Saturday, May 26, 2012

तुम्हारी आवाजों के कुछ टुकड़े

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वो बेहद तनहा कर देने वाली शाम थी.रात से ही लगातार बारिश हो रही थी..दिन में कभी कभी हवा अचानक से तेज हो जाती, और तब खिड़की के दोनों पाट इतने जोर से आपस में टकराते की मेरे दिल की धड़कन एकदम से बढ़ जाती..और मैं बेवजह बहुत डर जाता.ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है..जब मैं अपने उन सपनों के बारे में सोचने लगता हूँ जिसे वक्त ने बड़ी बेरहमी से कुचल डाला है, तब मैं अक्सर तेज आवाजों से डर जाता हूँ.रात भी कमोबेश ऐसे ही कटी थी...कभी खिड़की की आवाज़ से डरते हुए तो कभी सुबह होने की प्रतीक्षा में...दिल में अजीब अजीब से मिक्स्ड ख्याल आ रहे थे.दोपहर में भी बारिश की तेज आवाज़ और खिड़कियों की भयावह आवाजों ने सोने नहीं दिया.शाम होते होते मैं इन आवाजों से इतना घबरा गया, अपने तन्हाई से इस कदर डर गया की तेज बारिश में ही घर से निकल गया और एक पार्क में चला आया.पार्क में पहुँचते ही बारिश अचानक रुक गयी, और तब मुझे ये भ्रम हुआ की कहीं ये सारी साजिश मुझे घर से बाहर निकलने पर मजबूर करने की तो नहीं थी.

अभी याद करने बैठूं तो मुझे एक्जेक्टली ये याद आता नहीं की उस पुरे दिन मैं क्या सोच रहा था..बस यही याद आता है की उस शाम मैं बहुत डरा हुआ, घबराया हुआ और अकेला था..उस शाम पार्क में मेरी नज़र एक छोटी बच्ची पर गयी.वो कभी अपनी माँ को चिढाती तो कभी पार्क में इधर उधर भागने लगती.उस छोटी बच्ची को देख मुझे जाने क्यों तुम्हारी एक बात याद आ गयी...तुम कहती थी -घास पर नंगे पाँव चलने से पाँव कोमल और हसीन हो जाते हैं..तुम जब भी बारिशों के मौसम में पार्क आया करती थी, तो नंगे पाँव ही भींगी हुई घाँस पर दौड़ जाती थी, आसपास वाले लोग क्या कहेंगे इसकी तुमने कभी परवाह नहीं की.ये बात याद आते ही मेरे चेहरे पे एक मुस्कान आ गयी, जिसकी मुझे उस शाम बेहद जरूरत थी.

याद है तुम्हे, बहुत पहले जब एक शाम मैं अपने दोस्तों के साथ अपने शहर में अपने इलाके के पार्क के गेट के पास खड़ा था तो अचानक तुम पार्क के अंदर से दौड़ते हुए आई और मुझे लगभग खींचते हुए उस पार्क में ले गयी थी..जब तक की मैं कुछ समझ पाता, या सवाल कर पाता, मैं उस पार्क के एक कोने में एक पौधे के पास पहुँच चूका था.तुमने झपटकर मेरा हाथ पकड़ लिया और उस पौधे तरफ देख कर इशारों से कहा.."देखो तो उसे...कितना अच्छा है न?"..

सब कुछ इतना जल्दी हुआ था की एक पल तो मैं कुछ भी समझ नहीं पाया की तुम मुझे कहाँ देखने को कह रही हो, और फिर मेरी नज़रें उस पौधे के बजाय तुम्हारे चेहरे पर जाकर टंगी रह गयीं..तुमने फिर मुझे छेड़ते हुए कहा -- "अरे जनाब, इस बेयुतिफुल(ब्यूटफल) की तरफ नहीं..उस बेयुतिफुल की तरफ देखो" और तब मैं कुछ झेंप सा गया...मैंने देखा की तुम उस पौधे के तरफ ही इशारा कर रही हो.मैं कुछ समझ नहीं पाया की आखिर तुम मुझे क्या दिखाना चाह रही हो..ख्याल आया, की हो न हो उस पौधे का कोई फूल तुम्हे प्यारा लगा हो या आसपास कोई चींटी हो, जिसकी चाल ने तुम्हे अट्रैक्ट किया हो..मैं अभी अंदाजा ही लगा रहा था की तुम किस बात पर इतना खुश हो रही हो, की तुमने उस पौधे को बाय बोलकर मुझे वापस खींचते हुए बाहर ले गयी, पार्क के मैन गेट के पास..और जबतक मैं संभल पाता, तुम मुझे आइसक्रीम के एक ठेले के पास लेते आई थी, और मुझसे कह रही थी - "तुम्हे मैंने इतना अच्छा चीज़ दिखाया, अब चलो मुझे आईसक्रीम खिलाओ".

मैं तुमसे पूछना चाह रहा था की आखिर पार्क में तुम मुझे क्या दिखाना चाह रही थी..लेकिन बस इस वजह से चुप रहा की तुम हर बार की तरह मेरे सवालों को बेमतलब और व्यर्थ का बोल के खारिज कर दोगी.उस शाम की तुम्हारी वो अजीब हरकत को मैंने तुम्हारी बातों और हरकतों के उस कैटेगरी में डाल दिया था, जो मुझे हमेशा से बहुत रहस्मयी सी लगती थी और आज तक कभी समझ में नहीं आई..

तुम्हारे शहर से जाने के बहुत दिन बाद युहीं एक उदास शाम मैंने खुद से एक वादा किया था की अब कभी उस पार्क में दोबारा नहीं जाऊँगा.लेकिन कुछ महीनों पहले जब मैं उस पार्क के तरफ से गुजर रहा था..तो अचानक ही मेरे कदम पार्क के गेट के पास आकार ठिठक गए.और मैं खुद से किये वादे को तोड़ता हुआ पार्क के अंदर दाखिल हो गया.पार्क का पूरा नक्शा ही बदल गया था..सिंपल सा दिखने वाला पार्क अब बेहद खूबसूरत हो गया था..पार्क का एक कोना जहाँ पर बेंच लगी रहती थी और जहाँ तुम अक्सर बैठा करती थी..वहाँ से गायब था.पार्क के पीछे जो लंबे लंबे से पेड़ थे, वो पुरे कट गए थे, और वहाँ खाली मैदान था.सब ही कुछ पार्क में बदल गया था.मुझे इस बात से थोड़ी खुशी भी हुई, की अब इस पार्क में ऐसा कुछ भी नहीं है जो मुझे तुम्हारी याद दिलाएगा..लेकिन मेरी ये खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी.पार्क के दीवारों से सटे लंबे लंबे पीले फूलों वाले पेड़ अब भी अपने जगह वैसे ही मुस्तैद खड़े थे, जैसे उन दिनों खड़े रहते थे.मैंने सोचा--सब कुछ बदल भी जाए, लेकिन ये पेड़ कभी नहीं बदलते, वैसे ही रहते हैं जैसे बरसो पहले हुआ करते थे..मैं जाकर वहीँ एक पेड़ के नीचे बैठ गया..

