी चिढ़ सी भी होने लगी कि इस वक़्त इतनी ठंड में ये लोग यहाँ बैठ कर क्या बातें कर रहे हैं...कुछ देर तक जब आवाजें आनी बंद नहीं हुई तो थक हार कर मैंने रजाई से बाहर झाँका....कमरे में कोई नहीं था...एक नीली रौशनी कमरे में पसरी हुई थी. मेरा ध्यान टीवी की ओर गया...टीवी चल रहा था और मेरे कानों में टीवी की आवाज़ आ रही थी....मुझे एकाएक ख्याल आया कि रात को सोते वक़्त लाइट चली गयी थी और मैं बिना टीवी बंद किये सो गया था. लाइट कब वापस आई ये मुझे पता भी नहीं चल सका था. मैंने घड़ी देखा, सुबह के चार बज रहे थे.

रात में शायद ठंड अचानक बढ़ गयी थी, मैंने एक पतली रजाई ओढ़ी हुई थी. सोते वक़्त मुझे उम्मीद नहीं थी कि रात में यूँ अचानक ठंड बढ़ जायेगी. मैं उस पतली लेकिन गर्म रजाई में भी ठिठुर रहा था..लेकिन इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि मैं दूसरे कमरे जहाँ माँ और पापा सोते थे, वहाँ तक जाऊं और उनके कमरे से मोटी वाली रजाई लाकर ओढ़ लूँ. मैंने सोचा कि थोड़ी देर और सो लेता हूँ....लेकिन उसका भी ख़ास फायदा नहीं था. हर दिन सुबह साढ़े पांच बजे उसका फोन आता था और मैं ठीक छः बजे स्कूटर से कोचिंग के लिए निकल जाता था. मैं रजाई में ही पड़े हुए टीवी देखने लगा...टीवी पर एक फिल्म आ रही थी, मैं वही देखने लगा था..फिल्म थी "तेरी मेहरबानियाँ”. फिल्म का नाम मुझे इस वजह से याद रह गया क्योंकि उस दिन इस फिल्म का नाम लेकर मैं उसे दिन भर छेड़ता रहा था.

ठीक साढ़े पांच बजे फोन की घंटी बजी
हर सुबह यही वक़्त होता था जब उसका फोन आता था. उसे सुबह के साढ़े पाँच बजे फ़ोन करना अच्छा लगता था, सुबह के इस वक़्त उसे इस बात की फिक्र नहीं रहती थी कि कोई और फोन उठा लेगा, क्योंकि वो जानती थी कि फोन जिस कमरे में है वहाँ मैं सोता था और दूसरे लोग इतनी ठंड में सुबह सिर्फ एक फोन रिसीव करने तब तक नहीं आयेंगे जब तक फोन लगातार बज कर उनकी नींद न ख़राब कर दे.

“मैं तो ठंड से मर गयी..
तैयार होकर मैं तो फिर से रज़ाई में दुबक गयी.....
वाऊ, यु सी आई एम सो पोएटिक.”
हर सुबह फोन पर वो ये बात कहती...ये एक तरह से उसका ओपनिंग डायलॉग होता था....वो ‘हाय’ ‘हेल्लो’ कुछ भी नहीं बोलती, सीधे यही कहती थी. इस ओपनिंग डायलॉग की आदत उसे दो साल पहले की सर्दियों में लगी थी. उस साल उसे ये डायलॉग कहने की आदत इस कदर पड़ गयी थी, कि अकसर गर्मियों के दिनों में भी वो सुबह फोन पर यही डायलॉग दोहरा देती थी...और तब मैं फोन पर बहुत देर हँसता रहता और वो बिलकुल झेंप सी जाती.
सुबह उसका ये नियम था, वो कोचिंग के लिए तैयार हो जाती और फिर कुछ देर रज़ाई में दुबकी रहती, जब तक घड़ी में साढ़े पाँच न बजता....वो रज़ाई में ही दुबकी हुई अपने कोर्डलेस फोन से मुझे फोन करती...अपने उसी ओपनिंग डायलॉग से वो बातों की शुरुआत करती....कभी उसका ये डायलॉग चेंज हुआ हो, ये मुझे याद नहीं आता. उसे चिढ़ाने के लिए कभी कभी मैं मजाक में कुछ कह भी दिया करता था...लेकिन उस मजाक को अक्सर वो सिरिअसली ले लेती थी, कभी वो मेरे मजाक को डांट समझ कर चुपचाप सुनते रहती तो कभी एकदम इरिटेट होकर गुस्से में वो फोन काट देती....और फिर ठीक आधे-एक मिनट बाद खुद ही फोन कर के फोन काटने के लिए मुझसे सॉरी कहती..
उस दिन जब उसने फोन पर ये डायलॉग कहा, उसे छेड़ने के इरादे से मैंने जानबूझकर कहा...."तमाम सुविधाएं तुम्हारे पास, कोर्डलेस फोन, जिसे रजाई के अन्दर लेकर बैठ जाओ और बातें करो, गर्म पानी के लिए गीजर, रूम हीटर, ब्लोवर और पता नहीं कैसा है वो इलेक्ट्रिक ब्लैंकेट है जिसकी तुम इतनी तारीफ़ करती हो....और फिर भी तुम मर गयी ठंड से? ?हमारा क्या?सोचा है कभी?? फोन उठाने के लिए रजाई से निकलते ही लगता है ठंड से जान निकल जायेगी...ठंडे पानी से काम चलाना पड़ता है....इतनी सुबह कौन पानी गर्म करने के लिए गैस ऑन करे?टूटी खिड़की के फाट से ठंडी हवा रात में आती रहती है, हर रात सोने के पहले उसके दरारों को कागज़ से ठीक से ढंकना पड़ता है…सुविधा सभी तुम्हारे पास और ठंड से भी तुम ही मरो??ये अच्छा है..."
उधर फोन पर वो बिलकुल चुप....एकदम खामोश हो गयी....कुछ बोलने की कोशिश की उसने लेकिन कुछ कह नहीं सकी... थोड़ी देर बाद सिर्फ उसकी एक धीमी आवाज़ सुनाई दी मुझे...
"सॉरी.......मैं तो......."
मुझे समझने में देर नहीं लगी कि सुबह के मेरे इस मजाक को उसने फिर से डांट समझ लिया है, और अब पूरे दिन वो ये कहने से भी नहीं चूकेगी कि "सुबह तुम कित्ते जोल छे मेलेको डांट दिए थे?". मैं समझ गया था कि अब इससे आगे अगर मैंने एक भी शब्द कहा तो वो रो देगी....थोड़े प्यार से मैंने उसे समझाया... “यार तुम्हे मैंने डांटा नहीं था वो तो बस थोड़ा मजाक किया सुबह सुबह...बस्स्स”....
मेरे ये कहते ही वो एकदम चिढ़ सी गयी, गुस्से में उसने कहा....”यू  नो यू  आर सच अ डेविल....मेरे को कित्ते जोर से डरा दिए तुम...देखते हो कितनी तेज़ी से मेरी धड़कने चलने लगी....जाओ नहीं बात करुँगी तुमसे...”
“अच्छा यार चलो माफ़ कर दो.....मुझे क्या पता था कि  तुम फिर से इस मजाक को डांट समझ जाओगी. फ़िलहाल फोन रखो और कोचिंग के लिए निकलो वरना देर हो जायेगी....सी यू ”
"हाँ, सी यू .....तुम निकलते वक़्त दस्ताने रख लेना, और आज मुझे कोचिंग नहीं जाना...घूमना है..." कह कर उसने फ़ोन रख दिया....उसे कोचिंग क्यों नहीं जाना, कहाँ घूमना है ये पूछने का उसने मुझे मौका ही नहीं दिया. दो पल वहीँ फोन के पास खड़ा होकर मैं सोचने लगा, कि  आज ऐसा क्या है जो उसे घूमना है....कि तभी मेरी नज़र सामने दीवार पर टंगे  कैलेण्डर पर गयी, और फिर तुरंत मुझे पिछले शाम की कही उसकी बाद याद आई...आज क्रिसमस का दिन है, और उसे आज ये दिन सेलिब्रेट करना है.आज उसके साथ मुझे दिन भर घूमना होगा, ये मैं समझ गया था. एक तो क्रिसमस और उसपर से सुबह वो मेरे मजाक से चिढ़ गयी थी...अब पूरे दिन वो जो भी कहेगी उसे मुझे मानना पड़ेगा. ये भी एक नियम सा था...जब भी वो नाराज़ होती, उस दिन उसकी हर एक बात मानना मेरे लिए कम्पल्सरी होता था.
मैं जल्दी जल्दी अपना समान समेटने लगा..….बैग, स्कूटर की चाभी, मफलर और दस्ताने…सब निकाल कर कुर्सी पर रख दिया, ताकि मैं कुछ भी भूलूँ नहीं…कुछ और भूल भी जाऊं तो कोई बड़ी बात नहीं थी, दस्ताने ले जाना जरूरी था…मुझे कभी समझ नहीं आया की दस्ताने से उसे इतनी मुहब्बत क्यों थी, उससे कभी मैंने मफलर, टोपी या स्वेटर पहनने के लिए इतनी डांट नहीं सुनी होगी जितनी दस्ताने नहीं पहनने पर सुननी पड़ती थी.
वैसे मैं कभी कभी ये कोशिश करता था कि  मैं दस्ताने ले जाना जानबूझकर भूल जाऊं...दस्ताने घर में भूल जाने में एक सुख था, लेकिन उस सुख को एक अच्छी खासी डांट से होकर गुज़ारना पड़ता था. जब भी मैं दस्ताने ले जाना भूल जाता, वो मुझे अपने हाथों को इस्तेमाल नहीं करने देती...उसके साफ़ इन्स्ट्रक्शन रहते थे...कि  तुम अपने हाथों को अपने जैकेट के पॉकेट में घुसाए रखो, तुम्हे चाय पीना हो, या कुछ खाना हो या कुछ लिखना हो...सब मैं करूँगी. मैं इस सुख के लालच में कभी दस्ताने जानबूझकर घर भूल जाता तो कभी मैं दस्तानों को स्कूटर के डिक्की में या अपने बैग में छुपा देता...वैसे शायद उसे हर बार ये पता चल जाता था, कि  मैंने दस्ताने छिपाये हैं या सच में घर पर मैं उसे भूल गया हूँ...हालाँकि उसने कभी बताया नहीं मुझे ये बात, ये बस मेरा एक अनुमान ही है.
उस सुबह भी ठीक सवा छः बजे मैं कोचिंग क्लास के नीचे खड़ा होकर उसका इंतजार ही कर रहा था कि  मेरे मन को एक शरारत सूझी.....उसके आने के ठीक पहले ही मैंने जानबूझकर अपने दस्ताने छिपा कर बैग में रख लिए..
उसने मुझे दूर से ही देख लिया था, और शायद ये भी कि मैंने हाथों में दस्ताने नहीं पहने हैं....उसके चेहरे के भाव को मैंने दूर से ही पढ़ लिया था. पास आते ही उसने बिना कुछ पूछे बिना कुछ सुने, एक ज़ोर की डांट लगायी...."निकलते वक़्त फोन पर तुम्हें याद दिलाया था, कि दस्ताने रख लेना...लेकिन फिर भी भूल गए तुम...देखते हो कितनी ठंड है आज??स्कूटर चला कर आये हो? हाथ सुन्न पड़ गए होंगे तुम्हारे...”

