Saturday, September 6, 2014


मुझे लगता है कि बहुत सालों बाद भी जब भी दिल्ली या दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित कॉफ़ी हाउस का जिक्र होगा, मुझे तुम्हारी वो तमाम चिट्ठियाँ याद आएँगी जो यहाँ बैठकर तुम्हें मैं लिखा करता था, या फिर तुम्हारी लिखी वो तमाम चिट्ठियाँ जो यहाँ बैठकर मैं पढ़ा करता था. बीच के कुछ सालों में ईमेल, चैट और फ़ोन की आदत लगने की वजह से हम दोनों ने चिट्ठी लिखना एक दूसरे को लगभग बंद ही कर दिया था. तुम्हें फिर से चिट्ठी लिखने का सिलसिला भी इसी कॉफ़ी हाउस से शुरू था.

जिस ख़त से तुम्हें फिर से मैंने चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, वो तुम्हारे जन्मदिन पर लिखा एक बेहद लम्बा खत था, जिसे लिखने में मुझे तकरीबन तीन घंटे का वक़्त लग गया था. यहीं इसी कॉफ़ी हाउस से बैठकर तुम्हें वो खत लिखा था मैंने. अरसे बाद किसी को मैंने वैसा लम्बा खत लिखा था. लम्बे खत लिखने की आदत हम दोनों को तब से थी जब हम एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. मजेदार बात ये थी कि दोनों का लम्बे खत लिखना बंद होने की वजह और फिर इस आदत के शुरू होने की वजह एक ही थी. हम दोनों के कुछ ख़ास अपनों ने ही हमारी लम्बी चिट्ठी लिखने का अकसर मजाक उड़ाया, जिससे चिढ़ कर हम दोनों ने ही लोगों को लम्बे खत लिखने बंद कर दिए थे. तब हम दोनों एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. लम्बे खत फिर से लिखने की वजह हम दोनों ही बने एक दूसरे के लिए. तुम्हारे वजह से मैं लम्बे खत लिखने लगा था और मेरी वजह से तुम. हम दोनों की ये भूली हुई आदत फिर से लग गयी थी, यूँ  लम्बे खत लिखने की. तुमने एक खत में ये लिखा भी था न, और कितना सही लिखा था तुमने. तुमने कहा था - “देखो तो, मौका पाते ही पुरानी आदतें  उभर आती हैं...है न?? और आदत भी इतनी खूबसूरत. लम्बे खत लिखने की...” 

जानती हो, तुमने जिस खत से दोबारा चिट्ठी लिखनी शुरू की थी, उस खत को मैंने इसी कॉफ़ी हाउस में बैठकर पढ़ा था. वो लम्बी चिट्ठी तुम्हारी दरअसल चिट्ठी नहीं बल्कि रोचनामचे टाइप की चिट्ठी थी, एक डायरी जैसा था वो...हर दिन कुछ न कुछ जोड़ा था तुमने उस चिट्ठी में और तब मुझे भेजा था तुमनें. मैं कॉफ़ी हाउस में ही बैठकर वो चिट्ठी पढ़ रहा था, लेकिन मुझे क्या पता था उस दिन कुछ ऐसा होगा मेरे से जिसकी उम्मीद खुद मैंने भी नहीं की थी. चिट्ठी पढ़ते वक़्त कुछ ऐसा मैं कर गया था, जानबूझकर नहीं बल्कि अनजाने में ही मेरे से वो हो गया था. अपनी  उस हरकत पर मैं बड़ा शर्मिंदा सा हो गया था. 

कॉफ़ी हाउस में बैठा मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था. एक हाथ में तुम्हारी चिट्ठी थी और एक हाथ से मैं सांभर वड़ा खा रहा था. तुम्हारी चिट्ठी पढ़ते वक़्त मैं किसी और ही दुनिया में चला जाता हूँ, बाकी कुछ भी ध्यान नहीं रहता मुझे. उस शाम भी मुझे बिलकुल ध्यान नहीं रहा था कि मेरे प्लेट में वड़ा रखा है जिसे मैं चम्मच से काट कर खा रहा हूँ. मेरा सारा ध्यान तुम्हारी चिट्ठी के ऊपर था, तभी पता नहीं कैसे वड़ा काटते हुए मेरे हाथ से चम्मच फिसल गया, और वड़ा का एक टुकड़ा सीधा उछल कर सामने वाले टेबल पर रखे प्लेट में जा गिरा. दो बुजुर्ग व्यक्ति बैठे हुए थे उस टेबल पर. मेरे तो होश उड़ गए थे. ये क्या हो गया मुझसे. मैं समझ गया था, आज अच्छी खासी बात बेवजह सुननी पड़ जायेगी. लेकिन वो दोनों बुजुर्ग बड़े मीठे स्वभाव वाले व्यक्ति थे. उन्होंने गुस्से से नहीं बल्कि मुस्कुराकर बड़े प्यार से कहा, “कोई बात नहीं बेटा, बस थोड़ा ध्यान रखा करो...”. उन्होंने तो बुरा नहीं माना लेकिन मेरे अन्दर हद दर्जे की एम्बैरेसमेन्ट फील आने लगी थी. मैं झटपट वहाँ से उठा और सीधा कैफे के बाहर आ गया. 

ऐसा मेरे साथ अकसर होता है, खासकर जब भी तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा होता हूँ मैं या फिर तुम्हारे ईमेल्स या मेसेज. कितनी ही बार मुझे ऐसे एम्बैरेसमेन्ट का सामना करना पड़ा है. वैसे मैं इसे एम्बैरेसमेन्ट नहीं बल्कि `स्वीट एम्बैरेसमेन्ट' कहता हूँ. मुझे उस वक़्त बड़ी हँसी सी आती है खुद पर. कॉफ़ी हाउस की ये घटना पहली घटना नहीं थी, एक और दिलचस्प किस्सा तब हुआ था, जब तुम्हारी ही लिखी एक चिट्ठी मैं यहाँ पढ़ रहा था, इसी कॉफ़ी हाउस में. 

उस शाम काफी भीड़ थी कॉफ़ी हाउस में. कुछ बुजुर्ग लोग एक लम्बे टेबल पर बैठे थे. बैठने की कहीं और जगह नहीं देखकर मैंने वहाँ बैठे लोगों से इजाज़त ली और उनके टेबल पर ही एक कोने में बैठ गया. मेरे बगल में बैठे बुजुर्ग अपनी टोली के साथ बातों में मगन थे और मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ने में. पास वाले बुजुर्ग ने एक प्लेट पकौड़ियाँ मँगवाई खाने को. वो पकौड़ियाँ मेरे हाथों के पहुँच के दायरे में थीं. मैं तुम्हारी चिट्ठी पढ़ रहा था, और पढ़ते वक़्त ये भी ख्याल नहीं रहा कि मैंने सिर्फ कॉफ़ी आर्डर की है. मैं पास बैठे अंकल के प्लेट से पकौड़ियाँ लेकर बड़े इत्मिनान से खा रहा था. तीन चार पकौड़ियाँ मेरे पेट के अन्दर चली गयीं थी तब मुझे एकाएक ख्याल आया, ये मैं क्या कर रहा हूँ. बगल वाले अंकल मेरा ये गिल्ट भांप गए, और वो एकाएक हँसनें लगे. “कोई बात नहीं बेटा, हो जाता है. अब जब खा ही रहे हो, तो रुक क्यों गए, खाओ न..और आ जायेंगे”. उन्होंने कहा. लेकिन मैं इतना शर्मिंदा हो गया था, कि उनसे माफ़ी मांगी मैंने और तुरंत फिर वापस चला आया था.

सच में मुझे हैरत होती है कि मैं ऐसी हरकतें कैसे करने लगता हूँ. तुम्हें पता है न कितना डिसिप्लिन्ड पसंद व्यक्ति हूँ मैं. किसी से बात करने से लेकर सड़क पर चलने तक, गाड़ी चलाने तक हर बात कायदे से करने की आदत है मुझे. खोया खोया नहीं रहता सड़क पर चलते वक़्त. चिढ होती है जब देखता हूँ कोई मोबाइल में आँख गड़ाए सड़क पर चले जा रहा है. ऐसे लड़के या लड़कियों से कितना चिढ़ता था मैं, ये तुम जानती ही हो. लेकिन क्या ये पता है तुम्हें, जब मेरे पास नया स्मार्टफोन आया था, तो मैं भी अकसर ऐसे ही हरकतें कर दिया करता था. एक दो बार इन हरकतों की वजह से भी मुझे थोड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है. जैसे एक शाम का एक किस्सा है. 

मैं अपने भैया के साथ अपने मोहल्ले के मार्केट के किनारे बने पेवमेंट पर चल रहा था. वो पेवमेंट समतल नहीं थीं, कहीं ज्यादा स्लोप तो कहीं बिलकुल ऊँचा. ऐसी हालत उस पेवमेंट की थी. तुमने मुझे कुछ जरूरी मेसेज भेजे थे फेसबुक पर, मोबाइल पर फेसबुक का मेसेज टोन सुनाई दिया और मैंने झट से अपना मोबाइल पॉकेट से निकाला और चलते हुए ही मेसेज पढ़ने लगा. मेरा ध्यान चलने पर कम और तुम्हारे मेसेज पर ज्यादा था. यूँ कहो कि मेरा सारा ध्यान मेसेज पढ़ने पर ही था. जाने कहाँ से मेरा पैर फिसला, किस चीज़ से टकरा गया था मैं, मेसेज पढ़ते हुए ही, मोबाइल हाथ में लिए सड़क पर मैं फिसल गया, धम्म से नीचे गिरा सड़क पर. भैया आगे आगे चल रहे थे. उनके पीछे मुड़ने से पहले ही मैं झट से उठ गया, हाथ पैर झाड़ कर मैं उनके साथ हो लिया. चोट तो मुझे नहीं लगी थी लेकिन अपने मोहल्ले में गिरना, ऐसी जगह जहाँ आसपास के दुकान वाले मुझे अच्छे से जानते हैं, मुझे शर्मिंदा कर गया. ज्यादा शर्मिंदगी मुझे अगले दिन हुई थी, जब मार्केट के कोना पर चाट बनाने वाले लड़के ने पूछ दिया था मुझसे “भैया आप कल गिर गए थे...चोट तो नहीं लगी  थी आपको ज्यादा?” उस दिन के बाद लेकिन मैंने तय किया था कि अब कभी राह चलते हुए ऐसे मोबाइल का प्रयोग नहीं करूँगा मैं. उसके बाद से तुम्हारे मेसेज मुझे यूँ मिलते भी हैं, तो मैं सड़क के किनारे खड़ा होकर मेसेज पढ़ लेता हूँ लेकिन चलते हुए मेसेज करना उस दिन के बाद से मैं भूल ही गया.

जाने कितने सारे इस तरह के किस्से हैं मेरे. जाने कितनी बार अजीब अजीब हरकतें मेरे तरफ से हुई हैं. एक दिलचस्प किस्सा है, एक दिलचस्प से दिन का. मेरे लिए ये किस्सा एक यादगार किस्सा इसलिए भी है कि इसमें तुम भी हो. तुम्हें तो याद होगा ही वो दिन न जब कश्मीरी गेट बस अड्डे पर तुमसे मिला था मैं? 

दरअसल हम मिले नहीं थे उस दिन. बस एक दूसरे को दूर से ही देखे थे. बस एक घंटे के लिए तुम दिल्ली आई थी, तुम्हारी बस थी दोपहर में अम्बाला के लिए, और मैं तुमसे मिलने, बस तुम्हें एक झलक देखने के लिए बस स्टैंड आ पहुँचा था. तुम्हारे कुछ रिश्तेदार तुम्हारे साथ थे, वही कुछ रिश्तेदार जिनकी वजह से मुझे और तुम्हें जाने कितनी परेशानियों से गुज़ारना पड़ा था, वही कुछ रिश्तेदार जिनके वजह से हमने तय किया था कि उस दिन एक दूसरे के सामने नहीं आयेंगे हम. मैंने तुम्हें पहले से निर्देश दे तो दिए थे, कि मैं कहाँ पर खड़ा रहूँगा. तुम बस नज़रें उठा कर मेरी तरफ देख लेना, और यदि मौका मिला तो हम एक दूसरे के पास से गुज़रते हुए एक दूसरे को ‘हेल्लो’ भी बोल सकेंगे. लेकिन फिर भी तुम घबराई हुई थी. तुम्हारे मन में ये डर था, कहीं मुझे तुम्हारे रिश्तेदारों ने वहाँ बस स्टैंड पर देख लिया, तो बेवजह कहीं कुछ बात न बढ़ जाए. लेकिन मैंने तुम्हें आश्वस्त किया था कि मैं इन्विज़बल रहने में उस्ताद हूँ. तुम्हारे सिवा मुझे कोई नहीं देख पायेगा, इसकी जिम्मेदारी मेरी. तुम मेरे इस बात से निश्चिंत हो गयी थी. जैसा कि हमने तय किया था, उस दिन सभी कुछ वैसा ही हुआ था. हमनें दूर से ही एक दूसरे को देखा था, तुम मुझे देख कर मुस्कुराई थी उस दिन. मन में लेकिन हम दोनों के एक खलिश रह गयी, कि इतने करीब होने के बावजूद, कुछ मीटर की दूरी पर ही हैं हम दोनों और एक दूसरे से मिल नहीं सकते, बात नहीं कर सकते. लेकिन मन की इस एक चुभन के बावजूद हम दोनों बेहद खुश थे. हम दोनों ने एक दूसरे को देखा था, और हमें किसी ने नहीं देखा एक दूसरे को देखते हुए. हम दोनों दूर से ही एक दूसरे को देखकर खुश थे. 

कुछ देर बाद तुम्हारी बस अम्बाला के लिए रवाना हो गयी. तुम्हारे जाने के बहुत देर बाद तक मैं बस स्टैंड के उस प्लेटफोर्म पर बैठा रहा था जहाँ से तुम्हारी बस अम्बाला के लिए निकली थी. एक तो मैं तुम्हारे ख्यालों में गुम था, और दूसरा ये कि हर बार जब भी तुम मेरे सामने आती हो, जाने क्या हो जाता है मुझे, एक नशा सा छा जाता है आँखों पर. उस दिन भी शायद तुम्हारा ही नशा आँखों पर छाया हुआ था, शायद इसलिए मैं प्लेटफोर्म पर लगे एक बड़े से शीशे से जाकर टकरा गया था. हाँ, उस दिन यही हुआ था. कश्मीरी गेट बस अड्डे के प्लेटफोर्म से एक्जिट करने के लिए बेसमेंट में बने वेटिंग हॉल से गुज़रना पड़ता है. वेटिंग रूम में बड़े से शीशे के दरवाज़े बने हुए हैं, और मैं जाने तुम्हारे किन ख्यालों में गुम था, कि सीधा जाकर उस शीशे के दरवाज़े से ही मैं टकरा गया था, और जोर से टकराया था मैं. मेरे दरवाज़े से टकराने के साथ ही कुछ लोगों की निगाहें मुझपर उठ गयी थीं. कुछ की दबी सी हँसी भी निकल आई थी. मैं चुपचाप वहाँ से खिसक लिया, बाहर जब आया, तो खुद पर बेहद हँसी आ रही थी. मैं कैसे ऐसे टकराने लगा हूँ चलते हुए, लड़खड़ाने लगा हूँ चलते हुए...सच में बड़ा तगड़ा हैंगोवर होता है तुम्हारा मुझपर. 

ऐसे जाने कितने और किस्से मेरे साथ होते ही रहते हैं और हर बार ऐसे किस्से या ऐसे हादसों के बाद मैं तुम्हें मन ही मन गरिया भी देता हूँ, “बदतमीज़ लड़की, फिर से मुझे एम्बैरस करवा गयी”. लेकिन इन सब बातों के बावजूद, तुम्हारे ऊपर या तुम्हारी यादों के ऊपर या खुद के ऊपर कभी गुस्सा नहीं बल्कि हँसी आती है.. मैं बस मुस्कुरा देता हूँ ऐसे स्वीट एम्बैरेसमेन्ट पर.

स्वीट एम्बैरेसमेन्ट

Wednesday, August 27, 2014


मेरे साथ अकसर रातों में ऐसा होता है, किसी सपने के वजह से आधी रात में नींद टूट जाती है, और मैं एकदम हड़बड़ा के उठ बैठता हूँ. नींद टूटने के बाद कुछ पल के लिए तो मुझे पता भी नहीं चल पाता कि मैं कहाँ हूँ, किस कमरे में हूँ, किसके घर में हूँ, किस शहर में हूँ? जब पूरे होश में आता हूँ तो समझ आता है कि मैं दिल्ली के अपने कमरे में हूँ. ऐसा सिर्फ रातों में ही नहीं होता, दोपहर को भी जब कभी थका हुआ सो जाता हूँ और नींद खुलती है तो कुछ पल के लिए मैं पहचान ही नहीं पाता अपने इस कमरे को. मैं बड़े हैरानी से सामने की मेज, कुर्सी, टीवी, किताबों को देखता हूँ. सब चीज़ों को मैं इस तरह देखता हूँ जैसे इनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं, कुछ पल के लिए लगता है मैं किसी अजनबी के कमरे में आ गया हूँ, ये सब...ये कमरा ये घर असली नहीं है, ये बस एक भ्रम है. असली तो मेरा घर है, मेरे शहर का मेरा वो घर. मन बड़ा बेचैन हो जाता है. बहुत से ख्याल आने लगते हैं, मेरा ये घर नहीं तो मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्यों अब तक रुका हुआ हूँ मैं इस शहर में और शहर के इस घर में, जो मुझे अजनबी सा लग रहा है? जो भी सोच कर आया था इस शहर, क्या मैंने वो पा लिया ? नहीं. तो फिर क्यों मैं यहाँ अब तक टिका हुआ हूँ. रात की आधी नींद में आधे होश में ये सारे सवाल हमेशा परेशान करते हैं मुझे. सिर्फ मेरे साथ ही नहीं, शायद घर से बाहर रह रहे अधिकतर लोगों के साथ ऐसा होता होगा, खासकर उन लोगों के साथ जो कुछ सपने लेकर दूसरे शहर आये थे और वो उन सपनों को पूरा नहीं कर पायें. उस वक़्त वापस घर लौटने की बात दिमाग में बहुत तेज़ी से घूमने लगती है, लेकिन मैं उस बात को मन के किसी भीतरी कोने में धकेल देता हूँ. मन के अन्दर से आवाज़ आती है, कि तुम बेवकूफी कर रहे हो, किस चीज़ का इंतजार है तुम्हें अब? जो तुम्हें चाहिए था वो अब तक नहीं मिला, और कितना इंतजार करोगे तुम? जाओ वापस लौट जाओ. मैं मन की इन आवाजों को अनसुना कर देता हूँ. शायद एक बार घर छूट जाने के बाद वापस लौटना आसान नहीं होता. हाँ, घर लौटना आसान होता भी होगा, लेकिन उन लोगों के लिए जो जिस मकसद से घर से दूसरे शहर आये थे, उन्होंने वो मकसद पूरा कर लिया हो. लेकिन मेरे जैसे लोगों के लिए घर लौटना आसान नहीं होता. यूँ खाली हाथ वापस लौटना कोई चाहता भी नहीं.

अब ये सोचना भी अब मुश्किल लगता है कि जब ग्यारह-बारह साल पहले मैं अपने शहर से निकला था पढ़ाई के लिए दूसरे शहर, तो मेरे पास मात्र दो बैग थे, और अब देखता हूँ इस घर में मैंने कितना सामान इकट्ठा कर रखा है. हैरानी होती है कि मैंने कितना कुछ जमा कर लिया है घर में. हॉस्टल का वो कमरा याद आता है, जहाँ सबसे पहले मैं रुका था. सरस्वती माँ, हनुमान जी की मूर्तियाँ, कुछ कपड़े, कुछ किताबें और मेरा एक टेपरिकॉर्डर, इनके अलावा मेरे हॉस्टल रूम में कुछ भी नहीं था. और उस समय से लेकरं अब तक ऐसा लगता है कि मैंने एक दूसरा घर बसा लिया है यहाँ. बहुत से लोगों को ये नार्मल लगता होगा, लेकिन मुझे हैरानी होती है, पता नहीं क्यों किस बात कि हैरानी. घर से निकले ग्यारह-बारह साल हो गए, और पता भी नहीं चला? वक़्त ऐसे ही तो बीतता है, नहीं...बीतता वक़्त नहीं, बीतते हम लोग हैं. 