पेड़ के नीचे बैठ कर कुछ सोच ही रहा था की अचानक लगा की जैसे तुमने मेरा नाम लिया है कहीं से...मैं हतप्रभ होकर इधर उधर देखने लगा..फिर याद आया की तुम तो बहुत दूर किसी दूसरे शहर में हो..और ये सिर्फ मेरा वहम है..मुझे खुद पर ही हंसी आ गयी..लेकिन दूसरे ही पल तुम्हारी आवाज़ मुझे फिर से सुनाई दी..इस बार मैं सही में चौंक गया था और इधर उधर देखने लगा..मेरी नज़र ऊपर पेड़ की टहनियों पर जाकर टिक गयी..और तब मुझे लगा की इसी पेड़ की किसी टहनी से तुम्हारी आवाज़ मुझे सुनाई दे रही है...शायद तुम्हारे आवाज़ के कुछ टुकड़े यहाँ टंगे हुए रह गए हों...जिसे तुम अपने साथ वापस ले जाना भूल गयी..तब मुझे ये भी लगा की ये तुम्हारी आवाजों के टुकड़े यहाँ युहीं टंगे रहेंगे..बहुत साल बाद भी, शायद हमेशा हमेशा के लिए...और तब मैं बेहद निराश और उदास हो गया, और खुद से फिर एक वादा किया की अब फिर कभी इस पार्क में दुबारा नहीं आऊंगा.


कभी कभी सोचता हूँ की आने वाले सालों में तुम कभी अगर ये शहर वापस भी आई तो क्या तुम उस पार्क में जाओगी..क्या पार्क की गेट पर तुम्हारे कदम वैसे ही ठिठकेगें जैसे मेरे ठिठके थे....क्या तुम भी उस पौधे और पार्क का वो कोना को वहाँ न पाने पर दुखी होगी...और क्या तुम्हे भी ऐसा लगेगा की मेरी आवाजों के कुछ टुकड़े वहाँ के लंबे और घने पीले पेड़ों के टहनियों पर टंगे हुए हैं....क्या तुम उस समय मुझे याद करोगी..और क्या तुम भी उस समय वहाँ किसी पेड़ के नीचे बैठकर रोयोगी?

Saturday, May 5, 2012

टूटते तारों का सच

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वे गर्मियों के दिन थे.लड़का शहर में नया था और शहर की तेज गर्मी से वो बहाल था.पहली बार वो ऐसी गर्मी झेल रहा था..दोपहर होते होते पूरा शहर तपने लगता और जिस घर में वो रहता, उसके कमरे गर्मियों के दोपहर में रहने लायक नहीं होते..छत और फर्श से आग बरसती रहती..लड़का पूरा दिन अपने कमरे में नहीं गुज़ार सकता था इसलिए वो बाहर चला जाता..बाहर की गर्मी बर्दाश्त करना उसके लिए कमरे की गर्मी और उमस को बर्दाश्त करने से ज्यादा आसान होता.वो सुबह ही घर से निकल जाता..शहर में इधर उधर भटकते रहता..अपने मोहल्ले के एक दो दुकानवालों से उसका परिचय हो गया था तो वो अक्सर उन दुकानों में बैठ जाता और बातें करने लगता..कभी कभी वो घर के पास ही एक मॉल में चला जाता.वो अक्सर उस मॉल के फ़ूडकोर्ट में बैठा रहता और पूरा दिन वहीँ गुजार देता.उस मॉल के फ़ूड कोर्ट में वीरानी छाई रहती थी तो उसके वहाँ बैठे रहने से वहाँ के कर्मचारियों को कोई आपत्ति नहीं होती.फ़ूड कोर्ट वाले उस लड़के को अच्छे से पहचान गए थे.लड़का हमेशा अपने साथ कई किताबें,डायरी और नोटबुक रखता जिसे वो मॉल के फ़ूड कोर्ट पहुँचते ही टेबल पे फैला देता..पुरे फ़ूड कोर्ट में उसका टेबल सबसे अलग दीखता.हर के टेबल पे खाने के तरह तरह के व्यंजन होते लेकिन उसके टेबल पर तरह तरह की किताबें होती और साथ में कॉफी या चाय.वहाँ के लोग उसे कोई बड़ा लेखक समझते और शायद इस कारण से वे लोग उस लड़के की इज्ज़त भी करने लगे थे.

वो देर शाम तक वापस आता, लेकिन दिन भर की गर्मी से कमरा फिर भी तपा हुआ ही रहता.मॉल में पुरे दिन ठंडी हवा खाने के बाद जब वो अपने कमरे में दाखिल होता तो उसे कमरे की ताप बर्दाश्त नहीं होती और वो खिड़कियाँ दरवाज़े को खोल छत पे चला जाता.छत की सीढियां चढ़ते हुए वो अक्सर गिनने लगता की बारिशों में अब कितने और दिन बचे हैं..बारिश में तपन थोड़ी कम होगी और फिर उसके बाद सर्दियाँ शुरू हो जायेगी.ये सोच उसे कुछ तसल्ली मिलती और सर्दियों की बात सोच के वो कुछ देर के लिए खुश हो जाता.वो बहुत देर तक छत पे रहता..वो तब तक छत पे रहता जब तक उसके कमरे की ताप कम नहीं होती.गर्मियों की शाम उसे छत पे गुज़ारना हमेशा से अच्छा लगता था..अक्सर वो छत पे ही अपना बिस्तर लगा देता और वहीँ सो जाता.लेटे लेटे वो देर तक तारों को देखते रहता नींद कब उसे अपने आगोश में ले लेती ये उसे भी पता नहीं चलता.

उसके मकान के ठीक सामने तीन मंजिले का एक और मकान था.उसे वो मकान बहुत रहस्मयी सा लगता.वहाँ लोग रहते थे लेकिन फिर भी लगता की पुरे मकान में सन्नाटा पसरा है, एक वीरानी और उदासी छाई हुई है..पूरी शाम वो मकान अँधेरे में डूबा रहता.एक दो कमरे में कभी कभी हलकी रौशनी दिखाई देती थी लेकिन अक्सर मकान अँधेरे में ही डूबा रहता.वो हमेशा उस मकान में रहने वाले लोगों के बारें में सोचता..कौन रहते होंगे वहाँ?कैसे लोग होंगे वे?क्या करते होंगे?अँधेरे में वे क्यों रहते हैं..वो सोचता की अगर कभी उस मकान के किसी सदस्य से राह चलते उसकी मुलाकात हुई तो वो ये सब बातें उनसे पूछेगा.मकान के छत के एक कोने में एक टेबल और उसके दोनों तरफ दो छोटे बेंच लगे हुए थे...लड़के को थोड़ी हैरानी इस बात से होती की मकान में हमेशा अँधेरा रहता लेकिन वहाँ लगी टेबल और दो बेंचों के पास बत्ती पूरी रात जलते रहती और इसी वजह से छत का वो कोना बहुत खूबसूरत दीखता.