उसे मैंने कोई एक्स्प्लनेशन नहीं दिया...यूँ भी ऐसे जब जानबूझकर मैं शरारत करता था तो उसे कोई एक्स्प्लनेशन मैं देता नहीं था...शायद इसी से वो ये समझ जाती होगी की कब मैं शरारत कर रहा हूँ और कब नहीं..
वो मुझे डांट रही थी, एक तो दस्ताने नहीं पहनने की वजह से, दूसरी उसे फोन पर डरा देने की वजह से...मैं चुपचाप बिना कुछ कहे उसकी डांट सुनते रहा....उस सुबह उसकी डांट इतनी प्यारी लग रही थी, कि  मैं मन ही मन सोचता कि ये अपना डाँटना ययूँ हीं कन्टिन्यू रखे.....और मैं बस इसके सामने खड़े होकर इसकी डांट सुनता रहूँ....वो मुझे ऐसे डांट रही थी, कि अगर कोई दूसरा देखता हमें तो उसे लगता कि  कोई टीचर अपने स्टूडेंट को डांट रही है...
उसकी डांट अब तक खत्म नहीं हुई थी, लेकिन उसने जब नोटिस किया कि मैं कुछ भी नहीं कह रहा हूँ और चुपचाप उसकी डांट सुन रहा हूँ तो शायद एक हल्का गिल्ट उसके मन में आ गया और तब वो अचानक डांटते हुए रुक गयी....कहने लगी “चलो तुम्हें बहुत डांट दिया न, अब चाय पिलाती हूँ....” मैं मुस्कुराने लगा था, “चलो”, मैंने कहा....और हम दोनों चाचा की दुकान की तरफ बढ़ गए.
“सुनो तुम अपने दोनों हाथ जैकेट के पॉकेट में डाल लो....खबरदार इतनी ठंड में अपने हाथों को पॉकेट से बाहर निकाला तो....” चलते हुए उसने कहा...
“अरे तो मैं चाय कैसे पियूँगा?” मैं जवाब जानते हुए भी ये सवाल उससे पूछ बैठा.. वो थोड़े गुस्से में, थोड़े प्यार से कहती... “चाय पीने के लिए तुम्हे हाथ बाहर निकालने की क्या जरूरत है?मैं जो हूँ तुम्हे चाय पिलाने के लिए...”
मैं यही चाहता था...सर्दियों की सुबह जब भी मैं अपने दस्ताने भूल जाता, वो मुझे यूँ हीं अपने हाथों से चाय पिलाती...मेरे लिए ये सर्दियों के सुबह का सबसे बड़ा सुख था....जिसके लिए मैं अकसर थोड़ी बहुत डांट सुन लिया करता था....
हम दोनों चाचा के दुकान पहुँच गए थे....ये दुकान मुख्य सड़क से थोड़ी दूर एक गली में थी जहाँ हम सर्दियों में हर सुबह चाय पीने आते थे. चाचा की चाय दुकान में चाय के अलावा थोड़ी बहुत मिठाइयाँ और स्नैक्स भी मिलते थे. उनके चाय की दुकान के ठीक सामने एक कंप्यूटर  कोचिंग क्लास थी, और वहाँ के अधिकतर लड़के-लडकियाँ चाचा के दुकान पर सुबह-शाम नज़र आते थे...कंप्यूटर कोचिंग के स्टूडेंट्स के अलावा और बाहरी कोई उस चाय दुकान पर कम ही दिखाई देता था. यहाँ आने की हमारी आदत कुछ एक दो साल पहले पड़ी थी, जब हम दोनों ने कंप्यूटर कोचिंग क्लास में एड्मिसन लिया था और सामने चाचा के चाय की दुकान पर हर सुबह चाय पीते थे. वे सर्दियों के ही दिन थे.
हम चाचा के दुकान में सिर्फ सर्दियों के मौसम में सुबह की चाय पीने आते थे, गर्मियों के दिन में उस गली में हम कभी जाते भी नहीं थे....मैं फिर भी कभी गर्मियों की शाम भूले भटके चचा के दुकान चला भी आता था लेकिन वो सिर्फ सर्दियों की सुबह ही चाचा के चाय दुकान पर आती थी.
चाचा को लेकर उसके कई सारे आश्चर्य थे. पहला तो उसे इस बात से हद हैरानी होती थी की चाचा की याददाश्त इतनी अच्छी कैसे है. हम उनके दुकान पर सिर्फ नवम्बर से मार्च के महीने में ही आते थे फिर भी वो हमेशा हमें हमारे नाम से पहचान जाते थे, ये कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, लेकिन फिर भी उसे इस बात पर बड़ी हैरानी होती थी. चाचा थे भी ऐसे, जैसे हमारे घर के ही वो कोई बुजुर्ग हों....वो सब लोगों का हाल चाल वैसे ही लिया करते थे. उसे वो बिटिया कह कर बुलाते थे, वो बहुत खुश हो जाया करती थी जब चाचा उसे बिटिया कह कर बुलाते थे. उसे चाचा की दाढ़ी को देखकर भी थोड़ी हैरानी होती थी....वो उनकी दाढ़ी की तुलना बर्फ से कर देती….वो कहती “इनकी दाढ़ी तो देखो, लगता है चचा के चेहरे पर दाढ़ी नहीं बर्फ उग आई है….”
सुबह हम चाचा की दुकान पर जैसे ही पहुंचे, उसने मेरे कानों में कहा “चाचा को आज हम अगर सांता क्लॉज का गाउन पहना दें तो वो परफेक्ट सांता दिखेंगे न....” मेरी हाँ या ना का इंतजार किये बिना ही उसने यही बात चाचा से कह दी.... “चाचा आपको अगर सांता के कपड़े पहना दें तो आप बिलकुल सांता क्लॉज जैसे दिखेंगे”
चाचा ज्यादा कुछ समझ नहीं पाए....उन्होंने पूछा “सांता कौन है?”
वो पूरे आश्चर्य में कहती है.... “अरे चाचा, आपको सांता नहीं पता???वही जो क्रिसमस पर तोहफे और खुशियाँ बांटता है...और बच्चों को चॉकलेट्स देता है....” चाचा को कुछ ख़ास समझ में नहीं आया, दो पल सोचने के बाद वो कहते... “अच्छा, मैं वो तो नहीं, लेकिन हाँ देखो मैं चाय जरूर बांटता हूँ, पिलाता हूँ....और ये लो तुम्हे चॉकलेट भी दे रहा हूँ.....” कह कर उन्होंने सामने रखी टॉफी के डिब्बे से एक टॉफी निकाल कर उसे दे दी.....
वो बहुत खुश हो गयी..
“अरे आप तो सच में आज मेरे लिए सांता बन गए, वो भी बिना सांता के रेड गाउन के ही...क्रिसमस के सुबह देखिये आपने मुझे टॉफी दे दी.....” वो हँस रही थी.. मुझे लगा था कि  चाचा के साथ बात करने में वो अपने गुस्से को भूल गयी है...और शायद अब मुझे आगे डांट नहीं पड़ेगी.लेकिन ये मेरा भ्रम था.
उसने टॉफी खायी नहीं, बल्कि उसे उसने अपने बैग में रख लिया. चाय का कप अपने हाथों में पकड़े हुए वो कुछ देर जाने क्या सोचने लगी.....
वो ऐसा करती थी, चाय पीने से पहले वो अकसर कुछ देर तक चाय के कप को दोनों हाथों से पकड़े रहती थी.....मैं जब भी उसे यूँ चाय हाथ में पकड़े देखता, तो उसे कहता “हाथों में दस्ताने पहन कर तुम चाय के कप से अपना हाथ सेंक रही हो...” उसे मेरी ये बात शायद ज्यादा अच्छी नहीं लगती थी....मेरी इस बात का वैसे तो वो जवाब नहीं देती थी लेकिन कभी कभी वो तुरंत पलट कर कह देती “दैट वाज अ पी.जे....” 