बारह साल पहले जब मैं दूसरे शहर आया था तो जाने क्या क्या मन में सोचा था. आँखों में जाने कितने सपने लिए हुए मैं चला था घर से. क्या हुआ उन सपनों? कुछ भी पता नहीं चल पाया. कैसे और क्यों वो इस कदर बेरहमी से टूट गए या कहूँ कि कुचले गए. मैं ये भी नहीं जानता. कुछ तो मेरी गलती रही थी और कुछ वक़्त और दोस्तों की मेहरबानी थी. बारह साल पहले दूसरे शहर में आया था, तब कुछ और बेशकीमती चीज़ें मेरे साथ थीं, जब मैं घर से चला था...जो तुमने मुझे दिया था....कुछ चिट्ठियाँ, तुम्हारे बेक किये हुए बिस्कुट, तुम्हारे दिए तोहफे जिनसे मेरा बैग भरा था, तुम्हारा प्यार और तुम...तुम मेरे साथ थी मेरे पास थी, जब मैं चला था अपने घर से दूर. क्या कहा था तुमने उस शाम जिस शाम मुझे जाना था. याद है? तुमने कहा था, तुम मुझसे दूर नहीं जा रहे, बल्कि मुझे पाने के लिए तुम पहला कदम उठाने जा रहे आज. आज सोचता हूँ तो लगता है जो भी मैं अपने साथ लेकर बारह साल पहले चला था किसी दूसरे शहर, सब कुछ तो छूट गया पीछे... तुम्हारा साथ, तुम्हारा प्यार.. सब कुछ जाने कहाँ पीछे छूट गया. इतने सामान मैंने इन बारह सालों में जमा कर लिए हैं, लेकिन फिर भी लगता है अकसर कितना खाली सा हो गया हूँ मैं. 

रातों को नींद में अकसर मुझे आवाजें सुनाई देती है, लगता है तुम मेरे से बातें कर रही हो. जैसे उस रात हुआ था. हुआ कुछ भी नहीं था, लाइट कटी हुई थी, और मैं सोया हुआ था. खिड़की खुली थी, मुझे जाने क्यों ऐसा भ्रम होने लगा कि तुम उस खिड़की के पास खड़ी हो, और मेरे लिए वही गाना तुम गा रही हो जो तुम अकसर गुनगुनाती थी.. “लग जा गले...”. मैं बिस्तर पर ही आँखें बंद किये लेटे रहा था. ये पागलपन है, लेकिन फिर भी जाने क्यों उस रात मुझे ये पक्का यकीन था, कि तुम कमरे में मौजूद हो, और ये डर भी था कि मैं जैसे ही अपनी आँखें खोलूँगा, तुम गायब हो जाओगी. और इसी डर से मैं अपनी आँखें नहीं खोल रहा था. तुम्हारी आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी, तुम्हारे कमरे में होने का एहसास था मुझे. लेकिन उस एहसास को टूटना था, वो टूट गया. अचानक से लाइट आई, और मेरी आँखें ना चाहते हुए भी खुल गयीं. कमरे में होने का तुम्हारा वो एहसास और तुम्हारी आवाज़ गायब हो गयी थी.

मुझे हमेशा ऐसा लगता है, जब भी मैं अकेले घर में रातों को रहता हूँ, तुम चुपके से मेरे पास आ जाती हो. मेरे से बातें करती हो, एक परछाई की तरह मेरे साथ साथ चलती हो. मेरे पूरे घर पर एक अधिकार सा जमा लेती हो. अकेले घरों में रहने पर शायद यूँ ही यादें परछाईं बनकर हमारे पीछे पीछे चलने लगती हैं. उनको रोकने वाला कोई नहीं होता. कोई बाउंड्री नहीं होती कि उन यादों को उन परछाइयों को रोक सके. वो परछाइयाँ तुम्हारे साथ रहती हैं, तुम उठते हो, बैठते हो, सोते हो, वो तुम्हारे साथ ही घर में मौजूद रहती हैं. तुम्हारे अलावा और कोई घर में होता है, तो ये परछाई भी दूर भाग जाती हैं, लेकिन जैसे ही तुम अकेले होते हो, ये परछाईं फिर से तुम्हारे साथ हो जाती हैं. कितनी बार सीढ़ियों पर, बालकनी पर खड़े होकर मैंने तुमसे बातें की हैं, बस तुम्हारे पास होने का एहसास भर होता था...कि तुम मेरे साथ खड़ी हो. जैसे उस रात हुआ था, मैं देर तक सो नहीं सका था...उठ कर अपने घर के बालकनी के पास आ गया, मुझे जाने क्यों ये भ्रम होने लगा कि तुम भी मेरे पास आकर खड़ी हो गयी हो. कितनी ही बातें की थी मैंने तुमसे. लोगों को ये बातें कहो तो तुम्हें पागल कह कर तुम्हारी बातों को हँसी में उड़ा देंगे. लेकिन मेरे साथ ऐसा ही होता है, तुम यूँ हीं मेरे साथ रहती हो हमेशा. 

आधी रात का ही वो वक़्त भी होता है जब मुझे अजीब अजीब सपने भी आते हैं. उन सपनों का अर्थ क्या है ये मैं कभी समझ नहीं पाता. एक बार देखा था तुम्हें सपने में. मैं एक पुल पर खड़ा था. तुम पुल के दूसरे तरफ खड़ी थी. और वो पुल बीच से टूटा हुआ था. तुम तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं नज़र आ रहा था. नीचे गहरी खाई थी और मैं सोच रहा था कि मैं किसी भी तरह तुम्हारे पास पहुँच जाऊँ, लेकिन कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था. दूसरे तरफ से तुम्हारी घबराई हुई आवाजें सुनाई दे रही थीं. तुम रो रही थी. मुझे अपने पास बुला रही थी. तुम कह रही थी... आ जाओ वरना मुझे सब ले जायेंगे हमेशा के लिए... तुमसे बहुत दूर. मैं नीचे उतरने की कोशिश करता हूँ, और तभी एक बहुत बड़ा सा धमाका होता है.. और मेरी नींद टूट जाती है. मैं बहुत घबरा जाता हूँ उस सपने से. पास पड़े अपने मोबाइल को उठाता हूँ, वक़्त देखता हूँ तो सुबह के चार बज रहे होते हैं. सोचता हूँ कि अकसर तुम्हारे सपने मैं इसी वक़्त क्यों देखता हूँ? 

मुझे हमेशा ये लगता है कि जितना ज्यादा मैं इन सपनों से डर जाता हूँ या घबरा जाता हूँ उतना कभी किसी भयानक सपने से, किसी भूत प्रेत वाले सपने से मैं नहीं डरा. जब भी तुमसे जुदा होने की बात किसी सपने में देखता हूँ, तुम्हें खुद से दूर जाते हुए देखता हूँ तो मैं बेहद डर जाता हूँ. हालाँकि अब डरने जैसी कोई बात नहीं रही, तुम बहुत दूर जा चुकी हो. लेकिन अब भी मैं बेहद डर जाता हूँ ऐसे सपनों से. 

हर शाम को मन में यूँहीं जाने कितनी बातें चलने लगती हैं. तुम्हारी कही बात याद आती है, कि तुम लिख लिया करो अपने मन में चल रही बातों को. तुम्हारे पास लिखने का हुनर है, तुम लिखकर खुद के मन को थोड़ा शांत कर सकते हो, लेकिन उनके बारे में सोचो जो लिख नहीं पाते अपने मन की बात, ना किसी से कह पाते हैं. वो बस घुटते रहते हैं अन्दर ही अन्दर. तुमने फिर कहा था, कुछ और न मिले लिखने को, कुछ समझ में ना आये क्या लिखना है, तो जितनी भी गालियाँ तुम्हें आती हैं(वैसे तो कम ही आती हैं), मुझे सुना देना. खूब गरिया देना मुझे, देखना तुम्हारा मन एकदम शांत सा हो जाएगा.

परछाइयों सी होती हैं यादें...

Sunday, June 29, 2014

आसमान में बादल छा गए थे. सुबह की बारिश के बाद जो हलकी धूप निकली थी, अब वो मिट चली थी, हवा अचानक बहुत तेज़ हो गयी थी. ऐसा लगता था कि आंधी आने वाली है. हम दोनों वहां से निकल चुके थे. उसने उसी बिल्डिंग के छत पर जाने की इच्छा जताई थी जहाँ हम पहले कभी शाम में जाया करते थे. वो गाड़ी में बिलकुल खामोश बैठी रही. किसी भी बातों में जैसे उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही. चर्च से निकलने के बाद उसने गाड़ी की चाबी भी मुझे थमा दी, ये कहते हुए कि अब वो आराम करेगी. इस बात के अलावा उसने मुझसे और कोई बात नहीं की. हाँ बस गाड़ी का एसी ऑफ कर के उसने दोनों तरफ की खिड़कियों को खोल दिया था और फिर आँखें मूंदे बैठी रही.

मुझे उसकी ये चुप्पी अखरने लगी थी. शायद उसकी आवाजें उसकी नॉन-स्टॉप बातें सुनने का मैं इतना आदी हो गया था, कि जब वो ऐसे बिलकुल शांत हो जाती थी तो मेरा मन बड़ा ही अशांत सा हो जाता था. मैं चाहता था कि वो बातें करें, कुछ भी कहे, बस ऐसे चुप न रहे. लेकिन वो खामोश थी. उसकी चुप्पी तुड़वाने का मुझे कोई भी तरीका सूझ नहीं रहा था. मैं शायद इसी कशमकश में था, मुझे ध्यान भी नहीं रहा था कब मैंने यूँ ही एक ग़ज़ल गुनगुनाना शुरू कर दिया था. 

उसने चौंक कर आँखें खोली.
“तुम गाना गा रहे थे??तुम??? तुम सच में गा रहे थे या बस मेरा वहम था?????” अपनी बड़ी बड़ी आँखों को उसने और बड़ा बना कर आश्चर्य में मुझे देखा. हाँ, उसके लिए तो ये दुनिया का आठवां अजूबा ही था न, मुझे गाते हुए सुनना. पहले जाने कितनी बार उसने जिद किया था लेकिन मजाल है मैंने कभी कोई गाना उसके सामने गाया हो. हाँ एक दो बार उसे यूं ही चिढ़ाने के लिए मैं खड़े होकर ‘जन गण मन’ गा देता था. वो हद इरिटेट हो जाती थी.

“हाँ, बस वो एक ग़ज़ल याद आ गयी थी तो....” मैंने कहा. 

“वाऊ !!!!!!!!!!!! I am so Lucky!! तुम गा रहे थे...और मैंने सुना तुम्हें गाते हुए. You have no idea what this means to me.” वो एकदम से इक्साइटेड हो गयी थी. मुझे अच्छा लगा उसे यूं खुश हुआ देखकर. एक पल के लिए उसके चेहरे पर वही मुस्कान आ गयी थी जो सुबह थी, जब वो गाड़ी की चाबी के लिए मुझसे झगड़ रही थी. मैंने गाना बंद किया तो उसने मुझे वो ग़ज़ल आगे गाने को कहा. मैं भी बिना कुछ सोचे, बिना उसकी बात टाले, गुनगुनाने लगा. 

कुछ देर वो मुझे सुनती रही “काश इस पल को मैं रिकॉर्ड कर के रख सकती अपने पास. काश !! काश!” उसने कहा. 

पूरे रास्ते मैं गुनगुनाते रहा था. वो बस आँखें बंद कर मेरा गुनगुनाना सुन रही थी. या वो सो रही थी ? मुझे पता नहीं चल पाया. पूरे रास्ते मैंने उसकी तरफ जब भी देखा उसकी आँखें बंद ही थीं. बिल्डिंग के पास पहुँच कर मैंने उसे धीरे से हिलाया “पहुँच गए हम...तुम सो रही थी?” 

“हम पहुँच भी गए? अभी तो निकले थे? तुम सच में बहुत तेज़ ड्राइव करते हो”.

मैं मन ही मन मुस्कुराने लगा. रास्ते भर ट्रैफिक थी और गाड़ी २०-३० के रफ्तार से चल रही थी और इसे लग रहा था कि मैंने बहुत तेज़ गाड़ी चलाई है.

“क्या सोचने लगी थी तुम?” मैंने पूछा
“तुम्हें सुन रही थी. तुम गा रहे थे.” उसने कहा. 
“तुम क्या सोच रही थी?” मैंने दोबारा वही सवाल दोहराया..

वो कुछ देर खिड़की से बाहर देखती रही, उसी कोक के बोतल के आकार के दुकान को जहाँ पहले हम पाँच रुपये वाली फाउंटेन कोक पिया करते थे. 

“मैं उस दिन के बारे में सोचने लगी थी, जब तुमने लगभग मेरी जान निकाल दी थी, कितना तेज़ गाड़ी चलाया था तुमने. मैं तो डर गयी थी.”
मैं मुस्कुराने लगा. “आज सा ही मौसम था न उस दिन?” 
“हाँ बारिश हो रही थी..” उसने कहा

और फिर उस दुकान की तरफ देखकर वो जाने क्या सोचने लगी थी. मुझे शायद पता था कि वो क्या सोच रही है. उस दुकान के पास से ही तो उस दिन हमने अपने सफ़र की शुरुआत की थी. और वो उधर ही देख रही थी. 

हमने उसी दुकान से एक कोल्डड्रिंक की बड़ी बोतल खरीदी, और एक बड़ा चिप्स का पैकेट, और बिल्डिंग के छत पर आ गए थे.  इस छत पर हम दोनों पाँच साल बाद आ रहे थे. छत अब काफी बदला हुआ सा लग रहा था. उन दिनों जब हम आते थे तो कोई भी छत पर दिखता नहीं था. हमारे अलावा किसी और का दखल नहीं था यहाँ. लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं थी. छत के एक कोने में दो प्रेमी जोड़े बैठे थे. 

“चलो, चलते हैं यहाँ से...कहीं और..” मैंने कहा. जाने क्यों उन दो लोगों को बैठे देख वहां, मुझे अजीब सा लगा. वो जिस पोजीशन में बैठे थे, उन्हें देख शायद मैं थोड़ा असहज सा हो गया था. थोड़ी असहज तो वो भी हो गयी थी.

“जस्ट इग्नोर देम. मुझे तो इस छत पर आकर ऐसा लग रहा है जैसे वर्षों बाद अपने घर लौट आई हूँ मैं..” उसने कहा. 

छत के उसी कोने पर हम बैठे थे जहाँ पहले बैठा करते थे. ये हमारी खुशकिस्मती थी कि छत का हमारा कोना खाली था. वहां आसपास रंगबिरंगे तरह-तरह के इश्तहारों के कागज़ और पैम्फ्लट बिखरे हुए थे. शायद उस बिल्डिंग में जो कोचिंग इन्स्टिटूट थें ये उन्हीं कोचिंग इन्स्टिटूट के इश्तहार रहे होंगे, जिनका अब कोई काम नहीं होगा और वो यहाँ लाकर फेंक दिए गए होंगे. 

उनमें से एक रंगीन कागज़ को मैंने उठाया “कुछ याद आया तुम्हें इस रंगीन कागजों को देखकर?” मैंने उससे पूछा. 
“नहीं तो...क्या?”
“तुम रंगीन नक़्शे यहाँ इसी तरह बिखेर दिया करती थी..”
“अरे हाँ!! कैसे भूल सकती हूँ मैं. I was so crazy about maps”. एकाएक याद आई बात पर वो खुश हो गयी थी. हाँ उसे नक़्शे खरीदने का शौक था. स्कूल में जीआग्रफी विषय में जो हम मैप्स इस्तेमाल करते थे, अलग-अलग महादेश, देश, राज्य, शहर के मैप, वो उन्हीं नक्शों को खरीद लिया करती थी. जब भी वो किसी स्टेशनरी के दुकान के आगे से गुज़रती, हमेशा एक मैप खरीद लेती थी. उसे इन मैप्स की कोई जरूरत नहीं थी, बस ये उसका एक शौक था. 
“तुम उन नक्शों से खेलती थी. याद है तुम्हें, एक बार तुमने एक दुकान से दो नक़्शे खरीदे थे, एक भारत का और एक अमरीका का, और मुझे दिखाते हुए कहा था तुमने, देखो मैंने दो रुपये में दो देशों को खरीद लिया...याद है?”
“हाँ याद है मुझे. और वो दुकान वाले अंकल कैसे कन्फ्यूज हो गए थे न, जब मैंने उनकी तरफ देखकर कहा था, अंकल मेरे पास दो देश हैं, एक आपके नाम कर दूँ?”
“वो थके हुए थे. तुम्हारी इस बात से वो हँसने लगे थे. उनकी दिन भर की थकान तुम्हारी इस एक बात से उतर गयी थी...” मैंने कहा. 
“वो जानते थे मुझे, कि मैं ऐसे ही पागलपन कि बातें करती हूँ.” 

इस मैप के चक्कर में कितने लोगों को उसने उलझन में डाला था. उसका एक प्रिय खेल भी था. हर देश, शहर के नक़्शे को वो अपने मनपसंद रंग से रंग लिया करती और सारे नक्शों को इसी छत पर बिखेर दिया करती थी. छोटे-छोटे पत्थर उनपर रख देती, ताकि हवा उन्हें उड़ा न ले जाए...और फिर उसका खेल शुरू होता - 
उसे कौन से शहर घूमना है, वहां जाकर वो क्या करेगी...क्या देखेगी...उस शहर की खासियत क्या है, उस शहर या देश में कौन-कौन ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे वो मिलेगी, वो एक के बाद एक मुझे ये सब सुनाती. ऐसा नहीं था कि हर दिन वो मुझे एक ही बात कहा करती थी. हमेशा उसके पास कुछ नयी बातें होती थी कहने के लिए. एक दिन उसके इसी खेल के बीच एक जोरदार आंधी आई, उसके सारे नक़्शे हवा में उड़ने लगे थे. वो दौड़कर सारे नक़्शे बटोरने की नाकाम कोशिश करने लगी, लेकिन सभी हवा में उड़ चुके थे. उसने उदास होकर कहा था “देखो ये आंधी कितनी बेरहम है, मेरे सपनों को उड़ा ले जा रही है”. मुझे याद तो नहीं लेकिन उसकी इस बात पर शायद मैंने कहा था “इन कागज़ के सपनों को उड़ा ले जाए भी आंधी तो क्या, तुम्हारी आँखों में जो सपने बसे हैं, तुम्हारी ख्वाहिशों को कभी कोई आंधी उड़ा कर ना ले जाए कभी...” 
उसने मेरी इस बात पर “आमीन” कहा था. 


“अच्छा आज तुमने दुआ में क्या माँगा? मैं पूछना भूल गयी.” उसके नक़्शे के खेल की जो बातें हो रही थीं, उसे काटते हुए उसने पूछा मुझसे. मैंने बिना सोचे जवाब दिया -
“तुम्हें...”
“सच?”
“हाँ सच..”
“और तुमने?”
“मैंने?...मैंने? ये कि लन्दन न्यूयॉर्क बोस्टन का झंझट सब कहीं पीछे छूट जाए और मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे शहर जा सकूँ, जहाँ तुम रहते हो और जहाँ की तुम इतनी तारीफें किया करते हो. 

कुछ देर हम दोनों चुप रहे. उसने आगे कहा..

“तुम जा रहे हो तीन दिनों बाद. मैं साथ चलूँ तुम्हारे? बोलो...अभी इसी वक़्त बोलो. कुछ न सोचो, बस बोलो. मेरा दिल रखने के लिए ही बोल दो, भले तीसरे दिन तुम मना कर देना. डांट देना मुझे, मत ले जाना...लेकिन अभी हाँ बोल दो”

मैं कुछ बोलता उसके पहले उसने खुद कहा 

“कैन यू प्लीज इग्नोर ऑल दिस? मेरे पागलपन की बातें हैं ये...भूल जाओ..”

मैं चुप रहा. 

ऊपर आसमान में काले बादल घिर आये थे. लगता था किसी भी समय बारिश हो सकती है. लेकिन उस वक़्त मुझे आसमान से होने वाली बारिश की चिंता नहीं थी. उसके आँखों से बस बरसात न हो, इस बात का डर था. 

“एक शेर तुम सुनोगे?” उसने आसमान की तरफ देखते हुए कहा.
“हाँ सुनाओ...”

"तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा”.

उसकी आँखों से आंसू छलक आये थे, आंसू की कुछ बूँदें मेरी पलकें भी भिगो गयीं थी. 