वो अक्सर उस छत पे एक खूबसूरत लड़की को देखता.उसे वो लड़की बड़ी अजीब और रहस्मयी लगती...वो अक्सर शाम में छत पे टहलती और अजीब हरकतें करती.कभी बिना बात अचानक नाचने लगती तो कभी हवा में अपनी उँगलियों से कई शकलें बनाने लगती.वो जब छत पे आती तो मकान की पूरी बत्तियाँ जलने लगती, और उसके वापस जाते ही बत्तियाँ फिर से बुझ जाती.वो जब भी वो उस लड़की को देखता तो उसे अपनी प्रेमिका की याद आती, जो उन दिनों किसी दूसरे शहर में थी.उसकी प्रेमिका भी तो इस लड़की की ही तरह अजीब हरकतें करती थी.

एक शाम वो छत पे टहल रहा था और उदास था.उसकी नज़र फिर से उस लड़की पे टिक गयी.वो लड़की बहुत उदास लग रही थी और छत के कोने में लगी बेंच पे वो बैठी थी.उस लड़की को यूँ उदास देख उसे एक पुरानी बात याद हो आई.एक ऐसी ही गर्मियों की शाम थी, जब वो लड़का अपनी प्रेमिका के साथ अपने शहर में था.उसकी प्रेमिका उस शाम बहुत उदास थी.वे दोनों अपनी ऑफिस के छत के कोने में लगी बेंच पे बैठे हुए थे.लड़के की कोशिश जारी थी की वो अपनी प्रेमिका को खुश कर सके..उसे हँसा सके..लड़के को ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी.लड़की की उदासी ज्यादा देर चेहरे पे टिक नहीं सकी...यही उन दोनों के रिश्ते की खूबसूरती थी..जब भी दोनों साथ रहते तो दोनों में से कोई ज्यादा देर उदास नहीं रह सकता था.लड़का उस शाम पहली बार अपनी प्रेमिका के इतने करीब बैठा था और पहली बार उसने उसकी आँखों को करीब से देखा था और तब उसकी आँखों में झांकते हुए उसे पता नहीं क्यों ये भ्रम हुआ की उसकी आँखों के पीछे कोई एक बहुत ही खूबसूरत सी दुनिया है जहाँ सिर्फ वो जा सकती है..जहाँ की हर चीज़ उसके मुताबिक है और जहाँ उसके अलावा किसी दूसरे को जाने की कोई इजाज़त नहीं है..वो अक्सर देखता था की उसकी प्रेमिका जब भी उदास होती तो कुछ देर के लिए अपनी आँखें मुंद लेती, और फिर जब आँखें खोलती तो मुस्कुराने लगती.लड़के को उस शाम ये भी भ्रम हुआ की लड़की हमेशा अपनी आँखें बंद कर उसी खूबसूरत सी दुनिया में चली जाती है और अपने सारे गम और उदासी वहीँ छोड़ खुशियाँ ले वापस आ जाती है.

अचानक याद हो आई अपने अच्छे दिनों की स्मृति से वो थोड़ा और उदास हो गया और उसके मन ने चाहा की अभी इस वक्त वो अपनी प्रेमिका के पास पहुँच जाए.लेकिन सिर्फ चाहने भर से कुछ मिलता नहीं.वो उदास हो गया और छत पे टहलने लगा..की इतने में उसने आकाश से एक तारे को टूट के गिरते हुए देखा.उसने पहले कभी टूटते तारों को नहीं देखा था.सिर्फ फिल्मों में या अपनी प्रेमिका से वो टूटते तारों का जिक्र सुनते आया था.लड़की उससे हमेशा कहती की तारे जब टूट के गिरते हैं तो उस समय की मांगी हुई कोई भी मुराद जरूर पूरी होती है.लड़की ने उसे सलाह दी थी की जैसे ही टूटते तारों को वो देखे, कोई अच्छी 'विश' वो भी मांग ले..उसकी वो 'विश' जरूर पूरी होगी..लड़के ने पहली बार आज तारों को टूटते हुए देखा और जाने कैसे उसने उसी वक्त ये दुआ मांग ली की वो और उसकी प्रेमिका जिंदगी भर साथ रहे और उनकी मोहब्बत हमेशा जिंदा रहे.उसने सोचा की अगर उसकी मांगी ये मुराद पूरी हो जाती है तो वो इसके पीछे की सच्चाई को मानने लगेगा...अगर नहीं तो उसे ये बातें कहानियों सी लगेगी, जिसका होना असल जिंदगी में नामुमकिन है और जो सिर्फ बच्चों को रोमांचित करने के लिए बुनी जाती हैं.


उस शाम को बीते बहुत से साल गुजार गए...और अब लड़के को पूर्ण विश्वास है की टूटते तारों की ये कहानियाँ सिर्फ मनगढ़त हैं और इनका असल जिंदगी से कोई ताल्लुक नहीं..टूटते तारे तो असल में उल्का होते हैं जो यदि जमीन पे गिरे तो उल्का पिण्ड बनाते हैं.टूटते तारों को देखते वक्त मांगी कोई भी कोई भी मुराद कभी पूरी नहीं होती.

Sunday, April 8, 2012

ट्रैफिक के शोर में प्यार के तीन शब्द

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कितना अजीब होता है न, कभी कभी एक छोटी सी बात यादों के कितने तहे खोल जाती है.वे बातें जो लगभग हम भूल चुके होते हैं, या भूलने का ढोंग कर रहे होते हैं,अचानक बिना कोई वार्निंग दिए सामने आ जाती हैं.सड़क पर चलते हुए किसी जाने पहचाने गाने की धुन का सुनाई देना, किसी की खिलखिलाती हुई हंसी या किसी फ्लावर शॉप में बिक रहे जामुनी रंग के खूबसूरत फूल..हरेक  छोटी सी छोटी बात कभी कभी यादों का ऐसा तूफ़ान साथ ले आती है, की जिससे बचने की कोई गुंजाईश नहीं होती.फिर दिन,महीने बीत जाते हैं उन बातों और यादों में.कभी सोचता हूँ तो कितना अजीब लगता है की किसी अनजान महिला के हाथों की मेहँदी और हरी चूडियाँ,खुद को किस तरह टाईम मशीन में बिठा के वापस उन दिनों में ले जाते हैं, जो बेहद खूबसूरत दिन थे.और जहाँ से वापसी का रास्ता बड़ा मुश्किल से मिलता है.