“चचा आपको पता है, आज कल के कुछ बच्चे बहुत लापरवाह हो गए हैं...” हाथों में चाय का कप लेते हुए कुछ सोचते हुए उसने चाचा से कहा....
चाचा को फिर से कुछ समझ नहीं आया.... “हाँ बेटी सो तो है, सब तुम्हारे जितने समझदार नहीं होते...” उन्होंने कहा. चाचा की इस बात से उसका चेहरा थोड़ा खिल सा गया. अपनी तारीफ़ सुनने के बाद यूँ भी उसके चेहरे पर 880 वाल्ट की स्माइल आ जाती थी.
लेकिन अपनी ख़ुशी को छिपाते हुए उसने फिर आगे कहा... “हाँ चाचा देखिये न, कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं, उन्हें कितना भी याद दिलाओ आप, वो दस्ताने हमेशा भूल जाते हैं...” उसके सीधे निशाने पर मैं था....मेरी तरफ देखते हुए उसने ये कहा था.
वो जब भी ऐसे मेरी शिकायत करती, चाहे वो चाचा से, या मेरी बहन से या फिर अपनी दीदी से...मुझे हमेशा वो अपने उम्र से दस साल बड़ी दिखने लगती.
चाचा को थोड़ा बहुत अंदाज़ा था की वो किसके तरफ इशारे कर रही है.....उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा “क्यों बाबु, आज दस्ताने फिर से भूल गए तुम? सुन लो आज फिर बिटिया की डांट......वैसे तुम दोनों की ये मीठी लड़ाई अच्छी लगती है, तुम दोनों की दोस्ती बने रहे...” चाचा ने कहा...वो ये सुन कर खुश हो गयी...."देखो चाचा की प्यारी बातों ने तुम्हें आज बचा लिया है...वरना आज मैं इतनी जल्दी मानने वाली नहीं थी...."उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा...
"हाँ, वैसे भी तुम गुस्सा होने का अच्छा नाटक कर लेती हो, तुम्हारी सभी हरकतों से वाकिफ हूँ मैं".
वो मुस्कुराने लगी.

उस दिन जैसा उसने फोन पर कहा था, वैसा ही हुआ...हम क्लास नहीं गए....हमारी क्लास तो थी, लेकिन उसका तर्क था, कि क्रिसमस की सुबह भी कोई पढ़ता है क्या? वो चाहती थी कि क्रिसमस की सुबह वो मेरे साथ शहर घूमे...कोहरे में लिपटी सुबह उसे पसंद थी...हम दोनों बहुत देर तक घूमते रहे थे....गणेश की दुकान की जलेबियाँ और कचौड़ियाँ हमने खायी...उसकी पेस्ट्री खाने की जिद थी, लेकिन उतनी सुबह, साढ़े सात-आठ बजे कम ही दुकान खुलते थे.....एक दुकान पर हमारी नज़र गयी, जहाँ हमने देखा कि दुकानदार दुकान खोल ही रहा है...हम वहीँ गए पेस्ट्री खाने.हम जैसे ही दाखिल हुए दुकान में, उसने सीधे दुकानदार से कहा “क्या भैया, क्रिसमस के दिन भी कोई इतनी देर दूकान बंद रखता है क्या?” बेचारा दुकानदार अपने चेहरे पर हैरानी के एक्स्प्रेशन लेकर हमें देखता रहा...पेस्ट्री खा कर हम वहाँ से वापस चाचा के दुकान आ गए.
“चाचा एक कप चाय और पिलाइये न..” उसने चाचा से कहा...
“आज तुम दोनों की क्लास नहीं थी क्या? बहुत जल्दी आ गए तुम दोनों?” चाचा को हमारी टाईमिंग पता होती थी, जब भी हम दस बजे के पहले पहुँच जाते उनके दुकान, वो समझ जाते थे कि  हम क्लास नहीं गए और घूम रहे थे....उन्होंने फिर पूछा... “जब तुम लोगों को क्लास नहीं जाना होता तो यहाँ आकर क्यों बैठे रहते हो इतनी ठंड में?
मैंने उसकी तरफ इशारा कर के कहा , “इसे कहिये चाचा...मुझे तो वैसे भी जाड़ों के सुबह की नींद बहुत प्यारी है...सिर्फ इसी की मेहरबानी है कि  मुझे हर सुबह आना पड़ता है, इसके साथ घूमना पड़ता है..”
“अरे....तो क्या हुआ? देखिये चाचा मेरे दो ही तो सच्चे दोस्त हैं...बारिश और दिसंबर...और मैं इस महीने में घूमूं भी नहीं?” उसने बड़े मासूमियत से चाचा को देखते हुए ये बात कही...
"हाँ घूमो, लेकिन धूप निकली रहे तब....ऐसे ख़राब मौसम में क्यों घूमती हो?" चाचा ने कहा...
“अरे चाचा...ये ख़राब मौसम है??इसे आप ख़राब मौसम कहते हैं???ये तो सबसे सुन्दर मौसम है..जो इस मौसम को ख़राब कहते हैं उनका दिमाग ख़राब होता है...डरपोक लोग दुबके रहते हैं इस मौसम में रज़ाई और कम्बल में...मैं तो घूमती हूँ....” उसने एक ही सुर में ये कह दिया...
चाचा भी समझ गए थे, इस लड़की से बहस करने का कोई फायदा नहीं...वो बस मुस्कुरा कर रह गए.


सुबह के नौ बज गए थे, और चाचा के दुकान भी अब खाली नहीं थी...सामने कंप्यूटर कोचिंग क्लास की पहली क्लास दस बजे लगती थी, तो वहाँ पढ़ने वाले लड़के लड़कियों की भीड़ दुकान पर होने लगी थी.....वो ऐसे में ज्यादा देर तक दुकान पर बैठती नहीं थी...वो तभी वहाँ बैठती जब वहाँ कोई और न हो, या फिर कम लोग बैठे हों..

हम चाचा के दुकान से वापस कोचिंग कोम्प्लेक्स आ गए. चाचा के दुकान से कोचिंग तक आने में जितना समय लगा, उतने समय में उसने पूरे दिन का कार्यक्रम भी बना लिया था....मुझे उसने सिर्फ ढाई घंटे का वक़्त दिया था और कहा था कि सीधे बारह बजे तुम मुझे अशोक थिएटर के सामने मिलना, वहाँ एक अच्छी फिल्म लगी है, तुम टिकट लेकर रखना...शहर का वो एकमात्र थिएटर था, जहाँ फ़िल्में देखने वो जाया करती थी...वरना बाकी थिएटर उसे कुछ ख़ास पसंद नहीं थे..
उस पूरे दिन मैं उसके साथ घूमता रहा था, लगभग सुबह के सवा छः बजे से शाम के साढ़े छः बजे तक हम साथ घूमे थे.वो मेरी पहली क्रिसमस थी जो उसके साथ बीती थी, इसके पहले कभी इस दिन को मैंने सेलिब्रेट नहीं किया था...वैसे भी उन दिनों हमारे शहर में क्रिसमस से ख़ास मतलब किसी को था नहीं...शायद इसलिए जब उसने पेस्ट्री दूकान में दुकानदार से ये कहा था कि  क्रिसमस के सुबह भी आप इतनी देर से दूकान खोलते हो, तो दुकानदार ने हमें हैरानी से देखा था. सुबह के पेस्ट्री के बावजूद शाम में हमने क्रिसमस केक खाया...शाम को बाकी दोस्त भी मौजूद थे.सभी दोस्तों को फोन पर धमका कर उसने शाम में कोचिंग क्लास बुलाया था...किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि  उसकी धमकी को इग्नोर कर सके, शाम की कड़कती ठंड में भी सब बिलकुल तय समय पर कोचिंग पहुँच गए थे...और फिर हमने कोचिंग कोम्प्लेक्स के टेरेस पर क्रिसमस केक काटा था. नाश्ते का भी प्रबंध किया गया था और वो हमारी एक छोटी सी पार्टी हो गयी थी.

उसी रात हम बहुत देर तक बातें करते रहे थे.वो मेरे से कहानियाँ और मेरी लिखी उस समय की कवितायेँ सुनना चाहती थी.उस रात उसके कमरे में उसके साथ उसकी बड़ी बहन भी सोयी थी...वो उधर से कुछ कह नहीं सकती थी, उसने शाम में मुझे फोन पर बस इतना कहा था....की रात में ग्यारह के बाद मैं फोन करुँगी, और सिर्फ एक शब्द का सिग्नल दूंगी...(उसने कहा था, की वो सिर्फ हेल्लो बोलेगी) और तुम समझ जाना कि  ये मेरा फोन है, तुम अपनी कवितायें और डायरी में लिखी अपनी बातें मुझे सुनाते रहना, जब तक तुम्हे नींद न आ जाए....और मैं सुनती रहूंगी, रज़ाई में दुबक कर...रात में, ठीक ग्यारह बजे उसने मुझे फोन किया और जैसा उसने कहा था, ठीक वैसे ही डेढ़ घंटे तक मैं उससे इकतरफा बात करते रहा था.वो हमारे बीच हुई पहली साईलेंट कॉल थी. 


वो एक यादगार क्रिसमस का दिन था मेरे लिए !

Sunday, November 24, 2013

सफ़र की शुरुआत...


ज़िन्दगी की कुछ अच्छी चीज़ों की शुरुआत युहीं हो जाती है...अचानक ही. मेरे लिए लिखने की शुरुआत ऐसे ही हुई थी...एकदम रैंडमली...युहीं बातों बातों में...दो दोस्तों के साथ मजाक में लिखी गयी एक कहानी से...नवम्बर की एक सर्द शाम में, लक्ष्मी काम्प्लेक्स के आसपास टहलते हुए...चानू चाचा के चाय की दूकान में बैठकर चाय पीते हुए.