“तुम कब से शायरी करने लगी शायरा साहिबा” मैंने माहौल को थोड़ा हल्का बनाने की अपनी कोशिश की. 

“जब तुम्हारी बहुत याद आती थी तो अकसर उन बातों में खुद को उलझा लिया करती थी जो तुम्हें पसंद है... कविताओं, कहानियों और फिल्मों में. 
कभी सोचा है तुमने? आगे चल कर कहीं ऐसा हुआ हम महीनों-सालों बात न कर पाए, एक दूसरे की कोई खबर नहीं ले पाए हम तो?

मैंने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया.

“तुम्हें पता है होता है ऐसा कभी-कभी. मैं भी अकसर ऐसी बातें सोच कर परेशान होता हूँ. लेकिन तुम बताओ, क्या उम्र भर साथ निभाना ही सब कुछ होता है? हम साथ रहे या न रहे...ये वक़्त जो हम साथ बिता रहे हैं, ये वक़्त हमेशा हमारे साथ रहेगा, ये वक़्त जो हम एक दूसरे के साथ गुज़ार रहे हैं ये क्या कम है? तुमने मेरे लिए जो किया है, तुमने जिस तरह सम्हाला है मुझे, मैंने जिस तरह सम्हाला है तुम्हें, हर मोड़ पर, मुश्किल समय में हम साथ रहे, एक दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त बन कर, कभी एक दूसरे को हमने बिखरने नहीं दिया. एक दूसरे की सबसे बड़ी ताकत सबसे बड़ी प्रेरणा बने रहे. ये सब बातें, ये यादें, हमारा ये वक़्त हमसे कोई नहीं छीन सकता. आने वाला वक़्त भी नहीं. इन यादों पर सिर्फ और सिर्फ हमारा ही अधिकार रहेगा. हमेशा. आने वाले सालों में हम कहीं भी रहे, कितने भी दूर रहे, इन बातों को याद कर के मुस्कुरा तो सकेंगे, गर्व तो कर सकेंगे कि हमने कभी ऐसी दोस्ती निभाई थी जिसपर हमें नाज़ था, फख्र था. जो हर लिहाज से पवित्र है था, मासूम था...बहुत कम लोगों को ऐसी दोस्ती नसीब होती है. ये क्या कम है? तुम आज मुझसे एक वादा करो, आने वाले दिनों में चाहे कुछ भी हो, तुम हमेशा मेरी यादें को याद कर के मुसकुराओगी, कभी दुःखी नहीं होगी तुम. 

उसने मेरी बातों का कुछ जवाब नहीं दिया, बस वो मुस्कुराने लगी थी. आसमान से हलकी फुहारें होने लगी थीं. उसने अपने दोनों हथेलियों को आगे बढ़ा दिया, जैसे बारिश की बूंदों को पकड़ने की कोशिश कर रही हो. सामने के लैम्पपोस्ट पर बत्ती जल रही थी. बादल और बारिश के बीच उसकी रौशनी बड़ी अच्छी लग रही थी. वो उसी लैम्पपोस्ट को देखने लगी. 

“देखो तो लगता है ऐसे जैसे वो लैम्पपोस्ट न होकर एक लाइटहाउस हो.. तुम्हें पता है लाइटहाउस क्या होता है?” उसने कहा 

पाँचवीं क्लास के बच्चे भी इस सवाल का जवाब जानते थे, लेकिन मैं बिलकुल अंजान बना रहा... “लाइटहाउस? वो क्या होता है? मैंने पहली बार नाम सुना है”.

मेरी इस बदमाशी पर वो हँसने लगी. 

“जानते हो जब समंदर में जहाज खो जाते हैं, उन्हें रास्ता पता नहीं चलता, कोई उम्मीद नहीं नज़र आती कि अब वो कभी वापस अपने घर पहुँच पायेंगे, तब यही लाइटहाउस उनकी मदद करता है. लाइट हाउस उन्हें रास्ता दिखाता है और इसके रौशनी के सहारे वो किनारे तक आ जाते हैं, समंदर में खोने से, डूबने से बच जाते हैं वो. लाइटहाउस उन्हें बचा लेता है.” 

कुछ रुक कर कुछ सोचकर उसने आगे कहा 

“तुम मेरी ज़िन्दगी में भी एक लाइटहाउस की तरह ही तो हो...जाने कितनी बार तुमने मुझे रास्ता दिखाया है, मुझे अँधेरे से खींच बाहर निकला है. मुझे सम्हाला है. मुझे खोने से बचाते हो, मुझे डूबने नहीं देते. तुम मेरे लाइटहाउस हो. बस पूरी ज़िन्दगी मुझे तुम यूं ही रास्ता दिखाते रहना, खोने से, डूबने से बचाते रहना. तुम तो जानते हो कि मुझे डूबने से कितना डर लगता है. 

मैं उसके करीब आकर बैठ गया. उसने मेरे कंधे पर अपना सर रख दिया, बारिश रुक गयी थी, लेकिन फिर भी हम जाने कितनी देर तक वहां बैठे रहे. मेरे नज़रों के सामने वही शब्द घूम रहे थे जो उसने अभी कहा था “तुम मेरी ज़िन्दगी में एक लाइटहाउस की तरह हो..और वो आँखें बंद कर गुनगुनाना रही थी...


तुमको देखा तो ये खयाल आया
जिंदगी धूप तुम घना साया 

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की 
आज फिर दिल को हम ने समझाया 

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे 
हमने क्या खोया हमने क्या पाया 

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते 
वक़्त ने ऐसा गीत क्यों गाया


तुम मेरे लाइटहाउस हो

Sunday, June 22, 2014


समय जैसे घूम कर फिर से वहीं आ पहुंचा है. मैं उसी बिल्डिंग के छत पर खड़ा हूँ जिस बिल्डिंग के तीसरी मंजिल पर कभी हमारी शाम गुज़रती थी. हम यहाँ मैथ्स टयूशन पढ़ने आया करते थे. इस बिल्डिंग की छत से एक रिश्ता सा बन गया था. मुझे आज भी याद है वो दिन, एक शाम वो मुझे खींचते हुए छत पर ले गयी थी, हम करीब तीन महीने से इस बिल्डिंग में टयूशन पढ़ने आया करते थे लेकिन छत पर जाने का ख्याल कभी मन में नहीं आया था. उसे जाने क्या सूझा था कि वो छत पर मुझे खींचते हुए लेते गयी थी, “देखो कितना खूबसूरत छत है ये..”. उसने मुझसे कहा. मैंने छत पर एक निगाह डाली, वो छत मुझे कहीं से भी खूबसूरत नहीं दिख रही थी, हर बड़ी बिल्डिंग की छत की तरह ही वो उदास वीरान और नीरस थी. लेकिन उस शाम वो वाकई खुश थी. उसकी बातों को काटने की इच्छा नहीं हुई.
“हाँ वाकई खूबसूरत छत है”. मैंने कहा. 
“है न? देखो, ये छत मेरी डिस्कवरी है”.. उसने चहकते हुए कहा था. वो खुश हो गयी थी छत पर आकर. वो ऐसी ही थी, ऐसी छोटी छोटी बातों में वो खुशियाँ ढूँढ लिया करती थी. 

उस शाम के बाद हम उस छत पर लगातार जाने लगे थे. छत के एक किनारे खड़े होकर नीचे की सड़कों को देखते थे. बोरिंग रोड की वही सड़कें बिल्डिंग की छत से देखने पर बिलकुल अलग दिखती थी. वहीं छत के किनारे दो बड़े से तख्ते रखे हुए थे. हम वहीं बैठते थे. हर शाम का हमारा ये प्रिय शगल था, हम छत के किनारे खड़े हो जाते और सड़कों पर चल रही गाड़ियों को देखते रहते. नीचे गाड़ियों का शोर होता और ऊपर छत एकदम सुनसान. वहाँ कभी कोई नहीं आता था. कम से कम जब तक हम वहां जाते रहे थे तब तक किसी और को वहाँ कभी देखा हो ये याद नहीं आता. 

जाने कितने सपने हम यहाँ देखे थे, इस छत पर. हम दोनों पागल थे. हम दोनों नादान थे. हम समझते थे हमारे सभी सपने पूरे होंगे. ये हमारा नहीं हमारी उम्र का दोष था. २०-२१ साल की उम्र में सभी यही सोचते हैं कि वो दुनिया जीत लेंगे. जो चाहेंगे वो पायेंगे. हम भी उन्हीं लोगों में से थे. हमें उन दिनों ये विश्वास था कि आज से बहुत साल बाद जब हम बूढ़े होकर अपने शहर लौटेंगे तो शामें इसी छत पर बिताएंगे. हाँ उन दिनों हमें ये भी विश्वास था कि हम पूरी ज़िन्दगी साथ रहेंगे. 

आज मैं यहाँ इस छत पर ठीक छः साल बाद आया हूँ. शहर छूटने के बाद यहाँ बस एक बार आया था. २००६ का जून महीना था वो. मैं उन दिनों अपनी छुट्टियाँ बिताने शहर आया था. वो भी उन्हीं दिनों शहर आई थी. ऐसा इत्तफाक कम ही होता था कि हम दोनों एक साथ शहर में रहें. लेकिन उस साल जून के महीने में तीन हफ्ते तक हम दोनों शहर में थे. हम दिन भर घूमते थे, दोपहर को लू चलती थी, हम दोनों लू के थपेड़े झेलते, लेकिन फिर भी घूमते थे. देर शाम तक मौर्या लोक के किसी कॉफ़ी शॉप या रेस्टोरेन्ट में बैठे रहते, दुनिया भर की बातें करते थे हम. तीन हफ्ते लगभग हम हर दिन मिले थे, लेकिन हमारी बातें कभी खत्म नहीं होती थीं. दोपहर से लेकर शाम तक हम बस बातें किया करते थे. बेहिसाब बातें. वे तीन हफ्ते यादगार बीते थे. 

१८ जून की सुबह थी वो. रविवार का दिन था, और मैं देर तक सोने के मूड में था. रात में सोने के वक़्त तक मौसम बहुत अच्छा हो गया था. मेरे सोने के बाद पूरी रात बारिश होते रही थी, लेकिन मैं ऐसी गहरी नींद में था कि इस बात से बेखबर था. कब माँ ने आकर मेरे कमरे की खिड़की बंद की, मुझे ये भी याद नहीं था. सुबह उसके कॉल से ही नींद खुली थी. ठीक साढ़े पाँच बजे उसने मुझे कॉल किया था. उसने कॉल पर ‘हाय..हेल्लो’ कुछ भी नहीं कहा.
भरपूर नींद में था मैं, जैसे ही कॉल रिसीव किया उधर से उसकी मधुर आवाज़ सुनाई दी...
वो गा रही थी फोन पर -
“रिमझिम रिमझिम..रुमझुम रुमझुम..भीगी भीगी रुत में, तुम हम, हम तुम...चलते हैं...मिलते हैं.....कहो चलोगे आज? मिलोगे आज मुझसे? भीगोगे मेरे साथ बारिश में आज?” उसने पूछा... 

ऐसी सुरीली आवाज़ कानों में सुनाई दे सुबह सुबह तो नींद तो काफूर हो ही जानी है. 
“इतना मीठा गाओगी तुम, तो बताओ हम जैसे भोले भाले दिल वाले लोगों का क्या होगा?” मैंने उसे छेड़ते हुए कहा. 
“बातें मत बनाओ तुम, बारिश में भीग रहे या नहीं ये बताओ”. 
“बारिश? बाहर बारिश हो रही क्या?” मैंने आँख मलते हुए खिड़की खोली. सच में बारिश हो रही थी. 
“ज़रा उठकर तो देखो साहब, बाहर जाओ...भीगो, गाना गाओ, बारिश में नाचो, सुबह की चाय पियो और ठीक दो घंटे में मुझे पिक करो...आज घूमना है, इतना रोमांटिक मौसम है, इतनी प्यारी सुबह है और सरकार उसे सो कर बर्बाद कर रहे हैं”. 
"दो घंटे में? अभी तो लेकिन सुबह के साढ़े पाँच बजे हैं..." 
“I dont care. Pick me at 7:30.” उसने कहा और बिना मेरी आगे कोई बात सुने उसने फोन काट दिया था. 

फोन रखने के बाद मैं मुस्कुराने लगा था. ये उसकी पुरानी आदत जो थी. जिस दिन भी बारिश होती थी उसका हुक्म आ जाता था, दिन भर साथ रहेंगे हम, घूमेंगे. थोड़ा आश्चर्य मुझे इस बात से हुआ था, रात में एक बजे तक उसने मेरे साथ बातें की थी. वो इतनी जल्दी सुबह कैसे जाग गयी? उसे जगाने की जिम्मेदारी तो मेरी थी. शायद बारिश की आवाज़ से नींद खुली होगी उसकी...मैंने सोचा. घड़ी में वक़्त देखा...छः बज रहे थे, मैं जल्दी से बिस्तर से उठ गया.
उससे मिलने जाना था. तैयार होना था मुझे. 

उसकी एक ख़राब आदत भी थी. वो मुझे कभी पूरी बात नहीं बताती थी. उस दिन भी उसने मुझे ये नहीं बताया था कि उसने मेरे लिए ब्रेकफास्ट बनाया है. मैंने उसके अपार्टमेंट के गेट के पास पहुँच कर उसे फोन किया...

 “बाहर आओ, मैं नीचे इंतजार कर रहा हूँ” 
“तुम आओ ऊपर, ब्रेकफास्ट कर लो..फिर चलेंगे” 
“ब्रेकफास्ट? लेकिन मैं तो ब्रेकफ़ास्ट घर से ही कर के आया हूँ...तुम बस आओ”. 

वो मेरी इस बात से थोड़ा चिढ़ गयी.. 
“तुम्हें वाकई मुझे इरिटेट करने में बड़ा मजा आता है न? आई डोंट केयर तुमने ब्रेकफास्ट किया है या नहीं, ऊपर आकर तुम ब्रेकफास्ट कर रहे हो....Thats it. मुझसे आगे बहस न करना.” उसने पूरे गुस्से में कहा. 

मैं भी चुपचाप सीढियाँ चढ़ के घर के अन्दर आया. सामने वो खड़ी थी, दरवाज़े पर ही... 
“बड़े नखरे हैं साहब आपके? मेरे साथ ब्रेकफास्ट कर लोगे तो पुलिस जेल में बंद कर देगी न...मैं तो आतंकवादी हूँ...है न?” उसने शिकायती अंदाज़ में कहा. 
“एक तो मुझे साढ़े सात बजे तुमने बुलाया और देखो अब तक तैयार नहीं हुई तुम...तीन फ्लोर चढ़ के आया हूँ, मुस्कुरा कर स्वागत करना चाहिए, वो तो किया नहीं और शिकायत कर रही हो...रौब जमा रही हो?” 
वो मेरी इस शिकायत से चिढ़ गयी – “हाँ हाँ जानती हूँ साहब आप बहुत बिजी बिजी रहते हैं, थोड़ी देर इंतजार करेंगे तो जाने क्या हो जाएगा.. एक तो घर में मैं अकेली, दीदी अब तक सोयी हुई हैं, सुबह उठकर तुम्हारे लिए इतने प्यार से ब्रेकफ़ास्ट बनाया, और तुम हो कि....” 
“अच्छा सॉरी, चलो अब जल्दी से ब्रेकफास्ट करवाओ, और तैयार होकर चलो..?”  मैंने उसे मनाते हुए कहा. उसने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा कर रह गयी. वो मुझे ड्राइंग रूम में बिठा कर अन्दर चली गयी. 

“तुम बोर होगे, तो टीवी देख लो...” 

उसने टीवी ऑन कर दिया. टीवी पर एक कार्टून चैनल लगाकर और रिमोट पता नहीं कहाँ छिपाकर(ताकि मैं चैनल बदल न सकूँ) वो तैयार होने चली गयी. ठीक एक घंटे बाद वो नज़र आई. मैंने बस एक छोटा सा मासूम सा सवाल किया उससे -
“एक तो मेरे को इतना इंतजार करवाया, और उसपर से ये सज़ा कि कार्टून चैनल दिखाया एक घंटे, मैं चैनल भी नहीं बदल सकूँ इसलिए रिमोट छिपा दिया तुमने. ऐसा ज़ुल्म क्यों?”.
उसने इस बात का कुछ जवाब नहीं दिया बल्कि ज़माने भर के टफनेस वाले एक्स्प्रेशन उसके चेहरे पर आ गए थे. मैं खुद ही इस डर से कि जाने गुस्सा का अब कौन सा बम फूटेगा, चुप हो गया. एक और सवाल उस वक़्त मन में आया था, लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई कि वो सवाल उससे पूछूँ मैं.

पूरे दिन का कार्यक्रम पहले से तय था. उसने एक कागज़ का पुर्जा मुझे थमाया, जिसमें पूरे दिन क्या करना है इस बात का जिक्र था. उसी स्केजुल के हिसाब से सुबह १० बजे हम सिनेमा हॉल पहुंचे. ‘फना’ फिल्म जो कुछ दिनों पहले रिलीज हुई थी, उसे देखने. एक खूबसूरत सा इत्तफाक था फिल्म के साथ...उस फिल्म के शुरूआत के एक घंटे में बहुत से शेर कहे गए हैं. उनमें से कई शेर ऐसे थे जो मैंने पहले कहीं पढ़/सुन रखा था और उन्हें अपनी डायरी में मैंने नोट कर लिया था. उसे ये बात मालूम थी. उन दिनों मेरी डायरी में लिखी हर बात से वो वाकिफ थी. फिल्म में जब पहला शेर पढ़ा गया, वो शॉक्ड हो गयी...कस के उसने मेरे हाथों को भींच लिया...“अरेss देखो तुम्हारी शायरी चुराई है आमिर खान ने...केस करो इसपर तुम...केस करो...”, उसने इतने जोर से ये कहा था कि आसपास के दो तीन जोड़ी निगाहें हमपर उठ आयीं थी. मैंने उसे किसी तरह शांत रहने को कहा, इस आश्वासन के साथ कि मैं आमिर खान पर केस जरूर करूँगा. लेकिन उसे शांत और चुप रखने की मेरी कोई भी तरकीब उस दिन काम नहीं कर रही थी. फिल्म के पहले हिस्से में वो इतनी बातें कर रही थी कि मुझे इस बात का पूरा यकीन था कि थोड़े ही देर में लोग हमें हॉल से बाहर धकेल देंगे. लेकिन हमारी खुशकिस्मती थी कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. 

थिएटर के बाहर निकलने पर हम जैसे ही कार पार्किंग के पास पहुंचे, उसने मेरे हाथ से गाड़ी की चाबी छीनते हुए कहा “I am driving”. और सीधे ड्राइविंग सीट पर जाकर वो बैठ गयी. 
मुझे उसने विरोध जताने का कोई मौका नहीं दिया. 

“आओ अन्दर आओ हुज़ूर, इस गाड़ी को अपना ही समझो और गाड़ी की इस ड्राईवरनी को भी” उसने शरारत भरे लहजे में कहा. 
मैं थोड़ा झेंप सा गया. 
“कहाँ चल रही हो??” मैंने पूछा 
“ड्राईवर मैं हूँ, मालिक भी, तुम्हारी गाड़ी की भी और तुम्हारी भी...है न? तो मैं जहाँ कहूँ वहां चलेंगे हम....” उसने कहा. 
मैंने उसकी तरफ देखा, थोड़ा मुस्कुराने लगा था मैं. 
“ठीक है मैडम, एज यु विश.” इससे आगे मैंने कुछ भी नहीं कहा. मन में कुछ आया जरूर था, सोचा कि कहूँ उससे, लेकिन मैं चुप ही रहा गया. उलटे उसने ही फिर से मुझे छेड़ने का एक और मौका ढूँढ लिया....
“मैडम? उफ़! हाउ अनरोमांटिक.....तुम मुझे मैडम की जगह ‘स्वीटहार्ट’ भी कह सकते थे..एनीवे, We are going for lunch, और आज की ट्रीट मेरे तरफ से..”उसने कहा और गाड़ी को उसी रेस्टोरेन्ट की तरफ मोड़ दिया जो उस सिनेमा हॉल से ज्यादा दूर नहीं था और जहाँ पहले हम अकसर आया करते थे. 