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वे शुरू वसंत के दिन थे.लड़का और लड़की, दोनों को ये वसंत का मौसम बड़ा अच्छा लगता था.गर्मियों और सर्दियों का कम्बाइन्ड इफेक्ट जैसा कुछ होता है इस मौसम में.ये लड़की उन दिनों कहा करती थी.सर्दियाँ खत्म नहीं हुई थी और शाम में हलकी धुंध सड़कों पे हो जाया करती थी.वे दोनों देर शाम तक साथ रहते..या तो पार्क में बैठे रहते या फिर सड़कों पे घूमते.सड़कें बेहद व्यस्त रहती.लेकिन दोनों उसी सड़क के चक्कर काटते रहते.लड़के ने उन दिनों एक खेल शुरू किया था जिसकी खबर सिर्फ उसे थी, लड़की को उसने इस खेल के बारे में कुछ नहीं बताया था..वैसे उन दिनों इस खेल के अलावा भी बहुत कुछ ऐसा था जिसकी खबर सिर्फ उस लड़के को थी,लड़की को नहीं.व्यस्त सड़कों पे चलते हुए जब भी कोई तेज रफ़्तार की गाड़ी होर्न बजाते हुए पास से गुज़रती, तो लड़का उस लड़की को चुपके से 'आई लव यु' कहता.ये 'आई लव यु' इतना धीमे होता की ट्रैफिक और गाड़ियों के शोर के नीचे दब के रह जाता और खुद उस लड़के को भी सुनाई नहीं देता की उसने क्या कहा.लड़का जब भी लड़की से प्यार के ये तीन शब्द कहता तो उसे कम से कम इस बात की खुशी रहती की उसने अपने दिल की बात कह दी है.लेकिन लड़का जब भी लड़की से ये तीन शब्द कहता,लड़की हमेशा बड़े विस्मय से उसके तरफ देखती, और उस समय उसके चेहरे का भाव भी कुछ इस तरह का होता की लड़के को एक पल ये भ्रम होता लड़की सब जानती है, उसके दिमाग में क्या चल रहा, वो कौन सी बात उससे छुपा रहा है और उसने वे तीन शब्द भी सुन लिए जिसे वो खुद भी नहीं सुन पाया था.लड़की जब उससे पूछती की उसने क्या कहा तो लड़का कुछ भी बहाना बना देता था.लेकिन उसे हमेशा लगता की लड़की को सब पता है..जबकि लड़की को कुछ भी पता नहीं रहता, ये मात्र उसका वहम था.

फिर कुछ साल गुज़रे, लड़की को अब लड़के की सभी बातें मालुम हैं और वो भी लड़के से प्यार करने लगी है...एक सर्दियों की शाम आई..वे पुराने दिनों की तरह ही सड़कों पे चल रहे थे, की अचानक लड़के को अपने उस खेल की याद आई.उसने फिर से गाड़ियों के शोर के बीच लड़की से 'आई लव यु' कहा.हमेशा की तरह लड़की ने जब उससे पूछा की उसने क्या कहा, तो लड़के ने इस बार जवाब में कहा "मैंने तुम्हे आई लव यु कहा".लड़की इस जवाब के लिए तैयार नहीं थी और एक पल तो उसे लगा की वो क्या करे..वो शरमाने लगी और बस एक 'धत्त' कह कर लड़के को अपने से अलग धकेल दिया..लड़के ने फिर उससे कहा - 'पता है पहले जब हम युहीं सड़कों पे घुमा करते थे तो मैं अक्सर ट्रैफिक के शोर में तुम्हे 'आई लव यु' कहता था, लेकिन तुम सुन नहीं पाती थी और मैं अपनी बेवकूफी पे खुश हो जाया करता था'.लड़की को अब समझ में ही नहीं आ रहा था की वो इस बात का क्या जवाब दे...इस बार वो कुछ भी नहीं कह सकी.'धत्त' भी नहीं, बस उसकी नज़रें नीची हो गयी, और चेहरा बिलकुल सुर्ख लाल.लड़के ने पहली बार उसका चेहरा शर्म से लाल होते देखा था.

Monday, March 12, 2012

आखिरी मुलाकात

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अभिनव और स्नेहा के बीच जो रिश्ता था उसे सबसे अच्छी तरह अभिनव की छोटी बहन रिया ही समझ सकती थी और शायद इसलिए जब दोनों को अलग होना पड़ा तो सबसे ज्यादा तकलीफ रिया को ही हुई थी.रिया की बहुत ईच्छा थी की वो स्नेहा से आखिरी बार मिल सके.एक हफ्ते पहले स्नेहा सिर्फ एक दिन के लिए शहर आई थी अभिनव से मिलने.रिया को जैसे ही ये खबर मिली की स्नेहा आने वाली है, उसने तय कर लिया था की उससे वो भी मिलेगी.लेकिन अचानक तबियत खराब हो जाने की वजह से रिया स्नेहा से नहीं मिल पायी.उस शाम जब अभिनव स्नेहा से मिल कर वापस आया तो चुप-चाप सा अपने कमरे में बैठा हुआ था.वो उदास भी था और खुश भी.उदास इसलिए था की ये स्नेहा से उसकी आखिरी मुलाकात थी, और खुश इसलिए था की ये आखिरी मुलाकात बेहद यादगार और खूबसूरत थी.जब से अभिनव घर आया, तब से ही रिया उससे स्नेहा के बारे में पूछना चाह रही थी, लेकिन उस शाम रिया ने अभिनव से कुछ नहीं पूछा.वो जानती थी की ये शाम अभिनव अकेले बिताना चाहता है.अगले सुबह जब रिया अभिनव के लिए चाय लेकर आई, तब उसका सबसे पहला सवाल स्नेहा के बारे में ही था.

अभिनव और रिया भाई बहन थे, लेकिन एक दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त भी और स्नेहा से जुड़ी लगभग हर बात अभिनव रिया को बताता था.स्नेहा से हुई मुलाकात के बारे में भी अभिनव ने रिया को सब कुछ बताया ..बातों ही बातों में अभिनव ने ये रिया को बताया की स्नेहा कुछ दिनों के लिए अपने नेटिव शहर जाने वाली है.चुकि स्नेहा का शहर कोई ज्यादा दूर नहीं था इसलिए रिया ये खबर सुनते ही स्नेहा के शहर जाने की जिद  करने लगी.अभिनव चाहता तो रिया की इस जिद को टाल भी सकता था, लेकिन शायद अंदर ही अंदर वो खुद भी चाहता था की स्नेहा से एक और मुलाक़ात हो.स्नेहा की ये ख्वाहिश भी थी की अभिनव उसके शहर आये और उसके साथ उसका शहर घुमे.अभिनव भी चाहता था की स्नेहा के जाने से पहले वो एक बार उसके शहर जाए..वो उस मोहल्ले को भी देखना चाहता था जहाँ की हर छोटी सी छोटी बात स्नेहा उसे बताया करती थी.अब रिया के जिद के वजह से ही सही, उसके सामने स्नेहा के शहर जाने का मौका था जिसे वो गंवाना नहीं चाहता था.