वो बाईस नवम्बर की एक शाम थी.छठ पूजा सुबह के अर्ध्य के साथ समाप्त हुआ था.शाम में हम तीन दोस्त(मैं, सुदीप और शिखा) बोरिंग रोड के लक्ष्मी काम्प्लेक्स के आसपास टहल रहे थे...और पुरानी यादें ताज़ा कर रहे थे.छठ पूजा की शाम आमतौर पर सड़के सुनसान सी हो जाती हैं..दुकानें बंद रहती हैं.बोरिंग रोड का भी कुछ वैसा ही नज़ारा था...पटना के सबसे भीड़ भरे इलाकों में से एक बोरिंग रोड बिलकुल सुनसान सा था..कुछेक दुकानें खुली हुई थी, सड़कों पर लोग भी काफी कम नज़र आ रहे थे और ऐसे में शाम की हलकी सर्द हवा में बोरिंग रोड में टहलना हमें बहुत अच्छा लग रहा था..हम बहुत देर तक घूमते रहे थे...तीनों में से किसी को भी वापस घर जाने की जल्दी नहीं थी.हम तीनों अपनी गाड़ियों से आये थे, तो ये चिंता किसी को नहीं थी की देर हो गयी तो घर कैसे जायेंगे.मेरा घर तो खैर पास में ही था, बाकी दोनों के घर दूर थे.

कुछ देर घूमते घूमते जब हम थोड़े थक गए तो वहीँ लक्ष्मी काम्प्लेक्स के पास ही एक चाय की दूकान पर जाकर बैठ गए.वो चानू चाचा की चाय दूकान थी...जहाँ पहले हम अक्सर चाय पिया करते थे और बहुत बहुत देर तक बैठ कर बातें करते थे.चानू चाचा की चाय की दूकान पर हमें हमेशा गज़ब के आईडियाज आते थे.सबसे ज्यादा शिखा को.वो अजीब अजीब बातें यहाँ बैठ कर सोच लिया करती थी, और खुश होकर कहती थी..."ये मेरे लिए थिंकिंग पॉइंट है, जहाँ बैठकर मुझे अच्छी अच्छी बातें सूझती हैं".सुदीप बाबु नॉर्मली कभी कोई बहकी बातें सोचते नहीं थे, लेकिन उस शाम वहाँ जब हम तीनों एक अरसे बाद बैठ कर चाय पी रहे थे, तो उन्हें एक गज़ब की बात सूझी....वो अचानक से बहुत एक्साईटेड हो गए...कहने लगे "अभि...शिखा...लेट्स प्रोड्यूस अ फिल्म टूगेदर.....".
एक तो सुदीप बाबु की मुहँ से इस तरह की बातें सुनना बड़ा आश्चर्यजनक था दूसरा की उसने कुछ इस अंदाज़ में इस बात को कहा था, अपने दोनों हाथों को पुरे एक्साईटमेंट में हवा में ऐसे उछाल दिया था उसने की मुझे एकाएक बहुत जोरों की हँसी आ गयी.आगे मैं कुछ कह पाता इससे पहले ही मेरे बगल में बैठी शिखा ने एक मुक्का मेरी पीठ पर दे मारा और डांटते हुए कहा मुझे..."ख़बरदार तुमने कुछ कहा तो..............हाँ सुदीप, तुम कुछ कह रहे थे न यार...कहो.....इग्नोर हिम".
सुदीप बाबु को अब शिखा का सपोर्ट मिल गया था, वो थोड़े तन से गए...एक कोंफीडेंस आ गयी थी उनमे...उन्होंने मुझे देखा, थोड़ा चिढ़ाया मुझे और शिखा की तरफ मुखातिब होकर कहने लगे...  "मेरे पास एक सिच्युएसन है, एक कहानी, एक लव स्टोरी...लव ट्रायंगल...क्या कहती हो?? एक फिल्म बनाया जाए?.....सोचो अगर....."
सुदीप की बातें अभी खत्म भी नहीं हुई थी, शिखा ने झट से कहा "वाऊ...दैट्स ग्रेट यार!! वैस भी ज़िन्दगी काफी बोरिंग हो गयी है..कुछ तो नया करना ही चाहिए, मैं तुम्हारे साथ हूँ, चलो फिल्म बनाते हैं...तुम कहानी सुनाओ मुझे अपनी...लेट्स डिस्कस स्टोरी".
वैसे दोनों हमेशा मजाक के मूड में रहते हैं लेकिन उस शाम दोनों में से कोई भी मजाक के मूड में नहीं था....फिर भी दोनों की की बातें सुन कर जाने क्यों मुझे थोड़ी हँसी आ रही थी..मैंने बीच में टोकते हुए उन्हें कहा "वो कहानी बाद में डिस्कस कर लेना यार, अभी शाम इतनी अच्छी है, क्यों बर्बाद कर रहे हो तुम दोनों इसे?"
लेकिन मेरी बात को दोनों में से किसी ने लिफ्ट नहीं दिया....और दोनों कहानी डिस्कस करने में व्यस्त हो गए.

ना चाहते हुए मुझे भी उनकी कहानी सुननी पड़ रही थी.सुदीप की कहानी की शुरुआत लक्ष्मी काम्प्लेक्स के उसी कोक-शेप्ड दूकान से हुई, जहाँ हम पहले फाउन्टेन कोक पीने जाया करते थे.उसकी कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, वैसे वैसे मुझे भी उस कहानी में इंटरेस्ट आने लगा था.मैंने बीच में कुछ कहना चाहा, लेकिन चुप इस वजह से रहा की कुछ देर पहले मैंने कहानी का मजाक उड़ा दिया था.लेकिन थोड़ी देर बाद जब खुद को कंट्रोल नहीं कर सका तो बेशर्मों की तरह मैं भी कहानी के बीच में कूद पड़ा और अपने इनपुट देने लगा.कुछ एक-डेढ़ घंटे के  डिस्कसन के बाद एक अच्छी खासी लव स्टोरी तैयार हो गयी थी.बाकायदा एक कागज़ पर कहानी के पॉइंट्स लिखे गए थे ताकि हमें याद रहे.कहानी में सब कुछ ठीक था, सब बातें बहुत अच्छी थीं...लेकिन कहानी का क्लाइमैक्स तय नहीं हो पा रहा था.लड़की दोनों में से किस लड़के की होगी इस बात पर मेरी और सुदीप की राय अलग अलग थी..शिखा की कोई राय ही नहीं थी.बेसक्ली वो न्यूट्रल रहना चाह रही थी.हमने जब गेंद उसके पाले में फेंक दिया..की तुम ही अब फैसला करो, की कहानी का अंत क्या होगा....तो वो बेचारी धर्मसंकट में फँस गयी...किस दोस्त का पक्ष ले वो? किसके क्लाइमैक्स को बेहतर बताये...? कुछ देर वो सोचती रही थी और फिर कहती है वो "यु नो व्हाट ...लड़की किसी को नहीं मिलेगी....मैं तो सोच रही हूँ की कहानी का सबसे अच्छा क्लाइमैक्स ये हो सकता है की दोनों लड़के और वो लड़की पागल हो जाए और किसी मेंटल हॉस्पिटल चले जाए.इस तरह प्यार करने वाले लोगों को दुनिया वैसे भी पागल ही तो कहती है न". शिखा ने पूरी कोशिश की की इस बात को एक मजाक की तरह ही कहे वो, उसने हँसते हुए चुटकी लेते हुए इस बात को कहा था लेकिन फिर भी हम दोनों में से किसी को भी इस बात पर हँसी नहीं आ सकी..क्यूंकि कहानी सच में बहुत भावुक बन गयी थी और कहानी डिस्कस करते वक़्त हम तीनों ही काफी सेंटीमेंटल से हो गए थे.

कुछ देर हम तीनों चाय दूकान पर युहीं बैठे रहे..एकदम चुप..बस चाय पीते हुए और सड़कों पर आ जा रही गाड़ियों को देखते हुए.तीनों के बीच अचानक आ गयी इस चुप्पी को सुदीप ने ही तोडा..."कम ऑन यार....हम तो ऐसे बात कर रहे हैं जैसे सच में एक फिल्म बन जायेगी इस बकवास कहानी पर..." सुदीप की कही इस बात पर शिखा थोड़ी चिढ़ सी गयी, एक मुक्का उसने उसे भी दे मारा और उसके हाथों से वो कागज़ छीन कर उसने मुझे थमा दिया.."इसे तुम रखो, इस पागल लड़के को इतनी बेहतरीन कहानी बकवास लग रही है......किसे पता यार, कभी हम साथ मिलकर इसपर एक फिल्म बना ही दें".
सुदीप मुस्कुराने लगा, उसने शिखा के कंधे को हिलाकर कहा, हाँ रे..जरूर बनायेंगे फिल्म एक दिन और फिल्म की डाईरेक्टर तुम ही बनोगी..सुदीप की इस बात से शिखा मुस्कुराने लगी....हम तीनों सुदीप के इस छोटे से मजाक के सहारे उस सेंटीमेंटल मूड से बहार निकल आये थे.

उस शाम शिखा ने वो कागज़ मेरे को ये कह कर थमाई थी की इसे मैं अपनी डायरी में अच्छे से सहेज कर रख लूँ ताकि फिर कभी जब हम तीनों मिले तो इस कहानी को फाईनल टच दे पायें.बहुत दिनों तक वो कहानी रही भी मेरे साथ, लेकिन फिर पता नहीं कैसे अन्फॉर्चूनट्ली वो कागज़ मेरे से खो गया.वो जो अच्छी सी कहानी बन गयी थी, उसके पॉइंट्स सही सही याद नहीं थे, लेकिन फिर भी उस कागज़ के गुम हो जाने के बाद मैंने एक दिन उस कहानी को लिखना शुरू किया, लेकिन कहानी उस तरह से लिख नहीं पाया...युहीं आधी अधूरी बातें उस शाम की जो याद थी बस वो ही लिख पाया मैं.सोचता हूँ की कभी ये दोनों मिलें अगर फिर से, हमारे पास फिर से बैठ कर बातें करने का वक़्त हो, तो वहीँ चानू चाचा की चाय की दूकान पर हम फिर से एक बार बैठ कर कहानी को डिस्कस करें और पूरी कहानी अच्छे से लिखें, उस अधूरी कहानी को एक मुक्कमल शक्ल दें.