रेस्टोरेन्ट में वैसे तो वही मस्ती मजाक वाली बातें चल रही थी, वो अपनी आदत से मजबूर मुझे छेड़ने का कोई भी मौका छोड़ नहीं रही थी, लेकिन फिर पता नहीं क्या हुआ, कौन सी ऐसी बात उठी अचानक कि उसे अपनी दीदी की कही एक बात याद आ गयी. दीदी का जिक्र आते ही बातों का रुख ही मुड़ गया. कई दिशा में बातें होने लगी. दोस्ती, प्यार, रिश्ते, हम दोनों का साथ, दोनों के परिवार से जुडी कई बातें हुई, और सब अचानक ही हुई...हम दोनों नहीं चाहते थे कि वे बातें हम करें, कम से कम उस दिन तो नहीं. लेकिन बातें होती गयीं...अनचाहे ही. 

कुछ बातों को याद कर के वो काफी उदास हो गयी थी. उसने कहा मुझसे, “बहुत खालीपन सा लगता है मुझे उस शहर में, सब पास रहते हैं फिर भी जाने क्यों बहुत तनहा महसूस करती हूँ...यहाँ तुमसे दिल की बातें कह कर मन शाँत कर लिया करती थी, ये विश्वास तो था कि तुम पास हो, मेरे साथ हो. वहां तुम्हारी याद आती है. तुम चल सकते हो क्या मेरे साथ? तुम क्यों नहीं चल सकते मेरे साथ?” उसने भर्राए गले से ये एक मासूम सा सवाल पूछा था, जिसका मेरे पास कोई जवाब नहीं था. 

मैं उसे समझाता भी तो क्या समझाता. मेरे पास उसे कहने के लिए कुछ भी नहीं था. वो भी समझती थी ये बात. मेरी हर मजबूरी को शायद मेरे से भी ज्यादा बेहतर वो समझती थी. हम दोनों बहुत देर तक उस रेस्टोरेन्ट में बैठे रहे. कहीं और जाने की, घूमने की, मस्ती करने की सभी इच्छाएँ मर सी गयी थी. कुछ देर बिलकुल चुप रहने के बाद उसने ही कहा था मुझसे 
“मुझे एक जगह जाना है, तुम चलोगे न मेरे साथ?” 
“तुम्हें ये पूछने की जरूरत है?” 

वो थोड़ा मुस्कुराई.
सामने टेबल पर रखे उस कागज़ के पुर्जे को देखा उसने जिसपर दिन भर का कार्यक्रम लिखा था. इस कागज़ के टुकड़े की मुझे जरूरत नहीं, उसने कहा और उस पुर्जे के कई टुकड़े कर वहीं टेबल पर रख दिया. 
बगल में रेस्टोरेन्ट का बिल रखा था. 
मैंने उसका मन बदलने के इरादे से कहा “वैसे शायद इस फ़ालतू से कागज़(बिल) के टुकड़े की भी तो तुम्हें जरूरत नहीं न...इसे मैं रख लूँ अपने पास?”
उसने एकदम झपटते हुए वो बिल उठा लिया... “हाथ तो लगाकर देखो ज़रा, हाथ न तोड़ दूँ तो कहना”.

मैं मुस्कुराने लगा. जो मैं करना चाहता था, वो मैंने कर दिया था. उसे उस उदास मोड से बाहर लाना जरूरी था, और मेरी वो ट्रिक थोड़ा काम कर गयी थी, लेकिन वो अब तक परेशान थी, उदास थी. 

रेस्टोरेन्ट से निकलने के बाद मैंने उससे पूछा भी नहीं कि वो कहाँ जा रही है....किस तरफ जा रही है, जो बातें हुई थी उससे शायद मुझे थोड़ा अंदाज़ा तो मिल ही गया था. मेरा अंदाज़ा ठीक भी निकला था....उसने शहर के उसी बड़ी चर्च के आगे गाड़ी रोक दिया था जहाँ से उसकी दीदी की कई सारी यादें जुड़ी हुई थी. 

गाड़ी चर्च के सामने खड़ी थी. हम गाड़ी में ही बैठे थे. एक पल मुझे लगा कि उसे चर्च के अन्दर जाने की इच्छा नहीं है. बाहर से ही वो लौट जायेगी. लेकिन मैं गलत था.

“तुम तो कभी चर्च नहीं आये न?” उसने पूछा. 
“सोचा तो बहुत बार था, लेकिन कभी कोई मौका ही नहीं मिला.” मैंने कहा. 
“मौका मिलने की क्या बात है साहब? बस आ जाया करो यहाँ. चलो आज मैं तुम्हें चर्च घुमाती हूँ.” उसने कहा,

लेकिन गाड़ी से निकलने के बजाय, अपने बैग से वो कुछ निकालने लगी. मुझे समझते देर न लगी कि उसने बैग से अपना मिनी मेकअप किट निकाला है. अपने सजे संवरे चेहरे को वो फिर से सजाने-संवारने लगी थी. मुझे एकाएक थोड़ी हँसी सी आ गयी. कैसे भी मूड में रहे ये लड़की, कैसी भी परिस्थितियाँ रहे श्रृंगार करना ये कभी नहीं छोड़ सकती है. उसकी ही कही एक बात याद आई मुझे “काश मरने के समय मेरे पास इतना वक़्त बचा हो कि कम से कम कोई अच्छा सा ड्रेस पहन सकूँ मैं, अच्छा मेकअप कर सकूँ. मैं अपने घर की गली में बिना मेकअप नहीं निकलती तो फिर भगवान् से पास ऐसे ही चली जाऊं क्या? विदआउट मेकअप? नॉट पोसिबल”. 

कोई और वक़्त होता तो मैं इस हरकत के लिए उसे जी भर चिढ़ाता. लेकिन उस दिन मैं चुप ही रहा. उस दिन उसे मेकअप करते देख मैं मन ही मन ये सोच रहा था कि ये दुनिया की सबसे अलग, सबसे ख़ास लड़की है. इसे क्या नहीं आता. मन्दिर में पूजा करती है, गुरूद्वारे जाती है, चर्च में पूजा करने आती है, और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो दो तीन दफे ये मस्जिद भी गयी है. जितने सुरीली आवाज़ में ये पुराने हिंदी गाने गाती है, उतनी ही मीठी आवाज़ में ये भजन भी गुनगुनाती है. अकसर जब कभी उसके साथ शाम में मैं मन्दिर गया, वो हर बार कोई न कोई भजन गुनुनाती थी. उस वक़्त मुझे लगता था कि बस वो पल वहीँ ठहर जाए. शाम का वक़्त, मन्दिर में पूजा करते, भजन गाते हुए उसे देखना, इससे खूबसूरत और कोई दृश्य नहीं था मेरे लिए.

"चलो...चलना नहीं है क्या?" मैं पता नहीं किन ख्यालों में खो गया था, ये भी ध्यान नहीं रहा कब वो गाड़ी से उतर गयी थी और मुझे पुकार रही थी. झटपट उठा मैंने, और गाड़ी के बाहर आ गया. 
हम चर्च के अन्दर दाखिल हुए..
यहाँ करते क्या हैं? चर्च के अन्दर घुसते ही मैंने एक बेतुका सा सवाल पूछा था. मैं जानता था वो अकसर ऐसी बेतुकी बातों पर इरिटेट होकर हँस दिया करती थी. 
“क्या करते हैं? अरे पूजा करते हैं और क्या करते हैं? बेवकूफ..बुद्धू...सच में बेवकूफ हो तुम.” वो मेरे उस बेतुके सवाल पर मुस्कुराने लगी थी. 
“अच्छा...लेकिन कैसे पूजा करते हैं यहाँ” मैंने फिर से एक बेतुका सवाल पूछा था उससे. 
“बस हाथ जोड़ कर पूजा करो. ठीक वैसे ही जैसे तुम हनुमान जी की पूजा करते हो. बस...और कुछ नहीं...जगह चाहे कोई सी भी हो, मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा, चर्च, हर जगह पूजा एक सी ही होती है." उसने कहा.

चर्च के अन्दर दाखिल होते ही उसका मन जाने कहाँ अटक गया था. मैं लगातार उसे देख रहा था. मैं जानता था कि कोई बात है जो लगातार उसके मन में चल रही है. लेकिन मैं कोई जल्दबाजी करना नहीं चाहता था. मैं जानता था, मैं चाहता था कि जो कुछ भी उसके मन में है, वो खुद मुझसे कहे, बिना मेरे पूछे. मुझे यकीन था वो सारी बातें वो मुझे कह देगी. और यही हुआ भी. 

उसने कैंडल जलाया और फिर मेरे तरफ देखकर मुस्कुराने लगी. मैंने गौर किया, उसकी आँखें नम हो आई थी.
“तुम ठीक हो?” मैंने पूछा उससे. 

उसने मेरे हाथों को कस कर पकड़ लिया. 

“आज फिर से उन्हें देखा मैंने”. उसने कहा और वो मेरे और करीब आ गयी. मेरी बाँहों को उसने और कस के पकड़ लिया था. 
“किसे?” 
“दीदी को...” 
मैंने आगे कुछ नहीं कहा. “चलो चलते हैं यहाँ से, कहीं और चलते हैं...” 
मैंने उसके हाथों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली थी. वो कुछ देर चुप रही, फिर कहा उसने -
“पहली बार भी वो मुझे वहीं दिखी थी, वो जो सामने देख रहे हो न, येशु की बड़ी सी मूर्ति, क्रॉस के ऊपर...ठीक वहीँ...आज भी मुझे वहीं दिखी वो. मुझे याद है उस दिन भी ऐसा ही हुआ था, मैं आई थी इस चर्च में और प्रार्थना करते समय अचानक मुझे लगा की मेरे सामने वो खड़ी हैं, मैंने आँखें बंद कर रखी थी. उस दिन मुझे ऐसा लगा कि दीदी वहीँ उस बड़े से क्रॉस के पास से मुझे झाँक कर देख रही हैं....बड़ी बड़ी आँखों से मुझे देखकर वो मुस्कुरा रही हैं, जैसे पूछ रहीं हो मुझसे - तुम मुझे अब तक भूल नहीं पायी हो..तुम अब तक यहाँ आती हो, मैं तुम्हें यहाँ लेकर आई थी पहली बार, वो बारिश का एक दिन था...तुम अब भी मुझे याद कर के रातों में रोती हो न....रात भर तुम जागती रहती हो, आँसू बहाती रहती हो मेरे लिए लेकिन किसी से कुछ भी नहीं कहती...”

वो कहते हुए कुछ देर रुक गयी...फिर उसने आगे कहा 

“जानते हो उस शाम मुझे अजीब सा भ्रम हुआ था...मुझे ऐसा लगा था जैसे वो कहीं इसी चर्च में छुपकर बैठी हुई हों. जैसे वो कहीं नहीं गयी हैं, ये मेरा पागलपन था, मैं उस शाम यहाँ कैम्पस के बेंच में बहुत देर तक बस ये सोचकर बैठी रही थी कि शायद वो मेरे पास वापस आ जाए, लेकिन वो नहीं आई. जो चले जाते हैं दुनिया से वो फिर वापस नहीं आते न? कभी नहीं आते न वापस?” उसने पूछा 

मैंने उसे अपने और करीब खींच लिया, मेरी बाँहों में उसने अपना सर छिपा लिया, कहने लगी
“जानते हो, कितनी बार ऐसा हुआ है, मुझे ये एहसास होता है कि वो मेरे सामने हैं, मैं उनसे बातें करने लगती हूँ, और फिर कुछ देर बाद मुझे होश आता है....कि मेरे सामने कोई नहीं बैठा है. मैं अकेली हूँ. दीदी नहीं है यहाँ...फिर मैं सोचती हूँ कहाँ गयीं वो? शायद सच में वो कहीं इसी चर्च में छुप कर बैठी हुई हैं, ये विश्वास आज तक नहीं होता मुझे कि वो हमेशा के लिए हमारी दुनिया से दूर कहीं चली गयीं हैं....तुम्हें ये मेरा पागलपन लग सकता है, लेकिन सच कहूँ तो आज मैं बस यही देखने आई थी, कि दीदी मुझे दिखाई देती हैं या नहीं...और देखो वो दिख गयीं मुझे...ठीक वहीं, उसी जगह...वो मुझे देख मुस्कुरा रही थीं.” उसने उसी क्रॉस के तरफ इशारा करते हुए कहा. 

मेरे पास उसकी इन बातों का कोई जवाब नहीं था. उसकी बातें सुन एक ठंडी झुरझुरी सी मेरे अन्दर फ़ैल गयी.
“तुम जानती हो वो तुम्हें क्यों दिखीं आज? उस दिन भी क्यों दिखी थीं वो तुम्हें?”
"नहीं...क्यूँ?” 
“वो तुम्हें देखकर मुस्कुरा रही थीं न, जानती हो ये बस इस बात का इशारा है कि वो जहाँ भी हैं खुश हैं, और तुम्हें भी मुस्कुराते हुए कह रही हैं, कि खुश रहो हमेशा. उनकी यादें उनकी बातें उनके साथ बिताये वो अनगिनत पलों को याद कर के दुःखी न हो बल्कि मुस्कुराओ उन्हें याद कर के...उन्हें अच्छा लगेगा जब वो दिखेंगी वहां से कि तुम मुस्कुरा रही हो, खुश हो. तुम्हारी एक मुस्कान उनके लिए क्या मायने रखती थी ये जानती हो न तुम? तो तुम्हीं कहो तुम्हें ऐसे उदास देख उन्हें क्या अच्छा लगेगा??” 

वो एक छोटी बच्ची की तरह मेरी बातें सुन रही थी... 
“हाँ...शायद तुम ठीक कहते हो” उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा. 
“ऐक्चूअली यु नो व्हाट? तुम्हें पता है क्या करना चाहिए?” 
“क्या?” 
“तुम्हें तो आज सेलिब्रेट करना चाहिए. मेरी बात मानो तो जब जिस दिन वो तुम्हें ऐसे कहीं भी दिखें, घर में, मन्दिर में, किसी पार्क में, या इस चर्च में, उस दिन तो तुम्हें सेलिब्रेट करना चाहिए, इसलिए कि कम से कम वो तुम्हें नज़र तो आयीं. वो मुस्कुरा कर तुमसे बात तो कर रहीं थीं. ये क्या कम है? उन्हें सोचो कितना अच्छा लगेगा. इस तरह वो हर पल तुम्हारे साथ रहेंगी. चलो आज कहाँ तुम्हें डिनर करवाऊं? बोलो? कहाँ चलोगी सेलेब्रेट करने?” 
वो मुस्कुराने लगी थी. उसने मेरी बाँहों में अपना सर और ज्यादा छुपा लिया.. 
“तुम पागल हो” उसने कहा. 
“जो भी हो, हम आज सेलिब्रेट करेंगे....अच्छा बोलो उन्हें सबसे ज्यादा क्या पसंद था.?” 
बिना एक पल भी सोचे उसने तुरंत कहा... 
“जानते हो उन्हें कोल्डड्रिंक पीना बहुत पसंद था...कितनी बार तो माँ से वो डांट सुन चुकी है, इसी कोल्ड ड्रिंक के चक्कर में..मुझे तो वो हर दिन पिलाती थीं कोल्ड ड्रिंक...गोल्डस्पॉट और थम्प्स-अप उनकी फेवरिट कोल्ड ड्रिंक थी.” 
पता नहीं उसे बस इस एक कोल्ड ड्रिंक के जिक्र से कौन कौन सी बातें याद आने लगी थी. वो लगातार मुझे बताते जा रही थी, तरह तरह के किस्से, अपनी दीदी के, अपने बचपन के दिनों के. मैंने देखा उसकी आँखों में एक चमक आ गयी थी उन बातों को याद कर के. 

मुझे मौका मिल गया था, मैंने देखा चर्च के गेट के ठीक सामने, जहाँ हमने गाड़ी पार्क की थी, वहां एक छोटी सी दुकान थी. मैं उसे खींचते हुए, लगभग दौडाते हुए उस दूकान तक ले गया. वो मेरे इस बर्ताव से हतप्रभ थी. उसने ये कभी नहीं सोचा होगा की मैं ऐसे उसे बच्चों की तरह दौड़ाऊँगा. 
“क्या हो गया तुम्हें, कहाँ ले जा रहे मुझे खींचते हुए...अरे....रुको तो....” लेकिन मैं रुका नहीं...सीधे दुकान के पास आकर मैं रुका. 

"दो थम्प्स-अप देना भैया." मैंने दुकान वाले से कहा.
वो अविश्वास से मेरी और देख रही थी. वो हैरान थी. “तुम....” के आगे वो कुछ भी नहीं बोल सकी. 

थम्प्स-अप का एक बोतल मैंने उसे थमाया, एक खुद पकड़ा और ऊपर आसमान की तरफ बोतल उठा कर मैंने कहा “To smita di, we will always love you...Cheers” 
मैंने उसकी तरफ देखा...वो अब तक हतप्रभ सी मुझे देख रही थी...ऐसा पागलपन मैं कर सकता हूँ उसे ये विश्वास ही नहीं हो पा रहा था.... 
“क्या सोच रही हो? चियर्स करो...मैं इंतजार कर रहा हूँ...स्मिता दी इंतजार कर रही हैं” 

उसकी आँखें भर आयीं थी... 
“To didda...My one and only love...I love you...Cheers didda” उसने भी बोतल आसमान की तरफ उठा कर भर्राए आवाज़ में कहा. 
वो मेरी तरफ देख रही थी, कोल्ड ड्रिंक का एक घूँट उसने लिया, मेरी तरफ एक बार फिर से देखा उसने और कहा -  “तुम मुझे हमेशा संभाल लेते हो...”


आगे कहानी और भी है... !

चर्च...वो शाम और एक चियर्स...

Saturday, April 26, 2014


तुम्हारे जाने की घड़ी बहुत सख्त घड़ी होती है - ये तुम कहा करती थी. याद है न कैसे गुलज़ार साहब की इस नज़्म को पढ़ते वक़्त तुम्हारी आँखें भर आई थी? वो दिसंबर का ही एक दिन था. दिसंबर की वो सुबह तो याद होगी न तुम्हें? जब तुम मेरे शहर में कुछ दिन बिता कर वापस अपने शहर जा रही थी. वे दिन हमारे लिए संघर्ष, परेशानियों और उलझनों से भरे दिन थे. तुम इतनी ज्यादा परेशान मुझे पहले कभी नहीं दिखी थी. तुम्हारा मन बहुत ही विचलित हो गया था. तरह तरह के डर और आशंकाओं ने तुम्हें घेर रखा था. तुम्हें मैं हर बार बहुत ही आसानी से संभाल लेता था, लेकिन वे कुछ ऐसे दिन थे कि मैं सच में क्लूलेस था, कि  तुम्हें कैसे समझाऊं मैं? किस तरह तुम्हें संभालूं मैं? आज जब सोचता हूँ उन दिनों के बारे में तो मुझे लगता है वे हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन थें. उन अनचाही परस्थिथियों का आना एक तरह से अच्छा था. हमारे रिश्ते और विश्वास को एक नयी मजबूती मिली थी.

जिस दिन तुम्हें जाना था, उसके एक दिन पहले शाम में मैंने तुमसे वादा किया था, कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, मैं तुम्हे सी-ऑफ़ करने स्टेशन जरूर आऊंगा. वो दिसंबर की सुबह थी. तुम्हारी ट्रेन सुबह साढ़े छः बजे थी. मैं साढ़े पाँच बजे ही स्टेशन पहुँच गया था. कड़कती ठण्ड तो नहीं थी, लेकिन फिर भी सुबह कैब से आते वक़्त मैं ठिठुर रहा था. कैब ड्राइवर ने दो बार कहा मुझसे कि मैं खिड़की का शीशा चढ़ा लूँ.. लेकिन मैं जाने क्या सोच रहा था, मुझे सुबह की ठण्ड में यूँ ठिठुर कर बाहर कोहरे से लिपटे शहर को देखना अच्छा लग रहा था. मन में मैं उन सब बातों को दोहरा रहा था जो मैं तुमसे कहना चाहता था. मैं जानता था कि तुम खुद बहुत समझदार हो, मुझे जरूरत ही नहीं तुम्हें कुछ भी समझाने की या हिदायतें देने की...लेकिन फिर भी मैं चाहता था कि ट्रेन खुलने से पहले कुछ पल मैं सिर्फ तुम्हारे साथ बिता सकूँ. पूरे रास्ते ये प्रार्थना करते आया था कि तुम्हारे साथ एकांत में थोड़ा वक़्त मिल सके मुझे. हालांकि ये  मुमकिन नहीं था, ये जानता था मैं...लेकिन फिर भी मन में आशा थी कि शायद तुम्हारे साथ अकेले में कुछ पल मैं बिता सकूँ.

