Monday, April 18, 2011

कुछ टुकड़े डायरी के पन्नों से

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सच, मैं अब तुम्हे याद करना नहीं चाहता..तुम्हे भूलने की हर कोशिश करता हूँ, लेकिन फिर भी तुम याद आती हो.तन्हाई में, जब अकेले होता हूँ(आजकल अकेले ही अधिकतर रहता हूँ) तो बस पांच लोगों का ख्याल आता है, जिसमे से एक तुम भी हो.मैं नहीं चाहता की तुम अब ख्यालों में भी आओ, लेकिन क्या मेरे ख्यालों पे मेरा बस है?तुम ही कहो..कैसे तुम्हारी हर बातों को एकाएक एकदम से भूल जाऊं.अब ना तो मैं किसी से तुम्हारा जिक्र करता हूँ और न कोई तुम्हारी बातें करते हैं.जो करीबी हैं वो अब तुम्हारा नाम तक नहीं लेते मेरे सामने, लेकिन अनजान लोग कभी पूछ ही देते हैं तुम्हारे बारे में.मैं उस समय बड़ा कशमकश में फंस जाता हूँ, की क्या कहूँ उनसे? सारी बातें, बेमतलब हैं किसी को भी बताना..बता भी दूँ तो होगा क्या??क्या बताने से तुम वापस आ जाओगी? मैं बस ऐसे लोगों के प्रश्नों को मजाक में टाल देता हूँ.क्यूंकि अगर एक प्रश्न का जवाब दिया तो सैकड़ों प्रश्न और खड़े हो जायेंगे और मुझे सब सवालों के जवाब देने पड़ेंगे.

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कल युहीं तुम्हारे प्रोफाइल को बड़े गौर से देख रहा था.पहले कैसे तुम्हारा प्रोफाइल हमेशा चहका चहका सा दीखता था..तरह तरह के स्टेट्स, पागलपन वाले, बच्चों वाले,अजीब से बेवकूफियों वाले स्टेट्स और उन सब बेमतलब बेवकूफियों वाले स्टेट्स पे ढेरों कमेन्ट.लेकिन अब वही प्रोफाइल तुम्हारा एकदम बेरंग हो गया है.शायद जिन लोगों के वजह से तुम्हारे प्रोफाइल में वो रंगत थी, वो भी अब कशमकश में फंस जाते होंगे की क्या लिखें तुम्हारे प्रोफाइल पे, क्या कमेन्ट करें? ये वही लोग हैं जो तुमसे और मुझसे ऐसे जुड़े हुए हैं की मेरी और तुम्हारी कोई भी बात इनके जिंदगी पे असर डालती है.इनमे से एक से जब इस बार दिल्ली में मिला तो मैं समझ गया था की वो तुम्हारे बारे में कुछ पूछना चाह रही थी, उसकी आँखों में मैंने वो सवाल देखें थे,उसने इशारों में पूछा भी था..मैं उस मौके को गमगीन नहीं बनाना चाह रहा था इसलिए मैंने भी बस इशारों में उसे जवाब दे दिया.कल बहुत दिल किया की तुम्हे अपने फ्रेंडलिस्ट से अलग कर ही दूँ, लेकिन चाह के भी मैं "अनफ्रेंड" वाले ऑप्सन को क्लिक नहीं कर पाया, पता नहीं क्यों.

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आज शाम बहुत मस्त बारिश हुई, ठंडी हवा चल रही है, और ऐसे में तुम याद न आओ ये तो नामुमकिन है.बारिशों में तुम और भी याद आती हो.तुम्हे बारिश दीवानगी की हद तक प्यारी थी.उन दिनों तुम्हे बारिशों में भीगना, घुटने तक पानी से गुजरना और अपने कम्पाउंड में नाव चलाना बहुत पसंद था.तुम अक्सर बारिशों में रूमानी हो जाया करती थी और कभी कभी कुछ ऐसी बातें भी कर देती थी जो मुझे हद हैरान कर जाया करती थी.
आज सुबह से कुछ ऐसी बातें हो रही थी, जिससे अनजाने ही तुम्हारा ख्याल ज़हन में आ जा रहा था.शाम मौसम ने करवट ली और आकाश में बादल छा गए, ऐसे में मेरा घर में रहना तो मुमकिन नहीं था, अपना आईपोड उठाया और निकल गया सड़कों पे.कुछ ही देर में झमाझम बारिश होने लगी.मैं बगल वाले बस स्टैंड के तरफ बढ़ा, जहाँ मैं अक्सर शाम को बैठा करता हूँ.आईपोड पे गाने चल रहे थे और मैं बस बारिश देख रहा था.अभी बारिश रुकी भी नहीं थी की पता नहीं किस ख्याल में खोये हुए बारिश में ही चलने लगा.भींगते हुए घर पंहुचा.पूरी शाम तुम्हारी बहुत याद आई.