जिस शाम की ये बातें मैं बता रहा हूँ आपको, उन दिनों मैं कुछ लिखता नहीं था, हाँ ब्लॉग थे मेरे...दोनों ब्लॉग थे...लेकिन बस कॉलेज टाईम में मस्ती में लिखी हुई एक दो कवितायें ही ब्लॉग पर डाला करता था...अक्सर अपनी कविताओं को मैं अपनी डायरी में लिखा करता था...लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं.फिर भी पता नहीं कैसे कुछ दोस्तों को विश्वास था की एक दिन मैं लिखूंगा, कुछ भी लिखूंगा लेकिन लिखूँगा जरूर.दिव्या, शिखा, सुदीप और शायद प्रभात ऐसे दोस्त थे जिन्हें ये भरोसा था की मैं कभी न कभी कुछ न कुछ तो लिखूंगा ही.उस शाम  जब हमने वो कहानी डिस्कस की थी, शिखा ने चानू चाचा की चाय की दूकान पर बैठे हुए अचानक कहा था मुझसे..."तुम्हे सब काम वाम छोड़कर राईटर बन जाना चाहिए, तुम बहुत अच्छा लिखते हो...और कम से कम एक किताब तो तुम्हारी पब्लिश होनी ही चाहिए".सुदीप जो आमतौर पर इन सब बातों से दूर ही रहता है, किताबों का भी ज्यादा शौक नहीं उसे...सिर्फ अपने विषय की ही समझ रखता है...उसने भी शिखा का फुल सपोर्ट करते हुए कहा था "हाँ, सिरिअसली यार, यु सूड कंसीडर राईटिंग...तुम्हे लिखना चाहिए". दोनों ने ये बातें इस तरह कही थी की मुझसे आगे कुछ भी नहीं कहा गया.मैंने बस ये कहा की "I will try".

उस साल, छठ पूजा के आसपास कई लोगों ने रैंडमली मुझे इस तरह की बातें कही थी....सबसे पहले मेरी बहन मोना ने, जिसने बैंगलोर के एक रेस्टुरेंट में, कहा था मुझसे...जब किसी नए फिल्म का एक बकवास सा गाना बज रहा था वहाँ...मोना ने कहा था मुझसे "देखो तो आजकल कैसे वाहियात से गाने बनने लगे हैं...भैया तुम तो इन सब से अच्छे गाने लिख सकते हो..तुम लिखते क्यों नहीं?".दिवाली के दुसरे दिन दिव्या का जब फोन आया तो उसने भी एक्जैक्टली यही बातें कही थी मेरे से....."तुम लिखा करो यार, कितनी बार कहा है तुम्हे लिखना शुरू कर देना चाहिए". मैं अब सोचता हूँ तो लगता है की कहीं इन सब लोगों ने पहले से कोई प्लान तो नहीं बना रखा था की एक साथ सब मुझे लिखने के लिए यूँ इंस्पायर करेंगे? खैर, जो भी हो...दिव्या, शिखा,सुदीप और मोना की ये बातें कहीं न कहीं मेरे दिमाग में ठहरी हुई थी...और मैं सच में कुछ लिखना चाहता था...फिर करीब दो महीने बाद मौका मिला मुझे जब जनवरी की एक शाम मैं अपनी बहन सोना के साथ बैठकर कुछ पुराने किस्से, अपने स्कुल कॉलेज की पुरानी यादें उसे सुना रहा था.उसे किस्से सुनाते हुए एकाएक कुछ लिखने का ख्याल आया...एक कविता लिखने का मन किया....और इस तरह उस रात मैंने ये कविता लिखी थी जिसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट भी किया था.....उस दिन मैंने ये भी तय किया की आज के बाद से मैं लगातार ब्लॉग पर कुछ न कुछ लिखते जाऊँगा...चाहे मेरी लिखी बातें अच्छी हों या बकवास...चाहे उसे कोई पढ़े या न पढ़े..और उस दिन किया गया खुद से वादा अब तक कायम है.
शिखा ने उस शाम, जब हम कहानियाँ डिस्कस कर रहे थे तो एक और बात कही थी, "तुम एक दिन बहुत बड़े राईटर बनोगे, लोग तुम्हे जानेंगे". ये एक दोस्त का प्यार था...उसका मेरे पर ब्लाईंड फेथ..., बड़ा राईटर का तो कुछ अता पता नहीं, लेकिन मुझे लगता है उस शाम ने जो ट्रिगर किया था मेरे अन्दर, उससे अब एक स्माल टाईम ब्लॉगर तो बन ही चूका हूँ मैं.

सच कहूँ, तो इस ब्लॉग पर जब से लिखना शुरू किया था, तो एकदम नहीं सोचा था की लोग मेरी ये बातें पढेंगे भी....मुझे इतना प्यार देंगे......और ये तो कभी सपने में भी सोचा भी नहीं था की मेरी ये बातें अखबारों में भी छपेंगी.इस ब्लॉग की अब तक की आठ पोस्ट चार अखबारों में छप चुकी है.ये बातें दिल को खुश तो करती ही है, और लिखने के लिए उत्साहित भी करती हैं.अभी कुछ दिनों पहले कुछ ऐसा हुआ जिससे लगा की इस ब्लॉग पर जो भी छोटी मोटी कहानियाँ मैं लिखता हूँ, वो लिखना सच में सफल हुआ.मेरी दोस्त शिखा, जो अभी बोस्टन में रह रही है, उसने वहाँ एक कम्युनिटी फंक्सन में इस ब्लॉग की दो पोस्ट्स अपनी आवाज़ में लोगो को सुनाई...एक स्टोरी-टेलिंग सेसन में...और शिखा को इसके लिए पहला पुरुस्कार भी मिला था.जब शिखा ने मुझे ये बात बताई थी की वो मेरी कहानी एक फंक्सन में पढने वाली है, तो मैंने मजाक में कह दिया था उससे...तुम अगर चाहो, तो सबको ये कह कर सुना सकती हो की ये कहानियाँ तुमने लिखी हैं, या अगर चाहो तो कोई दूसरी कहानी लिख कर मैं तुम्हे भेज सकता हूँ....लेकिन उसने मना कर दिया...खुद के पसंद की दो कहानियाँ उसने उस फंक्सन में सबको सुनाई और अंत में उसने मेरा भी नाम लिया, ये कह कर की इन दोनों कहानियों को मेरे एक दोस्त ने लिखा है, जो दिल्ली में रहता है.ये मेरे लिए एक बहुत बड़ी बात थी.



जब से यहाँ मैंने लिखना शुरू किया है, बहुत से लोग मिले हैं, कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने बहुत जायदा उत्साह बढ़ाया है मेरा...यहाँ लिखी जिनकी बातें पढ़कर और बेहतर लिखने का मन करता है.आज कुछ वैसे ही लोगों को थैंक्स कहने का दिल कर रहा है...वैसे ये थैंक्स कहकर फोर्मलिटी करने में मैं यकीन नहीं रखता लेकिन फिर भी, आज के दिन जब ये लिख रहा हूँ...बाईस नवम्बर का समय भी है और सौ पोस्ट इस ब्लॉग के पूरे भी हो चुके हैं तो दिल की बात सुन रहा हूँ, और ये थैंक्स आप सब के नाम....

सबसे पहले तो प्रियंका दीदी, अगर आप ना होती...तो ये ब्लॉग शायद कब का इनएक्टिव हो गया होता...कितने ही पोस्ट्स इस ब्लॉग पर सिर्फ आपकी वजह से लग पाए हैं.मुझे डांट डांट कर आप पोस्ट्स लिखवाती हैं...और ये पोस्ट के लिए भी मुझे आप कई दिनों से डांट रहीं हैं....मेरा होमवर्क था की इसे मैं बाईस तारीख के शाम में लगाऊं...लेकिन अपना होमवर्क पूरा नहीं कर पाया समय पर.आपने मुझे आज तक का ग्रेस टाईम दिया है, तो देखिये मुझे पनिशमेंट न झेलनी पड़े, इस वजह से मैं इसे आज रात पोस्ट कर रहा हूँ..ये जानता हूँ की इसे पोस्ट कर भी दूँ, तो आप एक दूसरा होमवर्क लेकर मेरे सर पर बैठ जायेंगी...लेकिन कोई बात नहीं, मुझे अच्छा लगता है आपके दिए गए टास्क को पूरा करना.
दीदी, आप युहीं मेरे से पोस्ट लिखवाते रहिये, मैं बहुत आलसी हूँ लिखने में...आप हैं तो ये विश्वास भी है की ये ब्लॉग अब कभी इनएक्टिव नहीं होगा.

सलिल चचा.....इस ब्लॉग का ही शुक्रिया अदा करूँगा की आपसे मुलाकात हुई.सबसे खूबसूरत बातें आपकी ही होती हैं मेरे हर पोस्ट्स पर...कई कई बार तो आपकी तारीफ़ सुन कर दिल बहुत खुश हो जाता है, तब यकीन दिलाना मुश्किल होता है खुद को की क्या मैंने सही में अच्छा लिखा है? लेकिन आप तारीफ़ के साथ साथ गलतियाँ भी बता देते हैं, और मुझे बहुत अच्छा लगता है....लगता है जैसे कोई हाथ पकड़ कर मुझे बता रहा हो की देखो तुमने यहाँ यहाँ गलतियाँ की हैं.इस ब्लॉग के कुछ पोस्ट्स के लिए ख़ास तौर पर आपने दो तीन कवितायें लिखी हैं...जो की मेरे लिए अनमोल है.