स्टेशन के प्लेटफोर्म नंबर एक पर तुम खड़ी थी. सफ़ेद स्वेटर पहने, भीड़ से बिलकुल अलग दिख रही थी तुम. बहुत दूर से ही मैं तुम्हें पहचान गया था. तुमने वही स्वेटर पहन रखा था जिसे मैंने तुम्हें गिफ्ट किया था. थोड़ी देर एक कोने में खड़े मैं तुम्हें दूर से ही देखता रहा था. उस लम्बे सफ़ेद स्वेटर में तुम बिलकुल एक परी सी दिख रही थी. पिछले दिनों जो फ़िक्र और उदासी तुम्हारे चेहरे पर लगातार दिख रही थी, वो तुम्हारे चेहरे से गायब थी..तुम इस बात से खुश थी कि  पिछले दिनों की परेशानियाँ तुम्हारे वापस जाने के वक़्त तक बहुत हद तक सुलझ गयीं थीं. तुम्हारा चेहरा खिला हुआ दिख रहा था. तुम्हारे चेहरे पर वही मासूमियत और चमक लौट आई थी जो तुम्हें बाकी लड़कियों से अलग करती हैं. तुम्हे यूँ खुश देख मैं खुश था. मुझे इस बात की राहत थी कि तुम अच्छे मन से वापस जा रही हो.

तुम प्लेटफोर्म पर इधर उधर देख रही थी. तुम मेरा इंतजार कर रही थी...और जैसे ही तुम्हारी नज़र मुझ तक आई, तुम्हारे चेहरे पर ४४० वाट का बल्ब जल गया था. तुमनें जिस तरह से मेरा बैग छीना था, और आते ही मुझसे पूछा “सैंडविच लाये हो न?”, मुझे तो एक पल लगा कि  जैसे तुम मेरा नहीं, सैंडविच का इंतजार कर रही थी. तुमने मुझसे कुछ दिन पहले ही फरमाइश की थी कि मैं तुम्हारे लिए चीज़ सैंडविच बना कर लाऊं. तुम्हें मेरे हाथों के बने चीज़ सैंडविच बहुत पसंद आते थे. मुझे याद है जब तुम पहली बार मेरे घर आई थी और मैंने तुम्हारे लिए चीज़ सैंडविच और कॉफ़ी बनाई थी और तुम मेरी तारीफ़ करते नहीं थक रही थी. बाद में तो ये सुनते हुए मेरे कान पक गए थे “जब से तुम्हारे हाथों की सैंडविच खायी हूँ और कॉफ़ी पिया है मैंने, तब से किसी और के हाथों के सैंडविच और कॉफ़ी पसंद ही नहीं आते”. तुमने मेरे बैग से सैंडविच का वो पैकेट निकाल कर अपने पास रख लिया..अगले ही पल तुम्हें कुछ याद आया और तुमने झट से पूछा था मुझसे, “खुद के लिए भी एक दो सैंडविच रख लो, तुमने खुद के लिए तो रखा नहीं होगा एक भी...सभी मुझे दे दिए होगे?”
तुम सच में मेरे रग रग से वाकिफ थी.

तुमसे उस सुबह मैं बहुत सी बातें करना चाह रहा था, लेकिन आसपास लोगों की मौजूदगी में वो बातें तुमसे कह पाना नामुमकिन था. तुम भी तो उस सुबह शिद्दत से चाह रही थी कि हम दोनों को कुछ देर का वक़्त मिले, तुमने कितनी कोशिश की थी कि हम दोनों कुछ देर के लिए अकेले बैठ कर बात कर सके....तुमने बहुत एफोर्ट भी लगाया था. जो बहाने तुम बना रही थी, ताकि हम एकांत में कुछ पल बिता सके, वो कितने मासूम से थे. तुम्हें यूँ एफोर्ट लगाते देख, यूँ बेचैन देख मुझे तुमपर बहुत प्यार आ रहा था. मैं समझ गया था कि तुम्हारे साथ अकेले बैठ कर बातें कर पाना मुमकिन नहीं, लेकिन तुम थोड़ी रेस्टलेस सी होने लगी थी. मैंने तुम्हारे कानों में कहा था “रहने दो, जो बातें कहनी है तुमसे, वो तुम्हारे शहर आकर मैं कह दूंगा. आऊंगा मैं तुमसे मिलने अगले हफ्ते”. ये सुनते ही तुम बिलकुल शांत हो गयी थी. जो रेस्ट्लस्नस थी चेहरे पर तुम्हारी उसके जगह एक मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर उभर आई थी.

ट्रेन में कम्पार्टमेंट में भी जब सीट अरेंजमेंट हो रही थी, तुम मेरे बगल में आकर बैठ गयी थी. कुछ बुरे लोगों की बुरी नज़रें हम पर उठ आई थी. लेकिन तुमने इसकी ज़रा भी परवाह नहीं की. वहां कुछ लोग थे जो गलत नज़रों से देखते थे हमारे रिश्ते को...इतने खूबसूरत और पवित्र रिश्ते को समझने की शक्ति उनमें नहीं थी.. वे बेहद ही कमज़ोर और गिरे हुए मानसिकता के, निहायत ही बुरी सोच रखने वाले व्यक्ति थे. लेकिन तुमने उन लोगों की ज़रा भी परवाह नहीं की, ना मैंने ही उन लोगों के तरफ ध्यान दिया. उस वक़्त मेरे लिए यही काफी था कि तुम मेरे पास बैठी हो, मेरे साथ बैठी हो. उस वक़्त इसके अलावा मैं और कुछ भी सोचना नहीं चाह रहा था.

तुमने कुछ गैरजरूरी और बेतुकी बातें शुरू की थी, ऐसे सवाल जिनके जवाब तुम्हें मालूम थे. “क्या करोगे आज तुम?”, “यहाँ से सीधे घर जाओगे?”, “खाना खा लेना आज” वगैरह वगैरह. तुम्हारे चेहरे पर मेरी एक नज़र गयी थी....तुम उस वक़्त भयानक ई-मोड में आ गयी थी...और जब भी तुम यूँ इमोशनल हो जाती थी तब अकसर यूँ हीं बेतुके सवाल करती, इधर उधर की बातें करने लगती जिससे तुम्हारा ध्यान दूसरी तरफ जा सके. मैं भी तुमसे सीधे कुछ भी नहीं पूछ पा रहा था. तुम्हारे चेहरे की तरफ दोबारा देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. मुझे डर था कहीं तुम खुद पर काबू नहीं रख पायी तो मैं क्या करूँगा? तुम टूट गयी और आंसूं बहने लगे तुम्हारे तो मैं कैसे संभाल पाऊंगा तुम्हें? तुम बातें कर रही थी लेकिन तुम्हारी आवाज़ में एक भींगा सा कम्पन मैं महसूस कर रहा था. मैं सुन रहा था जो तुम कह नहीं रही थी. तुम्हारे दिल की धड़कनों को मैं सुन रहा  था, तुम्हारे मन में जो बेचैनी थी उसे मैं महसूस कर पा रहा था. तुम शायद बहुत ही ज्यादा बेचैन होने लगी थी....तुमने अपना हाथ आगे बढाया था “अपना हाथ लाओ तो” - तुमने कहा था और मेरे से ये एक्स्पेक्ट किया था कि मैं तुम्हारी हथेलियों पर अपने हाथ रख दूंगा. लेकिन जाने क्या सोच कर मैंने तुम्हारे हाथों को झटक दिया... “ये हाथ फैला कर क्या मांग रही हो? मेरे पास चिल्लर नहीं हैं...” मैंने कहा था. और मेरे इस छोटे से मजाक पर तुम खिलखिलाकर हंस दी थी. तुम्हें यूँ हँसता मुस्कुराता देख वे नज़रें जो हमारी तरफ उठ आयीं थीं, वो जल भुन गयी थीं. उन्हें यूँ जलता देख मुझे हलकी हंसी भी आई उस वक़्त. मैंने तुम्हारे कानों में कहा था “यूँ हीं मुस्कुराती रहो तुम, जलने वाले यूँ हीं तुम्हारी मुसकराहट देखकर जलते भुनते   रहेंगे”. तुम्हारे पास मैं ज्यादा देर ठहर नहीं सका, तुम्हें यूँ हीं कुछ हिदायतें देकर मैं ट्रेन से उतर कर प्लेटफोर्म पर चला आया था. तुमसे ठीक से विदा भी नहीं ले पाया था मैं. मुझे जाने क्यों लग रहा था कि एक पल भी मैं और रुकता ट्रेन में तो शायद तुम और हम दोनों खुद को कंट्रोल नहीं कर पाते.

मैं ट्रेन से बाहर आ गया था. ट्रेन की खिड़की के शीशे से मैंने तुम्हें देखने की कोशिश की लेकिन तुम्हारी बेचैन नज़रों को मैं सह नहीं पा रहा था. मैं स्टेशन के दूसरे छोर  पर चला आया. सामने उगते हुए सुरज को मैं देखने लगा. - “ये तुम्हारे जाने की घडी है – आठ दिसंबर का ये दिन मैं कभी नहीं भूलूंगा” . सुना था मैंने कहीं, किसी से....कि उगते सूरज को देखते हुए जो दुआ मांगो वो कभी खाली नहीं जाती. मैंने बहुत सी दुआएं मांगी तुम्हारे लिए उस सुबह.

ट्रेन ने सीटी दे दी थी....ट्रेन खुल रही थी, लेकिन मेरे में इतनी हिम्मत नहीं थी कि पीछे मुड़ कर मैं ट्रेन को जाता हुआ देख सकूँ. मैं कुछ देर तक उगते हुए सूरज को ही देखता रहा था...जब पीछे मुड़ा तो ट्रेन चली गयी थी. तुम चली गयी थी, वापस अपने शहर और मैं वहीँ रह गया था, अपने शहर में अकेला. मैं अचानक खाली सा हो गया था. तुम्हारी यादें, पिछले कुछ दिनों की बातें दिमाग में घूमने लगी थी. मैं वापस घर जाने के लिए मेट्रो स्टेशन की तरफ मुड़ा लेकिन मेरे कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे. इतवार की वो सुबह थी, और मैं जाने कितनी देर मेट्रो के फुटओवर ब्रिज पर खड़े होकर जाने क्या सोचता रहा था. तुम्हारी कई तस्वीरें आँखों के सामने घूम रही थीं, पिछले दिनों की बातें एक के बाद एक किसी फिल्म की तरह मन में चल रहीं थीं....“तुम्हारा वो उदास चेहरा, जब तुम्हें देखा था जिस सुबह तुम शहर आई थी.....उसके एक दिन पहले की रात, जब पूरी रात तुम बेचैन रही थी , कॉफ़ी हाउस में बिताया  वो वक़्त, इंडिया गेट की वो शाम, पुराने किले पर बीता वो दिन...एक के बाद सभी बातें मुझे याद आ रहीं थीं. मुझे वापस घर जाने की भी कोई जल्दी नहीं थी. मुझे याद नहीं लेकिन मैं बहुत देर तक उस फुटओवर ब्रिज के सीढ़ियों पर बैठा रहा था. मेरे आँखों के सामने बस तुम्हारा चेहरा था, और मन में वही नज़्म पढ़ रहा था जिसे पढ़ते एक शाम तुम्हारी आँखें नम हो गयीं थी....

जैसे झन्ना के चटख जाए किसी साज़ का इक तार
जैसे रेशम की किसी डोर से कट जाती है ऊँगली
ऐसे इक जर्ब-सी पड़ती है कहीं सीने के अन्दर
खींचकर तोड़नी पड़ जाती है जब तुझसे निगाहें

तेरे जाने की घड़ी, आह, बड़ी सख्त घड़ी है

- गुलज़ार

तेरे जाने की घड़ी बड़ी सख्त घड़ी है

Friday, January 31, 2014


जनवरी का ये आखिरी दिन है. मैं कॉफ़ी होम में बैठ कर कुछ तारीखें याद कर रहा हूँ. कुछ खत याद आ रहे हैं, जो यहाँ बैठ कर तुम्हें लिखा करता था. कुछ लम्हे जो यहाँ हमने और तुमने एक साथ बिताये थे. तुम्हें याद है न? जब से तुम्हें मैंने कॉफ़ी होम के बारे में बताया था तब से तुम कितनी बेताब हो गयी थी यहाँ आने के लिए और यहाँ की कॉफ़ी पीने के लिए. यहाँ मिलने वाली फ़िल्टर कॉफ़ी के बारे में जब भी तुम्हें बताया और जब कभी शाम में तुम मुझे फोन करती और तुम्हें मैं कहता कि मैं कॉफ़ी होम में बैठ कर फ़िल्टर कॉफ़ी पी रहा हूँ. तुम कितनी जल सी जाती थी. तुम प्यार से चिढ़ते हुए कहती “जला लो मुझे...और तुम्हें आता ही क्या है..” और मैं बस मुस्कुराते रहता था.

आज बड़े दिनों बाद कॉफ़ी होम आया हूँ तो मुझे अचानक कुछ बातें याद आ गयीं. असल में उन बातों का याद आना अचानक नहीं बल्कि स्वाभाविक था. आखिरी बार कॉफ़ी होम तुम्हारे साथ ही आया था और उस दिन के बाद सीधे आज आया हूँ. कॉफ़ी होम में आते ही दिसंबर के उस खूबसूरत दिन के साथ कुछ और बातें भी याद आते चली गयीं. मैं इस कैफे में आज उसी टेबुल पर जा बैठा था जहाँ बैठकर मैंने तुम्हें वो लम्बा सा खत लिखा था. याद है न तुम्हे वो खत? ऑफकोर्स तुम्हें याद होगा. तुम भूल भी कैसे सकती हो. वो खत तुम्हारे जन्मदिन का तोहफा था जो यहाँ बैठकर मैंने तुम्हारे लिए लिखा था.

अक्टूबर के आखिरी कुछ दिन थे वे. शायद बाईस या तेईस अक्टूबर का दिन था. याद नहीं सही से मुझे. उस दिन मैं बहुत बीमार था. सुबह जब आँख खुली तो पूरा बदन बुखार से तप रहा था. तुमने सुबह ही मुझे हिदायत दे दी थी कि दो दिन से तुम्हारी तबीयत ख़राब है, आज घर पर ही आराम करना. लेकिन मैं घर पर आराम करना नहीं चाह रहा था. तुम्हें ख़त लिखने का वो आखिरी दिन था. वरना एक दिन भी और देर करता मैं तो तुम्हें वक़्त पर शायद खत ना मिलता. उस दिन मैं चाहता तो घर में भी बैठकर तुम्हें खत लिख सकता था, लेकिन घर में बैठ कर कुछ भी लिखना मेरे लिए हमेशा मुश्किल काम रहा है. ख़त, कवितायें या डायरी लिखने के लिए मैं अकसर किसी पार्क या कैफे में चला आता हूँ.

कुछ चालीस मिनट का वक़्त लगता है मुझे अपने घर से कॉफ़ी होम आने में. शहर का ये मेरा सबसे पसंदीदा कैफे हैं जहाँ अकसर शाम में मैं देर तक बैठता हूँ. यहाँ आने के लिए चालीस मिनट की दूरी कभी अखरी नहीं मुझे. लेकिन उस दिन उस चालीस मिनट में कम से कम मैंने चालीस बार ये सोचा था कि आज मुझे घर पर ही रुक जाना चाहिए था. हिम्मत जवाब दे रही थी. कमजोरी इस कदर थी. लेकिन तुम्हें खत लिख कर पोस्ट करना था. मैं कैफे पहुँचा और एक फ़िल्टर कॉफ़ी, स्नैक्स आर्डर कर कैफे के अपने फेवरिट जगह पर आकर बैठ गया. बैग से मैंने वो लम्बा सा लेटर पैड निकाला और तुम्हें ख़त लिखना शुरू कर दिया. लिखना जो मैंने शुरू किया तो बस लिखते गया, बीच में सिर्फ एक बार एक कप और फिल्टर कॉफ़ी आर्डर करने के लिए मेरे हाथ रुके थे. मैं बहुत देर तक लिखता रहा था और लेटर पैड के नौवें पेज पर आकर मेरी कलम रुकी थी. उससे आगे लिखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. शायद तबीयत थोड़ी बिगड़ने लगी थी. मैंने खत लिखना वहीँ बंद कर दिया. तुमने गौर भी किया होगा न कि उस खत का कोई अंत था ही नहीं. वैसे खतों का अंत होता भी नहीं है...लेकिन उस खत को मैंने अचानक ही बंद किया था. तबीयत साथ देती अगर मेरी तो शायद मैं और कई पन्ने लिखते रहता.

कॉफ़ी होम से जब मैं निकल रहा था तो मुझे ये सोच बड़ी हैरत हो रही थी कि मैं पिछले दो दिन बिस्तर पर पड़ा रहा था. बैठने की हिम्मत नहीं थी, और यहाँ बैठकर ढाई घंटे में तुम्हें इतना बड़ा खत लिखा दिया. उस शाम घर पहुँचते पहुँचते बुखार थोड़ा और बढ़ गया था. लेकिन मुझे इसकी ज़रा भी चिन्ता नहीं थी. तुम्हें खत लिख कर भेजना था, सो मैं भेज चूका था. कैसे भूल सकता हूँ, जब तुम्हें वो खत मिला था. तुम कितनी खुश हो गयी थी...तुमने उसी वक़्त मुझे फोन किया था और कहा था “दिल्ली से मेरे लिए एक ख़त आया है...”. तुम्हारी आवाज़ से तुम्हारी ख़ुशी का अंदाज़ा हो रहा था मुझे. मैं शायद भूल भी नहीं पाऊँगा खत मिलने पर तुम्हारा वो रिएक्शन . उस समय मुझे लगा की तुम्हें ख़त लिखने में जो भी थोड़ी बहुत तकलीफ हुई थी मुझे, वो बिलकुल “वर्थ” थी.

तुम पहली बार यहाँ जब आई थी, वो दिसंबर का एक दिन था न? सात दिसंबर का दिन था वो. हम उस दिन पूरा शहर घूमे थे. सुबह से शाम तक. उसके आसपास के दिन बड़े संघर्ष के दिन थे. उलझनों से भरे हुए. कुछ अपनों की बातों ने तुम्हें बहुत दुःख पहुँचाया था. उन बातों से तुम्हारे दिल को बहुत ठेस पहुंची थी. तुम बिलकुल टूट गयी थी. रात भर तुम फोन पर रोती रही थी और मैं तुम्हें समझाने की, तुम्हें सँभालने की कोशिश कर रहा था. बड़ी मुश्किल से रात के एक बजे तुम्हें नींद आ पायी थी. लेकिन मैं पूरी रात जागा रहा था. अचानक जो बातें सामने आई थी वो कैसे सुलझेगी ये सोच रहा था. तुम्हारे बारे में सोच रहा था. कल का दिन कैसे बीतेगा उसके बारे में सोच रहा था. हमने पूरा दिन दिल्ली घूमने का प्लान बनाया था, लेकिन वो घूमना अब “आउट ऑफ़ क्वेश्चन” था. मैं बस इतना चाह रहा था कि तुम्हारी सभी परेशानियाँ खत्म हो जाए. रात भर मैं प्रार्थना करते रहा था, कि तुम जब सुबह जागो तो सब कुछ ठीक हो जाए. शायद ऊपर बैठा कोई खुदा है जरूर. प्रार्थनाओं में असर भी होता है, ये हमने उस दिन देखा था. चमत्कार जैसा ही कुछ कहेंगे न उसे कि सुबह तुमने मुझे फोन किया था और कहा था “आ जाओ, हम चलेंगे घूमने”. तुम्हारी आवाज़ थोड़ी बेहतर लगी थी मुझे और मैं तुमसे मिलने के लिए निकल पड़ा था.

पूरे रास्ते मैं सोचता रहा था कि आज क्या होगा? कैसा बीतेगा आज का दिन? तुमने तो कह दिया कि हम चलेंगे? लेकिन उन बातों का क्या होगा? वो उलझन कैसे सुलझेगी? जब तक दिमाग में वो बातें चलती रहेंगी तब तक क्या हम दोनों पूरे मन से शहर घूम भी पायेंगे? एन्जॉय कर पायेंगे? लेकिन तुमने बड़े विश्वास से कहा था कि “चले आओ, हम घूमने चलेंगे...ना भी चले तो कम से कम तुम्हारा साथ रहेगा पूरे दिन....मेरे लिए यही सबसे बड़ी बात होगी”

तुम जब मेरे सामने आई थी तो तुम्हारा चेहरा देख कर मेरा दिल एकदम बैठ सा गया था. हमेशा खिला हुआ सा रहने वाला तुम्हारा चेहरा मुरझाया हुआ था. एक फीकी मुसकराहट तुम्हारे चेहरे पर थी. मुझे देखते ही तुमने थोड़ा और मुस्कुराने की थोड़ी कोशिश की, लेकिन पूरी तरह कामयाब नहीं हो पायी. दिल ने कहा कि तुम्हें उसी वक़्त गले लगाकर कहूँ “घबराओ मत, सब ठीक हो जायेगा”.