रिया और स्नेहा के बीच अच्छी दोस्ती भी थी तो रिया को उसके स्केजुल की पूरी खबर थी.लेकिन अभिनव और रिया दोनों में से किसी ने स्नेहा को कुछ भी नहीं बताया था, दोनों स्नेहा को एक ऐसा सरप्राईज देना चाहते थे जिसे वो उम्र भर याद रखे.तीन दिन बाद अभिनव और रिया स्नेहा के शहर पहुंचे..वे देर शाम वहाँ पहुंचे.अभिनव के एक दो परिचित उस शहर में रहते थे लेकिन उसने होटल में ही रुकना मुनासिब समझा.रिया शाम से ही स्नेहा से मिलने की जिद पकड़ बैठी थी, लेकिन अभिनव ने उसे समझाया और कहा की हम अगली सुबह ही उससे मिलने जायेंगे और पूरा दिन उसके साथ ही बिताएंगे.

अगले दिन सुबह जब दोनों स्नेहा के घर के लिए निकल रहे थे तो उन्हें होटल के मैनेजर से पता चला की आज पुरे शहर में चक्का जाम है.कहीं कोई भी सवारी नहीं मिलेगी.एक रिक्शा तक नहीं, नाही कोई प्राईवेट टैक्सी.मैनेजर ने अभिनव को सलाह दिया की आज होटल में ही रुक जाएँ.इधर रिया अभिनव को कोस रही थी की वो कल शाम ही क्यों नहीं स्नेहा के घर जाने को तैयार हो गया.अभिनव भी थोड़ा परेसान सा हो गया.उसे ये पता था की अगले दिन सुबह स्नेहा की फ्लाईट है और बस एक ही दिन उसके पास है.उसने स्नेहा का एड्रेस होटल मैनेजर को दिखाया तो मालुम चला की स्नेहा का घर होटल से करीब तीन-चार किलोमीटर की दुरी पे है.दोनों ने तय किया इतने दूर आकार वे खाली हाथ नहीं लौटने वाले,और दोनों स्नेहा के घर पैदल ही निकल गए.

होटल मैनेजर ने उन्हें स्नेहा के घर जाने का रास्ता अच्छे से समझा तो दिया था लेकिन फिर भी उन्हें काफी पूछताछ करनी पड़ रही थी.अभिनव मन ही मन सोच रहा था कितनी कन्फ्यूजिंग गलियां हैं और स्नेहा इन्ही गलियों की तारीफ़ किया करती थी.अभिनव और रिया दोनों बातें करते हुए जा रहे थे.बातें स्नेहा से ही सम्बंधित हो रही थी.अभिनव हमेशा स्नेहा से जुड़ी खट्टी-मीठी यादें रिया को बताते रहता था, और रिया भी इन बातों को सुन बहुत खुश होती थी.दोनों बातें करते करते बहुत दूर तक निकल आये थे.एक मोड़ पे पहुँचते ही सहसा अभिनव के पांव ठिठक गए.रिया ने मुड़कर उसे देखा,और पूछा क्या हुआ?रुक क्यों गए?अभिनव ने एक दुकान की तरफ इशारा करते हुए कहा - ये देखो, "बिस्वास स्वीट्स", यहाँ से अब स्नेहा का घर पास में ही है..इस दूकान के बारे में वो हमेशा बात करती थी..यहाँ के रसगुल्ले की वो खूब तारीफ़ करती थी..अभिनव वहीँ उसी दूकान के सामने कुछ पल खड़ा रहा, और मुड़कर रिया को कहता है, देखो सामने जो गली जाती है न, बस उसी में सबसे आखिर वाला मकान है उसका.

दोनों स्नेहा के घर के आगे खड़े थे.एक नज़र देखने से अभिनव को ऐसा लगा जैसे वो कई बार इस घर में आ चूका है.ये अलग बात थी की वो पहली बार यहाँ आया था.स्नेहा ने अपने घर और मोहल्ले के बारे में इतना कुछ बताया था की उसे हर चीज़ जानी-पहचानी सी लग रही थी.स्नेहा पहली मंजिल पे रहती थी.अभिनव को ये देख बेहद आश्चर्य हुआ की पहली मंजिल पर जाने वाली लोहे की घुमावदार सीढियां एकदम वैसी ही हैं जैसी उसके एक करीबी दोस्त के घर हुआ करती थी, लेकिन स्नेहा ने उससे आजतक कभी इन घुमावदार सीढ़ियों का जिक्र क्यों नहीं किया? जबकि स्नेहा ये अच्छे से जानती थी की अभिनव को घुमावदार लोहे की सीढियां हमेशा से अच्छे लगते हैं और उसे वो अपने दोस्त के घर की घुमावदार सीढ़ियों पर हुए कितने ही दिलचस्प किस्सों को सुनाया करता था.

रिया और अभिनव पहली मंजिल पर पहुंचे तो देखा की वहाँ एक बड़ा सा ताला लटका था.दोनों एक दूसरे को देखने लगे.रिया को बेहद आश्चर्य हुआ.उसने यहाँ आने से पहले कन्फर्म कर लिया था की स्नेहा आज के दिन घर में ही रहेगी.अभिनव ने कहा - हो सकता है की कहीं बाहर कुछ काम से गयी हो. रिया ने स्नेहा को कॉल किया,तो उसका मोबाइल भी बंद पड़ा था.अभिनव नीचे किरायेदार से पूछताछ करने उतरा.पता चला की स्नेहा अपने मामा के घर गयी हुई है और शायद वहीँ से वो वापस चली भी जायेगी.दोनों परेसान हो गए.उसके मामा का घर कहाँ था, ना तो उन्हें ये पता था और नाही स्नेहा का फोन लग रहा था.दोनों बेहद उदास, वापस जाने ही वाले थे की एकाएक अभिनव को याद आया की स्नेहा हमेशा अपनी एक सहेली "निवेदिता" का जिक्र करती थी, जो उसके किरायेदार की बेटी है.अभिनव ने स्नेहा से कहा की वो जाकर एक बार किरायेदार की बेटी को बाहर बुलाये.निवेदिता बाहर आई.वो अभिनव को देखते ही पहचान गयी.

निवेदिता से मालुम चला की स्नेहा के मामा की तबियत अचानक खराब हो जाने के वजह से वो दो दिन से अपने मामा के पास ही है और वो वहीँ से वापस भी चली जायेगी.निवेदिता ने कहा की स्नेहा की बहन का फोन नंबर उसके पास है, और वे चाहे तो उसे फोन कर के खबर कर सकती है.अभिनव ने निवेदिता को फोन करने को कहा.निवेदिता जैसे ही फोन लगाने जा रही थी की तभी अभिनव ने उसे रोका.अभिनव ने निवेदिता से आग्रह किया की स्नेहा को वो सिर्फ ये बताये की रिया अकेले आई हुई है.वो चाहता था की स्नेहा के सामने वो एकाएक जाए.निवेदिता ने स्नेहा को फोन किया और ठीक वैसा ही कहा जैसा अभिनव ने उसे कहने के लिए कहा था.स्नेहा ने जब ये सुना कि रिया अकेली आई है, तो एक पल तो उसे विश्वास नहीं हुआ.जब उसने रिया की आवाज़ सुनी तब जाकर उसे यकीन हुआ.स्नेहा ने फोन पर रिया को थोड़ा डांटा भी..की वो अकेले ऐसे क्यों आ गयी?रिया ने उसे बताया की कुछ जरूरी काम के सिलसिले में वो अपने चाचा के साथ आई थी और आज का दिन खाली था तो उसने सोचा की उससे मिल लूँ.स्नेहा ने पूछा की वो घर तक किसके साथ आई है, तो उसने कहा की उसके चाचा उसे यहाँ तक छोड़ गए थे.