शिखा वार्ष्णेय दीदी..आप तो हैं ही बहुत स्वीट, और आपके कमेंट्स भी आपकी ही तरह स्वीट होते हैं....दीदी, आपकी छोटे से स्वीट कमेन्ट का इंतजार हमेशा रहता है मुझे...कुछ ऐसे भी कमेंट्स हैं आपके जिन्हें पढ़कर मैं सिर्फ मुस्कुराता हूँ...नहीं, मैं नहीं बताने वाला वो कौन कौन से कमेंट्स हैं, आपको जानना हो तो आप खुद ढूँढ लें वो कमेंट्स.आप ऐसे ही स्वीट सी बातें यहाँ करते रहिये...इस ब्लॉग को आपके स्वीट कमेंट्स की जरूरत है, और हाँ, मेरी गलतियाँ भी सुधारते रहिये(यु नो व्हाट आई मीन)...मैं काफी गलतियाँ करता हूँ.

अनुपमा पाठक.....आपके बारे में क्या कहूँ मैं....आप खुद इतना सुन्दर इतना "अवसम" टाईप लिखती हैं, की मुझे कुछ भी कहने को शब्द नहीं मिलते...अक्सर आपकी कवितायें पढ़ते हुए लगता है की आपने हमारे ही मन की बातें कही हो कविताओं में.और आप जैसी लेखिकाएं जब इतने सुन्दर कमेन्ट करती हैं तो बता नहीं सकता मन कितना खुश हो जाता है.आपके कमेंट्स गज़ब का हौसला देते हैं बेहतर लिखने को.आप इस ब्लॉग का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं.

अर्चना बुआ...रश्मि दीदी....यूँ तो आप दोनों के कमेंट्स यहाँ कम मिले हैं, लेकिन उसे क्या फर्क पड़ता है? आप दोनों की बातें हमेशा बहुत खुश कर जाती हैं मुझे.रश्मि दीदी, आप तो शायद अब ब्लॉग की साईलेंट रीडर बन चुकी हैं, और कभी कभी अर्चना बुआ भी साईलेंट रीडर का रोल निभा देती हैं.अर्चना बुआ, आपके कहे अनुसार मैंने सोचा है जल्द ही एक पॉडकास्ट इस ब्लॉग पर लगाऊं.आप दोनों अपना स्नेह युहीं बनाये रखिये.

अनु जी(अनुलाता जी)..आपके कमेंट्स थोड़े "हट-के" होते हैं न,. भीड़ से एकदम अलग...अपनापन झलकता है आपके हर कमेंट्स से..चाहे वो फेसबुक पर हो या ब्लोग्स पर...बिना < 3 सिंबल के पूरे नहीं होते...खूब सारा प्यार भरा होता है आपके कमेन्ट में....और कभी कभी शायद ये प्यार थोड़ा ज्यादा दिख जाता है, जैसे की एक दफे आपने एक पोस्ट में कहा था "पढ़ते हुए मुझे लगा आप बिलकुल गुलज़ार के जैसा लिखते हैं". ये बहुत बड़ी बात आपने कह दी थी पोस्ट में....और मैं बहुत खुश हो गया था, उस दिन तीन चार बार पढ़ा था आपका ये कमेन्ट...युहीं अपना प्यार बनाये रखिये आप.

दिगम्बर नासवा...आप तो खुद ही इतने शानदार शायर हैं..कमाल की ग़ज़लें कवितायें लिखते हैं आप..एक दो नहीं कई बार पढ़ता हूँ आपकी कविताओं और गजलों को...आपकी यहाँ लिखी बातें कितना उत्साह बढाती हैं ये मैं बता नहीं सकता...आप नियमित रूप से हर पोस्ट पर अपना प्यार बरसा कर चले जाते हैं..बहुत अच्छा लगता है आपकी प्यार भरी बातों को अपने पोस्ट्स में पढना.

स्नेहा...आपका इंग्लिश ब्लॉग है, मैं ज्यादा इंग्लिश ब्लॉग नहीं पढ़ता, लेकिन आप कमाल लिखती हैं.आपसे युहीं एक दिन घूमते फिरते टकरा गया था मैं, और तब से आज तक हमारी दोस्ती कायम है और रहेगी.शिखा दीदी के लिए जो बातें कही है मैंने, वही दोहराना चाहूँगा, आप जितनी स्वीट हैं, उतने ही स्वीट आपके कमेंट्स भी होते हैं...एक बड़ा सा शुक्रिया आपको स्नेहा.


दिव्या...तुम्हे क्या कहूँ दोस्त? एक समय था जब ये ब्लॉग नहीं था तब भी मेरी हर कविताओं को तुमने झेला है, हमने गाँधी मैदान के आसपास घूमते टहलते जाने कितनी कहानियां बनायीं होंगी...अगर उस समय पता होता की कभी ब्लॉग पर लिखना शुरू करूँगा तो उन कहानियों को मैं सहेजते जाता...तुम एक समय इस ब्लॉग की सदस्य थी, लेकिन फिर बाद में तुमने ये कहकर ब्लॉग को अलविदा कह दिया की यहाँ सिर्फ मेरा नाम अच्छा लगता है, वापस इस ब्लॉग से जुड़ने के बारे में सोचना तुम....

अकरम...दोस्त, तुम्हे शुक्रिया कहे बिना ये पोस्ट पूरी नहीं हो सकती.तुमने हर पोस्ट पर अपनी राय दी है, और हर पोस्ट पर तुमने अच्छी बातें ही कही है.तुमसे तो कई कहानियाँ यूँ भी कह चूका हूँ मैं, और बाद में उन्हें ब्लॉग पर लगाया है.शुक्रिया दोस्त.

रुचिका, वरुण, अतिप्रिया , शुभ्रा, अनिल, प्रभा.....तुम सब बच्चों को मैं क्या कहूँ...तुम सब का ब्लॉग से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है...नाही तुम हिंदी की किताबें या कहानियां पढ़ते हो.....फिर भी मेरी लिखी बातों को, यहाँ लिखी कहानियों, कविताओं को तुम सब नियमित पढ़ते आये...और यकीन मानो, शुरू के कुछ पोस्ट इस ब्लॉग को सिर्फ और सिर्फ तुम सब के लिए ही लिखे थे मैंने...तुम सब हमेशा मुझे बहुत खुश कर देते हो.शुक्रिया तुम बच्चों का, और युहीं मेरी कहानियों को झेलते रहो...

इन सब के अलावा और भी कई लोग मिले हैं, जिनका शुक्रिया मैं अदा करना चाहता हूँ की उन्होंने इतना प्यार दिया मुझे....कुछ लोग जिन्हें आज याद कर रहा हूँ....
श्रेया, निवेदिता भाभी, वाणी गीत जी, स्नेहा, संगीता स्वरुप जी, ऋता दीदी, सोनल जी, प्रवीण भैया,  अनुराग शर्मा जी, ऋचा गुप्ता जी, गुंजन दीदी, अर्चना बुआ, प्रशांत, स्तुति, रश्मि दीदी, स्मृति, पूजा, अजय भैया, देव भैया, वंदना, आराधना जी ,समीर चाचा, शिवम् भैया, अनूप शुक्ल जी, देवेद्र पाण्डेय जी, अमिता नीरव जी, अमृता तन्मय जी, देवांशु, शेखर , गिरिजा जी , गायत्री गुप्ता जी, मोनिका जी, रश्मि प्रभा जी, अभिषेक भाई, मोनाली जी, माही जी, रीना मौर्य,रूचि जैन, पल्लवी जी, नितीश,मुकेश भाई, निर्मला कपिला जी.

बहुत से लोग मिले हैं इस ब्लॉग के सफ़र में अब तक...बहुत लोग ऐसे भी हैं शायद जिनका नाम मैं यहाँ लेना भूल रहा हूँ...जिनका नाम मैं यहाँ न ले पाया हूँ...उन सबको कहना चाहता हूँ की आपके बिना ये सफ़र मुश्किल होता..आप सब का शुक्रिया, साथ ही उन सभी लोगों का जो ब्लॉग नहीं लिखते हैं फिर भी ब्लॉग से जुड़े हुए हैं...उन तमाम साईलेंट रीडर्स का जो ब्लॉग पढ़ते हैं......सभी उन साथियों को शुक्रिया जो किसी भी तरह से इस ब्लॉग से जुड़े हुए हैं...ये ब्लॉग मेरे लिए बहुत ख़ास है, अपना स्नेह बस युहीं बनाये रखिये.......!


अभि 

Wednesday, October 30, 2013

मैंने परी को देखा है..