तुम जानती हो मैंने कितनी मुश्किल से खुद को सँभाला था उस वक़्त. सोचता हूँ आज कि अगर मेरे चेहरे पर
तुम्हें वो भाव दिख जाते जो तुमसे मिलने के आधे घंटे पहले तक थे, तो तुम क्या करती ? तुम खुद को संभाल पाती या नहीं? मैं तुम्हें सम्हाल पाता या नहीं? बहुत जतन करना पड़ा था मुझे अपने चेहरे पर वो मुसकराहट लाने के लिए. मेरी वो कोशिश लेकिन व्यर्थ नहीं थी. मुझे यूँ मुस्कुराता देख तुम्हारे उस मुरझाये चेहरे पर एक अलग रौनक , एक अलग ही चमक आ गयी थी....है न?

बातें करते हुए तुम थोड़ी शांत दिख रही थी... हालांकि रात की बातों का असर तो तुम्हारे चेहरे पर था लेकिन फिर भी तुम मुसकुरा रही थी. ये तुम्हारे उसी फाईटिंग स्पिरिट की ही बदौलत था जिसका मैं हमेशा से कायल रहा हूँ. दुखों तकलीफों से कैसे उबरा जाता है...हज़ार दर्द हों दिल में, फिर भी उन सब को इग्नोर करते हुए कैसे मुस्कुराया जाता है और कैसे खुश रहा जाता है ये कोई तुमसे सीखे. इस मामले में मुझे तो तुमसे हमेशा एक इन्स्परेशन मिलती रही है.

उस दिन भी तुम्हारी यही सोच थी कि जो भी हो, हमें दिन हँसते हुए बिताना है..एक दूसरे के साथ. हम घूमने निकल गए थे, सारी उलझनों को पीछे छोड़कर. और कमाल की बात देखो, मेरे आते ही वो सारी परेशानियां, वो सारी उलझनें बहुत हद तक सुलझते गयी थी. तुम इस बात से बहुत खुश हो गयी थी. तुमने कहा था मुझसे, कि देखो भगवान भी कितने चमत्कार करते हैं न. “थैंक यू गॉड ” तो तुमने उस दिन जाने कितनी बार कहा होगा.
हम पूरे दिन पुराना किला, जंतर मन्तर, इंडिया गेट और कनॉट  प्लेस घूमते हुए हम वापस आये थे. पुराने किले में बिताया समय कितना अच्छा था न. मैं तुम्हें एक गाइड की तरह सब कुछ दिखा रहा था. दीवारों की नक्काशी तुम्हें दिखाते हुए मैंने कहा था, ये देखो ये नक्काशी नहीं, आयतें लिखी हुई हैं. और वो बात कहते ही मुझे अचानक “आंधी” फिल्म का वो गाना “तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं” याद आ गया. मैं सही सही नहीं कह सकता लेकिन मुझे लगता है कि उस वक़्त तुम्हें भी इस गाने की याद आई होगी. तुमने भी मन में इसे गुनगुनाया होगा न? ये तो वैसे भी तुम्हारे पसंदीदा गानों में से एक है...है न? याद है एक सुबह जब मैंने तुम्हें फोन किया था और तुम्हें बताया था कि ये गाना मैं अभी सुन रहा हूँ, तो तुम फोन पर ही इस गाने को गुनगुनाने लगी थी और मैं जो भी काम कर रहा था और जो बातें तुमसे कहनी थी, वो सब भूल चूका था. बस तुम्हारे गाने में, तुम्हारी आवाज़ में मैं खो गया था. तुम नहीं मानती हो न तुम्हारी आवाज़ कितनी अच्छी है. ये मेरे से पूछो. दिल को कितना सुकून पहुंचती है तुम्हारी आवाज़. ये तुम नहीं जानती. तुम जान भी नहीं पाओगी कभी. तुम्हारी आवाज़ के लिए मेरी डिक्शनरी में सिर्फ एक ही शब्द है... सोलफुल.

पुराना किला और जंतर मंतर घूम कर जब हम कॉफ़ी होम पहुंचे, तब तक तुम थोड़ी थक चुकी थी. तुम सीधे वहीं चली गयी थी, जो कैफे का मेरा पसंदीदा कोना था. तुम उसी टेबुल पर जाकर बैठ गयी थी. मैंने अपना बैग तुम्हारे पास छोड़ दिया था और आर्डर देने काउंटर की तरफ गया. तुम्हें अचानक बदमाशी सूझ गयी थी. मैं फ़ूड काउंटर पर डोसा और कॉफ़ी के इंतजार में खड़ा था कि तुम मौका देखते ही झट से मेरे बैग में ताक-झाँक करने लगी. मेरी डायरी निकाल कर तुम पढ़ने लगी थी. काउंटर से मैं तुम्हें देखकर मुसकुरा रहा था और फिर तुम्हें थोड़ा चौंकाने के लिए मैं दौड़ते हुए तुम्हारे पास आ पहुँचा था और लगभग स्किड करते हुए तुम्हारे पास आ रुका था. तुम बिलकुल चौंक सा गयी थी. शायद थोड़ा डर भी गयी थी तुम. तुमने डायरी पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली, कि  कहीं मैं उसे छीन ना लूँ तुमसे. “जाओ...जाओ जाकर काउंटर के पास खड़े रहो, मैं तुम्हारी नहीं, अपनी डायरी पढ़ रही हूँ, तुम्हें क्या?” तुमने कहा था और मैंने तुम्हारे पीठ पर एक थपकी देते हुए कहा “पढ़ लो बदमाश”. उस समय तुम बिलकुल वैसे ही मुस्कुराई थी जैसे तुम अकसर मुस्कुराती हो. मुझे लगा कि जैसे जो मुस्कराहट तुम्हारे चेहरे से गायब हो गयी थी वो अब धीरे धीरे वापस लौट रही है.

तुम उस दिन बातें करते वक़्त मेरी तरफ नहीं देख रही थी. तुम्हारी नज़रें कभी डोसे की तरफ जाती तो कभी आसपास बैठे दूसरे लोगों की तरफ....लेकिन तुम साफ़ तौर पर मुझे नहीं देख रही थी...और जब कभी बातों के बीच हमारी नज़रें मिल जाती, तुम्हारे चेहरे पर एक मुसकराहट फ़ैल जाती थी. तुम क्यों मेरी तरफ नहीं देख रही थी, ये भी मैं अच्छे से समझता हूँ, जानता हूँ. लेकिन मैं...मैं तो पूरे वक़्त सिर्फ तुम्हें ही देखता रहा था. कुछ बातों से कैसे तुम इरिटेट होकर शक्लें बनाने लगी थी..,कैसे मेरी कुछ बदमाशी वाली बातों पर तुम मन ही मन मुसकुरा रही थी...मैं वो सब देख रहा था. तुम खुल के कुछ भी नहीं कह रही थी, लेकिन मैं सब समझ रहा था.
हम लोग शायद एक घंटे कॉफ़ी होम में बैठे होंगे न? तुम्हें भी वो जगह काफी पसंद आई थी, और तुमने कहा था कि  अगर  मैं यहाँ रहती तो तुम्हारे साथ अकसर यहाँ चली आया करती शाम में, कॉफ़ी पीने . वहाँ से निकल कर हम इंडिया गेट की तरफ बढ़ गए थे. मुझे थोड़ा अफ़सोस हुआ था मैंने पहले ही उधर जाने का प्लान बना लिया था और तुम्हें कनॉट  प्लेस घूमना था. तुमने कहा भी था न मुझसे. सच कहो तो मैं भी चाहता था तुम्हारे साथ कनॉट  प्लेस का एक चक्कर लगाना. तुम्हे मैं वो आर्चीस गैलरी दिखाना चाहता था जहाँ से मैंने तुम्हारे लिए तोहफे खरीदे थे. तुम्हारे गले के लिए एक खूबसूरत सा चेन भी तो मैंने वहीं से खरीदा था. उस दिन अर्चिस गैलरी के काउंटर पर बूढ़ी महिला बैठीं थीं. उन्हें जब मैं पैसे देने पहुँचा तो उन्होंने उस चेन को देखते ही कहा था “बहुत सुन्दर तोहफा है. फॉर समवन स्पेसिअल?”. मैंने हाँ में सर हिलाया. उन्होंने कहा “उसे बहुत पसंद आएगा.” मैंने उन्हें धन्यवाद कहा और बाकी पैसे लेकर दुकान के बाहर आ गया. एक पागलपन वाला ख्याल था. मैं चाहता था कि तुम्हें भी वहाँ ले जाऊं और उसी बूढ़ी महिला से मिलवाऊं. उन्हें बताऊँ कि इसी ख़ास लड़की के लिए मैंने कल आपके दुकान से वो तोहफा खरीदा था. अगर रात में अचानक वो सारी बातें ना हुई होतीं, तो मैं सच में तुम्हे अर्चिस गैलरी ले जाता और उस बूढ़ी महिला से मिलवाता तुम्हें

लेकिन हम कनॉट  प्लेस ना जाकर इंडिया गेट आ गए थे. हम कुछ देर तक इंडिया गेट घूमते रहे थे. तुमने वहाँ भी मुझसे कहा था कि तुम्हें कनॉट  प्लेस घूमना है. मैंने तुम्हारी इस बात को इग्नोर कर दिया था. क्योंकि हमारे पास समय कम था. “वापस जाकर मैं करुँगी भी क्या? इससे अच्छा है यहीं घूम लूँ मैं..” तुमने कहा था. लेकिन मैं अड़ा रहा था अपनी बात पर...कि यहाँ से हम वापस लौट जायेंगे. तुम थोड़ी उदास सी हो गयी थी. तुम वहाँ लगी एक सीमेंट की बेंच पर जाकर बैठ गयी थी. तुम्हारा चेहरा हल्का बुझा हुआ सा दिख रहा था. तुम कुछ कह नहीं रही थी, लेकिन तुम वहाँ से वापस नहीं जाना चाहती थी. तुम्हारे मन में उस वक़्त जो बातें चल रही थी वो सिर्फ मैं जान रहा था लेकिन खुल कर तुमसे कुछ कह नहीं पा रहा था. तुम भी खुल कर मुझसे कहाँ कुछ कह पा रही थी. तुम अपना ध्यान बँटाने के लिए वहाँ खेलते कुछ बच्चों को देखने लगी थी. तुमने कहा था मुझसे “यहाँ कितना अच्छा लग रहा है. कितना अच्छा माहौल है. और तुम इस खूबसूरत ऐट्मस्फिर को छोड़कर जाने के लिए कह रहे हो..यहाँ से मेरा तो जाने का दिल भी नहीं कर रहा. ऐसे खूबसूरत माहौल से जाना कितना उदास और बोरिंग सा ख्याल है”

लेकिन वक़्त सच में हो चला था और मैं चाहता था कि हम समय रहते ही वापस लौट जाएँ. वापस लौट आने पर भी तुम मेरे साथ एक डेढ़ घंटे तक रही थी. शाम के उस वक़्त तुम बहुत हद तक शांत हो चुकी थी. तुम्हारे मन के अन्दर जो तूफान उठे हुए थे, वो शांत हो गए थे. तुम्हारा मन स्थिर था. तुम अपनी युज्वल बदमाशी वाली बातें करने लगी थी. तुम खेलने लगी थी मेरे हाथों से. मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर तुम नाप रही थी.. “तुम्हारा हाथ सच में मेरे से बड़ा है” तुमने कहा था. फिर मैं तुम्हें तुम्हारे हाथों की रेखाओं से पहचान करवा रहा था... “ये देखो, इसे भाग्य रेखा कहते हैं,” ये देखो इस रेखा को ये कहते हैं....और जाने क्या क्या....” तुम मेरी बातें ऐसे सुन रही थी जैसे मैं सच में मैं हाथ की रेखाएं पढ़ना जानता हूँ.

तुम नहीं चाहती थी कि मैं तुम्हे छोड़ कर वापस इतनी जल्दी लौट जाऊं. लेकिन मेरा लौटना जरूरी था. डेढ़ घंटे बस तुम्हारे लिए मैं रुक गया था. मैं जब वापस आ रहा था तो तुम बाहर गेट तक मुझे छोड़ने आई थी. जब तक मैं गली से मुड़ न गया था तब तक तुम देखती रही थी मुझे. बस पर जब बैठा मैं अपने घर की ओर जा रहा था तो कई सारी बातें दिमाग में चल रही थी. लेकिन सबसे ज्यादा आश्चर्य और ख़ुशी की बात ये थी कि हमने आज का पूरा दिन साथ बिताया था. कल रात जो बातें हो गयी थी, उससे दिन भर साथ रहना नामुमकिन सा लग रहा था. लेकिन ये तुम भी जानती हो और मैं भी कि हम दोनों का एक-साथ पूरा दिन बिताना कितना जरूरी था. वापस लौटते वक़्त मेरी नज़र मेरी पॉकेट में पड़ी एक कागज़ पर नज़र गयी. उमसे मैंने शहर के उन जगहों के बारे में लिखा था जहाँ तुम्हारे साथ मैंने जाने का प्लान बनाया था. मैंने उस नोट को एक बार पढ़ा और मन ही मन मन सोचा, अच्छा जब तुम अगली बार आओगी दिल्ली तो तुम्हें इन सब जगह मैं घुमाऊंगा.

दिल्ली डायरी (४)

Monday, January 20, 2014


सुबह के छः बज रहे थे. हमेशा की तरह आज भी वो अलार्म बजने के पहले ही जाग गया था. जाड़ों की सुबह इतनी जल्दी जागने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन फिर भी वो जाग गया. रात में कई बार उसकी नींद टूटती रही थी. कुछ अनसुलझे सवाल ऐसे थे जिसका जवाब उसके पास नहीं था...रात भर वे सवाल उसे परेशान करते रहे थे. बहुत देर तक वो बिस्तर पर यूँ ही पड़ा रहा, जैसे फैसला नहीं कर पा रहा हो कि उठे या न उठे. तीन दिन उसके अच्छे बीते थे. तीन दिन से उसके रिश्तेदार आये हुए थे तो तीन दिन वो काफी व्यस्त रहा लेकिन कल रात उनके चले जाने के बाद वो फिर से एकदम खाली सा हो गया था. उसने अपनी आँखें फिर से बंद कर ली... उठने का भी क्या फायदा? ना तो उसके पास कोई काम है ना ही शहर में कोई ऐसा जिससे वो मिल सके या जिनके साथ वक़्त बिता सके. आज का दिन कैसे कटेगा? - उसने सोचा. बहुत याद करने की कोशिश की उसने, लेकिन कोई भी ख़ास काम उसे याद नहीं आया. कुछ जॉब एजन्सीस में उसे जाना तो है, लेकिन वो भी तब जब उधर से कोई फोन आएगा.

फिर से एक खाली सा बेकार सा निरर्थक सा दिन उसे बिताना है...एक कोरा दिन जिसका कोई हासिल नहीं. आज फिर पूरा दिन यूँ हीं बसों में शहर घूमते हुए काटना है – उसने सोचा. एक हलकी बेचैनी ने उसे पकड़ लिया. वो उठ कर सुस्त क़दमों से अपने घर की खिड़की के पास आ पहुँचा. शीशे की उस बड़ी सी खिड़की से सामने मुख्य सड़क दिखाई देती थी. वो हर सुबह उठ कर अपने घर के खिड़की के पास आता और लोगों को काम पर जाते हुए देखता. हर कोई किसी न किसी काम के लिए  सुबह तैयार होकर घर से निकलता....लेकिन वो...उसे कोई काम नहीं है...और वो अपने घर की खिड़की से बाकी लोगों को काम पर जाते देख रहा है...उसने सोचा वो शहर के उन लोगों में से है जो फ़िलहाल बेकार बैठे है और जिन्हें सिवाए दिन भर निरुद्देश्य इधर उधर भटकने के कोई दूसरा काम नहीं है.

उसे ये ख्याल हमेशा बड़ा भयावह सा लगता है....कि वो उन लोगों में से है जो अभी खाली हैं...बेकार हैं, और घरों में बैठे हैं. खिड़की से उसने आँखें मोड़ ली और गैस पर चाय चढ़ा कर उसने अपने कमरे को एक बार देखा...उसका वो कमरा सस्ते दामों पर मिला एक स्टूडियो अपार्टमेंट था. यूँ तो वो अकेला रहता था लेकिन उसके कमरे को देखने पर लगता था जैसे वो परिवार के साथ रहा रहा हो.. कई सारी चीज़ें उसने जमा कर रखी थी....और जब कभी वो अपने कमरे का यूँ जायजा लेता हमेशा उसे लगता कि उसे इतनी चीज़ें जमा कर के रखनी नहीं चाहिए थी. कोई अनजाना उसके घर आता तो उसके घर को देखकर ये सवाल जरूर पूछता उससे कि शादी हो गयी आपकी? वो चुपचाप “ना” में गर्दन हिला देता. वो व्यक्ति फिर कहता, आपके घर को देखने से लगता है आप परिवार के साथ रहते हैं...वो इसका कुछ भी जवाब नहीं देता. ‘परिवार के साथ रहना’, ‘शादी’ इसके बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं. उसकी माँ भले हर दो तीन दिन पर इस विषय पर बात कर लेती लेकिन वो हमेशा उसके सवाल को टाल देता. माँ भी उसकी मजबूरी समझती, और वो ज्यादा सवाल नहीं करती...बात को रोक दिया करती. “शादी” के लिए वो शायद तैयार नहीं था. उसे ये शब्द किसी दूर की चीज़ मालूम लगती थी. वो इस बारे में कभी नहीं सोचता था. ऐसी कई बातें थी जिसके बारे में वो कभी नहीं सोचता...कुछ भी नहीं सोचता...ये वैसी चीज़ें थी जो उसके वश में शायद नहीं थी.

अपने कमरे में वो ज्यादा देर रह नहीं सका...जल्दबाजी में या शायद फ्रस्टेशन में वो तैयार होकर बाहर निकल गया. यूँ भी दोपहर के समय वो पूरा दिन अकेले कमरे में नहीं रहता था...दिन में घर पर रहना हमेशा उसके लिए असंभव सा रहा है. काम ना भी रहता तो भी वो निकल जाता था घर से. घर से निकलते ही वो सामने वाले होटल में चला जाता जहाँ वो कुछ देर बैठता और सुबह का अख़बार पढ़ता, वहाँ उस होटल में वो सुबह की दूसरी कप चाय पीता और कभी मन करता तो सुबह का नाश्ता भी कर लेता. चाय नाश्ता के अलावा सुबह इस होटल में आने की उसकी एक और वजह थी... यहाँ उसे अपने ही जैसे कई लोग मिल जाते जो हर सुबह चाय पीने और नाश्ता करने आते थे. वे यहाँ लम्बी बहसें किया करते थे....कंपनियों के रिक्रूट्मन्ट प्रोसेस, मैनेजमेंट पोलिसिस से लेकर देश की पोलिटिकल व्यवस्था तक हर बात पर वो सिस्टम को जी भर कोसते. वो बस दूर बैठे हुए उन लोगों की बहस सुनते रहता...कभी वो बहस का हिस्सा नहीं बना...वैसे भी ऐसे लोगों से वो दूर ही रहना पसंद करता था. लेकिन सुबह का ये वक़्त, उन लोगों को यूँ बहस करते देख उसे अच्छा लगता....उसे ये यकीन होता कि उसकी तरह दुनिया में और भी कई लोग हैं जो अभी काम के तलाश में हैं और पूरा दिन खाली हैं.