स्नेहा ने रिया से कहा की आज तो उसका आना मुमकिन नहीं है, सवारी का कोई भरोषा नहीं और उसका भाई भी घर में नहीं है जो उसे वहाँ पहुंचा सके.स्नेहा ने निवेदिता से बात की.स्नेहा ने निवेदिता से कहा था की सामने जो ऑटो वाले मुखर्जी चचा रहते हैं,अगर वो घर पे हों तो वो रिया को स्नेहा के मामा के घर तक पहुंचा सकते हैं..निविदेता ने जाकर मुखर्जी चचा से बात की और वो जाने को राजी हो गए.रिया और अभिनव दोनों उस ऑटो-रिक्शे में बैठ गए.स्नेहा ने रिया से कहा था की सीधा उसके मामा के घर ही आ जाए,लेकिन रिया ने जिद की कहीं बाहर मिलने की.स्नेहा ने कहा की उसके मामा के एपार्टमेंट के ठीक सामने एक कॉफी शॉप है, वे वहाँ मिल सकते है.

अभिनव और रिया की सरप्राईज पर तो वैसे ही पानी फिर चूका था.ये सरप्राईज वैसा नहीं था जैसा उन्होंने सोचा था.शायद इसलिए भी अभिनव ने निवेदिता से कहा की वो बस रिया के आने की ही खबर स्नेहा को दे.शायद वो चाह रहा था की कम से कम एक स्ट्रोंग सरप्राइज तो स्नेहा को मिलना ही चाहिए.अभिनव ने रिक्शे वाले चचा से कहा की स्नेहा के मामा के घर वाली सड़क आने के पहले ही वो उसे बता दें ताकि वो पहले ही ऑटो से उतर जाए.अभिनव ने दूर से ही देख लिया की स्नेहा अपने अपार्टमेंट के गेट के बाहर खड़ी है.वो हरी साड़ी में थी और बेहद खूबसूरत दिख रही थी.इतनी दूर से भी अभिनव उसे अच्छे से देख पा रहा था.

जैसे ही रिया रिक्शे से उतरी स्नेहा ने उसे गले लगा लिया.बीच सड़क पे दोनों ऐसे गले मिल रही थीं जैसे वर्षों की बिछड़ी बहनें हों.दोनों पास वाले कॉफी शॉप में चली गयीं.अभिनव भी उस कॉफी के पास पहुंचा.अभिनव ने तो पहले सोचा की वो कॉफी शॉप के बाहर ही थोड़ी देर इंतज़ार करेगा, लेकिन उसने देखा की जहाँ रिया और स्नेहा बैठी हुई थी, उसके ठीक सामने वाली टेबल खाली थी और वो उसपर जाकर बैठ सकता था.वो स्नेहा के पीछे वाली टेबल थी और स्नेहा उसे देख नहीं पाती.अभिनव वहाँ जाकर चुपचाप बैठ गया.

स्नेहा रिया को बहुत सारी बातें बता रही थी..ऐसी बातें जो उसने शायद किसी से अब तक नहीं कही थी.परिवार की परेशानियाँ,मजबूरियां और उलझनें.रिया के दिल में भी बहुत सी बातें थी, जिसे वो स्नेहा से कह रही थी.अभिनव ने महसूस किया की रिया और स्नेहा दोनों बातें करते वक्त काफी भावुक हो गयीं और दोनों के शब्द अटक अटक कर बाहर आ रहे थे.

स्नेहा,रिया और अभिनव तीनो ये अच्छे से जानते थे की ये जो हालात हैं इसका जिम्मेदार कोई नहीं है लेकिन जो भी हुआ उससे इन तीनो की जिंदगी पे एक गहरा असर पड़ा.अभिनव को यूँ तो पता था की उसकी छोटी बहन उसे कितना प्यार करती है, लेकिन उसे अंदाजा बिलकुल भी नहीं था की वो अभिनव और स्नेहा को लेकर इस संजीदा बातें भी कर सकती है..रिया ने स्नेहा को बताया, की जब उसे पता चला की वो हमेशा के लिए अभिनव से दूर हो रही है, तो वो उस रात अपने कमरे में खूब रोयी थी.उसने स्नेहा से कहा की वो हमेशा उसे अपनी भाभी के रूप में ही देखती थी..इसलिए हमेशा उसने स्नेहा को "बी डॉट बी" कह कर बुलाया."बी डॉट बी" था तो एक तरह का मजाक ही लेकिन वो इसकी आदी हो चुकी थी और जब स्नेहा ने उससे रिक्वेस्ट किया की उसे इस नाम से ना बुलाये तो रिया को बहुत दुःख हुआ था.उस शाम वो बेहद उदास थी, और पूरी रात उसे नींद नहीं आई थी.रिया ने ऐसी कई बातें स्नेहा को बताई.रिया ने स्नेहा से कहा की अभिनव किसी से कुछ भी नहीं कहता.वो खुश रहता तो है, लेकिन उसे लगता है की ये बस बनावटी खुशी है, जो सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए है.

स्नेहा ने भी रिया को बहुत सी बातें बतायी.कुछ बातें ऐसी थी जिसे वो किसी से नहीं कह पायी थी,अभिनव से भी नहीं.लेकिन उसने वो सारी बातें उस दिन रिया से कह डाली..स्नेहा ने रिया से कहा की जब उसने सबसे पहले उसे "बी डॉट बी" कह के बुलाया था, तो पहले तो उसे कुछ समझ नहीं आया.उसे लगा की वो उसका मजाक उड़ा रही है, लेकिन जब रिया ने उसे बताया की "बी डॉट बी" का मतलब भाभी(BhaBhi) है, तो उसके आँखों में आंसू आ गए थे.स्नेहा ने रिया से कहा की वो एकमात्र ऐसी लड़की थी जिसने उसे भाभी कह के बुलाया था,और उसे बेहद खुशी हुई थी..उसका दिल झूम उठा था.वो "बी डॉट बी" के नाम में खुद को बेहद कम्फर्टेबल महसूस करने लगी थी, और उसे धीरे धीरे ये यकीन हो चला था की रिया युहीं उसे हमेशा "बी डॉट बी" बुलाते रहेगी..फिर जब वक्त ने करवट ली और उसे अभिनव से दूर जाना पड़ा तो उसे इस "बी डॉट बी" से चिढ़ सी होने लगी.ये नाम उसे परेसान करने लगा.तभी उसने रिया से कहा की इस नाम से उसे ना बुलाया करे.उस शाम जब उसने रिया से ये बात कही, तो वो भी काफी उदास थी और रात भर बेचैन रही.स्नेहा ने रिया से कहा - ये भी अजीब है न..हम दोनों दो अलग अलग शहरों में एक ही समय एक ही कारण से रात भर रोते रहे थे और दोनों में किसी को इस बात की खबर भी नहीं थी.