आज से ठीक चार साल पहले की ३१ अक्टूबर की बात है..युहीं घूमते हुए एक ब्लॉग पर जा रुका था..एक कहानी सामने दिखी थी..."ज़िन्दगी बाकी है".मुझे कहानी काफी पसंद आई, सोचा की कुछ कमेन्ट कर दूँ, की तभी ब्लॉगर प्रोफाइल के तरफ ध्यान गया.सोचा कमेन्ट करने से पहले देख तो लूँ की आखिर किसका ब्लॉग है, नाम क्या है इनका? और क्या करती हैं?लेखिका हैं कोई या हम लोग टाईप टाईमपास ब्लॉगर.इनका प्रोफाइल क्लिक किया तो सबसे पहले जिस चीज़ पर नज़र गयी थी वो थी इनके फोटो पर...फोटो से बड़ी सुन्दर लेखिका लग रही थी..इनका नाम जानना चाहा तो देखा नाम के जगह लिखा था "कही अनकही".मुझे थोड़ी हंसी आ गयी थी, मैंने सोचा कैसी बेवकूफ ब्लॉगर हैं, ब्लॉगर प्रोफाइल में अपना नाम लिखने के जगह अपने ब्लॉग का नाम ही लिख दिया है इन्होने..फिर इनका प्रोफाइल आगे पढ़ा...'अबाउट मी' सेक्सन के तरफ नज़र गयी तो मैं थोड़ा सा संभला...लिखा था "I have got my five books published, out of which two are awarded...I write basically in my mother tongue-Hindi- but there are some stuffs in English too.".. जो इनके बारे में पहली सोच थी की कैसी बेवकूफ ब्लॉगर हैं वो सोच अब तब्दील हो गयी थी, की "अरे ये तो बड़ी हॉट-शॉट टाईप कोई चीज़ हैं".पांच किताबें, दो सम्मानित और इंग्लिश में भी कुछ लिखती हैं.अब मैं सोचने लगा था की कमेन्ट करूँ या न करूँ?? लेकिन उसके पहले दुविधा ये थी की इन्हें बुलाऊं किस नाम से?नाम तो इनके पूरे ब्लॉग पर कहीं नहीं लिखा था, नाही प्रोफाइल पर...कमेंट्स मोडरेसन लगाया हुआ था इन्होने तो कोई कमेन्ट भी नहीं दिख रहा था जहाँ से हिंट ले सकूँ, की तभी ध्यान गया की इन्होने कहानी में अपना नाम तो लिख ही रखा है, जिसे पता नहीं क्यों मैंने देखा ही नहीं था.खैर, नाम जानने के बाद और काफी सोच विचार करने के बाद मैंने कहानी के ऊपर कमेन्ट कर दिया(एज युज्वल, विद अ ग्रमैटिकल मिस्टेक)..मैंने सोचा नहीं था की इनका कोई जवाब भी आएगा, लेकिन अगले ही दिन या शायद उसी दिन ई-मेल के जरिये इनका एक औपचारिक सा जवाब आया था.हम दोनों के बीच बातचीत उसी ई-मेल से शुरू हुई थी.उस वक़्त हम दोनों में से किसी को ये नहीं मालुम था की एक सिम्पल ई-मेल से शुरू हुआ रिश्ता ज़िन्दगी भर का साथ बन जाएगा.

पहले ईमेल पर हुई उस औपचारिक बातचीत के बाद(जिसमे मुख्यतः झूठी तारीफ़ शामिल थी.."प्रियंका जी, आप बहुत अच्छा लिखती हैं", "अभिषेक जी आपका आभार, आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं".) हमारे बीच बातें लगातार होती रहीं, हम लगातार ईमेल एक्सचेंज करते रहे.बहुत जल्दी ही हमारे बीच सारी औपचारिकतायें मिट गयीं और दोस्ती हो गयी.अब ये याद भी नहीं की कितने ख़त(ई-मेल) हमने एक दुसरे को लिखे थे.वैसे यहाँ मैं ये बता दूँ की ये मैं फेसबुक के ज़माने की बात कर रहा हूँ..साल २००९-२०१० में फेसबुक काफी सक्रीय था और सभी लोग इससे जुड़े हुए भी थे..मैं भी था, ये भी थीं फेसबुक पर...लेकिन फिर भी हम एक दुसरे के फेसबुक अकाउंट से जुड़े नहीं थे.हमने तो फेसबुक पर बहुत बाद में एक दुसरे को एड किया था...हमारे बीच जो भी एक रिश्ता बना था वो किसी सोशल नेटवर्किंग साईट, चैट या फोन के माध्यम से नहीं बल्कि खतों के माध्यम से बना था..और हमें पता भी नहीं चला की कब और कैसे हम एक दुसरे के इतने करीब आ गए की एक दुसरे से हर बात शेयर करने लगे...चाहे वो दोस्तों की बातें हों, शहर की या परिवार की..हम पारिवारिक फंक्सन की तस्वीरें भी एक दुसरे को भेजने लगे..और बाद में तो ऐसा हो गया था की अगर एक का जवाब वक़्त पर ना आये तो दूसरा परेशान हो जाता था की "आखिर बात क्या है?अब तक जवाब क्यों नहीं आया?".

एक दिन युहीं बातों बातों में  मैंने इनसे पूछ ही लिया था, "आपको मैं दीदी बुला सकता हूँ?".इनके ख़ुशी का तो फिर कोई ठिकाना ही नहीं था...बड़ा खुश होकर इन्होने एक प्यारा सा जवाब भेजा था मुझे और कहा था "क्यों नहीं, तुम भी तो मेरे छोटे भाई ही तो हो"
और फिर ये बन गयीं मेरी प्रियंका दीदी और मैं बन गया इनका छोटा अभि भैया.अब सोचता हूँ तो ये असंभव सा लगता है की कभी कोई ऐसा भी वक़्त था जब हम एक दुसरे को नहीं जानते थे.जब कभी पुराने खतों को देखता हूँ तो हँसी भी बहुत आती है, की पहले इन्हें मैं "प्रियंका जी" कहता था और ये मुझे "अभिषेक जी".मुझे ये पता भी नहीं चला की कब ये मेरे लिए प्रियंका जी से प्रियंका दीदी बन गयीं और प्रियंका दीदी से सिर्फ "दीदी".और मैं कब इनके लिए अभिषेक जी से अभि भैया बन  गया और अभि भैया से सिर्फ "भाई".

अब कभी सोचता हूँ तो लगता है की कहाँ से अचानक यूँ चलते चलते इनसे मेरी मुलाकात हो गयी और पता भी नहीं चला की कैसे ये मेरी ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन गयीं...इतना की मेरे पल पल की खबर रखती हैं...मैं कब क्या कर रहा हूँ, कहाँ हूँ, वक़्त पर खा रहा हूँ या नहीं, सही वक़्त पर सो रहा हूँ या नहीं...मेरी हर बात का ये ख्याल रखती हैं.छोटी छोटी बातों पर परेशान भी बहुत हो जाती हैं..इनका फोन भी अगर रिसीव करने में देरी करूँ तो ये बहुत घबरा जाती हैं.मैं इन्हें समझाता हूँ की दीदी इतना जल्दी परेशान नहीं होना चाहिए, इनका जवाब होता है..."तुम्हारे लिए कैसे न परेशान हों हम?" . मेरी हर लापरवाही पर वैसे ही पुरे अधिकार से डांटती हैं जैसे माँ डांटती हैं.खाने पीने में, या तबियत ख़राब हो जब तब....हर ढंग से हर समय ये मेरे पीछे पड़ी रहती हैं..अब तो लगता है ऐसा की दो दी निगाहें मुझपर हर वक़्त लगी रहती हैं...एक मेरी माँ की और दूसरी इनकी.

मेरे पर ये हर हुक्म चला लेती हैं.जब कहता हूँ, की "देखो भाई पर इतना हुक्म चलाना ठीक नहीं"..तो कहती हैं "ये 'दिदिगिरी' तो तुमको हमेशा झेलनी पड़ेगी रे".दीदीगिरी इनकी कम खतरनाक नहीं होती है..अक्सर ये मुझे इमोशनल ब्लैकमेल भी कर देती हैं...पता नहीं कहाँ कहाँ से आईडियाज लेकर आती हैं ये भाई को इमोशनल ब्लैकमेल कर अपना काम निकलवाने का? वो काम इनका चाहे भाई को वक़्त पर खाना खिलाने का हो या उसे समय पर सुला देने का, ऐसी धमकियाँ देती हैं की इनका भाई चुपचाप इनका बात मान लेता है.
कोई गलती करूँ तो ये थोड़ा डांट भी लगा देती हैं मुझे(हाँ, थोड़ा ही डांट लगाती हैं, क्यूंकि भाई को ये खुल कर डांट भी नहीं सकती न, इतना प्यार करती हैं अपने भाई से).इनकी डांट से वैसे मुझे थोडा डर भी लगता है, ये आज कन्फेस कर रहा हूँ(ये जानता हूँ अच्छे से की यूँ इनके सामने ये कन्फेस करना कितना खतरनाक साबित हो सकता है, फिर भी).

लेकिन आमतौर पर इनका एक अलग ही रूप मेरे सामने रहता है, उस वक़्त मुझे बिलकुल नहीं लगता की ये मेरे से बड़ी हैं, कभी कभी इनसे पूछ भी देता हूँ मैं "तुमने सच तो बताया था न मुझे की मेरे से बड़ी हो तुम, या झूठ कह दिया था".अक्सर एकदम बच्चों जैसी हरकतें और जिद होती हैं इनकी.बदमाशियां तो इनकी रूकती ही नहीं हैं..कभी कभी जब मैं प्यार से डांट देता हूँ..."बहुत बदमाशियां कर रही हो तुम आजकल"..तो ये और भी बच्ची बन जाती हैं और कहती हैं "हाँ तो?भाई हो, झेलो मेरे इन नखरों को...".

जब भी इनसे मिला हूँ, इनकी ढेर सारी इललोजिकल और बकवास बातों को झेलना पड़ा है...मुझे देखते ही इन्हें लगातार हँसी के दौरे पड़ते रहते हैं और अजीब अजीब हरकतें करती रहती हैं.....खूब बदमाशियां भी कर लेती हैं ये मेरे सामने..मुझे ही उलटे चुप हो जाना पड़ता है...कभी कभी तो इन्हें संभाल लेता हूँ, लेकिन अक्सर इनकी बदमाशियाँ, इनकी हंसी, और इनकी ईललॉजिकल बातें आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो जाया करती हैं....वैसे ये भी सच है की जब ये बदमाशियाँ कर रही होती हैं, उस समय मन ही मन ये भी दुआ करता हूँ की इनकी ये हरकतें, ये बदमाशियां और हंसी के ये दौरे तामुम्र पड़ते रहे.