होटल में बैठे हुए वो हर दिन सोचता कि ये फेज है, और ये फेज भी गुज़र जाएगा. लेकिन उसे सिर्फ काम की चिंता नहीं थी. काम आज नहीं तो कल उसे मिल ही जायेगा....वो कभी काम के बारे में ज्यादा नहीं सोचता. उसे दूसरी  चीज़ों की फ़िक्र ज्यादा रहती, अपनी बड़ी बहन की ज़िन्दगी में चल रही  कुछ बातों की, एक दोस्त की, जो ज़िन्दगी के क्रिटिकल फेज पर खड़ी है...अपने घर की कुछ बातें जो वो ना चाहते हुए भी सोचता है...आने वाले दिनों में ये समस्याएं कैसे और कब सुलझेंगी...सुलझेंगी भी  या और उलझ जायेंगी....उसका दिमाग इन बातों में लगा रहता. वो ये जानता कि इन बातों को सोचने का कोई ख़ास फायदा नहीं और वक़्त आने पर सब बातें सुलझते जायेंगी. लेकिन फिर भी अकसर ये सारी बातें बहुत देर तक उसके दिमाग में चलती रहतीं. ऐसा नहीं है कि उसके लिए ये कोई नयी बात है. पहले भी वो बहुत उलझनों से गुज़रा है...लेकिन उन दिनों वो हमेशा इन बातों को इग्नोर करने में कामयाब रहता था...अब शायद वक़्त जैसे जैसे बीतता जा रहा है, वो इन बातों को नजरंदाज आसानी से नहीं कर पाता.. शायद अब ऐसे बड़े शहर में अकेले रहना वो नहीं चाहता. शायद उम्र के इस मोड़ पर आकर अकेलापन उसे थोड़ा सताने लगा है. कई बार उसने सोचा कि वापस घर लौट जाए. माँ भी कई बार उसे वापस आ जाने के लिए कह चुकी है. एक दो बार कमज़ोर घड़ियों में उसने लगभग तय भी कर लिया था कि अब बस बहुत हुआ...अगले दिन ही यहाँ से सामान समेट कर वापस घर चले जाना है. जैसे यहाँ खाली हूँ, वैसे ही वहाँ रहूँगा. कम से कम घर पर इस बात का तो भरोसा रहेगा कि मैं अकेला नहीं हूँ...लेकिन घर लौटना इतना आसान नहीं है...घर लौटने का मतलब होगा अपनी हार स्वीकार कर लेना...उसने कुछ लाईनें पढ़ी थी एक कहानी में, हालाँकि वो मन की बात हो सकती है या नहीं ये वो नहीं जानता...लेकिन उसे कहानी की वो बात याद आती है... “एक उम्र के बाद तुम घर वापस नहीं जा सकते. तुम उसी घर में वापस नहीं जा सकते, जैसे जब तुमने उसे छोड़ा था.” . वो आँखें बंद कर के कुछ सोचने लगता है.

"सर कुछ और चाहिए ?"

ये होटल के वेटर की आवाज़ थी. उसके सामने होटल का वेटर खड़ा था..उस वेटर ने उसे यूँ टोककर एकदम से उन ख्यालों से बाहर निकाल दिया था...जैसे अचानक ही किसी ने ब्रेक लगा दिया हो उन बातों पर...ऐसे पता नहीं कितनी ही बार हुआ होगा कि उस वेटर उसे किसी सोच से बाहर निकला है...यूँ टोक कर. हर बार वो सोचता कि  वेटर को वो बताये कि उसने कितना अच्छा कम किया उसके फ़ालतू के ख्यालों पर यूँ ब्रेक लगाकर...लेकिन वो बस मुस्करा कर उसे देखता है.
“नहीं......कुछ नहीं” कह कर होटल के बाहर निकल आया.

आज धूप निकली हुई है, दिन कितना अलग सा लग रहा है....होटल के बाहर निकलते ही उसने सोचा. पिछले कई दिनों से धूप के दर्शन नहीं हुए थे, और आज सुबह अचानक धूप निकल आई थी. दिन खुला हुआ सा लग रहा था. आज वो थोड़ा खुश भी था. खुश होने की वजह कुछ ख़ास नहीं थी. होटल में पैसे देते वक़्त जब उसने अपना वॉलट खोला तो उसे ये देखकर हलकी ख़ुशी हुई कि उसके जेब में अब भी तीन सौ रुपये बचे हुए हैं. उसे याद आया कि चार दिन पहले उसने पाँच सौ रुपये एटीएम् से निकाले थे और अब भी तीन सौ रुपये बचे हुए हैं. ये ख़ुशी की बात थी. चार दिनों में मात्र दो सौ रुपये का खर्च होना...ये किसी चमत्कार से कम नहीं था. उसे याद आया कि तीन दिन जो उसके रिश्तेदार उसके साथ रुके थे, उन्होंने उसे कुछ भी खर्च करने नहीं दिया था...इसी वजह से उसके पैसे बचे रह गए थे. उसने सोचा कि जो पैसे बच गए हैं उनसे आज शाम वो कुछ अपनी पसंद की चीज़ खरीद सकेगा. वैसे यूँ अपने वॉलट में ऐसे बचे हुए पैसे को देखना उसके लिए एक हलकी सी ख़ुशी नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी ख़ुशी की बात होती थी.

दिन भर वो जाने कहाँ कहाँ घूमता रहा...छत्तरपुर का मंदिर, क़ुतुब मीनार, पंचशील मार्ग जहाँ सड़क के दोनों तरफ अलग अलग देशों के एम्बेसीज हैं और जहाँ उसे पैदल टहलना अच्छा लगता है....इंडिया गेट....जंतर मंतर और पुराना किला, जो उसके लिए बहुत ख़ास है. जाने कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हैं इस पुराने किले से. पुराने किले के बाहर खड़े होकर वो उन सब बातो को याद करने लगता है, जो इस जगह से जुड़ी हैं. कुछ दिन याद आते हैं उसे...१० जनवरी, २ जून, ७ दिसंबर...यहाँ बिताये बहुत से खूबसूरत दिनों में से ये तीन दिन उसे याद रह गए हैं. वो किले के बाहर ही खड़ा रहता है. आमतौर पर वो किले के अन्दर जाने से बचता है. वो जानता है किले के अन्दर जाने का मतलब होगा कई सारे बातों को फिर से सोचना. वो ये नहीं चाह रहा था. वो दिन में अब और कोई भी चीज़ सोचना नहीं चाह रहा था. वो बस ये चाहता था कि  घर पहुँचने के पहले वो इतना थक जाए कि घर में जाते ही वो बस बिस्तर पर पसर जाए और एक लम्बी नींद ले सके.

शाम में जब वो थक कर घर आता तो हमेशा उसे एक अजीब सी तन्हाई पकड़ लेती...कुछ देर के लिए वो बहुत अकेला महसूस करता. ज्यादा देर नहीं, बस कुछ मिनट के लिए. यूँ भी शाम में अकेले घर में वापस आना थोड़ा तकलीफदेह होता है. जाड़ों के दिनों में अकेला घर शायद कुछ ज्यादा ही सूना सा लगता है. ख़ासकर के शाम में...एक अजीब सी गंध फैली होती है घर में, शायद तनहाई की गंध होती है वो. घर का दरवाज़ा खोलते ही वो अजीब सी गंध उसे हमेशा जकड़ लेती. वो घर का दरवाज़ा खोल कुछ देर सीढ़ियों के पास ही खड़ा रहता है. सामने कुछ लड़के दिखाई देते हैं जो अपने बालकनी  में खड़े होकर सिगरेट पी रहे होते हैं. वे पाँच लड़के हमेशा शाम में अपने बालकनी में दिख जाते हैं. उन्हें देख अकसर उसे वे दिन याद आते हैं जब वो अपने दोस्तों के साथ रहता था..वे उसके मस्ती के दिन थे. कुछ देर तक सीढ़ियों के पास खड़े रहने के बाद वो घर में दाखिल होता है. उसे पता होता है कि ये सर्दियों की शाम है. कोई और मौसम होता, गर्मियों के दिन होते तो वो खिड़की खोल कर बैठ सकता. छत पर जा सकता. अपने बालकोनी में बैठ सकता. लेकिन ये सर्दियों की शाम है...जो कि  बहुत सूनी सी, बहुत खामोश सी होती है. हर कुछ अपने जगह पर चुप...टेबल, कुर्सी, किताबें, लैपटॉप, दीवारें...सब चुप. टीवी भी तब तक चुप रहता जब तक उसे ऑन न करें. चालू  करने के बाद भी कुछ देर तक टीवी स्क्रीन पर ब्लू लाइट जलती रहती है...उसे अकसर लगता है जैसे टीवी की वो ब्लू लाइट उससे सवाल कर रही है....तुम सच में मुझे देखोगे? तुम्हारे पास कोई काम नहीं है? तुम्हारे कोई दोस्त नहीं हैं ? तुम मुझे देखते भी कहाँ हो....बस सामने बैठे रहते हो और जाने क्या सोचते रहते हो?

हर शाम का यही खेल होता है. वो टीवी के सामने बैठ जाता और अपनी आखें बंद कर लेता...टीवी से वैसे भी उसे ज्यादा मतलब कभी नहीं रहा. लेकिन इन दिनों वो टीवी भी देखने लगा है. शाम के समय वो बस इसलिए इस इडियटबॉक्स को चालू  करता है, ताकि कमरे में कुछ आवाजें मौजूद रहे..तन्हाई शायद थोड़ी कम होती है ऐसे में....

वो कुर्सी पर बैठकर अपनी आँखें बंद कर लेता है और पुराने दिनों की बहुत सारी तस्वीरें घूम जाती हैं. एक के बाद एक...किसी स्लाइड शो की तरह. उन दिनों की तस्वीरें जब वो अपने शहर में था... गांधी मैदान, अपना बाज़ार, मौर्यालोक, बोरिंग रोड, लक्ष्मी काम्प्लेक्स, अशोक थिएटर....और न जाने कौन कौन जगहें. वो सब एक एक कर के उसे याद आती जाती हैं.

फोन की घंटी अचानक बजती है.

उसकी माँ का फोन है. वो घड़ी देखता है. शाम के इस वक़्त माँ उसे फोन जरूर करती है. उसे थोड़ा अजीब लगा जब माँ ने फोन पर सीधे से पूछ लिया “तुम ठीक तो हो?”. माँ के इस बात को उसने टाल दिया. बात करते हुए वो सोचता है, माँ ये सवाल जब भी पूछती है उससे, वो हमेशा दिमागी उलझनों से घिरा रहता है. ये माँ का युज्वल सवाल नहीं होता. वो बस कभी कभी ही ये सवाल पूछती और उस समय वो सच में बहुत उदास सा होता है. शायद माँ है वो, इसलिए उसे पता चल जाता होगा कि मैं थोड़ा परेशान सा हूँ...उसने सोचा.
वो झटके से उठा...और माँ से बात करते हुए ही अपने किचन की तरफ आ गया.. चाय बनाने के लिए गैस पर बर्तन चढ़ा देता है. माँ उससे तरह तरह की बातें करती है. उसके लिए वो एक स्वेटर बुन रही होती है, वो उसे उस स्वेटर के डिजाईन के बारे में बताती है. उसे ज्यादा समझ नहीं आता लेकिन माँ की बातों को सुनना उसे अच्छा लगता है. उसने हमेशा से अपनी माँ को अपना इन्स्परेशन माना है...जाने कितने ही ऐसे बुरे फेज थे, जब माँ ने उसे विश्वास दिलाया था...कि फ़िक्र की कोई बात नहीं...सब ठीक हो जाएगा. माँ से बातें करते हुए वो बहुत हल्का महसूस करता है. सामने चाय के बर्तन में चाय उबल रही  होती  है....चाय के बर्तन से उठती भाप को वो देखता है, और उसे लगता है कि जैसे माँ से बात करते हुए उसके मन की वो उलझनें,  वो चिन्ताएं भी चाय से उठती भाप के साथ हवा में उड़ कर गायब हो रही है...

उसका मन सच में बहुत शांत सा हो जाता है. उसे याद आता है कि सुबह उसके पास पैसे बचे थे और उन पैसों से एक अच्छे डिनर की व्यस्वस्था हो सकती है. वो घर में ताला बंद कर के बाहर निकल जाता है.....सोचता है आज के दिन कम से कम कुछ पैसे खुद पर खर्च करूँगा...! 


खाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ, फैलाया हुआ
ठोंकरे खाता हुआ खाली लुढ़कता डिब्बा

यूँ  भी होता है कोई खाली-सा बेकार-सा दिन
ऐसा बेरंग-सा बेमानी-सा बेनाम-सा दिन


[ गुलज़ार ]

एक खाली सा दिन

Thursday, January 2, 2014

पच्चीस दिसंबर की वो सुबह थी. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी...मेरी नींद अचानक किसी आवाज़ से टूटी. पहले मुझे शक हुआ था कि कमरे में कोई है..क्योंकि बातें करने की आवाज़ आ रही थी. शायद पापा-माँ या फिर भैया या बहन होंगे, मैंने सोचा...लेकिन ठंड इतनी थी कि रजाई से बाहर मुहँ निकाल कर देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. आवाज़ें लगातार आ रही थीं और मुझे इस बात से थोड़ी चिढ़ सी भी होने लगी कि इस वक़्त इतनी ठंड में ये लोग यहाँ बैठ कर क्या बातें कर रहे हैं...कुछ देर तक जब आवाजें आनी बंद नहीं हुई तो थक हार कर मैंने रजाई से बाहर झाँका....कमरे में कोई नहीं था...एक नीली रौशनी कमरे में पसरी हुई थी. मेरा ध्यान टीवी की ओर गया...टीवी चल रहा था और मेरे कानों में टीवी की आवाज़ आ रही थी....मुझे एकाएक ख्याल आया कि रात को सोते वक़्त लाइट चली गयी थी और मैं बिना टीवी बंद किये सो गया था. लाइट कब वापस आई ये मुझे पता भी नहीं चल सका था. मैंने घड़ी देखा, सुबह के चार बज रहे थे.

रात में शायद ठंड अचानक बढ़ गयी थी, मैंने एक पतली रजाई ओढ़ी हुई थी. सोते वक़्त मुझे उम्मीद नहीं थी कि रात में यूँ अचानक ठंड बढ़ जायेगी. मैं उस पतली लेकिन गर्म रजाई में भी ठिठुर रहा था..लेकिन इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि मैं दूसरे कमरे जहाँ माँ और पापा सोते थे, वहाँ तक जाऊं और उनके कमरे से मोटी वाली रजाई लाकर ओढ़ लूँ. मैंने सोचा कि थोड़ी देर और सो लेता हूँ....लेकिन उसका भी ख़ास फायदा नहीं था. हर दिन सुबह साढ़े पांच बजे उसका फोन आता था और मैं ठीक छः बजे स्कूटर से कोचिंग के लिए निकल जाता था. मैं रजाई में ही पड़े हुए टीवी देखने लगा...टीवी पर एक फिल्म आ रही थी, मैं वही देखने लगा था..फिल्म थी "तेरी मेहरबानियाँ”. फिल्म का नाम मुझे इस वजह से याद रह गया क्योंकि उस दिन इस फिल्म का नाम लेकर मैं उसे दिन भर छेड़ता रहा था.

ठीक साढ़े पांच बजे फोन की घंटी बजी
हर सुबह यही वक़्त होता था जब उसका फोन आता था. उसे सुबह के साढ़े पाँच बजे फ़ोन करना अच्छा लगता था, सुबह के इस वक़्त उसे इस बात की फिक्र नहीं रहती थी कि कोई और फोन उठा लेगा, क्योंकि वो जानती थी कि फोन जिस कमरे में है वहाँ मैं सोता था और दूसरे लोग इतनी ठंड में सुबह सिर्फ एक फोन रिसीव करने तब तक नहीं आयेंगे जब तक फोन लगातार बज कर उनकी नींद न ख़राब कर दे.

“मैं तो ठंड से मर गयी..
तैयार होकर मैं तो फिर से रज़ाई में दुबक गयी.....
वाऊ, यु सी आई एम सो पोएटिक.”
हर सुबह फोन पर वो ये बात कहती...ये एक तरह से उसका ओपनिंग डायलॉग होता था....वो ‘हाय’ ‘हेल्लो’ कुछ भी नहीं बोलती, सीधे यही कहती थी. इस ओपनिंग डायलॉग की आदत उसे दो साल पहले की सर्दियों में लगी थी. उस साल उसे ये डायलॉग कहने की आदत इस कदर पड़ गयी थी, कि अकसर गर्मियों के दिनों में भी वो सुबह फोन पर यही डायलॉग दोहरा देती थी...और तब मैं फोन पर बहुत देर हँसता रहता और वो बिलकुल झेंप सी जाती.
सुबह उसका ये नियम था, वो कोचिंग के लिए तैयार हो जाती और फिर कुछ देर रज़ाई में दुबकी रहती, जब तक घड़ी में साढ़े पाँच न बजता....वो रज़ाई में ही दुबकी हुई अपने कोर्डलेस फोन से मुझे फोन करती...अपने उसी ओपनिंग डायलॉग से वो बातों की शुरुआत करती....कभी उसका ये डायलॉग चेंज हुआ हो, ये मुझे याद नहीं आता. उसे चिढ़ाने के लिए कभी कभी मैं मजाक में कुछ कह भी दिया करता था...लेकिन उस मजाक को अक्सर वो सिरिअसली ले लेती थी, कभी वो मेरे मजाक को डांट समझ कर चुपचाप सुनते रहती तो कभी एकदम इरिटेट होकर गुस्से में वो फोन काट देती....और फिर ठीक आधे-एक मिनट बाद खुद ही फोन कर के फोन काटने के लिए मुझसे सॉरी कहती..
उस दिन जब उसने फोन पर ये डायलॉग कहा, उसे छेड़ने के इरादे से मैंने जानबूझकर कहा...."तमाम सुविधाएं तुम्हारे पास, कोर्डलेस फोन, जिसे रजाई के अन्दर लेकर बैठ जाओ और बातें करो, गर्म पानी के लिए गीजर, रूम हीटर, ब्लोवर और पता नहीं कैसा है वो इलेक्ट्रिक ब्लैंकेट है जिसकी तुम इतनी तारीफ़ करती हो....और फिर भी तुम मर गयी ठंड से? ?हमारा क्या?सोचा है कभी?? फोन उठाने के लिए रजाई से निकलते ही लगता है ठंड से जान निकल जायेगी...ठंडे पानी से काम चलाना पड़ता है....इतनी सुबह कौन पानी गर्म करने के लिए गैस ऑन करे?टूटी खिड़की के फाट से ठंडी हवा रात में आती रहती है, हर रात सोने के पहले उसके दरारों को कागज़ से ठीक से ढंकना पड़ता है…सुविधा सभी तुम्हारे पास और ठंड से भी तुम ही मरो??ये अच्छा है..."
उधर फोन पर वो बिलकुल चुप....एकदम खामोश हो गयी....कुछ बोलने की कोशिश की उसने लेकिन कुछ कह नहीं सकी... थोड़ी देर बाद सिर्फ उसकी एक धीमी आवाज़ सुनाई दी मुझे...
"सॉरी.......मैं तो......."
मुझे समझने में देर नहीं लगी कि सुबह के मेरे इस मजाक को उसने फिर से डांट समझ लिया है, और अब पूरे दिन वो ये कहने से भी नहीं चूकेगी कि "सुबह तुम कित्ते जोल छे मेलेको डांट दिए थे?". मैं समझ गया था कि अब इससे आगे अगर मैंने एक भी शब्द कहा तो वो रो देगी....थोड़े प्यार से मैंने उसे समझाया... “यार तुम्हे मैंने डांटा नहीं था वो तो बस थोड़ा मजाक किया सुबह सुबह...बस्स्स”....
मेरे ये कहते ही वो एकदम चिढ़ सी गयी, गुस्से में उसने कहा....”यू  नो यू  आर सच अ डेविल....मेरे को कित्ते जोर से डरा दिए तुम...देखते हो कितनी तेज़ी से मेरी धड़कने चलने लगी....जाओ नहीं बात करुँगी तुमसे...”
“अच्छा यार चलो माफ़ कर दो.....मुझे क्या पता था कि  तुम फिर से इस मजाक को डांट समझ जाओगी. फ़िलहाल फोन रखो और कोचिंग के लिए निकलो वरना देर हो जायेगी....सी यू ”
"हाँ, सी यू .....तुम निकलते वक़्त दस्ताने रख लेना, और आज मुझे कोचिंग नहीं जाना...घूमना है..." कह कर उसने फ़ोन रख दिया....उसे कोचिंग क्यों नहीं जाना, कहाँ घूमना है ये पूछने का उसने मुझे मौका ही नहीं दिया. दो पल वहीँ फोन के पास खड़ा होकर मैं सोचने लगा, कि  आज ऐसा क्या है जो उसे घूमना है....कि तभी मेरी नज़र सामने दीवार पर टंगे  कैलेण्डर पर गयी, और फिर तुरंत मुझे पिछले शाम की कही उसकी बाद याद आई...आज क्रिसमस का दिन है, और उसे आज ये दिन सेलिब्रेट करना है.आज उसके साथ मुझे दिन भर घूमना होगा, ये मैं समझ गया था. एक तो क्रिसमस और उसपर से सुबह वो मेरे मजाक से चिढ़ गयी थी...अब पूरे दिन वो जो भी कहेगी उसे मुझे मानना पड़ेगा. ये भी एक नियम सा था...जब भी वो नाराज़ होती, उस दिन उसकी हर एक बात मानना मेरे लिए कम्पल्सरी होता था.
मैं जल्दी जल्दी अपना समान समेटने लगा..….बैग, स्कूटर की चाभी, मफलर और दस्ताने…सब निकाल कर कुर्सी पर रख दिया, ताकि मैं कुछ भी भूलूँ नहीं…कुछ और भूल भी जाऊं तो कोई बड़ी बात नहीं थी, दस्ताने ले जाना जरूरी था…मुझे कभी समझ नहीं आया की दस्ताने से उसे इतनी मुहब्बत क्यों थी, उससे कभी मैंने मफलर, टोपी या स्वेटर पहनने के लिए इतनी डांट नहीं सुनी होगी जितनी दस्ताने नहीं पहनने पर सुननी पड़ती थी.
वैसे मैं कभी कभी ये कोशिश करता था कि  मैं दस्ताने ले जाना जानबूझकर भूल जाऊं...दस्ताने घर में भूल जाने में एक सुख था, लेकिन उस सुख को एक अच्छी खासी डांट से होकर गुज़ारना पड़ता था. जब भी मैं दस्ताने ले जाना भूल जाता, वो मुझे अपने हाथों को इस्तेमाल नहीं करने देती...उसके साफ़ इन्स्ट्रक्शन रहते थे...कि  तुम अपने हाथों को अपने जैकेट के पॉकेट में घुसाए रखो, तुम्हे चाय पीना हो, या कुछ खाना हो या कुछ लिखना हो...सब मैं करूँगी. मैं इस सुख के लालच में कभी दस्ताने जानबूझकर घर भूल जाता तो कभी मैं दस्तानों को स्कूटर के डिक्की में या अपने बैग में छुपा देता...वैसे शायद उसे हर बार ये पता चल जाता था, कि  मैंने दस्ताने छिपाये हैं या सच में घर पर मैं उसे भूल गया हूँ...हालाँकि उसने कभी बताया नहीं मुझे ये बात, ये बस मेरा एक अनुमान ही है.
उस सुबह भी ठीक सवा छः बजे मैं कोचिंग क्लास के नीचे खड़ा होकर उसका इंतजार ही कर रहा था कि  मेरे मन को एक शरारत सूझी.....उसके आने के ठीक पहले ही मैंने जानबूझकर अपने दस्ताने छिपा कर बैग में रख लिए..
उसने मुझे दूर से ही देख लिया था, और शायद ये भी कि मैंने हाथों में दस्ताने नहीं पहने हैं....उसके चेहरे के भाव को मैंने दूर से ही पढ़ लिया था. पास आते ही उसने बिना कुछ पूछे बिना कुछ सुने, एक ज़ोर की डांट लगायी...."निकलते वक़्त फोन पर तुम्हें याद दिलाया था, कि दस्ताने रख लेना...लेकिन फिर भी भूल गए तुम...देखते हो कितनी ठंड है आज??स्कूटर चला कर आये हो? हाथ सुन्न पड़ गए होंगे तुम्हारे...”