स्नेहा ने रिया से कहा की अभिनव हमेशा चुप रहता है और किसी से कुछ भी नही कहता.उसके दोस्त भी एक्का दुक्का ही हैं..और वो जल्दी किसी पे विश्वास भी नहीं करता.ऐसे में बस एक वही है जो उसे पूरी तरह संभाल सकती है.उसे अभी एक दोस्त की सख्त जरूरत है, जो उसे समझ सके,उसका दर्द बाँट सके और वो वैसे दोस्त की कमी बेतरह महसूस कर रहा होगा.जब तक वो थी उसके जिंदगी में, तब तक उसने उसे कभी किसी की कमी महसूस होने नहीं दी.लेकिन अब वो नहीं है और वो बेहद अकेला महसूस कर रहा होगा.स्नेहा ने रिया से कहा की अक्सर रातों में उसकी नींद इस सोच से टूटती है की अभिनव कैसा होगा..कहीं वो जाग तो नहीं रहा होगा?वो खुश होगा या उदास? स्नेहा ने कहा की ऐसी कई सारी बातें उसे हमेशा परेसान करती है.उसने कहा की जब भी वो किसी बुक-स्टोर जाती है तो अक्सर सोचती है की अगर अभिनव उसके साथ होता तो वो उसे हर किताब के बारे में विस्तार से बताता..चाहे उसे सुनना हो या न हो..वो कहता की देखो, ये किताब इन्होने लिखी है..इसमें ये खास बातें हैं..ये किताब उन्होंने लिखी है..वैगरह वैगरह..स्नेहा ने रिया से कहा - "अगर सच पूछो तो जब कभी मैं कोई बेवकूफी वाली हरकतें करती हूँ तो उस वक्त सबसे ज्यादा कमी अभिनव की ही महसूस होती है, एक वही तो था जो मेरी बेवकूफियों पर खूब हँसता था, मुझे चिढ़ाता था और कभी कभी मुझे बहुत डांटता भी था,और यही वो पल होते हैं जब मैं खुद को बेहद तनहा,उदास और टुटा हुआ सा पाती हूँ".ये कहते कहते स्नेहा की आवाज़ बिखर गयी.उसके आँखों से आंसू आ गए.पास बैठा हुआ अभिनव ये सब सुन स्तब्ध सा था.

अभिनव बहुत देर से खुद को रोके हुए था, लेकिन अब उसका खुद पे काबू कर पाना नामुमकिन था.उसने पीछे से स्नेहा के सर पर अपना हाथ रख दिया.स्नेहा अचानक से पीछे मुड़ी और कुछ पल उसके तरफ अविश्वास से देखते रही..

अभि....नव....अभिनव...ओह गौड अभिनव..इट्स यु...?? ओह शिट अभि..इट्स रिअली यु..

स्नेहा खुद को रोक नहीं पायी और उसके गले लग गयी.अभिनव की आँखें भी नम हो गयीं.कुछ पल वो अभिनव के बाहों में रही और फिर खुद को संभालते हुए कहती है - मुझे यकीन था की तुम भी रिया के साथ जरूर आये होगे और ये घटिया सा हर्ट-एटैक जैसा सरप्राईज देने का ख्याल भी तुम्हारा ही होगा...यु नो व्हाट..तुम बहुत गंदे हो..छुप छुप कर हमारी बातें सुन रहे थे...आई जस्ट हेट यु..गो अवे..

स्नेहा ने अभिनव को पीछे धक्का दे दिया.अभिनव ने प्यार से स्नेहा का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा की अगर मैं छुप छुप कर तुम्हारी बातें न सुनता तो मुझे इतनी प्यारी प्यारी मासूम बातें कैसे मालुम चलती?चलो अब अपने शहर की कॉफी पिलाओ..बड़ा अपना शहर का नाम जपते फिरती हो....स्नेहा मुस्कुराने लगी.

तीनो एक दूसरे को देख मुस्कुरा रहे थे.


कुछ देर तीनो खामोश रहे..बिना कुछ कहे,एक दूसरे को देखते हुए अपनी कॉफी खत्म की और देर शाम तक तीनो वहीँ बैठे रहे.तीनो के लिए ये एक यादगार मुलाकात थी.

अभिनव और रिया जब वापस जा रहे थे तो स्नेहा ने उनसे कहा - "तुम दोनों मुझे हमेशा याद रखना, अगर कभी मुझे भूले तो देख लेना..सपने में आकार मैं तुम दोनों के पुरे बाल नोच खाऊँगी" --- यही स्नेहा का मैजिक था..उसकी ऐसी बातें इंसान को गहरे उदासी से भी खींच ले आती थी, और फिर ये तो एक यादगार लम्हा था..जो हमेशा के लिए उनके दिलों में फ्रीज़ होके रह गया.

Sunday, January 22, 2012

वो लड़की जो खुश रहना जानती थी

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ऐसा तो नहीं था की उसने उससे खूबसूरत लड़की पहले नहीं देखी थी, लेकिन उसके चेहरे में जरूर कुछ ऐसा था जिससे उसकी नज़र उसके चेहरे से हटती ही नहीं थी.लड़की की मासूम भोली और अनोखी हंसी लड़के के दिल को एक अजीब सा सुकून देती थी.वो जब भी हँसती तो उसे वो दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की लगती.लड़की की हंसी से लड़के के आसपास की पूरी दुनिया खिल उठती थी.लड़का मन ही मन ये दुआ भी करता की लड़की बस ऐसे ही हँसती मुस्कुराती रहे, हमेशा.