इन्हें हमेशा मेरे से शिकायत रहती है की मैं जब इनसे मिलने आता हूँ तो इनके लिए चोकलेट लेकर नहीं आता...ये मुझे धमकाती भी हैं बहुत, मैं फिर भी भूल जाता हूँ.अगली बार भी हम जल्दी ही मिल रहे हैं और ये अभी से ही मुझे याद दिला रही हैं चोकलेट लाने को...और मैं हमेशा की तरह इस बार भी जान बुझकर चोकलेट लाना भूल जाऊँगा.इनसे हुई पहली मुलाकात का एक मजेदार किस्सा भी है...वो बहुत खूबसूरत सा एक दिन था.मुझे याद है, जब इन्हें मैंने पहली बार देखा था, ये मेरे इंतजार में गेट पर खड़ी थीं और मुझे देखते ही मुस्कुराते हुए कहती हाँ..."स्वागत है"...इन्होने उस समय "स्वागत है" कुछ इस तरह से कहा था, अपने दोनों हाथों को फैला यूँ वेलकम किया था की जैसे कह रही हों..."आ जाओ बेट्टा, अब बचकर कहाँ जाओगे?".
मैंने इन्हें पैर छू कर प्रणाम किया, उस समय भी दीदी की हल्की "दीदीगिरी" झेलनी पड़ी थी...इन्होने मुझे और नीचे झुकाया और कहा की पैर को अच्छे से छुओगे तब आशीर्वाद मिलेगा.मैंने भी इनके मन मुताबिक ही पैर को अच्छे से छूकर प्रणाम किया, इनका आशीर्वाद लिया.घर में इत्मिनान से बैठा ही था..चाय पानी पीकर थोड़ा आराम कर ही रहा था की मुझे अहसास हुआ ये बड़े इक्साइट्मन्ट से मेरी तरफ देख रही हैं..मैंने पूछा, क्या बात है दीदी? ऐसे क्या देख रही हो? इन्होने कहा, चलो जल्दी से मुझे मेरा चोकलेट दो तो.मुझे हँसी आने लगी..मैंने कहा आपके लिए कोई चोकलेट नहीं लाये.इनका चेहरा उदास हो गया था...कहने लगीं..."मैं कब से इंतजार कर रही थी की भाई जेब से अब चोकलेट निकालेगा की तब निकालेगा और भाई को देखो...खाली हाथ हिलाते हुए आ गया मेरे पास...चोकलेट क्यों नहीं लाये? मैंने दीदी की बात का जवाब नहीं दिया और सामने जो स्नैक्स रखा था उनपर कान्सन्ट्रेट करते हुए कहा इनसे..."अगली बार". ये कहाँ मानने वाली थीं..कहने लगीं...अगली बार नहीं, अभी जाओ..सामने ही दूकान है". इन्होने जिद दिखाया तो मैं भी जिद पर अड़ गया और बेशर्मों की तरह बैठा रहा.अंत में तंग आकर ये कहती हैं...मुझे पता था तुम मुझे चोकलेट नहीं खिलाओगे.
इनसे बाद की मुलाकातों में भी ये बात होती रही है, हर बार ये उम्मीद करती हैं की मैं इनके लिए चोकलेट लेकर आऊंगा और हर बार मैं चोकलेट लाना जान बुझकर भूल जाता हूँ...
वैसे दीदी, आप तो ये पोस्ट पढ़ ही रही हैं और अब तक समझ भी चुकी होंगी, की हम आपके लिए चोकलेट नहीं लाने वाले...अगली बार भी ये उम्मीद छोड़ दीजियेगा की हम आपको चोकलेट खिलाएंगे, अरे..बड़ी बहन
चोकलेट खिलाती है या छोटा भाई?

ये मेरे से खूब लड़ाई भी कर लेती हैं, और खूब नखरे भी दिखाती हैं...लेकिन कितनी भी ये लड़ाईयां करे, अपने भाई से जुडी हर बात से इन्हें प्यार है."भाई सब काम सही ही करता है ये इनका विश्वास है".इनके भाई की जब कोई तारीफ़ करता है तो भाई से भी ज्यादा ख़ुशी इन्हें होती है....भाई के लिखे स्टुपिड ब्लॉग पोस्ट्स की तो ये तारीफ़ करते नहीं थकती.वैसे भाई की तारीफ़ करना इनका फेवरिट काम है(और बड़ा गर्व भी है इन्हें इस पर).जब ये कहती हैं मुझसे(और अक्सर कहती ही हैं) की "काश भाई की तरह मैं लिख पाती", तो उस समय सच में मैं निशब्द हो जाता हूँ.खुद दीदी इतना अच्छा लिखती हैं, साहित्य की पता नहीं कौन कौन सी विधा जानती हैं ये, कहानियां, कवितायें, हाईकू और जाने क्या क्या में माहिर दीदी अपने भाई के लिए ऐसा कहती हैं तो ये उनका बस प्यार ही है.

सच में कुछ लोग होते हैं जो आपके ज़िन्दगी में जब आते हैं तब आपकी ज़िन्दगी बदल जाती है, और खूबसूरत हो जाती है..दीदी वैसे ही लोगों में से हैं.कभी कभी यकीन करना मुश्किल हो जाता है की इतना प्यार करने वाली बहन से मिलना लिखा था.हर तरह से ये मेरे लिए एक सहारा बन जाती हैं...चाहे कितनी भी परेशानियों में रहूँ, ये मेरे साथ हर वक़्त रही हैं.अब खुद मैं अगर ज्यादा परेशान हो जाता हूँ तो इनके पास चला आता हूँ..कभी कभी तो ये यकीन होता है की इनकी बातों में सच में कोई मसीहा बसता है..थोड़ी देर भी इनसे बातें कर लेता हूँ तो सारी परेशानियां सारी चिंताएं पीछे छुट जाती हैं.मेरे लिए ये एक इन्स्परेशन भी हैं और मेरी स्ट्रेंथ भी.बहुत कुछ ऐसा है जो मैंने इनसे सीखा है.खासकर जिस जिन्दादिली से ये ज़िन्दगी जीती हैं, वो सच में कमाल है.हर परिस्थिति में, हर हालात में ये मुस्कुराते रहती हैं, हँसते रहती हैं.मैं सच में चाहता हूँ की काश मैं भी खुद में ये ऐटिटूड डेवलप कर सकूँ.

इनके कुछ बेहद करीबी लोग इन्हें कभी कभी "परी" कह कर भी बुलाते हैं...ये सच भी है, ये हैं भी परी जैसी...जो मेरी उदासियों और तकलीफों को ही नहीं बल्कि जाने कितनों की उदासियों को अपने प्यार की छड़ी घुमा कर छूमंतर कर चुकी हैं.कभी कभी लगता है की मेरे लिए तो ये एक परी ही हैं जो जाने कितनी आसानी से मेरी सारी चिंताओं को दूर कर देती हैं...

आज के दिन, जब दीदी का जन्मदिन है...तो मैंने सोचा की दीदी के लिए ये एक छोटा सा तोहफा, एक ब्लॉग पोस्ट के रूप में उन्हें दे दूँ मैं.कम से कम अपनी प्यारी परी जैसी दीदी के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ मैं...

तो,
अ वैरी हैप्पी बर्थडे टू यु दीदी....!
आप युहीं मुस्कुराती रहिये, हँसते रहिये और खूब बदमाशियां करते रहिये....! 

एक कविता जो कहीं पढ़ी थी कभी किसी मैगज़ीन में उसे आपके नाम कर रहा हूँ -

"भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,
यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,"


दीदी, तमाम उम्र दुआएं रहेंगी आपके नाम ! हमेशा खुश रहिये आप !




दीदी से जुडी इस पोस्ट को "मेरी बातें" पर ना लगाकर यहाँ लगाने की एक वजह भी है.ये जो ब्लॉग है,जितना मेरा है, उससे कहीं ज्यादा इस ब्लॉग पर दीदी का अधिकार है.पिछले कई पोस्ट्स ऐसे हैं जो सिर्फ दीदी के कहने पर मैंने लगाए हैं.मुझे बाकायदा धमकियाँ मिलती थी, "बहुत दिन हो गए पोस्ट लिखे, चलो आज कोई अच्छी पोस्ट लिख दो". जून में लिखी "दिल्ली डायरी" तो पूरे तौर पर इन्होने धमका धमका कर लिखवाया था मेरे से....फोन पर धमकियां देती थी.."तुम लिखोगे की नहीं?" और तब तक ये मेरे पीछे पड़ी रही थी जब तक मैंने वो तीनों पोस्ट लिख कर यहाँ लगा न दिया था.वैसे ये क्यों मुझे हमेशा नयी पोस्ट लिखने के लिए धमकाते रहती हैं ये भी अच्छे से जानता हूँ मैं...इन्हें भाई की तारीफ़ करने की एक और वजह जो मिल जाती है..मेरी एक नयी पोस्ट का हैंगओवर इनपर तब तक चढ़ा रहता है जब तक दूसरी कोई और पोस्ट न लगा दूँ..कहने का अर्थ इतना सा है की ये उस हैंगओवर से एक अरसे से बाहर नहीं निकली हैं...कभी कभी इनको दौरे चढ़ते हैं तो भाई की पुरानी सभी पोस्ट एक सिरे से पढ़ जाती हैं, और फिर मुझे अपने भाई की तारीफें सुना सुना कर पका डालती हैं..


आज इस ब्लॉग की ये सौवीं(100th)पोस्ट भी है, सेंचुरी पोस्ट, जो डेडीकेटेड है मेरी दीदी को !