उसे मैंने कोई एक्स्प्लनेशन नहीं दिया...यूँ भी ऐसे जब जानबूझकर मैं शरारत करता था तो उसे कोई एक्स्प्लनेशन मैं देता नहीं था...शायद इसी से वो ये समझ जाती होगी की कब मैं शरारत कर रहा हूँ और कब नहीं..
वो मुझे डांट रही थी, एक तो दस्ताने नहीं पहनने की वजह से, दूसरी उसे फोन पर डरा देने की वजह से...मैं चुपचाप बिना कुछ कहे उसकी डांट सुनते रहा....उस सुबह उसकी डांट इतनी प्यारी लग रही थी, कि  मैं मन ही मन सोचता कि ये अपना डाँटना ययूँ हीं कन्टिन्यू रखे.....और मैं बस इसके सामने खड़े होकर इसकी डांट सुनता रहूँ....वो मुझे ऐसे डांट रही थी, कि अगर कोई दूसरा देखता हमें तो उसे लगता कि  कोई टीचर अपने स्टूडेंट को डांट रही है...
उसकी डांट अब तक खत्म नहीं हुई थी, लेकिन उसने जब नोटिस किया कि मैं कुछ भी नहीं कह रहा हूँ और चुपचाप उसकी डांट सुन रहा हूँ तो शायद एक हल्का गिल्ट उसके मन में आ गया और तब वो अचानक डांटते हुए रुक गयी....कहने लगी “चलो तुम्हें बहुत डांट दिया न, अब चाय पिलाती हूँ....” मैं मुस्कुराने लगा था, “चलो”, मैंने कहा....और हम दोनों चाचा की दुकान की तरफ बढ़ गए.
“सुनो तुम अपने दोनों हाथ जैकेट के पॉकेट में डाल लो....खबरदार इतनी ठंड में अपने हाथों को पॉकेट से बाहर निकाला तो....” चलते हुए उसने कहा...
“अरे तो मैं चाय कैसे पियूँगा?” मैं जवाब जानते हुए भी ये सवाल उससे पूछ बैठा.. वो थोड़े गुस्से में, थोड़े प्यार से कहती... “चाय पीने के लिए तुम्हे हाथ बाहर निकालने की क्या जरूरत है?मैं जो हूँ तुम्हे चाय पिलाने के लिए...”
मैं यही चाहता था...सर्दियों की सुबह जब भी मैं अपने दस्ताने भूल जाता, वो मुझे यूँ हीं अपने हाथों से चाय पिलाती...मेरे लिए ये सर्दियों के सुबह का सबसे बड़ा सुख था....जिसके लिए मैं अकसर थोड़ी बहुत डांट सुन लिया करता था....
हम दोनों चाचा के दुकान पहुँच गए थे....ये दुकान मुख्य सड़क से थोड़ी दूर एक गली में थी जहाँ हम सर्दियों में हर सुबह चाय पीने आते थे. चाचा की चाय दुकान में चाय के अलावा थोड़ी बहुत मिठाइयाँ और स्नैक्स भी मिलते थे. उनके चाय की दुकान के ठीक सामने एक कंप्यूटर  कोचिंग क्लास थी, और वहाँ के अधिकतर लड़के-लडकियाँ चाचा के दुकान पर सुबह-शाम नज़र आते थे...कंप्यूटर कोचिंग के स्टूडेंट्स के अलावा और बाहरी कोई उस चाय दुकान पर कम ही दिखाई देता था. यहाँ आने की हमारी आदत कुछ एक दो साल पहले पड़ी थी, जब हम दोनों ने कंप्यूटर कोचिंग क्लास में एड्मिसन लिया था और सामने चाचा के चाय की दुकान पर हर सुबह चाय पीते थे. वे सर्दियों के ही दिन थे.
हम चाचा के दुकान में सिर्फ सर्दियों के मौसम में सुबह की चाय पीने आते थे, गर्मियों के दिन में उस गली में हम कभी जाते भी नहीं थे....मैं फिर भी कभी गर्मियों की शाम भूले भटके चचा के दुकान चला भी आता था लेकिन वो सिर्फ सर्दियों की सुबह ही चाचा के चाय दुकान पर आती थी.
चाचा को लेकर उसके कई सारे आश्चर्य थे. पहला तो उसे इस बात से हद हैरानी होती थी की चाचा की याददाश्त इतनी अच्छी कैसे है. हम उनके दुकान पर सिर्फ नवम्बर से मार्च के महीने में ही आते थे फिर भी वो हमेशा हमें हमारे नाम से पहचान जाते थे, ये कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, लेकिन फिर भी उसे इस बात पर बड़ी हैरानी होती थी. चाचा थे भी ऐसे, जैसे हमारे घर के ही वो कोई बुजुर्ग हों....वो सब लोगों का हाल चाल वैसे ही लिया करते थे. उसे वो बिटिया कह कर बुलाते थे, वो बहुत खुश हो जाया करती थी जब चाचा उसे बिटिया कह कर बुलाते थे. उसे चाचा की दाढ़ी को देखकर भी थोड़ी हैरानी होती थी....वो उनकी दाढ़ी की तुलना बर्फ से कर देती….वो कहती “इनकी दाढ़ी तो देखो, लगता है चचा के चेहरे पर दाढ़ी नहीं बर्फ उग आई है….”
सुबह हम चाचा की दुकान पर जैसे ही पहुंचे, उसने मेरे कानों में कहा “चाचा को आज हम अगर सांता क्लॉज का गाउन पहना दें तो वो परफेक्ट सांता दिखेंगे न....” मेरी हाँ या ना का इंतजार किये बिना ही उसने यही बात चाचा से कह दी.... “चाचा आपको अगर सांता के कपड़े पहना दें तो आप बिलकुल सांता क्लॉज जैसे दिखेंगे”
चाचा ज्यादा कुछ समझ नहीं पाए....उन्होंने पूछा “सांता कौन है?”
वो पूरे आश्चर्य में कहती है.... “अरे चाचा, आपको सांता नहीं पता???वही जो क्रिसमस पर तोहफे और खुशियाँ बांटता है...और बच्चों को चॉकलेट्स देता है....” चाचा को कुछ ख़ास समझ में नहीं आया, दो पल सोचने के बाद वो कहते... “अच्छा, मैं वो तो नहीं, लेकिन हाँ देखो मैं चाय जरूर बांटता हूँ, पिलाता हूँ....और ये लो तुम्हे चॉकलेट भी दे रहा हूँ.....” कह कर उन्होंने सामने रखी टॉफी के डिब्बे से एक टॉफी निकाल कर उसे दे दी.....
वो बहुत खुश हो गयी..
“अरे आप तो सच में आज मेरे लिए सांता बन गए, वो भी बिना सांता के रेड गाउन के ही...क्रिसमस के सुबह देखिये आपने मुझे टॉफी दे दी.....” वो हँस रही थी.. मुझे लगा था कि  चाचा के साथ बात करने में वो अपने गुस्से को भूल गयी है...और शायद अब मुझे आगे डांट नहीं पड़ेगी.लेकिन ये मेरा भ्रम था.
उसने टॉफी खायी नहीं, बल्कि उसे उसने अपने बैग में रख लिया. चाय का कप अपने हाथों में पकड़े हुए वो कुछ देर जाने क्या सोचने लगी.....
वो ऐसा करती थी, चाय पीने से पहले वो अकसर कुछ देर तक चाय के कप को दोनों हाथों से पकड़े रहती थी.....मैं जब भी उसे यूँ चाय हाथ में पकड़े देखता, तो उसे कहता “हाथों में दस्ताने पहन कर तुम चाय के कप से अपना हाथ सेंक रही हो...” उसे मेरी ये बात शायद ज्यादा अच्छी नहीं लगती थी....मेरी इस बात का वैसे तो वो जवाब नहीं देती थी लेकिन कभी कभी वो तुरंत पलट कर कह देती “दैट वाज अ पी.जे....” 

“चचा आपको पता है, आज कल के कुछ बच्चे बहुत लापरवाह हो गए हैं...” हाथों में चाय का कप लेते हुए कुछ सोचते हुए उसने चाचा से कहा....
चाचा को फिर से कुछ समझ नहीं आया.... “हाँ बेटी सो तो है, सब तुम्हारे जितने समझदार नहीं होते...” उन्होंने कहा. चाचा की इस बात से उसका चेहरा थोड़ा खिल सा गया. अपनी तारीफ़ सुनने के बाद यूँ भी उसके चेहरे पर 880 वाल्ट की स्माइल आ जाती थी.
लेकिन अपनी ख़ुशी को छिपाते हुए उसने फिर आगे कहा... “हाँ चाचा देखिये न, कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं, उन्हें कितना भी याद दिलाओ आप, वो दस्ताने हमेशा भूल जाते हैं...” उसके सीधे निशाने पर मैं था....मेरी तरफ देखते हुए उसने ये कहा था.
वो जब भी ऐसे मेरी शिकायत करती, चाहे वो चाचा से, या मेरी बहन से या फिर अपनी दीदी से...मुझे हमेशा वो अपने उम्र से दस साल बड़ी दिखने लगती.
चाचा को थोड़ा बहुत अंदाज़ा था की वो किसके तरफ इशारे कर रही है.....उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा “क्यों बाबु, आज दस्ताने फिर से भूल गए तुम? सुन लो आज फिर बिटिया की डांट......वैसे तुम दोनों की ये मीठी लड़ाई अच्छी लगती है, तुम दोनों की दोस्ती बने रहे...” चाचा ने कहा...वो ये सुन कर खुश हो गयी...."देखो चाचा की प्यारी बातों ने तुम्हें आज बचा लिया है...वरना आज मैं इतनी जल्दी मानने वाली नहीं थी...."उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा...
"हाँ, वैसे भी तुम गुस्सा होने का अच्छा नाटक कर लेती हो, तुम्हारी सभी हरकतों से वाकिफ हूँ मैं".
वो मुस्कुराने लगी.

उस दिन जैसा उसने फोन पर कहा था, वैसा ही हुआ...हम क्लास नहीं गए....हमारी क्लास तो थी, लेकिन उसका तर्क था, कि क्रिसमस की सुबह भी कोई पढ़ता है क्या? वो चाहती थी कि क्रिसमस की सुबह वो मेरे साथ शहर घूमे...कोहरे में लिपटी सुबह उसे पसंद थी...हम दोनों बहुत देर तक घूमते रहे थे....गणेश की दुकान की जलेबियाँ और कचौड़ियाँ हमने खायी...उसकी पेस्ट्री खाने की जिद थी, लेकिन उतनी सुबह, साढ़े सात-आठ बजे कम ही दुकान खुलते थे.....एक दुकान पर हमारी नज़र गयी, जहाँ हमने देखा कि दुकानदार दुकान खोल ही रहा है...हम वहीँ गए पेस्ट्री खाने.हम जैसे ही दाखिल हुए दुकान में, उसने सीधे दुकानदार से कहा “क्या भैया, क्रिसमस के दिन भी कोई इतनी देर दूकान बंद रखता है क्या?” बेचारा दुकानदार अपने चेहरे पर हैरानी के एक्स्प्रेशन लेकर हमें देखता रहा...पेस्ट्री खा कर हम वहाँ से वापस चाचा के दुकान आ गए.
“चाचा एक कप चाय और पिलाइये न..” उसने चाचा से कहा...
“आज तुम दोनों की क्लास नहीं थी क्या? बहुत जल्दी आ गए तुम दोनों?” चाचा को हमारी टाईमिंग पता होती थी, जब भी हम दस बजे के पहले पहुँच जाते उनके दुकान, वो समझ जाते थे कि  हम क्लास नहीं गए और घूम रहे थे....उन्होंने फिर पूछा... “जब तुम लोगों को क्लास नहीं जाना होता तो यहाँ आकर क्यों बैठे रहते हो इतनी ठंड में?
मैंने उसकी तरफ इशारा कर के कहा , “इसे कहिये चाचा...मुझे तो वैसे भी जाड़ों के सुबह की नींद बहुत प्यारी है...सिर्फ इसी की मेहरबानी है कि  मुझे हर सुबह आना पड़ता है, इसके साथ घूमना पड़ता है..”
“अरे....तो क्या हुआ? देखिये चाचा मेरे दो ही तो सच्चे दोस्त हैं...बारिश और दिसंबर...और मैं इस महीने में घूमूं भी नहीं?” उसने बड़े मासूमियत से चाचा को देखते हुए ये बात कही...
"हाँ घूमो, लेकिन धूप निकली रहे तब....ऐसे ख़राब मौसम में क्यों घूमती हो?" चाचा ने कहा...
“अरे चाचा...ये ख़राब मौसम है??इसे आप ख़राब मौसम कहते हैं???ये तो सबसे सुन्दर मौसम है..जो इस मौसम को ख़राब कहते हैं उनका दिमाग ख़राब होता है...डरपोक लोग दुबके रहते हैं इस मौसम में रज़ाई और कम्बल में...मैं तो घूमती हूँ....” उसने एक ही सुर में ये कह दिया...
चाचा भी समझ गए थे, इस लड़की से बहस करने का कोई फायदा नहीं...वो बस मुस्कुरा कर रह गए.


सुबह के नौ बज गए थे, और चाचा के दुकान भी अब खाली नहीं थी...सामने कंप्यूटर कोचिंग क्लास की पहली क्लास दस बजे लगती थी, तो वहाँ पढ़ने वाले लड़के लड़कियों की भीड़ दुकान पर होने लगी थी.....वो ऐसे में ज्यादा देर तक दुकान पर बैठती नहीं थी...वो तभी वहाँ बैठती जब वहाँ कोई और न हो, या फिर कम लोग बैठे हों..

हम चाचा के दुकान से वापस कोचिंग कोम्प्लेक्स आ गए. चाचा के दुकान से कोचिंग तक आने में जितना समय लगा, उतने समय में उसने पूरे दिन का कार्यक्रम भी बना लिया था....मुझे उसने सिर्फ ढाई घंटे का वक़्त दिया था और कहा था कि सीधे बारह बजे तुम मुझे अशोक थिएटर के सामने मिलना, वहाँ एक अच्छी फिल्म लगी है, तुम टिकट लेकर रखना...शहर का वो एकमात्र थिएटर था, जहाँ फ़िल्में देखने वो जाया करती थी...वरना बाकी थिएटर उसे कुछ ख़ास पसंद नहीं थे..
उस पूरे दिन मैं उसके साथ घूमता रहा था, लगभग सुबह के सवा छः बजे से शाम के साढ़े छः बजे तक हम साथ घूमे थे.वो मेरी पहली क्रिसमस थी जो उसके साथ बीती थी, इसके पहले कभी इस दिन को मैंने सेलिब्रेट नहीं किया था...वैसे भी उन दिनों हमारे शहर में क्रिसमस से ख़ास मतलब किसी को था नहीं...शायद इसलिए जब उसने पेस्ट्री दूकान में दुकानदार से ये कहा था कि  क्रिसमस के सुबह भी आप इतनी देर से दूकान खोलते हो, तो दुकानदार ने हमें हैरानी से देखा था. सुबह के पेस्ट्री के बावजूद शाम में हमने क्रिसमस केक खाया...शाम को बाकी दोस्त भी मौजूद थे.सभी दोस्तों को फोन पर धमका कर उसने शाम में कोचिंग क्लास बुलाया था...किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि  उसकी धमकी को इग्नोर कर सके, शाम की कड़कती ठंड में भी सब बिलकुल तय समय पर कोचिंग पहुँच गए थे...और फिर हमने कोचिंग कोम्प्लेक्स के टेरेस पर क्रिसमस केक काटा था. नाश्ते का भी प्रबंध किया गया था और वो हमारी एक छोटी सी पार्टी हो गयी थी.

उसी रात हम बहुत देर तक बातें करते रहे थे.वो मेरे से कहानियाँ और मेरी लिखी उस समय की कवितायेँ सुनना चाहती थी.उस रात उसके कमरे में उसके साथ उसकी बड़ी बहन भी सोयी थी...वो उधर से कुछ कह नहीं सकती थी, उसने शाम में मुझे फोन पर बस इतना कहा था....की रात में ग्यारह के बाद मैं फोन करुँगी, और सिर्फ एक शब्द का सिग्नल दूंगी...(उसने कहा था, की वो सिर्फ हेल्लो बोलेगी) और तुम समझ जाना कि  ये मेरा फोन है, तुम अपनी कवितायें और डायरी में लिखी अपनी बातें मुझे सुनाते रहना, जब तक तुम्हे नींद न आ जाए....और मैं सुनती रहूंगी, रज़ाई में दुबक कर...रात में, ठीक ग्यारह बजे उसने मुझे फोन किया और जैसा उसने कहा था, ठीक वैसे ही डेढ़ घंटे तक मैं उससे इकतरफा बात करते रहा था.वो हमारे बीच हुई पहली साईलेंट कॉल थी. 


वो एक यादगार क्रिसमस का दिन था मेरे लिए !

यादों में एक दिन - क्रिसमस