लड़के और लड़की की प्रेम कहानी भी लड़की की हंसी की तरह ही एकदम अनोखी थी.दोनों अलग अलग देशों में रहते थे.अलग अलग देशों में रहते हुए भी दोनों के बीच एक अटूट रिश्ता था.कभी कभी तो दोनों को ऐसा लगता की दोनों में कुछ भी दूरियां नहीं हैं और दोनों हर पल साथ हैं.ऐसा नहीं की शुरू से ही दोनों में इतनी दूरियां थी.दोनों पहले एक ही शहर में रहते थे.लड़का का वो शहर अपना था, और लड़की कुछ समय के लिए उस अजनबी शहर में रहने आई थी.पता नहीं कैसे दोनों में दोस्ती हो गयी, और दोस्ती हुई भी तो ऐसी की आसपास के लोग लड़के-लड़की की दोस्ती से जल-भून जाते.जब तक लड़का और लड़की एक ही शहर में रहे, तब तक लड़के ने लड़की से कुछ नहीं कहा.लड़की हमेशा उसे अपना सबसे अच्छा दोस्त समझती रही और लड़का उससे दीवानों की तरह मोहब्बत करता था.कुछ अनचाहे कारणों की वजह से जब लड़की को विदेश जाना पड़ा तब भी लड़का उससे कुछ नहीं कह सका.फिर एक समय ऐसा आया की लड़के ने लड़की से अपने प्रेम का इजहार किया, इजहार भी लड़की की हंसी के जैसा ही अनोखा था.लड़की एक हाँ के सिवाय कुछ भी नहीं कह सकी.जब से दोनों के बीच इजहार-इकरार हुआ तब से दोनों कभी साथ नहीं रहे.जब कभी लड़की अपने वतन लौटती तब दोनों की मुलाकात हो पाती.लड़के ने जब से लड़की से अपनी दिल की बात कही तब से अब तक छः साल हो चुके हैं और इन छः सालों में दोनों की मुलाकात सिर्फ बत्तीस दिन हो पायी.बत्तीस दिनों में दोनों बस पचपन घंटे ही एक दूसरे के साथ रहे.

लड़के को लड़की की बहुत सी बातें विचित्र सी जान पड़ती.सबसे पहले तो लड़की की हंसी.लड़के को लगता की लड़की के हंसी के पीछे कोई बहुत गहरा रहस्य छिपा है, जिसे कभी कोई जान नहीं सकता.खुद वो लड़की भी नहीं.लड़के को अक्सर ये भ्रम भी होता की लड़की तितलियों और चीटियों से बातें करना जानती है.लड़के ने कितनी ही बार लड़की को उनसे बातें करते देखा है.लड़की खुश रहती थी, बहुत खुश..इतना की लड़का भी ये सोचता की कोई भी इंसान इतना खुश आखिर कैसे रह सकता है.लड़की हमेशा कहती की "इतना खुश रहो की आसपास वाले तुम्हे देख के जल-भून जाए की आखिर कोई इतना खुश कैसे रह सकता है".लड़की की बातें भी लड़की के हंसी के जैसी ही अनोखी और जुदा थी.लड़की कहा करती थी की 'इंसान को कभी उदास नहीं रहना चाहिए.उदास रहने से चेहरा भी मुरझा जाता है और इंसान की खूबसूरती भी नहीं रहती.इंसान को हमेशा खुश रहना चाहिए, खुश रहने से चेहरा खिला खिला सा लगता है'.

लड़के के जब संघर्ष के दिन चल रहे थे और कुछ लोगों के बर्ताब ने उसे एकदम निराश और हताश कर दिया तब गिने चुने चार पांच लोग ही थे जो लड़के को हौसला देते रहे.उनमे से एक वो लड़की थी.लड़का दिन भर अपने घर में चुपचाप रहता, और शाम को बाहर निकलता.जिस शाम लड़के को काम नहीं भी रहता, उस शाम भी वो निकलता, सिर्फ उस लड़की से मिलने के लिए.रोज लड़की से एक घंटे की मुलाकात लड़के के दिल को तसल्ली देती की सब ठीक हो जाएगा.शाम के वो पल लड़के के सबसे खूबसूरत पल होते थे और उसे हर शाम लगता की ये पल यहीं ठहर जाए, बस वो लड़की की आँखों में, उसकी बातों में कहीं खो जाए.वो सारी दुनिया से बेखबर हो जाता, अपनी सारी तकलीफ और दर्द को पीछे छोड़ वो एक बहुत ही खूबसूरत सी दुनिया में चला जाता.

लड़की भी लड़के का बहुत ख्याल रखती.लड़के को लगता की लड़की बिलकुल उसकी माँ की तरह उसका ख्याल रखती है.लड़के के खर्चे से लेकर उसकी पढ़ाई तक का हर हिसाब लड़की रखती.लड़की जहाँ देखती की लड़का फ़ालतू के चीज़ों में अपनी पॉकेट मनी उड़ा रहा है तो वो नाराज़ हो जाती और लड़के को खूब डांटती.लड़के को हमेशा ये लगता की उसके दो गार्डीअन हैं.घर में उसकी माँ और बाहर वो लड़की.शायद इसी वजह से जब कुछ सालों बाद लड़का पढ़ाई के लिए दूसरे शहर गया तब वो एकाएक बहुत अकेला सा हो गया.ना तो उसकी माँ उसके साथ थी और नाही वो लड़की.

लड़के ने लड़की को हमेशा खुश ही देखा.दुःख के मौसमों में भी लड़की के चेहरे पे मुस्कान सदा बनी रही.लेकिन कुछ ऐसी परिस्थितियां भी आयीं की लड़की की हंसी एकदम गायब हो गयी.लड़का तब बड़ा चिंतित हो गया.उसने कभी लड़की को दुखी नहीं देखा और जब एक दिन लड़की को उसने उस हालत में देखा तो अंदर ही अंदर टूट सा गया.वो उस दिन खूब रोया भी.उसके मन में सिर्फ एक ही ख्याल आया की भगवान को अगर दुःख ही देना था तो उसे देते, उस बेचारी लड़की को क्यों?लड़का उस दिन को कभी नहीं भूल सकता जब उसने पहली बार लड़की की उदास आँखें देखी थी जब पहली बार लड़की उसके कंधे पर सर रख कर रोई थी.

लड़के और लड़की अब भी एक दूसरे से बहुत दूर रहते हैं और अब तो दोनों एक दूसरे से बात भी नहीं कर पाते.ऐसे में अक्सर शामों में या फिर बारिशों में या फिर जाड़ों की गुनगुनी धुप में लड़के को लड़की की हंसी अचानक से याद आ जाती है और सड़कों पर चलते चलते वो अचानक मुस्कुराने लगता है, गुनगुनाने लगता है..बाकी लोगों से बेफिक्र, बेपरवाह..कभी किसी अजनबी लड़की की नीली जूतियों,पीले दुप्पट्टे या लंबे बालों पर लड़के की नज़र जाती है तो उसे वो लड़की बेतरह याद आ जाती है.लड़के को तो लड़की को याद करने के बस बहाने चाहिए होते हैं और वो उसे बड़े आसानी से मिल भी जाते हैं.आसपास के लोग अक्सर लड़के की हरकतों से उसे कोई दीवाना समझते हैं लेकिन लड़के को इस बात की ज़रा भी फ़िक्र नहीं है, वो तो बस यादों के मौसम में डूबे रहने के और उस लड़की को याद करने के बहाने खोजता फिरता है जो खुश रहना जानती थी.

   | जब तू मुस्कुराती है, बिजली भी शरमाती है
     पलकें जब उठाती है, दुनिया ठहर जाती है..